तोड़ रहे हैं सुबह की ठंडी हवा को फूट रही सूरज की किरनें और नन्हें-नन्हें पंछियों के गीत मजदूरों की काम पर निकली टोलियों को किरनों से भी ज्यादा सहारा गीतों का है शायद नहीं तो कैसे निकलते वे इतनी ठंडी हवा में !
हिंदी समय में भवानीप्रसाद मिश्र की रचनाएँ