इस दुनिया को सँवारना अपनी चिता रचने जैसा है और बचना इस दुनिया से अपनी चिता से बचने जैसा है संभव नहीं है बचना चिता से इसलिए इसे रचो और जब मरो तो इस संतोष से कि सँवार चुके हैं हम अपनी चिता !
हिंदी समय में भवानीप्रसाद मिश्र की रचनाएँ