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आलोचना

प्रेमचंद और राष्ट्रवाद
राजकुमार


आधुनिकता के उदय की तार्किक परिणति यह हुई कि गैर पश्चिमी समाज पारंपरिक मान लिए गए। इन पारंपरिक समाजों के अध्ययन के लिए दो नए विषयों की स्थापना हुई जिन्हें एंथ्रोपॉलजी और औरियंटलइज्म नाम दिया गया। पश्चिम की नजर में जो निहायत ही अविकसित कबीलाई समाज थे उनका अध्ययन एंथ्रोपॉलजी के अंतर्गत और जो थोड़े विकसित किंतु पश्चिम के मुकाबले पिछड़े समाज थे उनका अध्ययन ओरियंटलइज्म के अंतर्गत किया गया। ओरियंटलइज्म के भी कई उपविभाग किए गए। भारत से संबंधित जो ज्ञान पश्चिमी विद्वानों ने तैयार किया उसे इंडोलॉजी कहा गया।

पश्चिमी विद्वानों ने माना कि भारत का अतीत तो बेहतर था लेकिन आगे चल कर इसकी प्रगति अवरुद्ध हो गई, इसका पतन हो गया, यह परंपरा की अमानवीय बेड़ियों में कैद होकर रह गया। (देखें आनिया लुंबा की किताब 'कोलोनियलइज्म/पोस्ट कोलोनियलइज्म', रूटलेज) इस पारंपरिक समाज की अवरुद्ध गति को मुक्त करने का बीड़ा औपनिवेशिक आधुनिकता ने उठाया! (भए प्रकट कृपाला दीनदयाला...) मतलब यह कि पश्चिम से बाहर पड़नेवाले समाज अब पारंपरिक समाज हो गए। वैसे तो हिंदुत्ववादी विचारक भी भारतीय समाज को अपरिवर्तनशील मानते हैं लेकिन ओरियंटिलिस्टों के विपरीत वे अपरिवर्तनशीलता को पतन नहीं, श्रेष्ठता के सबूत के रूप में पेश करते हैं (जो भी हो फिलहाल हमारा मकसद इस बहस को आगे बढ़ाने का नहीं है।) वस्तुतः आधुनिकता के उदय के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि परंपरा का मतलब परिवर्तनहीनता हो गया। इससे पहले परंपरा और परिवर्तनशीलता परस्पर विरोधी पद नहीं थे। परंपरा में परिवर्तन की अवधारणा शामिल थी, यह अलग बात है कि इन दोनों में परंपरा को प्राथमिकता दी जाती थी। आधुनिकता के आने के बाद परंपरा और परिवर्तन परस्पर विरोधी पद हो गए। और वही परिवर्तन श्रेयस्कर माना गया जो आधुनिकता के निकष पर खरा उतरे। इस तरह पहले तो गैरयोरोपीय समाजों का पारंपरीकरण (ट्रेडीशनाइलेजेशन) किया गया और फिर यह बताया गया कि वे अपने आप नहीं बदल सकते थे। बदलाव के लिए औपनिवेशीकरण आवश्यक है। औपनिवेशीकरण की एक सकारात्मक प्रगतिशील भूमिका को नैतिक औचित्य प्रदान करने के लिए इस तरह की स्थापना जरूरी थी।

औपनिवेशीकरण गैरयोरोपीय समाज को विकास और प्रगति के पश्चिम केंद्रित महाआख्यान में शामिल करने के लिए जरूरी था। पश्चिमी समाज की मूलभूत आलोचना करनेवाले भी यही मानते थे कि गैर पश्चिमी समाजों का भावी विकास औपनिवेशिक अधीनता के रास्ते ही संभव होगा। आशीष नंदी ने लिखा है : ''धुर कट्टरपंथी और उपनिवेशवाद के समर्थकों को ही नहीं, पश्चिमी समाज के मूलभूत आलोचकों को भी पक्का यकीन था कि एक दिन उनका सांस्कृतिक मिशन पूरा होगा और 'बर्बर' सभ्य बन जाएँगे। उन्हें विश्वास था कि कुछ समाजों के परिपक्व होने के लिए उपनिवेशवाद एक आवश्यक चरण है।'' (इंटीमेट एनमी, ओ.यू.पी., दिल्ली, 1983, पृ.14)। यहाँ तक कि मार्क्सवाद, जिसे सामान्य रूप से उपनिवेशवाद और शोषण का विरोधी माना जाता है, अपने यूटोपिया की चरितार्थता के लिए उपनिवेशवाद की सकारात्मक भूमिका खोज लेता है। राबर्ट युंग के शब्दों में ''विश्व इतिहास की तार्किक प्रणाली के अभ्युदय का मार्क्सवादी महाआख्यान वस्तुतः योरोपीय साम्राज्यवाद के इतिहास का नकारात्मक रूप है। अंततः हीगेल ही थे जिन्होंने घोषणा की कि अफ्रीका का कोई इतिहास नहीं है, मार्क्स ही थे जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आलोचना करने के बावजूद इस नतीजे पर पहुँचे कि अंततः ब्रिटिश साम्राज्यवाद से भारत का भला ही हुआ, क्योंकि उसी की वजह से भारत पश्चिमी इतिहास के विकसनशील आख्यान में दाखिल हुआ, और इस प्रकार उपनिवेशवाद ने वर्ग संघर्ष के लिए हालात तैयार किए। मार्क्स ने हेगेल को सर के बल खड़ा करके उनके आदर्शवाद को भले ही उलट दिया हो लेकिन इससे अवधारणात्मक प्रणाली की संचालन प्रविधि में कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी मूलतः यूरो केंद्रित बनी हुई है।'' (ह्वाइट मायथालजी, रूटलेज)

यही नहीं, मार्क्स ने भारत को अर्द्धबर्बरता की स्थिति से सभ्यता की ऊँचाई पर पहुँचाने का सेहरा भी ब्रिटिश उपनिवेशवाद के सिर पर बाँधा है। यह ठीक है कि मार्क्स ब्रिटिश उपनिवेशवाद के समर्थक नहीं, कटु आलोचक थे लेकिन प्रगति, विकास और सभ्यता के यूरोकेंद्रित तत्समय प्रचलित महाआख्यान के प्रभाव से वह भी पूरी तौर पर मुक्त नहीं थे। उत्तर औपनिवेशिक चिंतकों द्वारा की गई मार्क्स की आलोचना जायज है, लेकिन उन्हें उपनिवेशवाद के समर्थक के रूप में पेश करना ठीक नहीं। एरिका बेनर ने ठीक लिखा है ''मार्क्स ने योरोपीय उपनिवेशवाद की सकारात्मक सराहना नहीं की बल्कि उनकी चिंता यह थी कि भारत में एक ऐसे सामाजिक आंदोलन का जन्म हो जो उपनिवेशवाद विरोधी तो हो ही, साथ ही पारंपरिक निरंकुशता का भी विरोधी हो; मार्क्स के अनुसार इसी कमी के कारण भारत पश्चिमी आक्रमण के सामने कमजोर पड़ गया।'' (रीयली इक्जिस्टिंग नेशनलिज्म : ए पोस्ट कम्युनिस्ट व्यू फ्रॉम मार्क्स एंड एंगेल्स' आक्सफोर्ड, क्लारेन्डन) उस समय यूरोप वह आर्केमेडियन बिंदु था जिसके आधार पर अन्य सभ्यताओं का मूल्यांकन होता था। इस महाआख्यान में 'अन्य' सभ्यताओं की भिन्नताओं को उनकी अक्षमता के रूप में देखा जाता था। आधुनिकता के इस महाआख्यान में दीक्षित मानस या तो अपनी परंपरा और संस्कृति को निकृष्ट मानने लगता था या अपनी परंपरा और संस्कृति में भी उन्हीं तत्वों की खोज करता था जिन्हें इस महाआख्यान द्वारा वैध माना गया था।

भिन्नता अक्षमता के बजाय विशिष्टता की भी सूचक हो सकती है और उसके महत्व को नकारने के बजाय उसे समझने और वैकल्पिक संभावना पर गर्व करने की सार्थकता भी हो सकती है। जाहिर है यह गर्व संग्रह और त्याग के आलोचनात्मक विवेक के बिना परंपरा और संस्कृति के प्रति अंधपूजा का रूप ले लेता है। कालिदास ने लिखा है कि पुरानी होने से ही कोई चीज 'साधु' और नई होने से 'वंदनीय' नहीं हो जाती। इसीलिए संत किसी चीज को परीक्षा के बाद स्वीकार करते हैं जबकि मूढ़ दूसरे की बुद्धि से चलते हैं। आधुनिकता के महाआख्यान को निकष के रूप में स्वीकार कर लेने के बाद परंपरा का मूल्यांकन बहुत आसान हो गया। वस्तुतः यह परंपरा का मूल्यांकन था ही नहीं, परंपरा को आधुनिकता के साँचे में फिट करने की कोशिश थी। परंपरा ने औपनिवेशिक आधुनिकता को प्रश्नांकित, संशोधित और परिवर्तित करने का काम किया ही नहीं। उसने आधुनिकता को परंपरा की शब्दावली में सिर्फ अनूदित करने की कोशिश की। उसने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि आधुनिकता का परंपरा की शब्दावली में यथावत अनुवाद ज्ञानमीमांत्मक हिंसा के बिना संभव ही नहीं। पार्थ चटर्जी जैसे राजनीतिविज्ञानी यदि भारतीय राष्ट्रवाद को पश्चिमी आधुनिकता का 'डिराइवेटिव डिसकोर्स' कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं?

अकारण नहीं है कि प्रेमचंद का अध्ययन प्रायः आधुनिकता द्वारा स्वीकृत और राजनीतिक दृष्टि से 'सही' मुद्दों के आधार पर किया गया है। इसी क्रम में प्रेमचंद को कालक्रमानुसार देखने और किसी एक कालखंड की रचनाओं को अपनी समझ के करीब पड़ने के कारण विशेष तरजीह दी गई। जैसे प्रेमचंद के अंतिम दौर की रचनाओं को मार्क्सवादी विद्वानों ने ज्यादा महत्व दिया क्योंकि उनके अनुसार प्रेमचंद इस दौर में 'लगभग' मार्क्सवादी हो गए थे। इस तरह के अध्ययन की विडंबना यह है वह यह मान कर चलता है कि सच क्या है, यह उसे पहले से मालूम है। इस सच के समर्थन में एक गवाह के रूप में पेश करने के लिए वह प्रेमचंद को ठोंक पीट कर अपने सच के अनुरूप ढालने की कोशिश करता है। यानी यहाँ प्रेमचंद स्वयं में महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण हैं वह सच जो उसे पहले से मालूम है। यह प्रेमचंद का रिडक्शन है, पहले से ज्ञात सच में प्रेमचंद के रचनात्मक अवदान को हजम कर लेने की कोशिश है। प्रेमचंद से कोई रचनात्मक संवाद या मुठभेड़ करने के बजाय पूर्व ज्ञात सत्य में प्रेमचंद के व्यक्तित्व को विलुप्त करने की यह कोशिश पॉलिटकली करेक्ट हो सकती है लेकिन यह हमारे ज्ञान या समझ में कुछ नया नहीं जोड़ती। यह ऐसी पुनरावृत्ति है जो अमौलिक होने के लिए अभिशप्त है। सच तो यह है कि यहाँ नया कुछ खोजने या जानने की जरूरत ही नहीं है।

प्रेमचंद भारतीय समाज की सामंती वर्णव्यवस्था के कटु आलोचक थे लेकिन वे पश्चिम के अंध समर्थक नहीं थे। यही कारण है कि उन्हें आज के कथित दलित हितैषियों की तरह भारतीय सभ्यता में सब कुछ बुरा ही बुरा नहीं दिखाई पड़ता था। भारतीय सभ्यता की आलोचना की पूर्व शर्त पश्चिम का अंध समर्थन नहीं है और भारतीय सभ्यता की आलोचना का मतलब भारतीय सभ्यता का पूर्ण निषेध भी नहीं है। क्योंकि भारतीय सभ्यता के पूर्ण निषेध की तार्किक परिणति पश्चिमी साम्राज्यवाद के अंध समर्थन में होती है। जो लोग पश्चिमी साम्राज्यवाद के विरोध को ही गलत मानते हैं और 'देर से आए जल्दी चले गए' का जाप करते रहते हैं, उनका प्रेमचंद की विरासत से कोई संबंध नहीं है। यदि वे प्रेमचंद को दलित विरोधी कहते हैं तो बिलकुल ठीक कहते हैं। उनकी नजर में साम्राज्यवाद का विरोध करनेवाला दलित हितैषी हो ही नहीं सकता। प्रेमचंद साम्राज्यवाद के विरोधी थे और पश्चिम की हर बात का आँख मूँद कर समर्थन नहीं करते थे।

जैसा कि पहले भी कहा गया, प्रेमचंद साम्राज्यवाद और सामंती वर्णव्यवस्था दोनों के विरोधी थे। वर्णव्यवस्था की आलोचना करने के लिए उन्हें न तो साम्राज्यवाद का समर्थन करने की जरूरत महसूस हुई और न ही भारतीय सभ्यता की सकारात्मक उपलब्धियों को पूरी तौर पर नकारने की। सच्चाई यह है कि साम्राज्यवाद का समर्थक सही मायने में सामंतवाद का विरोधी नहीं हो सकता। भारतीय सभ्यता की बुराइयों का बढ़ चढ़ कर बखान करनेवाले मिस मेयो के समकालीन वंशज वस्तुतः वर्णव्यवस्था के विरोधी नहीं हैं। वर्णव्यवस्था का सुसंगत विरोध साम्राज्यवाद का भी विरोध है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने सामंती जागीरदारी व्यवस्था को खत्म कर किसानों में जमीन बाँटने की पहल कभी नहीं की। अंग्रेजी साम्राज्यवाद वस्तुतः सामंतवाद के सहारे ही फला फूला और परवान चढ़ा। औपनिवेशिक जनता के लिए सबसे जरूरी चीज जमीन होती है जिस पर उपनिवेशवाद कब्जा कर लेता है। फ्रैन्ज फेनन ने लिखा है ''उपनिवेशित लोगों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी और मूल्यवान चीज जमीन है। जमीन सर्वाधिक ठोस और बुनियादी चीज है क्योंकि इसी से उनकी रोजी रोटी चलती है और खास बात यह है कि इसी से उनकी इज्जत मरजाद बनती है।'' (रेचेड आफ अर्थ, पृ. 34 पेंग्विन, 1974)

जमींदारी व्यवस्था खत्म कर किसानों में जमीन बाँटने और बिना किसी भेदभाव के सभी को समान नागरिकता देने का काम उपनिवेशवाद ने नहीं, राष्ट्रवाद ने किया। लेकिन दलित हितैषी चिंतकों की दृष्टि में औपनिवेशिक शासन के सिवा बाकी सभी वर्णवादी लगते हैं। राष्ट्रवाद की कमियाँ गिना कर उपनिवेशवाद का समर्थन करने में इन्हें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। औपनिवेशिक शासकों के प्रति इस भक्ति विह्वल प्रेम की जितनी तारीफ की जाय कम होगी। एकतरफा प्रेम में बौराए इन बेचारों को यह भी नहीं पता कि औपनिवेशिक शासक इनके बारे में क्या सोचते हैं। उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक शासक सफेद नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। सभी भारतीय उनकी दृष्टि में हीन प्रजाति के थे। इन हीनों में सवर्ण बेहतर थे क्योंकि वे पतित आर्य थे; दलित पतित आर्य भी नहीं थे, वे निकृष्टतम प्रजाति के थे। (देखें पीटर वैनेडर वीर की 'इंपीरियल इनकाउंटर' पुस्तक, ओरियंट एंड लांग मैन, दिल्ली)

हिंदी में इन दिनों प्रगतिशीलता का एक नया ढब निकला है। इस ढब के मुताबिक उपनिवेशवाद भारत के लिए और विशेष रूप से दलितों के लिए वरदान था। दलितों का उद्धार करने के लिए ही अंग्रेजों ने भारत को उपनिवेश बनाया था। बुरा हो राष्ट्रवादियों का जिन्होंने उन्हें ज्यादा दिन टिकने नहीं दिया। वे देर से आए और जल्दी चले गए। अब ये उन्हें दोबारा वापस बुलाने के फिराक में है। मजा यह है कि सवर्ण नेतृत्व भी इस मुद्दे पर उनके साथ है। क्यों न हो सवर्ण सामंतों ने भी 'इन दलितों' की तरह कभी नहीं चाहा कि अंग्रेज देश छोड़ कर चले जाएँ। अंग्रेजों के जाते ही उनकी जमींदारी चली गई। छूत अछूत सभी कानून की नजर में बराबर हो गए। बुरा हो गांधी का, बुरा हो कम्युनिस्टों का, बुरा हो भगत सिंह का। अंग्रेजी राज में सभी सुखी थे; सवर्ण भी, दलित भी; अंग्रेजी राज क्या गया सुख चैन छिन गया।

नामवर सिंह ने बहुत पहले लिखा था कि ''प्रासंगिक क्या वही है जो हमारे विचारों का अनुमोदन करता है और आपके अनुकूल है? जो आपसे भिन्न है और हमें चुनौती देता है, वह प्रासंगिक क्यों नहीं है? ...अतीत के लेखकों को प्रगतिशील सिद्ध करने की चिंता में या तो वर्तमान से उनके पार्थक्य को कम करके बताया जाता है या फिर इस अंतर को एकदम ही भुला दिया जाता है। इस प्रक्रिया में होता यह है कि प्रगतिशील परंपरा की एक अटूट अविच्छिन्न धारा तो बन जाती है किंतु कुछ समान प्रगतिशील तत्वों के कारण अतीत के प्रायः सभी महान लेखक एकरूप दिखाई पड़ते हैं यहाँ तक कि उनके चेहरे की निजी विशिष्टता भी खो जाती है। इस प्रकार फौरी तौर पर यह प्रगतिवादी राजनीति भले ही कारगर प्रतीत हो किंतु यह आश्चर्यजनक एकरूपता ही उसे संदिग्ध बना देती है।'' ('आलोचना', अक्टूबर दिसंबर, 1983 पृ. 6, दिल्ली)

इन दिनों दलित और स्त्री 'विमर्श' का इस कदर दबदबा है कि पिछले बरस (धर्मवीर जैसे एकाध अपवादों को छोड़ दें तो) प्रेमचंद को भी इन दो 'विमर्शों' के साँचे में फिट करने की कोशिश की गई और इस प्रक्रिया में नामवर सिंह की चेतावनी को लगभग नजरंदाज कर दिया गया। जबकि जैसा कि प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि प्रेमचंद दलित लेखक नहीं हैं और यह कहना प्रेमचंद की तौहीन नहीं है, बल्कि प्रेमचंद को उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रस्तावना है। उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद के दलित और स्त्री विमर्श को उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में ही ठीक से समझा जा सकता है। यह सही है कि प्रेमचंद के लेखन को 'डीकंसट्रक्ट' किया जा सकता है। लेकिन फिलहाल हम प्रेमचंद की चिंताओं को राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में ही समझने की कोशिश करेंगे। इस आलेख को हम प्रेमचंद के वैचारिक लेखन पर केंद्रित करेंगे।

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प्रेमचंद के वैचारिक लेखन को समझने के लिए हमने कुछ बीजशब्दों (की वर्ड्स) को चिन्हित किया है। ये बीजशब्द ऐसे हैं जो उस दौर के प्रायः सभी लेखकों की मूलभूत चिंताओं को सूत्रबद्ध करते हैं। लेकिन खास बात ये देखना है कि प्रेमचंद की रचनाओं में ये बीजशब्द किस रूप में उभरते हैं।

सबसे पहले हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि प्रेमचंद की पश्चिम के प्रति क्या अवधारणा है। इसी क्रम में पश्चिमी राष्ट्रवाद के बारे में प्रेमचंद की सोच और भारतीय राष्ट्रवाद से उसकी भिन्नता पर विचार करेंगे। फिर भारतीय राष्ट्रवाद के टुकड़ों (फ्रेगमेन्ट्स) शहर (नागरिक समाज) गाँव (पारंपरिक सामुदायिकता) और गाँव में भी दलित और स्त्री के बारे में प्रेमचंद के विचारों की चर्चा करेंगे। फिर यह देखने की कोशिश करेंगे कि इन घटकों के आपसी संबंध को प्रेमचंद किस तरह रचते हैं।

यह ठीक है कि उत्तर आधुनिकता का दौर समाप्त हो चुका है और सयाने लोगों ने इस जहाज को छोड़ दिया है लेकिन आधुनिकता के बौद्धिक आतंक और वर्चस्व को तोड़ने में इसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक ने 'पोस्ट कोलोनियल क्रिटिक' पुस्तक में स्वीकार किया है कि पश्चिम के ही विचारक देरिदा ने जब ज्ञानमीमांसा की पश्चिमी परंपरा को चुनौती दी तो उनकी भी हिम्मत बढ़ी और लगा कि यह परंपरा अभेद्य नहीं है। उत्तर आधुनिकता ने बहुलता, बहुसांस्कृतिकता, संवादधर्मिता, भिन्नता, महाआख्यान की समाप्ति और केंद्र के टूटने की बात कर और पश्चिम के 'सिवलाइजिंग मिशन' के ज्ञानमीमांसात्मक आधार को चुनौती देकर गैर पश्चिमी समाजों को अपनी ज्ञान मीमांसात्मक परंपरा को पश्चिम के निकष पर तौलने की बाध्यता से मुक्त कर दिया।

पश्चिम के ज्ञानमीमांसात्मक वर्चस्व को उत्तर आधुनिक चिंतकों से बहुत पहले गांधी जी ने चुनौती दी थी। गांधी जी ने तो यहाँ तक कहा था कि सबसे अच्छा तो यह होता कि भारत पश्चिम को पूरी तौर पर नकार देता। गांधी की दृष्टि में राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करना नहीं है। पश्चिम की 'शैतानी सभ्यता' से मुक्ति ही राष्ट्रीय आंदोलन का चरम ध्येय है। अपनी इस मान्यता पर वे अंतिम दिनों तक अडिग रहे। गांधी पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीय बुद्धिजीवियों से इस मायने में अलग हैं कि उन्होंने पश्चिम और पश्चिम से आनेवाली किसी भी विचारधारा को पूरी तौर से स्वीकार नहीं किया। उनका इरादा पूर्व को पश्चिम का वर्णसंकर (हाइब्रिड) बनाने का नहीं था। वैसे भी यह वर्णसंकरता सिर्फ दिखाने की वर्णसंकरता थी। इसमें पूर्व का रंगरोगन भले ही दिख जाय लेकिन इसका मूल पश्चिमी था। पश्चिम से इसकी भिन्नता ने किसी गुणात्मक रूप से भिन्न चीज को जन्म नहीं दिया। क्योंकि पार्थ चटर्जी के शब्दों में यह 'डिराइवेटिव डिसकोर्स' ही था। (नेशनलिस्ट थाट एंड कोलोनियल वर्ल्ड)। आर. राधाकृष्णन के शब्दों में यह 'समूचा घालमेल (हाइब्रिडिटी) पश्चिमी ज्ञानमीमांसा की परिधि के भीतर ही हुआ। पूर्वी ज्ञानमीमांसा से मुठभेड़ के बाद उत्पन्न होनेवाली वर्णसंकरता इसे नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसने पूर्वी ज्ञानमीमांसा को अपदस्थ/बहिष्कृत कर दिया और उससे बराबरी के स्तर पर संवाद की आवश्यकता को ही अस्वीकार कर दिया' (थियरी इन अनइवेन वर्ल्ड, आर. राधाकृष्णन)। यही कारण है कि अर्जुन अप्पादुराई जैसे विचारक को आज यह लगता है कि पुराने द्विआधारी विरोध की अवधारणा जैसे ग्लोबल/लोकल, उत्तर/दक्षिण, मेट्रोपॉलिटन/नानमेट्रोपालिटन की तरफ वापस जाने की जरूरत है क्योंकि बहाव पश्चिम से पूर्व की ओर आ रहा है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में ''पूर्व के वे इलाके जो उपनिवेशवाद के दौर में कमोबेश अछूते रह गए थे जैसे कृषि, संस्कृति और अवचेतन, वे भी इस पश्चिमी प्रवाह में बहे जा रहे हैं।'' (फ्रेडरिक जेम्सन, लिटिक्रिट, 1988)

प्रेमचंद ने पूर्व और पश्चिम के अंतर को मिटाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पश्चिम का न तो आँख मूँद कर समर्थन किया और न ही विरोध। गांधी की तरह उन्होंने पश्चिम की लगभग हर बात का निषेध भले ही न किया गया हो, लेकिन चूँकि उनकी जड़ें भारतीय गाँवों में थीं और उन पर गांधी जी का गहरा असर था, इसलिए उन्होंने पश्चिम की हर बात को सही भी नहीं माना। सबसे पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि उन्होंने पश्चिम को किस रूप में देखा। पश्चिम को देखने के उनके ढंग से यह भी अनुमान लगता चला जाएगा कि पूर्व के बारे में उनका नजरिया क्या है। जैसा कि पहले भी संकेत किया गया था, हम उस सैद्धांतिकी को अस्वीकार करते हैं जिसके मुताबिक प्रेमचंद के अंतिम दौर के लेखन को उनके पूर्ववर्ती लेखन पर तरजीह दी जाती है। आखिरी दौर के लेखन को तरजीह इसलिए दी जाती है क्योंकि सत्य के आधुनिकता द्वारा अनुमोदित निकष के यह सबसे करीब पड़ता है। यदि ऐसा न होता तो हम उसे भी नकार देते। अरविंदो और सावरकर के प्रारंभिक दौर का लेखन कुछ लोगों की दृष्टि में ज्यादा सार्थक है। यही बात इकबाल के बारे में भी कही जाती है। इकबाल, अरविंदो और सावरकर के पूर्ववर्ती लेखन को तरजीह दी जाती है और परवर्ती लेखन को 'विचलन' के रूप में देखा जाता है। लब्बोलुआब यह कि अंतिम दौर का लेखन अपने आप में परिपक्वता की कसौटी नहीं है। परिपक्व लेखन वही जो हमारे द्वारा तय सच के पैमाने में फिट बैठे। लेकिन मुसीबत यह है कि सच का पैमाना बदलता रहता है और यह सिलसिला लेखक के अंतिम दौर के साथ समाप्त नहीं हो जाता। अर्थात अंतिम कुछ भी नहीं होता। इसलिए हमने इस बात पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी है कि यह लेखन किस दौर से संबंधित है क्योंकि दौर के आधार पर किसी बात की महत्ता का निर्धारण नहीं किया जा सकता। संभवतः इसीलिए वाल्टर बेन्यामिन ने अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सीधे रेखीय संबंध के बजाय गतिशील, लचीले एवं टुकड़ों में बँटे हुए संबंध की अवधारणा प्रस्तुत की थी। तर्कप्रधान आधुनिक समाज के दोनों रूपों - पूँजीवादी और समाजवादी की कटु आलोचना करते हुए बेन्यामिन ने लिखा है कि ''इतिहासवाद द्वारा तय की गई प्रगति की अवधारणा पुरानी शक्ति संरचना और चिंतन रूप को पुनरुत्पादित करती है क्योंकि यह ऐतिहासिक समय को 'इन्स्ट्रूमेन्टल मैटर' में रिड्यूस कर देती है जहाँ ऐतिहासिक समय बर्बरता से सभ्यता की ओर, आदिम से आधुनिक की ओर, और बुरे पुराने दिनों से अच्छे नए दिनों की ओर संचरित होता है।'' इस इतिहासवाद के विरुद्ध बेन्यामिन ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा रखी जहाँ समय को समरूप (होमोजिनियस), सतत (कंटीनिवस) और एककालिक (साइमलटेनियस) नहीं माना गया। बेन्यामिन की दृष्टि में समय अतीत से होते हुए मनुष्यता की मुक्ति के भविष्य की ओर जाता है। उन्होंने आधुनिकता की समरूपता को अतीत (या भविष्य) की विविधता के बरक्स नहीं रखा बल्कि यह दिखाया कि अतीत और वर्तमान दोनों उस अभिशप्त समय द्वारा रचे गए हैं जिसका नाम आधुनिकता है। इसलिए भौतिकवादी इतिहासकार को न तो अतीत के प्रति मासूम सहानुभूति प्रकट करने की जरूरत है और न ही प्रगति के नाम पर वर्तमान की अंध प्रशंसा की, बल्कि उसे आधुनिकता और स्वयं की असफलता को पहचानना चाहिए। बेन्यामिन की दृष्टि में 'समरूप रिक्त समय' की अवधारणा प्रगति की रिक्त अवधारणा का ही दूसरा रूप है और इसीलिए उन्होंने समय की समरूप नहीं, बहुमुखी अवधारणा प्रस्तुत की। और सातत्य के बजाय विच्छिन्नता को महत्व दिया। स्वाभाविक है कि उत्तर आधुनिक चिंतकों की दृष्टि में वाल्टर बेन्यामिन द्वारा प्रस्तुत समय की अवधारणा प्रगति की उस अवधारणा को विखंडित करती है जिसके केंद्र में पश्चिम है, और जिसके मुताबिक गैरपश्चिमी समाजों को इतिहास के इस पश्चिम सम्मत पथ पर प्रगति करने के लिए उपनिवेशवाद को एक 'आवश्यक बुराई' के रूप में स्वीकार करने की सलाह दी गई थी। पश्चिम के इतिहास को केंद्र में रख कर देखने पर गैर पश्चिमी समाजों के इतिहास में 'कमी' या 'विचलन' दिखाई पड़ना स्वाभाविक है। दीपेश चक्रवर्ती ने ठीक लिखा है कि ''इस विचलन या कमी से उपनिवेशवाद उन्हें मुक्त करता है, इसलिए सारी बुराइयों के बावजूद उपनिवेशवाद का एक प्रगतिशील पक्ष भी निकल आता है लेकिन यदि यह मान लिया जाय कि विभिन्न सभ्यताओं का विकास पथ एक जैसा नहीं होता, क्योंकि वे स्वयं एक जैसी नहीं होतीं, और उनके जीवन मूल्य और प्राथमिकताएँ भी एक जैसी नहीं होतीं, तो पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता का मिथ टूट जाता है। इतिहास के अभी तक के अनुभव से यह बात खुल कर सामने आई है कि प्रत्येक सभ्यता की अपनी एक आंतरिक गतिकी (इंटरनल डायनमिक्स) होती है और उसी के अनुरूप यदि उसका सहज विकास होता रहे तो यह उस सभ्यता के लिए हितकर साबित होता है। लेकिन जब कोई सभ्यता अपने हित में दूसरी सभ्यता को अधीन बना लेती है तो उसका विकास बाधित और विकृत हो जाता है, और जीवन मूल्यों तथा संस्थाओं की विविधता एवं वैकल्पिक संभावनाएँ नष्ट हो जाती हैं। यदि नीयत दुरुस्त हो और इरादे नेक तो भी सभ्यताओं का निर्यात फलीभूत नहीं होता। उपनिवेशवाद को तो छोड़िए ही, समाजवाद का निर्यात भी सफल नहीं हुआ। सभ्यताओं के बीच आदान प्रदान और अंतरावलंबन का इतिहास तो इतना पुराना है कि किसी सभ्यता के पूर्ण पार्थक्य में विकसित होने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पूर्ण पार्थक्य की अवधारणा को, इधर के अध्ययनों को यदि प्रमाण माने, राष्ट्रवाद के अभ्युदय ने बढ़ावा दिया। इसीलिए संजय सुब्रह्मण्यम जैसे इतिहासकार अब 'कनेक्टेड' इतिहास की बात करने लगे हैं। लेकिन सभ्यताओं के बीच चले आ रहे आदान प्रदान के सहज सिलसिले को उपनिवेशवाद ने बहुत ही आक्रामक और हिंसक तरीके से तोड़ दिया। बर्नाड एस. कोहन ने बहुत सटीक बात लिखी है कि 'उपनिवेशवाद ने केवल एक भू भाग पर कब्जा नहीं किया; उसने ज्ञानमीमांसा की पहले से चली आ रही परंपरा को भी अपदस्थ कर दिया।' ज्ञान का मतलब अब औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा अनुमोदित ज्ञान हो गया। गैर पश्चिमी ज्ञान को अपदस्थ करने के बाद उपनिवेशवाद ने उसे हाशिए पर ढकेल कर अवैधानिक घोषित कर दिया। उपनिवेशवाद ने औपनिवेशीकृत समाज के लोगों को यह पाठ पढ़ाया कि 'अज्ञान अंधविश्वास और पिछड़ेपन' से मुक्ति उसके द्वारा सिखाए गए रास्ते पर चल कर ही मिल सकती है। पश्चिम के इस ज्ञानमीमांसात्मक प्रभुत्व के प्रभाव में लोग न आए हों, ऐसा नहीं; लेकिन इस प्रभुत्व से मुक्त होने की जद्दोजहद बंगाल से ही शुरू हो गई थी। क्योंकि बंगाल ही सबसे पहले पश्चिम के अधीन हुआ था। तपनराय चौधरी ने अपनी पुस्तकों में इस प्रक्रिया का बहुत विस्तार से विश्लेषण किया है। फिलहाल उस विस्तार में जाना तो संभव नहीं, लेकिन प्रेमचंद के हवाले से हम उस प्रक्रिया की हिंदी प्रदेश में घटित होनेवाली अगली कड़ी को समझने की कोशिश जरूर करेंगे। आइए सबसे पहले इस बात पर विचार करें कि प्रेमचंद ने पश्चिम को किस रूप में देखा।

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यदि पश्चिम ने अपनी जरूरतों के मुताबिक पूर्व की एक छवि गढ़ी और उसे पूर्व पर आरोपित कर दिया तो पूर्व ने पश्चिम द्वारा गढ़ी गई छवि को बिना किसी नानुकुर के यथावत स्वीकार नहीं कर लिया। यह ठीक है कि पश्चिम के मुकाबले पूर्व पर स्वयं को परिभाषित करने का दबाव था और उसे पश्चिम द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देना था। पश्चिम ने पूर्व पर 'असभ्य, बर्बर, आलसी, अंधविश्वासी, असंगठित, पिछड़े हुए, राष्ट्र राज्य और विज्ञान का विकास कर पाने में अक्षम' जैसे आरोप लगाए थे और उपनिवेशवाद को 'सिवलाइजिंग मिशन' के रूप में प्रस्तुत किया था। उसने पूर्व को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि 'सिवलाइजिंग मिशन' से वह इन कमियों से मुक्त हो जाएगा। जैसे पश्चिम ने पूर्व की एक छवि गढ़ी और उसे हीन साबित करने की कोशिश की वैसे ही पूर्व ने भी पश्चिम की एक छवि गढ़ी और उसकी श्रेष्ठता के दावे पर पलटवार किया। पश्चिम द्वारा गढ़ी गई पूर्व की छवि पर, एडवर्ड सईद के प्रभाव से, बहुत काम हुआ लेकिन भारत की आधुनिक भाषाओं के बुद्धिजीवियों द्वारा गढ़ी गई पश्चिम की छवि पर अभी काम शुरू ही हुआ है।

पश्चिम के प्रति प्रेमचंद के नजरिए पर तत्कालीन बौद्धिक चिंतन का प्रभाव तो है ही लेकिन उन पर सबसे गहरा प्रभाव गांधी का है। उन्होंने लिखा है कि महात्मा गांधी के आने से 'पश्चिम की बुराइयाँ हमें नजर आने लगीं।' (विविध प्रसंग-2, पृ. 302-303, 3 अप्रैल, 1933) कहने का आशय यह कि पश्चिम को देखने की आलोचनात्मक दृष्टि महात्मा गांधी से मिली और उसे उन्होंने अपने ढंग से परवान चढ़ाया। आगे बढ़ने से पहले उपर्युक्त उद्धरण को पूरा देखें ''हमने बंदरों की तरह पश्चिमवालों की नकल शुरू की और अभी तक करते जा रहे हैं... महात्मा गांधी ने आकर उन बिखरी हुई आकारहीन भावनाओं को मूर्तिमान कर दिया और यूरोप की बुराइयाँ हमें नजर आने लगीं।'' (उपर्युक्त)

यूरोप में बुराइयाँ भी हैं, प्रतीति तो होती थी, लेकिन यह प्रतीति बिखरी हुई और आकारहीन थी, गांधी ने उसे मूर्तिमान कर दिया। अनुभूति तो सभी को होती है लेकिन उसे शब्दों में मूर्तिमान करने का कार्य कोई बड़ा लेखक, कवि या चिंतक ही कर पाता है। गांधी ऐसे ही चिंतक विचारक थे। प्रेमचंद के सामान्य पाठक भी प्रायः यह कहते पाए जाते हैं कि उनकी बिखरी हुई और आकारहीन अनुभूतियों को प्रेमचंद ने शब्दों में मूर्त कर दिया है।

ऐसा नहीं है कि गांधी से पहले यूरोप की बुराइयाँ किसी को दिखीं ही न हो, लेकिन गांधी जैसी दृढ़ता के साथ आधुनिकता की ज्ञान मीमांसात्मक परंपरा को चुनौती देनेवाला कोई नहीं दिखता; अरविंदो और विवेकानंद भी नहीं। चलते चलते यहाँ जिक्र कर दें कि बंगाल में अरविंदो और विवेकानंद से पहले ही पश्चिम अर्थात आधुनिकता की मूलभूत आलोचना शुरू हो गई थी। और लोगों को छोड़ भी दें तो भूदेव मुखोपाध्याय का उल्लेख आवश्यक है। उन्होंने 'सामाजिक प्रबंध' नामक एक ग्रंथ लिखा, जिसमें, कुछ लोगों को, आगे आनेवाले गांधी की झलक दिखाई देती है। उन्होंने लिखा है कि सभ्यताओं के उद्देश्य और प्राथमिकताएँ एक जैसी नहीं होतीं; इसलिए उनकी तुलना नहीं की जा सकती। तुलना सभी को स्वीकार्य सार्वभौम निकष पर ही संभव है। और यह निकष मनुष्य की प्रेम करने की क्षमता का क्रमिक विस्तार हो सकती है। पहले व्यक्ति और फिर व्यक्ति से आगे बढ़ते हुए इस दायरे में परिवार, समुदाय, राष्ट्र, मानवता और अंततः समूचा ब्रह्मांड आना चाहिए। लेकिन पश्चिमी संस्कृति में यह राष्ट्र पर आकर रुक जाती है। हिंदू धर्म के सार्वभौम प्रेम की तुलना में यह मनुष्यता के लिए हीनतर लक्ष्य है। यूरोप के इतिहास का चरम ध्येय राष्ट्र राज्य है, और यह राष्ट्र राज्य अंतर्वाह्य संघर्षों के अंतहीन सिलसिले का दूसरा नाम है। योरोपीय सभ्यता की तथाकथित विशेषताएँ एकता, अनुशासन, नेतृत्व के प्रति आज्ञाकारिता और राष्ट्रहित में आत्म बलिदान, संघर्ष के लंबे इतिहास का प्रतिफल हैं। इसी में आगे वह विचारधारा जुड़ गई जिसका जन्म धन प्रेम और संपत्ति अधिकारों के बीच हुआ था। पश्चिमी सभ्यता की मूलभूत विशेषताएँ दो हैं - व्यक्तिवाद और स्वार्थपरता। मशीन ने मनुष्य के जीवन को सुगम बनाने के बजाय मजदूरों को अपना दास बना डाला है और बाजार तथा एकाधिकार की अंतहीन चाहत को जन्म दिया है, जिसकी परिणति युद्ध, विजय और नरसंहार में हुई है। यूरोप के समतावादी आदर्श भी इस प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं, क्योंकि उनका जन्म स्वार्थ और लालच की विचारधारा की प्रतिक्रिया में हुआ है और वे मनुष्यता की इस समस्या के समाधान के लिए हिंसा से बेहतर कोई विकल्प नहीं देते। योरोप के लोगों में अंग्रेज सबसे स्वार्थी हैं लेकिन उनके स्वार्थीपन में एक मासूमियत का गुण है। वे अपने हित से इस कदर मोहाविष्ट हैं कि उन्हें लगता है कि जो उनके हित में है, वही सारी दुनिया के हित में है और दुनिया भर के लोग उनके शासन का स्वागत करने के लिए बेताब हैं। व्यावहारिक मामलों के तकनीकी कौशल के अतिरिक्त उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे सीखने की जरूरत भारत को हो। अच्छा हो यदि भारत उनसे इसके अतिरिक्त और कुछ भी न सीखे। अंग्रेजों और भारतीयों के संपर्क से यदि भारतीयों के बजाय अंग्रेज कुछ सीखते तो बेहतर होता। लेकिन ऐसा होना नामुमकिन लगता है। (देखें तपन राय चौधरी की पुस्तक 'परसेप्शन, इमोशन, सेन्सबिल्टीज', ओ.यू.पी., नई दिल्ली, 2005)

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भूदेव मुखोपाध्याय के विचारों का संक्षिप्त परिचय इसलिए जरूरी था क्योंकि इन विचारों की अनुगूँज आगे गांधी और प्रेमचंद के विचारों में सुनाई पड़ती है। प्रेमचंद के विचारों पर एक नजर डालें : ''संसार मरे हम जीते हैं। यही पश्चिमी सभ्यता है।'' (विविध प्रसंग, भाग-2, पृ. 84, अक्टूबर, 1931, 'सरकारी खर्चे किफायत'।) "...पश्चिम की देखादेखी हम भी धनोपार्जन को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगे हैं, संपत्ति को ही सर्वोपरि समझने लगे हैं, यही हमारा धर्म हो गया है... हमारे हृदय की उच्च वृत्तियाँ सभी धन इच्छा के नीचे दबती जाती हैं। स्वराज को पाकर हम अपनी आत्मा को पा जाएँगे।'' (विविध प्रसंग, भाग-2, पृ. 277, 'स्वराज के फायदे', सन का उल्लेख नहीं।)

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने यूरोप में पूँजीवाद के विकास को 'प्रोटेस्टेंट इथिक्स' के साथ जोड़ा था और यह दिखाया था कि दुनिया के बाकी धर्म - भारतीय, चीनी इत्यादि चूँकि प्रोटेस्टेंट इथिक्स जैसी चीज का विकास नहीं कर पाए, इसलिए वहाँ पूँजीवाद का विकास भी नहीं हुआ। इसी आधार पर वेबर ने यूरोप की सभ्यता को शेष दुनिया की सभ्यताओं से श्रेष्ठ घोषित किया था। वेबर को माननेवाले समाजशास्त्रियों का विचार है कि दो प्रकार की सभ्यताएँ होती हैं - एक्जिएल और नान एक्जिएल। एक्जिएल सभ्यताएँ बेहतर जीवन का सपना देखती हैं और इस सपने को यथार्थ की जमीन पर संभव करने की कोशिश करती हैं। पश्चिमी सभ्यता ऐसी ही सभ्यता है; इसीलिए वहाँ आधुनिकता और पूँजीवाद का विकास संभव हुआ और शेष सभ्यताएँ ऐसा कर पाने में नाकामयाब रहीं। जिस पूँजीवाद को पश्चिम के चिंतक अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता के प्रमाण के रूप में पेश कर रहे थे, वही पूँजीवाद प्रेमचंद की नजर में पश्चिमी सभ्यता की बुराइयों की जड़ है। उन्होंने लिखा है ''पश्चिम की पुरानी संस्कृति हमारी संस्कृति से अभिन्न थी। जब से पश्चिम में कलों का युग आरंभ हुआ है, तभी से वहाँ की संस्कृति में स्वार्थ और संघर्ष की प्रधानता हुई है। यद्यपि यह कथन सारहीन नहीं है फिर भी पश्चिमी संस्कृति का जो उद्गम स्थल है यानी यूनान और रोम, वह संघर्ष प्रधान राष्ट्र था। ईसाई धर्म जो मूल में बौद्ध धर्म और बहुत अंशों में हिंदू धर्म का ही रूपांतर है, पश्चिम में उस पौधे के समान था जिसे कहीं बाहर से लाकर आरोपित किया गया हो। ...(भारत में) देवताओं और असुरों की लड़ाई की कथाएँ मिलती हैं, लेकिन यह स्वार्थ का संघर्ष न था, बल्कि सिद्धांत का संघर्ष था। असुर भोगवादी थे, देवता त्यागवादी। यूरोप में इसके प्रतिकूल स्वार्थ का संघर्ष था। ...ईसाई धर्म ने कई सदियों तक उस स्वाभाविक मनोवृत्ति को दबाए रखा। अंत में वह भी परास्त हो गई, अतएव यूरोप के जीवन में आज जो स्वार्थ का उन्माद है वह उसकी स्वाभाविक और सनातन मनोवृत्ति है। बार बार क्रांति का होना उसी स्वार्थमय संघर्ष का परिणाम है।'' (विविध प्रसंग एक, पृ.206, 5 सितंबर, 1932, 'जाग्रति')

अब यदि कोई चाहे तो इसे 'ओरिएंटलइज्म' का जवाब 'काउंटर नैरेटिव' कह सकता है।

प्रेमचंद एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जो पश्चिम से तात्विक और बुनियादी रूप से भिन्न है। तात्विक (एशेनशियलिस्ट) और बुनियादी भिन्नता की बात करना उत्तर आधुनिक दौर में भले ही गुनाह रहा हो लेकिन उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन की इसके बिना कल्पना भी कर पाना आसान नहीं। तात्विक और बुनियादी भिन्नता की बात वही कर सकता था जो आधुनिकता की ज्ञान मीमांसा को पूरी तौर पर खारिज करता हो। वामपंथी ऐसी भिन्नता की कल्पना नहीं कर सकते थे क्योंकि वामपंथ के सार्वभौमिक महाआख्यान में भिन्नता के लिए खास जगह नहीं थी। भिन्नता का मतलब उनके लिए विशिष्टता नहीं, कमी था, जो उन्हें भारत के इतिहास में दिखाई पड़ती थी। पश्चिम की तर्ज पर भारत के इतिहास में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, राष्ट्रवाद, औद्योगिक क्रांति; व्यक्तिवाद वगैरह की अपेक्षिक अनुपस्थिति देख उनके 'करुणा कलित हृदय' में आह सी उठती थी और फिर वे इस शोध में जुट जाते थे कि क्या कारण (अर्थात कमी थी) थे जिनकी वजह से हमारे यहाँ...। कुल मिला कर भारत के अतीत इतिहास में गर्व करने लायक उन्हें कुछ खास नजर नहीं आता था। मार्क्स की तरह उन्हें भी लगता था कि शैतान को भी उसका जायज हक मिलना ही चाहिए। सदियों से चली आ रही जड़ अर्थव्यवस्था को नष्ट कर उपनिवेशवाद ने भारतीय इतिहास को पटरी पर ला दिया। भारत को 'इतिहास के राजपथ' पर घसीट लाने का सेहरा उपनिवेशवाद के माथे बाँध देने के बाद उपनिवेशवाद का एक प्रगतिशील पक्ष तो निकल आया लेकिन इसी के साथ भारत के इतिहास की विशिष्टता का महत्व समझनेवाली दृष्टि भी गायब हो गई। लब्बोलुआब यह कि उपनिवेशवाद आया तो भारत की जड़ता टूटी और पूँजीवाद का विकास शुरू हुआ। पूँजीवाद आ गया तो देर सबेर समाजवाद आना ही है। यह सोचने की जहमत नहीं उठाई गई कि सभ्यताओं का विकास क्रम और जीवन मूल्य एक जैसे नहीं होते, खास तौर पर प्राक्‌ औद्योगिक सभ्यताओं के। इस विविधता और वैकल्पिक संभावना को उपनिवेशवाद ने नष्ट कर दिया और पहले से चली आ रही समस्याओं को अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर और भी विकृत कर सुलझाने के बजाय उलझा दिया। यूरोप के इतिहास को दुनिया के इतिहास का आदर्श मान लेने और उसी निकष पर स्वयं का मूल्यांकन करने पर भारत के इतिहास में कमियाँ ही कमियाँ दिखाई पड़ेंगी और पश्चिम के इतिहास में खूबियाँ ही खूबियाँ। यूरो केंद्रित इतिहास की आलोचना करते हुए दीपेश चक्रवर्ती ने ठीक लिखा है कि ''यूरोप आज भी समूची दुनिया के इतिहास का संप्रभु कर्ता है।'' (देखें उनकी पुस्तक प्रोविन्शियलाइजिंग यूरोप, ओ.यू.पी., दिल्ली)

गांधी की तरह प्रेमचंद भारतीय सभ्यता के सकारात्मक वैकल्पिक जीवन मूल्यों को देख सकते थे, जिन्हें औपनिवेशिक आधुनिकता में पगी आँखें नहीं देख पाती थीं। उनके पास वह 'क्रिटिकल स्पेस' था जहाँ से वे दोनों की खूबियाँ और खामियाँ देख सकते थे। उन्होंने लिखा है ''पश्चिमवालों को शक्तिशाली देख कर हम इस भ्रम में पड़ गए हैं कि हममें सिर से पाँव तक दोष ही दोष हैं और उनमें सिर से पाँव तक गुण ही गुण है। इस अंधभक्ति में हमें उनके दोष भी भूषण मालूम होते हैं और अपने गुण भी दोष।'' ('मानसिक पराधीनता', विविध प्रश्न एक, पृ. 189, जनवरी 1931)

चूँकि पश्चिमी सभ्यता का इस समय समूची दुनिया पर वर्चस्व है, इसलिए हमें पश्चिम में अच्छाई ही अच्छाई और अपने यहाँ बुराई ही बुराई दिखती है। जो जीता वही सिकंदर की तर्ज पर क्या यह कहना ठीक है कि पश्चिमी सभ्यता भारतीय सभ्यता से श्रेष्ठ है? प्रेमचंद के सामने भी यह सवाल था और उसका उन्होंने जो जवाब दिया उस पर गौर करने की जरूरत है ''देशों को जीत लेना और चीज, ऊँची सभ्यता और चीज है। इटली ने निम्नस्तर की सभ्यता रखते हुए भी यूनान को जीत लिया जो उस जमाने में सभ्यता के उच्चतर शिखर पर पहुँचा था। सभ्यता और हिंस्र भावनाओं का बैर है। बर्बर कौमें सभ्य कौमों के मुकाबले ज्यादा लड़ाकू और जान पर खेलनेवाली होती हैं। पश्चिमी सभ्यता की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसने बर्बर कौमों की विशेषताओं को सभ्यता के गंभीर प्रभाव से बचाए रखा। खुलासा यह कि हिंदुस्तानी सभ्यता की बुनियाद धर्म और नेकी पर थी जबकि पश्चिमी सभ्यता की बुनियाद लाभ और ईर्ष्या पर है।'' (विविध प्रश्न-3, पृ. 182)

उस दौर के अन्य लेखकों विचारकों की तरह प्रेमचंद के लिए भी पश्चिम एक चुनौती था और अपने वैचारिक लेखन में पश्चिम द्वारा फेंकी गई चुनौती का वे जवाब देते हैं : ''विजय और सफलता के आधार पर किसी सभ्यता को श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता। पराजित होकर भी भारतीय सभ्यता पश्चिमी सभ्यता से श्रेष्ठ है। क्योंकि भौतिकता पश्चिमी सभ्यता की आत्मा है। अपनी जरूरतों को बढ़ाना और सुख सुविधा के लिए आविष्कार इत्यादि करना, अपने नफे के लिए दूसरों के जान माल की परवाह न करना यही पश्चिमी सभ्यता की विशेषताएँ हैं। जीवन के हर क्षेत्र में व्यापार के नियम को लागू करना और नफे या नुकसान के खयाल को एक क्षण के लिए आँख से ओझल न होने देना, यह पश्चिमी सभ्यता के लक्षण हैं।'' (विविध प्रसंग-3, पृ. 174-175) मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि प्रेमचंद ने पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता की श्रेष्ठता को कभी भी स्वीकार नहीं किया, अंतिम दौर में भी नहीं। लिखते हैं ''वाह रे पश्चिम की सभ्यता, तूने मानवता के लिए तो कहीं जगह ही नहीं रखी। चारों तरफ निकृष्ट व्यावसायिकता का राज है। ...लोभ को जब पर लग जाते हैं, तब वह जुआ हो जाता है। ...वाह रे योरोप! तेरी गुलामी हमें न जाने पतन की किस गहराई तक ले जाएगी।'' (जुए का युग, विविध प्रसंग एक, पृ. 455-56, 25 दिसंबर, 1933)

प्रेमचंद भारतीय सभ्यता की सभी बातों की आँख मूँद कर तारीफ करनेवालों में न थे, फिर भी उन्होंने पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता को भारतीय सभ्यता से बेहतर नहीं माना। भारतीय सभ्यता की कमियों का समाधान उन्हें पश्चिमी व्यावसायिक सभ्यता में नहीं दिखा। लिखा है ''हम नहीं कहते कि वह पुरानी बातें सबकी सब तारीफ करने के काबिल हैं, मगर वह कितना ही बुरा क्यों न हो और कितने ही ताने उसे क्यों न दिए जाएँ, नई स्वार्थपरता, घमंड और आडंबर से कई गुना अच्छा है।'' (विविध प्रसंग-3, पृ. 263)

पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता नहीं, बल्कि समाजवाद की ओर अपने आखिरी दौर में जरूर आकृष्ट हुए थे क्योंकि उन्हें लगता था भारतीय सभ्यता का बेहतर विकल्प उसमें मिल सकता है। पुरानी समाज व्यवस्था को प्रेमचंद लगातार, अंतिम समय तक, पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता से बेहतर बताते रहे ''पुरानी समाज व्यवस्था अपनी सादगी और सच्चाई में नई समाज व्यवस्था की प्रदर्शनप्रियता और आडंबर से कहीं अच्छी थी।'' (विविध प्रसंग-1, पृ. 63) ''पुराने जमाने में सभ्यता का अर्थ आत्मा की सभ्यता और आचार की सभ्यता होता था। वर्तमान युग में सभ्यता का अर्थ है स्वार्थ और आडंबर, उसका नैतिक पक्ष छूट गया।'' (विविध प्रसंग-3, पृ. 258)

दाढ़ में खाज यह कि ''योरोप का विलास तो अपनी सारी बुराइयों के साथ आ डटा पर योरोप का अध्यवसाय और साहस और उत्सर्ग और अन्य हजारों खूबियाँ जो उस विलासिता का पर्दा ढाँकती हैं, यहाँ नजर नहीं आतीं।'' (विविध प्रसंग-1, पृ. 218, सितंबर, 1932) ''ध्यान देने लायक बात यह है कि योरोप की खूबियाँ भी वास्तव में उसकी विलासिता पर पर्दा ढाँकने का काम करती हैं इसलिए योरोप की इन 'खूबियों' पर भी आँख मूँद कर मोहित होने की जरूरत नहीं है। यदि ब्रिटिश चरित्र में अच्छाइयाँ हैं तो बुराइयाँ भी हैं, उसी प्रकार भारतीय चरित्र में भी लेकिन भारतीय चरित्र में बुराई के मुकाबले अच्छाइयाँ अधिक हैं।'' (विविध प्रसंग-1, पृ. 450, 13 फरवरी, 33)

योरोप की सांप्रदायिक, जातीय और औपनिवेशिक हिंसा और शोषण के सामने एशियायी सभ्यता की कमियाँ कहीं नहीं ठहरतीं। योरोप ने अपनी खूबियों का खूब प्रचार किया, लेकिन खामियों को छिपा कर रखा। अभी भी भूगोल की किताबों में पुनर्जागरण के दौरान नए सामुद्रिक मार्गों और द्वीपों की खोज का बढ़ चढ़ कर बखान किया जाता है लेकिन यह नहीं बताया जाता कि इन खोजों के परिणामस्वरूप जब यूरोप के लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ के मूल निवासियों का क्या हश्र हुआ। सिर्फ एक मिसाल देखें। कोलंबस ने 1492 में अमेरिका की खोज की और यूरोपियन्स ने वहाँ बर्बरता का ऐसा तांडव नृत्य किया कि वहाँ की आबादी अगली सदी में घट कर आधी रह गई। सोलहवीं सदी में जब दुनिया के कई क्षेत्रों में (भारत समेत) आबादी बढ़ कर लगभग दोगुनी हो रही थी, अमेरिका की आबादी घट कर आधी रह गई। अफ्रीका में यूरोपवासियों ने क्या किया और 'दास व्यापार' के दौरान कैसी अमानवीय हिंसा से काम लिया गया - ये सारी बातें इतनी जगजाहिर हैं कि उन्हें दोहराने की जरूरत नहीं लगती। बात सिर्फ यह है कि योरोपीय सभ्यता की प्रगति और मानवीयता का बढ़ चढ़ कर बखान करनेवालों को उसके इस पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए। ये सारी बातें तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर यूरोप के ही विद्वानों ने लिख दी हैं, गर्व के साथ नहीं, प्रायश्चित और क्षमा याचना के रूप में। ऐसा भी नहीं है कि हिंसा और बर्बरता का यह सिलसिला सिर्फ शुरुआती दौर तक सीमित होद्र वह अबाध गति से आज तक चला आ रहा है। प्रेमचंद इसीलिए 'सिवलाइजिंग मिशन' के कायल नहीं हो पाए। उन्होंने लिखा है ''हम कहते हैं कि यह कौमें (माओरी जुलू) बहशी सही, जंगली सही... हम उन्हें मौजूदा तहजीब के खूँखार दरिंदों से... खून पीनेवाले अत्याचारी व्यापारियों से कहीं बेहतर समझते हैं।'' (विविध प्रसंग-2, पृ. 28) और अंततः प्रेमचंद ने वे बातें लिखीं जिनका महत्व उत्तर औपनिवेशिक दौर के चिंतकों - आशीष नंदी, शेल्डन पोलक, दीपेश चक्रवर्ती आदि के समकालीन लेखन को पढ़ कर ही समझा जा सकता है। लिखा है कि ''योरोपियन संस्कृति की तारीफें सुनते सुनते हमारे कान पक गए। उनको अपनी सभ्यता पर गर्व है। हम एशियावाले तो मूर्ख हैं, बर्बर हैं, असभ्य हैं, लेकिन जब हम उन सभ्य देशों की पशुता देखते हैं तो जी में आता है कि यह उपाधियाँ सूद के साथ उन्हें क्यों न लौटा दी जाएँ।'' जर्मनी में यहूदियों पर अत्याचार (30 अप्रैल 1933)। ''इसके मुकाबले भारत को देखिए। यहाँ हिंदू, मुसलमान, ईसाई, पारसी सब सदियों से रहते चले आते हैं। इधर कुछ दिनों से हिंदू मुसलमान के एक दल में वैमनस्य हो गया है; पर इसके लिए भी वही लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने पश्चिम से प्रकाश पाया है और अपरोक्ष रूप से वहीं पश्चिमी सभ्यता अपना करिश्मा दिखा रही है।'' (विविध प्रसंग-2, पृ. 205-206) आशीष नंदी भी तो यही कहते हैं कि ''भारतीय समाज ने विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच सहिष्णुता और सहअस्तित्व की संस्कृति विकसित कर ली थी; सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक संघर्ष तो आधुनिकता के बाई प्रोडक्ट हैं। सांप्रदायिकता का उद्गमस्थल भारत नहीं, पश्चिमी आधुनिकता है और भारत में सांप्रदायिकता की राजनीति करनेवालों को यह ज्ञान पश्चिम से मिला है। सांप्रदायिकता और आधुनिकता में एकांतिक विरोध देखनेवाली औसत समझ को यह अंतर्दृष्टि चुनौती देती है और पड़ताल करने पर मालूम होता है कि इस चुनौती में दम है क्योंकि सांप्रदायिकता आधुनिकता की विरोधी नहीं बल्कि आधुनिकता की तरह वह भी सार्वभौम ज्ञान का दावा करती है और आधुनिकता के मूलभूत अनुषंगों विज्ञान, राष्ट्र राज्य की आलोचना करने के बजाय उनका समर्थन करती है।'' (देखें आशीष नंदी की पुस्तक; 'इंटीमेट एनमी' और आर. रघुराम राजू की पुस्तक 'डिबेट्स इन इंडियन फिलॉसफी', ओ.यू.पी., दिल्ली)।

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प्रेमचंद ने पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता के विपरीत भारतीय सभ्यता की एक सकारात्मक छवि प्रस्तुत की है। भारतीय सभ्यता की खामियों से वे वाकिफ थे और उसकी आलोचना भी करते थे। लेकिन कुल मिला कर पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता के मुकाबले उन्हें भारतीय सभ्यता बेहतर लगती थी और आखिरी दौर में भी उनके इस विश्वास में कोई बदलाव नहीं दिखाई पड़ता। आगे बढ़ने से पहले, आइए देखें कि प्रेमचंद की नजर में भारतीय सभ्यता की विशेषताएँ क्या थीं।

प्रेमचंद ने लिखा है कि ''पुरानी समाज व्यवस्था में सादगी और सच्चाई थी जो 'नई समाज व्यवस्था की प्रदर्शनप्रियता और आडंबर से कहीं अच्छी थी।'' (विविध प्रसंग-1, पृ. 73) त्याग, संयम, मर्यादा और सादगी भारतीय सभ्यता की विशेषताएँ थीं और उसी के अनुरूप यहाँ के आदर्श पश्चिम के आदर्शों से भिन्न हैं ''हमारे आदर्श नैपोलियन जैसे नहीं जो संसार पर अधिकार प्राप्त करना चाहता था, न क्लाइव और क्रामबेल जैसे, लेनिन या मुसोलिनी जैसे। हमारे आदर्श चरित्र कृष्ण और राम और अशोक जैसे राजा, अर्जुन और भीष्म जैसे योद्धा और गांधी जैसे गृहस्थ हैं। हमारा विश्वास संघर्ष में नहीं, सहयोग में है।'' (जाग्रति, वि.प्र. 1, पृ. 208, 5 सितंबर, 1932)

पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता का कुछ ऐसा असर हुआ है कि जिन विशेषताओं का शुमार गुण में होता था वे भी अवगुण मान ली गई हैं और जिन्हें पहले अवगुण माना जाता था उनकी गुण के रूप में तारीफ की जाने लगी है - ''नम्रता और सहिष्णुता, शर्म और हया, सदाचार और मुरव्वत गुणों का सब आदर करते थे। आज हालत कुछ और है। नम्रता को आज निर्बलता की स्वीकृति समझा जाता है। लाज शर्म नामर्दों के गुण हैं। ...दया और प्रार्थना, संयम और नर्मी को कायरता और पस्तहिम्मती समझा जाता है। ...गुस्सा एक मर्दाना जौहर है। उसे रोकना बुजदिली की दलील है। मुरव्वत और इनसानियत को पास न भटकने दीजिए। ये गरीब और मजबूर लोगों के गुण हैं।'' (वि.प्र.- तीन, पृ. 262-263)

उल्लेखनीय है कि उपनिवेशवाद की दृष्टि में औपनिवेशिक समाज स्त्रैण समाज थे, जिनमें पुरुषोचित क्रियाशीलता, उग्र आक्रामक वर्चस्व भावना, जोखिम उठाने के साहस का अभाव तो था ही, नए नए क्षेत्रों को खोज निकालने और उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का वीरोचित आवेग भी नहीं था। चिंतकों ने लक्ष्य किया है कि उपनिवेशवाद का चरित्र पौरुषपूर्ण था। जाहिर है कि औपनिवेशिक विमर्श में सहिष्णुता, शर्म और हया, सदाचार और मुरव्वत, संयम और नम्रता को गुण नहीं, कमी के रूप में चिन्हित किया गया। ये गुण अब अवगुण मान लिए गए। जैसा कि अक्सर होता है, औपनिवेशीकृत समाज के बुद्धिजीवी भी यह मान बैठे कि उपनिवेशवाद के आगमन के समय भारतीय समाज पतन के दौर से गुजर रहा था और इस पतन का कारण उसमें आ गई स्त्रैणता थी। दिलचस्प तथ्य यह है कि उपनिवेशवाद के पहले समूचे भारतीय साहित्य और चिंतन परंपरा में पतन का भाव कहीं नहीं है, लेकिन उपनिवेशवाद के आने के बाद, विशेष रूप से उन्नीसवीं सदी से यह भाव कुंडली मारे बैठा है। पतन का यह भाव हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं में मौजूद है और इससे मुक्ति के लिए अपने 'गौरवपूर्ण' अतीत का अवलंब गढ़ने और उससे प्रेरणा लेने का खयाल भी दोनों जगह कमोबेश एक जैसा है। बात चाहे गौरवपूर्ण अतीत के स्मरण की हो या समकालीन पतन की, निकष विक्टोरियन आदर्श ही हैं और इसीलिए अतीत की इस कल्पित छवि में भी इन्हीं आदर्शों का प्रक्षेपण है। इन आदर्शों से विरत होने की वजह से पतन का दौर शुरू हुआ। हाली तो यहाँ तक कहते हैं जिन आदर्शों को मुसलमानों ने त्याग दिया था, उन्हें ही पश्चिम ने अपनाया और प्रगति के पथ पर बढ़ गए :

शरियत के जो हमने पैमाने तोड़े
वो ले जाके सब अहले मर्गिब ने जोड़े।

इसे ही आलोचक एलनॉर शाफर ने 'माइथॉलाजिकल डबलिंग' कहा है : जहाँ एक ज्ञान प्रणाली किसी अन्य ज्ञान प्रणाली के मूल्यों, अंतर्दृष्टियों को इस तरह पेश करती है जैसे वे उसी के मूल्यों, अंतर्दृष्टियों का प्रच्छन रूप हों। खास बात यह कि औपनिवेशिक मानस कहीं न कहीं पश्चिम की श्रेष्ठता स्वीकार करने लगता है और अपने यहाँ ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें 'सामाजिक बुराइयाँ' न हों और जो पश्चिम की तरह 'स्वस्थ' और 'गतिशील' हो। उन्नीसवीं सदी के धार्मिक और समाज सुधार आंदोलनों का जन्म इसी मनःस्थिति में हुआ था। औपनिवेशिक आधुनिकता की दृष्टि में पारंपरिक भारतीय समाज के मूल्य पिछड़ेपन की निशानी बन गए और उनकी जगह व्यक्तिवादी उग्रता, सर्कमता, पुरुषोचित आवेश को तरजीह दी जाने लगी। औरों को छोड़िए, विवेकानंद के यहाँ भी पौरुषपूर्ण क्रियाशीलता और भौतिक संपन्नता का आग्रह साफ दिखाई पड़ता है। लब्बोलुआब यह कि मान लिया गया कि नम्रता, सहिष्णुता, शर्म और हया, सदाचार, संयम और मुरव्वत गुण नहीं है, बल्कि पिछड़ेपन और सामंती मानसिकता के परिणाम हैं। वस्तुतः इन गुणों का उपयोग दुरुपयोग तो संभव है लेकिन इनकी सार्थकता थोड़े बहुत हेरफेर के साथ हमेशा बनी रहती है। लेकिन इन गुणों और आधुनिकता का 'केर बेर' संग निभता नहीं। पूँजीवाद किसी बंधन - अनुशासन, मर्यादा, संयम और मानवता जैसे नैतिक मूल्य को नहीं मानता। वह लोभ लाभ की संस्कृति का निर्माण करता है जिसमें पैसे मुनाफे के अलावा और किसी मूल्य के लिए जगह नहीं बचती। मार्शल बर्मन ने अपनी पुस्तक 'ऑल दैट इज सॉलिड मेल्ट्स इन टू एयर' में पूँजीवाद के इस चरित्र का सटीक विश्लेषण किया है।

प्रेमचंद ने लिखा है कि गांधी ने बताया तो पश्चिम की बुराइयाँ समझ में आने लगीं। पहले महसूस तो होती थीं लेकिन समझ में नहीं आती थीं। यहाँ इतना जोड़ने की जरूरत है कि गांधी ने समझाया तो भारत की अच्छाइयाँ समझ में आने लगीं। पहले महसूस तो होती थीं लेकिन... गांधी ने पौरुष प्रधान, आक्रामक और वर्चस्व वासना से ग्रस्त आधुनिकता को सभ्यताओं का निकष मानने से इनकार कर दिया और यह बताया कि कोमलता और सहजता, त्याग और क्षमा, करुणा और परदुखकातरता दुर्गुण नहीं गुण हैं। आधुनिकता का जवाब आधुनिकता के निकष पर देने के बजाय उन्होंने भारतीय सभ्यता की सकारात्मक उपलब्धियों के आधार पर उपनिवेशवाद को चुनौती दी। इसीलिए उनके राजनीतिक विमर्श में आक्रामक हिंसा की जगह विनम्रता, वर्चस्व वासना की जगह त्याग और संयम, आत्म की जगह अन्य, अतिशय भोग की जगह इंद्रिय निग्रह, मशीन की जगह मनुष्य, शहर की जगह गाँव, ज्ञान की जगह प्रेम और करुणा को वरीयता दी गई है। आशीष नंदी ने ठीक लिखा है कि ''औपनिवेशिक आधुनिकता के प्रभाव में जिन चीजों को स्त्रैण मान लिया गया था, गांधी ने उनकी वैकल्पिक सार्थकता को दोबारा स्थापित किया।'' (देखें आशीष नंदी : इंटीमेट एनमी)

प्रेमचंद भारतीय सभ्यता की विशेषताओं का जिक्र करते समय अक्सर पश्चिम को सामने रखते हैं, आधुनिक आलोचना की भाषा में कहें तो द्विआधारी विरुद्धों की रचना करते हैं। जैसे ''हमारी सभ्यता कहती है कि अपनी जरूरतों को मत बढ़ाओ ताकि तुम्हारी जात से कुटुंब या परिवार का भी कुछ उपकार हो। पश्चिमी सभ्यता का आदर्श है - अपनी जरूरतों को खूब बढ़ाओ, चाहे उसके लिए दूसरे की जेब ही क्यों न काटनी पड़े। अपने लिए ही जिओ और अपने लिए ही मरो।'' (मानसिक पराधीनता, वि.प्र.द्र एक, पृ. 139, जनवरी, 1931)

प्रेमचंद के सपनों का स्वतंत्र भारत व्यावसायिक योरोप की प्रतिकृति नहीं होगा बल्कि उससे भिन्न होगा ''योरोप की स्वाधीनता और कृत्रिमता और हृदयहीनता भारत को ग्रस्त करती चली जाती है। ...हमारी क्रांति अपनी खोई हुई आत्मा को, अपने त्याग और सरलता और आदर्श को फिर वापस लाना चाहती है और इस पश्चिमी संघर्ष और स्वार्थवाद को मिटा कर उसकी जगह सहयोग और सहृदयता को आसीन देखने की इच्छुक है।'' (वि.प्र.द्र एक, पृ. 200, संयुक्त प्रांत के दो कन्वोकेशन, 1934)

लेकिन द्विआधारी विरुद्धों (बायनरी अपोजिट्स) के आधार पर पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता की प्रेमचंद द्वारा की गई आलोचना के मर्म को उद्घाटित नहीं किया जा सकता। इस आलोचना के मूल में गांधी के चिंतन की भूमिका है। यह ठीक है कि प्रेमचंद गांधी के विचारों के यथावत अनुवादक नहीं है, लेकिन गांधी के विचारों का प्रभाव उन पर बहुत गहरा है, इसे सिर्फ सत्याग्रह और हृदय परिवर्तन तक सीमित कर देना ठीक नहीं। आखिरी दौर में साम्यवाद के प्रति उनका आकर्षण कदाचित्‌ इसीलिए बढ़ा क्योंकि साम्यवाद में उन्हें पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता का विकल्प नजर आया। पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता को उन्होंने भारतीय सभ्यता के विकल्प के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया। 'साम्यवाद में व्यावसायिक सभ्यता का विकल्प नजर आया' कहने का यह मतलब नहीं कि वे साम्यवादी हो गए थे। सामुदायिक ग्रामीण जीवन, सादगी, इच्छाओं आवश्यकताओं को बढ़ाने के बजाय उन पर संयम और नियंत्रण, प्रतिद्वंद्विता के बजाय सहयोग और भाईचारा, कृषि आधारित उद्योगों का सीमित पैमाने पर विकास जैसे आदर्शों में उनकी आस्था अंतिम दौर में भी कायम रही। अब यह देखें कि प्रेमचंद के यहाँ पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता की आलोचना के मुख्य आधार बिंदु क्या हैं।

6 .

पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता की बुनियाद में विज्ञान का अभूतपूर्व विकास है। विज्ञान के विकास के बिना न तो राष्ट्र राज्य की कल्पना संभव थी और न ही उपनिवेशवाद की। पश्चिम का अन्य सभ्यताओं पर सबसे बड़ा आक्षेप यही था कि वे विज्ञान और राष्ट्र राज्य की अवधारणा का विकास करने में असफल रही हैं। इस चुनौती का जवाब देने का सिलसिला तो बंगाल नवजागरण के दौरान ही शुरू हो गया था। गांधी एवं प्रेमचंद उसी सिलसिले की अगली कड़ी हैं। गांधी विज्ञान के विकास के साथ आनेवाली खामियों का जिक्र करते हुए बताते हैं कि चाहते तो हम भी विज्ञान का वैसा विकास कर सकते थे लेकिन हम जानते थे कि उसके साथ खामियाँ भी आएँगी, इसलिए हमने जान-बूझकर विज्ञान का विकास नहीं किया। विज्ञान का विकास कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जिस पर गर्व किया जाय। एक तरह से पश्चिम के आक्षेप पर गांधी का यह पलटवार था। इस पलटवार को सिर्फ पालिमिक्स मान लेना ठीक नहीं होगा क्योंकि गांधी इस बात पर आखिरी दिनों तक कायम रहे। गांधी की तरह प्रेमचंद भी पश्चिम की इस वैज्ञानिक औद्योगिक प्रगति की आलोचना करते हैं।

स्पष्ट है कि प्रेमचंद की दृष्टि में स्वार्थ, संघर्ष, व्यावसायिकता, अपनी जरूरतों को बढ़ाना, नफे के लिए दूसरों के जानमाल की परवाह न करना, व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यावसायिकता को सर्वोच्च मूल्य मानना, और उसके लिए निरंतर संघर्ष, जिसकी परिणति उपनिवेशवाद और विश्वयुद्ध के रूप में हुई, का प्रभाव तो स्पष्ट ही है लेकिन उससे भी खास बात यह है कि यह तर्क इतना शक्तिशाली है कि आज भी समाजवैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर बहस जारी है और उनमें एक बड़ा हिस्सा ऐसे बुद्धिजीवियों का है जो यह मानता है कि वैज्ञानिक प्रगति और उपनिवेशवाद नाभिनाल आबद्ध हैं। यदि यह बात ठीक है कि वैज्ञानिक प्रगति के बिना औपनिवेशिक वर्चस्व असंभव था, तो फिर उपनिवेशवाद का विरोध करनेवाले बुद्धिजीवी/नेता से यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि वह वैज्ञानिक प्रगति को विकास के आगे बढ़े हुए दौर के रूप में सराहे। कम से कम गांधी और गांधी से प्रभावित विचारकों से तो हमें ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। क्योंकि गांधी एक ऐसे विचारक हैं जो आधुनिकता की आलोचना उसकी ज्ञान मीमांसा के बाहर से करते हैं। आधुनिकता के अंतर्विरोधों को दिखाना एक बात है और आधुनिकता की ज्ञानमीमांसात्मक बुनियाद को ही खारिज कर देना बिल्कुल अलग बात। रोम्या रोलां ने गांधी के चिंतन के इस मूलभूत पक्ष को बहुत पहले चिन्हित करते हुए लिखा था कि उनके चिंतन की केंद्रीय विशेषता है : प्रगति और योरोपीय विज्ञान का निषेध (रोमा रोलां : महात्मा गांधी, अनु. रामास्वामी अइयर, पृ. 30)। पार्थ चटर्जी ने सही लक्ष्य किया है कि योरोप के रोमैंटिक विचारकों की पंक्ति में गांधी को नहीं रखा जा सकता। रोमैंटिक विचारक नागरिक समाज के अंतर्विरोधों की आलोचना उसी के भीतर से करते हैं जबकि गांधी की आलोचना उत्तर ज्ञानोदयी परंपरा के बाहर से उठती है और इसीलिए उनके चिंतन का केंद्रबिंदु राष्ट्रवाद भी नहीं है। यही कारण है कि राष्ट्रवादी चिंतकों की तरह वे ऐतिहासिकता, तार्किकता और वैज्ञानिकता को भी ज्यादा तरजीह नहीं देते। (देखें : 'गांधी एंड क्रिटीक ऑफ सिविल सोसाइटी' लेख, पृ. 170, 175, 176; पुस्तक : सबार्ल्टन स्टडीज III ओ.यू.पी., नई दिल्ली, 1984) कहने का आशय यह कि गांधी की तरह प्रेमचंद भी पश्चिमी आधुनिकता की आलोचना उत्तर ज्ञानोदयी परंपरा के भीतर से नहीं, बाहर से करते हैं। इसीलिए उन्होंने आधुनिक राष्ट्र राज्य और उससे जुड़े हुए नागरिक समाज के अवयवों और मूल्यों की सख्त आलोचना की है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, विज्ञान और राष्ट्र राज्य के बिना आधुनिकता की कल्पना असंभव है। (देखें ज्ञान प्रकाश की पुस्तक 'अनदर रीजन : सांइस एंड इमैजिनिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया, ओ.यू.पी., नई दिल्ली) आधुनिकता के इन दो बुनियादी निकषों के आधार पर भारतीय सभ्यता की खामियों का उपनिवेशवादियों ने खूब प्रचार किया था। दूसरे के द्वारा रखी गई शर्त पर स्वयं को श्रेष्ठ (या बराबर) सिद्ध करने का एक सरल लेकिन तत्कालीन संदर्भ में प्रभावशाली तरीका यह साबित करना था कि भारत में विज्ञान, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र का अस्तित्व पहले (प्राचीन काल) से रहा है, और भारतीय राष्ट्रवाद, लोकतंत्र एवं विज्ञान पश्चिम से श्रेष्ठतर हैं। राष्ट्रवादी इतिहासकारों और आर्यसमाजियों ने यही दिखाने की कोशिश की। दूसरा तरीका यह था कि पश्चिम के इतिहास के सार्वभौम महत्व को मानते हुए ईमानदारी से अपने इतिहास की 'कमियों' को स्वीकार किया जाय। वामपंथी, नेहरूवादी चिंतकों इतिहासकारों ने यही किया। उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा यह जानने में खपा दी कि भारत में पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, पूँजीवाद और सेकुलर राष्ट्र राज्य का विकास क्यों नहीं हुआ। उनकी चिंता का विषय वह नहीं था जो हुआ; जो नहीं हुआ, उसे लेकर वे व्यथित होते रहे। उन्होंने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि जहाँ ये सब हुआ, वहीं से उपनिवेशवाद का भी प्रादुर्भाव क्यों हुआ। उनके लेखों में दूसरी सभ्यताओं को 'सही रास्ते' पर लाने के लिए उपनिवेशवाद एक जरूरी बुराई थी। उपनिवेशवाद के बिना भारत में राष्ट्र राज्य का विकास असंभव था। राष्ट्र राज्य का विकास पश्चिमी सभ्यता की उपलब्धि है और भारतीय सभ्यता में उसका 'अभाव' दिखता है। तीसरा तरीका यह था कि पश्चिमी इतिहास के सार्वभौम महत्व को अस्वीकार कर दिया जाय और यह दिखाया जाय कि सभ्यताओं के मूल्यांकन में कोई तटस्थ आर्केमेडियन बिंदु निकाल पाना असंभव है। किसी सभ्यता को दूसरी सभ्यता को पिछड़ी हुई, असभ्य कहने का हक नहीं। रवींद्र ठाकुर के शब्दों में सभ्यताओं की प्राथमिकताएँ अलग अलग होती हैं। भारतीय सभ्यता में समाज हित की चिंता सर्वोपरि थी जबकि पश्चिमी सभ्यता में राज्य और प्रशासन पर ज्यादा ध्यान दिया गया था। इसलिए भारत में राष्ट्रवाद का विकास न देख कर शर्मसार होने की जरूरत नहीं। उन्होंने योरोपीय इतिहास के निकष पर भारतीय इतिहास का मूल्यांकन करने की प्रवृत्ति की सख्त आलोचना करते हुए लिखा कि ''योरोप का अपना अतीत है और वह उसकी शक्ति है। हम भारतीयों को अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि किसी और का इतिहास उधार नहीं लिया जा सकता और अपने इतिहास का गला घोंटने का मतलब है आत्मघात। बाहर से उधार ली हुई चीजें जीवन को बर्बाद कर देतीं हैं।'' उधार के इतिहास से काम चलानेवालों और अपने इतिहास का पूर्ण निषेध कर देनेवालों में कोई खास फर्क नहीं है। जब हम अपने इतिहास पर ध्यान देंगे तो वहाँ खामियों के साथ ऐसी खूबियाँ भी नजर आएँगी जो दूसरी सभ्यता में नहीं होंगी। अपनी सभ्यता को नितांत त्याज्य मान लेने पर उधार के इतिहास से काम चलाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचता। उधार के इतिहास में वह शक्ति नहीं होती जो किसी बड़े सामाजिक परिवर्तन को अंजाम दे सके। गांधी की अपेक्षिक सफलता का राज यही था कि उन्होंने उधार के इतिहास से काम चलाने की कोशिश कभी नहीं की।

प्रेमचंद भारत में राष्ट्र के अभाव को लेकर चल रही बहस से परिचित थे। रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा की गई राष्ट्रवाद की अवधारणा में निहित संकीर्णता की भावना की आलोचना से भी वाकिफ थे। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में राष्ट्रवाद की सकारात्मक भूमिका के हिमायती होने के बावजूद वे राष्ट्रवाद, खास तौर पश्चिमी राष्ट्रवाद, की प्रकृति और अंतर्विरोधों को अच्छी तरह समझते थे। गांधी की तरह उनके चिंतन को भी राष्ट्रवाद की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। उनके राष्ट्र संबंधी चिंतन से आज भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। प्रेमचंद ने यह दिखाया कि आधुनिक किस्म का राष्ट्रवाद योरोप की ईजाद है लेकिन यह वरदान नहीं शाप है। प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद का जिस गहराई से विश्लेषण किया है उसके सामने समकालीन उत्तर औपनिवेशिक चिंतकों का लेखन भी फीका लगने लगता है। लिखते हैं ''राष्ट्र एक मानसिक प्रवृत्ति है। जब यह प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है तो किसी प्रांत या देश के निवासियों में भ्रातृभाव पैदा हो जाता है। प्राचीनकाल का भारत केवल इसी अर्थ में एक था कि उसकी संस्कृति एक थी। ...परंतु राजे सैकड़ों हजारों थे, उनमें बराबर लड़ाइयाँ होती रहती थीं। उनके स्वार्थ अलग थे। वर्तमान राष्ट्र का विकास न हुआ था। ...वर्तमान राष्ट्र योरोप की ईजाद है और राष्ट्रवाद वर्तमान युग का शाप। ...इसी राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद, व्यवसायवाद आदि को जन्म देकर संसार में तहलका मचा रखा है। व्यापारिक प्रभुत्व के लिए महान युद्ध होते हैं। यह सारे अनर्थ इसलिए हो रहे हैं कि धन और भूमि की तृष्णा ने राष्ट्रों को चक्षुहीन सा कर दिया है। प्राणी मात्रा को भाई समझनेवाला ऊँचा और पवित्र आदर्श इस राष्ट्रवाद के हाथों ऐसा कुचला गया कि अब उसका कहीं चिह्न भी नहीं रहा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 11, अक्टूबर नवंबर, 1932)

प्रेमचंद को यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं हुआ कि भारत में सांस्कृतिक एकता तो थी, लेकिन राजनीतिक रूप से राष्ट्र के रूप में वह संगठित नहीं था। वर्तमान राष्ट्र यूरोप की ईजाद है और साम्राज्यवादी संघर्ष और लूटखसोट का आधार भी है। लेकिन योरोप में तीन सौ साल पहले जातीयता (राष्ट्रीयता) का वर्तमान रूप मौजूद नहीं था। जातीयता का विकास कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जिस पर गर्व किया जाय। उसने मनुष्य को भिन्न भिन्न भागों में बाँट कर एक दूसरे का शत्रु बना दिया है। (देखें वि.प्र., दो, पृ. 198-99, 21 अगस्त 1933) भारत की सबसे बड़ी गलती यह थी उसने जनता को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा, जिसका परिणाम यह हुआ कि जनता राजनीतिक परिवर्तनों से निरपेक्ष बनी रही। (पूर्वोक्त) राष्ट्र क्या है? ''स्वार्थ से भरी हुई गुटबंदी है, जिसने संसार को नरक बना रखा है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 101, नवंबर, 33) ''जैसे डाकू बाहर लूट पाट कर अपना घर भरता है वैसे ही 'राष्ट्रीयता' भी अपने परिमित क्षेत्र के अंदर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 334, 27 नवंबर, 1933)

जैसे गांधी को पश्चिमी शिक्षा की उपयोगिता में यकीन नहीं था वैसे ही प्रेमचंद अनेक प्रकार की 'अस्वाभाविकताओं' का कारण पश्चिमी शिक्षा को मानते थे। राष्ट्रीयता का रोग भी इसी शिक्षा का फल है, जो शिक्षित जनों को लगा हुआ है। लिखते हैं ''आज भी राष्ट्रीयता का रोग उन्हीं लोगों को लगा हुआ है जो शिक्षित हैं, इतिहास के जानकार हैं। वे संसार को राष्ट्र के रूप में ही देख सकते हैं। संसार के संगठन की दूसरी कल्पना उनके मन में आ ही नहीं सकती। जैसे शिक्षा से कितनी ही अस्वाभाविकताएँ हमने अंदर भर ली हैं, उसी तरह इस रोग को भी पाल लिया है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 334-35, 27 नवंबर, 1933) पश्चिमी शिक्षा के बारे में प्रेमचंद ने यही बातें 'शिक्षा का नया आदर्श लेख' में ज्यादा साफ शब्दों में लिखीं। उन्हें उद्धृत करना जरूरी है ताकि किसी संदेह की गुंजाइश न रहे। लिखा है : ''यह साम्राज्यवाद और व्यवसायवाद और राष्ट्रों में संघर्ष इसी कुशिक्षा के फल हैं, जिसने व्यक्ति को प्रधानता देकर उसे समाज का हिंसक जंतु बना दिया है।'' (वि.प्र.-एक, पृ. 222, सितंबर, 1933)

आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय और विस्तार का नतीजा यह हुआ कि जो सभ्यताएँ राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं थीं, वे 'उसके अत्याचारों का क्षेत्र बन गईं। उपनिवेश में तब्दील हो गईं। प्रेमचंद ने लिखा है कि ''जो 'अराष्ट्र' प्रदेश इस राष्ट्र के हाथों बंदी हुआ, उसका जीवन निराशा अपमान की भेंट चढ़ जाता है। ...नारा व्यक्ति स्वातंत्र्य का बुलंद किया जाता है लेकिन सच तो यह है कि राष्ट्र ने व्यक्ति को मिटा दिया, व्यक्ति का अस्तित्व राष्ट्र या स्टेट में समाहित हो गया।'' (वि.प्र. दो, पृ. 261) निष्कर्ष यह कि ''राष्ट्रवाद पैसेवालों का एक जत्था है जो नैतिक, भावनात्मक, आत्मिक वस्तुओं को व्यावसायिक लाभ और हानि की दृष्टि से देखता है जिसके निकट वही नेकी आचरण करने योग्य है जो दौलत के ढेर में कुछ वृद्धि कर सके। उसे जनतंत्र कहना गलती है। बराबरी और भाईचारे को उसने पैरों तले इस तरह रौंदा है कि अब उसकी शक्ल भी नहीं पहचानी जा सकती। इनसान की कीमत उसकी नजदीक इतनी ही है कि वह रुपया कमाने का साधन है। वह कसाई की तरह इनसान के गोश्त और खाल का अंदाजा करके उसकी कीमत लगाता है।'' (वही, पृ. 264) पश्चिमी राष्ट्रवाद और नागरिक समाज पर इससे सख्त और सटीक टिप्पणी मेरे पढ़ने में नहीं आई।

अब सवाल यह था कि जो सभ्यताएँ राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं थीं, वे क्या करें? स्वयं को कैसे बचाएँ? प्रेमचंद का खयाल था कि अव्वल तो उन्हें राष्ट्र के रूप में संगठित होना होगा ''अन्यथा असंगठित प्राणि समूहों का इस राष्ट्रीयता के युग में कहीं पता भी नहीं लगेगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 100) राष्ट्र के रूप में संगठित होने के दौरान उन्हें उन बुराइयों से बचना होगा जो पश्चिमी राष्ट्रों में दिखती है। हमारा राष्ट्र पश्चिम की हूबहू नकल नहीं होगा। प्रेमचंद लिखते हैं : ''हम उन बुराइयों से बचना चाहते हैं जिनमें अन्य अधिकांश राष्ट्र पड़े हुए हैं। हम पश्चिमी सभ्यता की कृत्रिमताओं को मिटा कर उस पर भारतीयता की छाप लगाना चाहते हैं; हम वह स्वराज चाहते हैं जिसमें स्वार्थ और लूट प्रधान न हो, नीति और धर्म प्रधान हो।'' (वि.प्र.-दो, पृ.91, अप्रैल, 1932)

जैसे राष्ट्रवाद के विकास को प्रेमचंद ने कोई बड़ी उपलब्धि नहीं माना वैसे ही राष्ट्रीयता के प्रश्न को सनातन प्रश्न नहीं माना। क्योंकि ''प्रायः सभी राष्ट्रों में ऐसे विचारवान पुरुष निकल रहे हैं जिन्हें वर्तमान संस्कृति में तबाही के लक्षण दिख रहे हैं।'' (वि.प्र. दो, पृ.101, नवंबर, 1932) उन्हें लगता था कि 'बहुत मुमकिन है कि सभ्यता के विकास के साथ राष्ट्रीयता की समस्या गायब हो जाय और सारी दुनिया में भाईचारे की व्यवस्था फैल जाय। इस आंदोलन का आरंभ श्री रवींद्रनाथ ठाकुर ने कर दिया है और दुनिया के उद्बुध विचारकों ने बड़ी उदारता से उसका स्वागत किया है।' (वि.प्र.-दो, पृ.33) कुल मिला कर यह है कि ''संसार का कल्याण तभी हो सकता है जब संकुचित राष्ट्रीयता का भाव छोड़ कर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाव से विचार हो।'' (वि.प्र.-दो, जुलाई, 1933)

राष्ट्रीय औपनिवेशिक संघर्ष का मूल कारण आर्थिक है। अंतर्राष्ट्रीयतावाद का विकास अर्थ के प्रश्न को हल किए बिना न होगा। लिखते हैं : ''यह जो राष्ट्रों में परस्पर तनातनी हो रही है, इसका कारण अर्थ के सिवा और क्या हो सकता है। हजरत, ईसा, महात्मा बुद्ध आदि सभी धर्म प्रवर्तकों ने मानसिक और आध्यात्मिक संस्कार से समाज का संगठन बदलना चाहा। लेकिन उनकी असफलता का मुख्य कारण यही था कि उन्होंने अर्थ को नगण्य समझा। अंतरराष्ट्रीयता या एकात्मवाद या समता तीनों मूलतः एक ही हैं। ...जब तक संपत्ति मानव समाज संगठन का आधार है, संसार में अंतरराष्ट्रीयता का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता...। संपत्ति ने मनुष्य को अपना क्रीतदास बना लिया है। उसकी सारी मानसिक, आत्मिक और दैहिक शक्ति केवल संपत्ति के संचयन में बीत जाती है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 334-35, 35 नवंबर, 1933)

विज्ञान और राष्ट्रवाद के विकास के साथ लोकतंत्र का विकास भी जुड़ा है। लोकतंत्र के विकास को भी पश्चिमी सभ्यता की महान उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाता था। गांधी की तरह प्रेमचंद भी लोकतंत्र की महानता के कायल नहीं हो पाए। लिखते हैं कि ''डेमोक्रेसी केवल एक दलबंदी बन कर रह गई। जिसके पास धन था, जिनकी जबान में जादू था, जो जनता को सब्जबाग दिखा सकते थे, उन्होंने डेमोक्रेसी की आड़ में सारी शक्ति अपने हाथ में कर ली। व्यवसायवाद और साम्राज्यवाद उस सामूहिक स्वार्थपरता के भयंकर रूप थे जिन्होंने संसार को गुलाम बना डाला और निर्बल राष्ट्रों को लूट कर अपना घर भरा और आज तक वही नीति चली आ रही है। डेमोक्रेसी की इन दो सदियों में संसार में जो जो अनर्थ हुए, वह एकाधिपत्य की असंख्य सदियों में न हुए थे। अपने राष्ट्र के लिए डेमोक्रेसी चाहे जितनी मंगलमय सिद्ध हुई हो, पर संसार की दृष्टि से तो उसने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिस पर वह गर्व कर सके।'' (वि.प्र.-3, पृ. 326, दिसंबर, 1933)

विज्ञान, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र नागरिक समाज के तीन मूलभूत आधार स्तंभ, और तीनों की ऐसी गहन आलोचना उस दौर में गांधी की प्रेरणा के बिना संभव न थी। प्रेमचंद नागरिक समाज की आलोचना भारतीय सभ्यता की जमीन से कर रहे थे। नागरिक समाज की आलोचना मार्क्सवाद की भूमि से भी हो रही थी। लेकिन दोनों में फर्क है। प्रेमचंद को 'लगभग' मार्क्सवादी सिद्ध करने के उन्माद में प्रायः इस भेद की अनदेखी कर दी जाती है। लेकिन यह भेद महत्वपूर्ण है और प्रेमचंद के अंतिम दौर में भी यह भेद कायम रहता है। खास बात यह है कि प्रेमचंद पश्चिमी सभ्यता के तामझाम के पीछे छिपी सच्चाई को समझ रहे थे : ''संसार में जो यह तबाही आई हुई है उसका कारण योरोप के पूँजीपति हैं। संसार उनके भोग का क्षेत्र है। सारी राजव्यवस्था, ये बड़ी बड़ी सेनाएँ, ये जंगी बेड़े, ये हवाई जहाजों की परें इन्हीं व्यापारियों के फायदे के लिए तो हैं। वे संसार के स्वामी हैं, पार्लियामेंट, सीनेट सिंडीकेट तो उनके खिलौने हैं।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 329, 30 अक्टूबर, 1933)

7 .

उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के उस दौर में प्रेमचंद भली भाँति यह समझते हैं कि कौन सी बात कहाँ कहनी चाहिए और कौन सी बात नहीं कहनी चाहिए। औपनिवेशिक प्रभुत्व के उस दौर में राष्ट्रीय आंदोलन गांधी के नेतृत्व में इस वर्चस्व को चुनौती दे रहा था और अपना प्रति वर्चस्व (Counter hegemoney) कायम करने की कोशिश कर रहा था। प्रेमचंद इस अभियान से जुड़े हुए थे। उनके वैचारिक लेखन का अध्ययन करते समय संवाद के संदर्भ का ध्यान रखना जरूरी है। क्योंकि संवाद के संदर्भ के मुताबिक उनका बलाघात (emphasis) बदलता है। जैसे कबीर की कविताओं में पंडित, काजी, मौलवी, साधो जैसे संबोधनों से यह पता चलता है कि ये कविताएँ किसे संबोधित हैं, और उसी के अनुरूप उनकी तर्कप्रणाली में बदलाव दिखाई पड़ता है, वैसे ही प्रेमचंद के लेखन में पश्चिम (योरोप), भारत, शहर, गाँव, स्त्री और दलित, व्यक्ति और समुदाय ऐसे संदर्भ हैं जिनके अनुसार वे अपने तर्क प्रणाली के बलाघात को बदलते हैं।

पश्चिमी राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद की आलोचना करने के दौरान प्रेमचंद ने यह दिखाया था कि जो समाज राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं थे उनके सामने आत्मरक्षा के लिए स्वयं को राष्ट्र के रूप में संगठित करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। इसलिए इस बात पर जोर देना जरूरी था कि ''भारत एक राष्ट्र है अन्य राष्ट्रों की भाँति अनेक भेदों के होते हुए भी एक राष्ट्र है। धर्म और संस्कृति के अलग होने पर भी एक राष्ट्र है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 387, अक्टूबर, 1932) भारत के एक राष्ट्र होने पर जोर देना जरूरी था क्योंकि पश्चिमी राष्ट्रों के वजन पर भारत को राष्ट्र कहना मुश्किल था। इस बात का प्रचार भी किया जाता था कि इतनी भिन्नताओं के रहते भारत का एक राष्ट्र के रूप में संगठित होना कठिन है। उपनिवेशवाद का मुकाबला करने के लिए स्वयं को राष्ट्र के रूप में संगठित करना एक ऐसा आपद्धर्म था जिसमें समाज के प्रायः सभी वर्गों को एकजुट करने की जरूरत थी। भिन्नता पर जोर देने से ज्यादा एकता का महत्व समझाने की जरूरत थी। उपनिवेशवाद ने अपनी मर्जी से, सदिच्छा से, कुछ भी नहीं दिया। उससे लड़ने के लिए व्यापक गठजोड़ और जनसमर्थन जरूरी था। डेविडसन ने ठीक लिखा है कि ''उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के लिए एक ऐसे विचारधारात्मक आधार की जरूरत थी जिसके द्वारा व्यापकतम एकता कायम की जा सके। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से पहले ऐसी व्यापक एकता की जरूरत कभी महसूस नहीं की गई थी।'' (बेसिल डेविडसन, लेट फ्रीडम कम, 1978, वोस्टन और टोरेंटो, लिटिल ब्राउन एंड कंपनी) नील लजारस का भी विचार है कि ''तीसरी दुनिया में राष्ट्रवाद अपरिहार्य है क्योंकि बहुराष्ट्रीय पूँजीवाद के दौर में उपनिवेशवाद का विरोध राष्ट्रवाद जैसे सार्वभौमिक विचार की बुनियाद पर ही संभव है।'' (देखें : फ्रांसिस बार्कर पीटर हूल्में द्वारा संपादित पुस्तक कॉलोनियल डिसकोर्स/पोस्ट कॉलोनियल थियरी पुस्तक में लेख 'नेशनल कान्शसनेस एंड स्पेसिफिसिटी ऑफ पोस्ट कॉलोनियल इंटेक्चलुअलइज्म, मैन्चेस्टर यूनिवर्सिटी प्रेस, मैन्चेस्टर और न्यूयार्क, 1994, पृ. 216)

जाहिर है कि एकता का रूप, एकता का आधार एवं शर्तें सर्वत्र एक जैसी नहीं हो सकतीं। इसलिए अलग अलग देशों के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष का चरित्र और परिणति भी एक समान नहीं हो सकती थी। लेकिन इस फर्क से एकता की जरूरत और महत्व का निषेध नहीं हो जाता। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में राजनीतिक सांस्कृतिक कार्यवाही द्वारा लोगों को संगठित और एकजुट करना जरूरी था। भिन्नता पर ज्यादा जोर देने से यह एकजुटता टूटती थी, जिसका फायदा अंततः उपनिवेशवाद को मिलता था। प्रेमचंद इस बात को अच्छी तरह समझते थे। इसीलिए भिन्नता के नाम पर एकता को कमजोर करने की किसी भी कोशिश का उन्होंने समर्थन नहीं किया। लिखा है : ''राष्ट्रवाद चाहे कोई और उपकार न कर सके, देश में खून खच्चर तो नहीं कराता, कुछ लोगों को एकत्र करता है जो राष्ट्र को संप्रदाय से ऊपर समझते हैं। ...वही बुनियाद है जिस पर राष्ट्र का भवन खड़ा होगा। जब तक राष्ट्र के भिन्न भिन्न अंग एक दूसरे के अहित पर अपना हित निर्माण करते रहेंगे, राष्ट्र का पतन होता चला जाएगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 421, अक्टूबर, 1933) निष्कर्ष ये रहा कि प्रेमचंद संप्रदायवाद से राष्ट्रवाद को बेहतर समझते थे और राष्ट्रहित को राष्ट्र के भिन्न भिन्न अंगों के हित से बड़ा मानते थे। अपनी इसी समझ के आधार पर उन्होंने संप्रदायवाद, प्रांतवाद, क्रांतिकारी आतंकवाद, आंबेडकर के दलितवाद आदि की आलोचना की थी।

प्रेमचंद को लगता था कि भारत के राष्ट्र के रूप में संगठित होने की प्रक्रिया में शिक्षित समुदाय अपने निहित स्वार्थ के कारण बाधा उत्पन्न कर रहा है। लिखते हैं : ''वास्तव में जो मतभेद है वह शिक्षित समुदाय के अधिकार और स्वार्थ का है। राष्ट्र के सामने जो समस्या है उसका संबंध हिंदू मुसलमान, सिख ईसाई सभी से है। बेकारी से सभी दुखी हैं। ...गौण बातों को प्रधान समझा जा रहा है और थोड़े से व्यक्तियों के हित पर राष्ट्र के हित का बलिदान किया जा रहा है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 393.94, नवंबर, 1932)

नाना प्रकार की भिन्नताओं का राग अलापने के पीछे वस्तुतः शिक्षित समुदाय का सरकारी नौकरी के लिए मोह है : ''सरकारी नौकरियों के लिए शिक्षित समाज में मोह है। वही मोह, वही लोभ इस भिन्नता का कारण है। वास्तविक राष्ट्र शिक्षित समाज की संकीर्ण स्वार्थपरता से विद्रोह करेगा। मुट्ठी भर पढ़े लिखे आदमियों को अधिकार नहीं कि वह अपने हलुए माड़े के लिए संपूर्ण राष्ट्र का जीवन संकटमय बनाएँ। वह जमाना आ रहा है जब भारत के किसान, भारत के दुकानदार, भारत के मजदूर खुद अपना नफा नुकसान समझेंगे और अपने हितों को शिक्षित समुदाय के पैरों तले कुचला जाना गवारा न करेंगे। शिक्षितों ने जीवन के पश्चिमी, नकली आडंबरपूर्ण आदर्शों की गुलामी करके भारत को सर्वनाश की गर्त में ढकेल दिया। ...इसी आडंबरमय जीवन के निर्वाह के लिए तरह तरह के ढोंग रचे जाते हैं, धर्म की आड़ ली जाती है, संस्कृति का रोना रोया जाता है, विशेष अधिकार का भूत खड़ा किया जाता है, भाषा और लिपि और अनेक कल्पित भिन्नताओं की दुहाई दी जाती है। ...वह समय अब दूर नहीं जब भारत इस नकली आदर्श से विद्रोह करेगा और पृथकता के मकड़ी के जाल को छिन्न भिन्न कर देगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 374, अक्टूबर, 1931)

इस लंबे उद्धरण को पढ़ कर कोई सहज ही सोच सकता है कि प्रेमचंद एक ऐसे क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की कल्पना कर रहे हैं जिसके केंद्र में भारत के किसान मजदूर और छोटे दुकानदार होंगे और यह 'वास्तविक राष्ट्र' शिक्षित समाज की संकीर्ण स्वार्थपरता के कारण राष्ट्रीय एकता के मार्ग में खड़ी की गई बाधाओं को तोड़ देगा। भारत विभाजन के भावी परिदृश्य को यदि ध्यान में रखें तो यह आशंका निराधार नहीं लगती। अस्मितावादी समकालीन राजनीति की असलियत को इन पंक्तियों की रोशनी में समझा जा सकता है और यह भी कि अस्मितावादी राजनीति के मूल में शिक्षितों का सरकारी नौकरी के लिए मोह है। अलग अलग धर्म, जाति, क्षेत्र आदि का प्रतिनिधित्व करने का दावा करनेवाले ये शिक्षित जन ही भारत को सर्वनाश की गर्त में ढकेलने के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि ये पश्चिमी, नकली आडंबरपूर्ण आदर्शों की गुलामी करनेवाले लोग हैं।

लेकिन सच्चाई यह है कि प्रेमचंद को अभी भी यही लगता है कि कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत करके ही ऐसे राष्ट्रवाद को संभव बनाया जा सकता है। इसी लेख में वे लिखते हैं कि ''कांग्रेस ने राष्ट्र के स्वत्वों की जो घोषणा की है उसमें हरेक भारतीय के समान अधिकार रखे हैं। वोट का हक हरेक को दिया है। राजपद पर भी सब का समान अधिकार माना गया है। ...इस वक्त तो पृथकता का राग अलाप कर वह हमारे शत्रुओं का साथ दे रहे हैं। लेकिन अगर डॉक्टर साहब (आंबेडकर) ने मुसलमानों, ईसाइयों, एंग्लो इंडियनों के साथ विशेष अधिकार पर जोर दिया तो यह राष्ट्र क्या होगा लड़ैतियों का अखाड़ा होगा। भारत का उद्धार अब इसी में है कि हम राष्ट्रधर्म के उपासक बने, विशेष अधिकारों के लिए न लड़ कर समान अधिकारों के लिए लड़ें। हिंदू या मुसलमान, अछूत या ईसाई बन कर नहीं, भारतीय बन कर संयुक्त उन्नति की ओर अग्रसर हों, अन्यथा हिंदू, मुसलमान, अछूत और सिख सब रसातल को चले जाएँगे। संपूर्ण भारत का हित एक है, उसमें कोई भिन्नता नहीं है।'' (पूर्वोद्धृत)

सच तो यह है कि प्रेमचंद ने समाज के वंचित वर्गों समुदायों की विशेष जरूरतों को तो स्वीकार किया लेकिन इन समुदायों को लेकर अस्मितावादी राजनीति करनेवालों को उन्होंने महत्व नहीं दिया। मुसलमान, सिक्ख, ईसाई और दलितों को अलग अलग संगठित कर राजनीति करनेवालों की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा कि ''यही वह संस्था (कांग्रेस) है जो प्रत्येक विषय पर राष्ट्रीय दृष्टि से विचार करती है और जाति द्वेष से अपने को बचाती रहती है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 89, अप्रैल 1932) मुसलमानों को पृथक निर्वाचन दिए जाने के नतीजे से उत्साहित अंग्रेजी सरकार ने अछूतों को भी कांग्रेस से अलग कर राष्ट्रीय आंदोलन की कमर तोड़नी चाही : ''अछूत भाइयों को हिंदुओं से अन्याय की शिकायत है ही और बजा शिकायत है। उन्हें पृथक करने में क्या देर लगती थी। वहाँ डाक्टर आंबेडकर थे ही। वह बड़ी खुशी से इस गुट में आ गए। यह किसी ने सोचने की जहमत नहीं उठाई कि कांग्रेस ने जिस नीति की घोषणा की है, उससे राष्ट्र के किसी अंग को वास्तव में हानि पहुँचती है या नहीं। ...कांग्रेस ही ऐसी संस्था है जो वास्तविक रूप में जनसत्ता चाहती है, जो जात पांत के झगड़ों से अलग रह कर राष्ट्र के उद्धार के लिए प्रयत्न करती है; जो दरिद्र किसानों के हित को सबसे ऊपर रखती है, विभिन्नता में एकता उत्पन्न करके राष्ट्र को बलवान बनाना चाहती है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 89-91, अप्रैल 1932)

लेकिन सन 1934 तक आते आते कांग्रेसी नेतृत्व के प्रति प्रेमचंद का असंतोष बढ़ने लगता है। वह स्वराज के स्वरूप को लेकर चिन्तित दिखते हैं : ''स्वराज हम चाहते ही हैं किसलिए? इसीलिए तो कि राष्ट्र को हम ज्यादा सुखी और खुशहाल बना सकें, वरना राष्ट्र को स्वराज से क्या फायदा? जेम्स की जगह मि. नायडू के आ जाने से जनता का क्या उपकार होगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 262, अप्रैल 1934) और फिर बिल्कुल साफ साफ बातें कांग्रेसी नेतृत्व के बारे में : ''कांग्रेस में बड़े बड़े ताल्लुकेदार और जमींदार, बड़े बड़े व्यापारी और पूँजीपति शरीक हैं। सभी स्वराज्य को अपने स्वार्थ की आँखों से देख रहे हैं। उसे आर्थिक समस्याओं का भी फैसला करना होगा, तभी उसके ऐब और हुनर मालूम होंगे।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 264-65, अप्रैल 1934)

किसी समुदाय या धार्मिक अल्पसंख्यक के नाम पर अस्मितावादी राजनीति करनेवालों की प्रेमचंद द्वारा की गई आलोचना पर विचार करते समय ध्यान रखना चाहिए कि उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन किसी एक वर्ग या समुदाय की माँगों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता था। राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्र, स्वरूप और नेतृत्व में बदलाव की संभावना तो रहती है और उसकी परिणतियाँ भी एक जैसी नहीं होतीं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि नवजनवादी क्रांति की अवधारणा में भी किसान मजदूर के अलावा राष्ट्रीय पूँजीपति शामिल थे। प्रेमचंद 'वास्तविक राष्ट्र' के हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाले अपेक्षाकृत रैडिकल राष्ट्रीय आंदोलन की कल्पना तो करते हैं लेकिन यह स्वीकार नहीं करते कि ऐसे आंदोलन की बुनियाद 'कल्पित भिन्नता' की आड़ में अस्मितावाद की राजनीति करनेवालों के सहारे पड़ेगी। इसके विपरीत उनके अनुसार रैडिकल राष्ट्रीय आंदोलन उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता को और भी मजबूत करेगा और और उपनिवेशवाद का प्रखर विरोधी होगा। प्रेमचंद का खयाल था कि उपनिवेशवाद स्वेच्छा से किसी को कुछ नहीं देता, समाज के वंचित और कमजोर वर्ग को तो बिल्कुल ही नहीं। लिखते हैं : ''अंग्रेज जाति उनका उद्धार करने पर आमादा हो गई है। ...डाक्टर साहब (आंबेडकर) तो विद्वान आदमी है क्या वे नहीं जानते कि विजेताओं ने हमेशा कमजोरों को दबाया है, यहाँ तक कि वही अंग्रेज जाति जिन्हें वह अपना उद्धारक समझ रहे हैं, अपनी पराधीन जातियों पर किस प्रकार शासन कर रही है? अफ्रीकावालों से अंग्रेजों की न्यायप्रियता की कथा पूछिए, रेड इंडियन से पूछिए, आस्ट्रेलिया के मावरियों से पूछिए, भारतवालों से पूछिए।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 373, अक्टूबर 1931)

इतना तो तय है कि राष्ट्रीयता के उत्थान के लिए प्रेमचंद जाति भेद के खात्मे को पहली शर्त मानते थे। लिखा है ''राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण व्यवस्था, ऊँच नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 476, 8 जनवरी 1934) प्रेमचंद अब एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना कर रहे थे जिसके केंद्र में किसान और मजदूर थे : ''हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मगत वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन।'' (वही, पृ. 473) आगे उन्होंने स्वराज को और भी साफ शब्दों में परिभाषित किया है : ''हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।' (वही, पृ. 476) अब प्रेमचंद जिस स्वराज की कल्पना कर रहे थे वह पूँजीपतियों का नहीं बल्कि गरीबों, काश्तकारों और मजदूरों का स्वराज था। (वि.प्र.-दो, पृ. 218, 16 अक्टूबर 1933)

अकारण नहीं है प्रेमचंद का ध्यान अब कांग्रेस के वर्ग चरित्र पर जा रहा था। कांग्रेस में, ताल्लुकेदार, जमींदार, व्यापारी और पूँजीपति शरीक थे और ये ''सभी स्वराज को अपने अपने स्वार्थ की आँखों से देख रहे हैं। ...उसे (कांग्रेस को) आर्थिक समस्याओं का भी फैसला करना पड़ेगा, तभी उसके ऐब और हुनर मालूम होंगे। ...(अन्यथा) जेम्स की जगह मि. नायडू के आ जाने से जनता का क्या उपकार होगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 262-64, 30 अप्रैल 1934) प्रेमचंद रैडिकल राष्ट्रवादी थे और उन्हें 'वास्तविक राष्ट्र' से सच्चा लगाव था।

प्रेमचंद ने इस बात पर बराबर जोर दिया कि सांप्रदायिक और अस्मितावादी राजनीति का आधार शिक्षित समुदाय है। लिखा है कि ''यह सारी लड़ाई मुट्ठी भर आदमियों की है जो ओहदे और मेंबरियों के लिए एक दूसरे को नोच रहे हैं। इस समुदाय से अलग जो राष्ट्र हैं वहाँ न कोई हिंदू है और न मुसलमान। वहाँ सब किसान हैं, या मजदूर जो एक से एक दरिद्र, एक से पिसे हुए एक से दलित हैं। आरती और नमाज, हिंदू उर्दू की समस्याएँ वहाँ हैं ही नहीं।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 404, 5 दिसंबर 1932)

राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए सांप्रदायिकता का इस्तेमाल उपनिवेशवाद 1857 से करता रहा था। प्रेमचंद सांप्रदायिकता के राजनीतिक निहितार्थों को भली भाँति समझते थे : ''सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है और वह आखिर दम तक इस हथियार को हाथ से न छोड़ेगी।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 118, 23 फरवरी 1933) उनका अनुमान था कि ''सरकार ने भारत में सांप्रदायिकता का बीज बो दिया है और किसी दिन इस वृक्ष का फल भारत और भारतीय सरकार दोनों के लिए घातक साबित होगा।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 418, 4 सितंबर 1933) कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अनुमान बिल्कुल सही निकला और भयंकर सांप्रदायिक दंगों के बाद 1947 को भारत का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन हो गया।

पंथवाद और सांप्रदायिकता के अतिरिक्त प्रेमचंद क्रांतिकारी आतंकवाद की भूमिका को लेकर भी आश्वस्त न थे। उन्हें लगता था आतंकवाद का मूल कारण युवकों की बेकारी है और सरकार बेकारी का इलाज कर दे तो आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। (वि.प्र.-दो, पृ. 70,सितंबर 1934) कांग्रेस से बगावत करने पर तुले इन युवकों में उन्हें विद्रोह के लक्षण दिखाई पड़ रहे थे और वे तय नहीं कर पा रहे थे : ''इसका फल क्या होगा? देश के सुदिन आनेवाले हैं या कुदिन।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 178, 26 जून 1933)

आतंकवाद के बजाय 1933 से प्रेमचंद का झुकाव समाजवाद की ओर बढ़ता दीखता है। यद्यपि वे समाजवाद को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और वर्गवाद को विपत्ति मानते प्रतीत होते हैं। 9 अक्टूबर 33 को उनकी एक टिप्पणी है : ''भारत जैसे देश में जहाँ आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबों का है... सोशलिज्म के सिवा उनका आदर्श हो ही क्या सकता है। अगर इसके लिए वर्गवाद की विपत्ति आए और जो लोग भूमि और धन पर कब्जा किए बैठे हैं, वे अनंतकाल तक उसे भोगने की इच्छा रखें तो संघर्ष होना लाजिमी है।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 217) वर्गवाद को लेकर आशंकित होने के बावजूद उन्हें यह समझ में आ रहा था कि आनेवाला समय समाजवाद का है : ''यदि सरकार ने बाधाएँ न खड़ी की होतीं तो इस थोड़े समय में राष्ट्र साम्यवाद की ओर आ गया होता।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 226, जनवरी, 1934 और वि.प्र. 1, पृ. 268)

यह ठीक है कि प्रेमचंद को समाजवाद पूँजीवाद से बेहतर विकल्प लग रहा था लेकिन वे मूलतः भारतीय जीवन के पुनरुद्धार के हिमायती थे और स्वराज का फायदा उनकी नजर में ये था कि स्वराज मिलने पर ''हम संसार में एक नई सभ्यता, एक नए जीवन का प्रचार कर देंगे, स्पर्द्धा और प्रतिद्वंद्विता को मिटा कर सहकारिता और प्रेम का सिक्का जमा देंगे।'' (वि.प्र.-दो, पृ. 277-78) कृषि, गाँव और उद्योग को लेकर प्रेमचंद की सोच समाजवादी आर्थिक परियोजना से भिन्न और गांधीवादी चिंतन के नजदीक लगती है। वे ऐसी ही आर्थिक नीतियों के हिमायती थे जिससे 'स्वास्थ्य रक्षा और आचरण की पवित्राता का प्रतीक ग्राम्य जीवन' नष्ट न होने पावे क्योंकि बड़े कारखाने कायम करने से ''मजदूर लोग शहर में बसने लगते हैं और नाना प्रकार की आदतों में पड़ कर अपने शरीर और आत्मा दोनों का ही सर्वनाश करते हैं। कलकत्ता, बंबई, अहमदाबाद आदि स्थानों में मजदूरों की दशा अत्यंत शोचनीय हो रही है। ...इसलिए हमें प्रायः उन्हीं उद्योग धंधों का प्रचार करना होगा जो कृषक लोग घर बैठे अवकाश के समय कर सकें। छोटे छोटे कारखाने अलबत्ता कस्बों में खोले जा सकते हैं। हमारा उद्देश्य कदापि नहीं है कि सस्ता माल बना कर निर्बल देशों पर पटकें और व्यवसाय के बहाने उन पर आधिपत्य जमाएँ। इसी व्यावसायिक चढ़ा ऊपरी के कारण योरोप की जातियों में नित्य वैमनस्य बना रहता है। उसका भयंकर परिणाम वह महासमर था जिसका अभी तक निपटारा नहीं हुआ है। इस व्यावसायिक स्वार्थपरता को छिपाने के लिए तरह तरह के नैतिक ढकोसले गढ़े जाते हैं।'' (वि.प्र.-दो, 280, स्वराज के फायदे) प्रेमचंद के इस सोच पर गांधी का प्रभाव साफ परिलक्षित होता है। उल्लेखनीय है कि 'यंग इंडिया' में 11 नवंबर 1931 को गांधी ने लिखा था : ''मुझे भय है कि औद्योगीकरण मानव जाति के लिए अभिशाप साबित हो रहा है। एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा शोषण सदैव नहीं चल सकता। औद्योगीकरण पूरी तौर पर आपकी इस क्षमता पर निर्भर करता है कि विदेशी बाजार आपके लिए खुले हों और प्रतियोगिता का अभाव हो। औद्योगीकरण के लिए भारत को दूसरे राष्ट्रों का शोषण करना होगा और इस तरह वह दूसरों राष्ट्रों के लिए अभिशाप और संसार के लिए मुसीबत साबित होगा।'' (गांधी, माई सोशलिज्म, संकलन, आर.के. प्रभु, अहमदाबाद, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, 1959, पृ. 28)

दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने का 'सौभाग्य' तो गैर पश्चिमी राष्ट्रों को सुलभ नहीं था अतः उन्होंने औद्योगीकरण के लिए दूसरा तरीका अपनाया, जिसे आंतरिक औपनिवेशीकरण कहना अनुचित न होगा। औद्योगीकरण के लिए जरूरी पूँजी मुहैया कराने के लिए इन राष्ट्रों के पास अपने ही देश के कृषि संसाधनों का दोहन करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। नव स्वाधीन राष्ट्रों, सोवियत संघ और चीन जैसे समाजवादी देशों ने यही रास्ता अपनाया और 'स्वास्थ्य रक्षा और आचरण की पवित्राता के प्रतीक' ग्रामीण जीवन को तबाह कर दिया। उल्लेखनीय है कि ग्रामीण जीवन को आंबेडकर नरक तुल्य मानते थे और पंचायतों को अधिकार दिए जाने के विरोधी थे। आंबेडकर के विपरीत प्रेमचंद पारंपरिक संस्थाओं और मूल्यों के प्रगतिशील पुनरुद्धार और संवर्धन के हिमायती थे और औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा कायम की गई संस्थाओं के कटु आलोचक। इसीलिए वे औपनिवेशिक शिक्षा, न्याय प्रणाली, लोकतांत्रिाक चुनाव और भोगवादी भौतिक संस्कृति की आलोचना करते हैं और इनके विकल्प के रूप में देसी मूल्यों और संस्थाओं को पुरस्कृत करते हैं और देश को देश के विभिन्न टुकड़ों के योग से बड़ा मानते हैं।


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