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कविता

आश्वस्त
भवानीप्रसाद मिश्र


हम
रात-भर तैरेंगे

और अगर
डूब नहीं गए
सवेरे तक

तो कोई न कोई
डोंगी छोटी
या बड़ी कोई नौका

फिर देगी हमें मौका
धरती पर पहुँचकर
उथल-पुथल करने का !

 


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हिंदी समय में भवानीप्रसाद मिश्र की रचनाएँ