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कविता

जहाँ सर और पैर हो सकते हैं
संजय चतुर्वेदी


फुर्सत मिली तो
बिताऊँगा जिंदगी एक कवि की तरह
लुंगी पहन कर जाऊँगा दफ्तर
मिटा दूँगा कायदे
खोजूँगा जिंदगी के वे हिस्से
जहाँ सर और पैर हो सकते हैं
दिन में अदब से सिर झुकाऊँगा
खुशी से सिर उठाऊँगा
शाम को सोचूँगा कुछ।

 


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