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कविता

पता नहीं
संजय चतुर्वेदी


सुंदरता हद से ज्‍यादा है
शरीर इच्‍छाहीन
आसमान सवाल पूछता है
झील में तैर रहे हैं तारे
पहाड़ी ढलानों से उतरते
चाँदनी लड़खड़ाती है
हरे काँच के पेड़ों पर
सफेद धुआँ चढ़ता-उतरता है
धरती नीली हो गई है
फटी हुई आस्‍तीनों से
मैले हाथ बाहर निकले हैं
उँगलियाँ ठंडी पड़ चुकी हैं
बहुत छुड़ाने के बाद भी
नाखूनों पर रंग लगे रह गए थे
वो अब सुख दे रहे हैं
समय सो गया है
लेकिन चिड़ियों के बच्‍चे जाग रहे हैं
आज शाम लौटे नहीं उनके माँ-बाप
सूखे पत्‍तों पर किसी के चलने की
आवाज आती है
डर के मारे बोलती बंद है सारे संसार की
सवेरे जब आँख खुलती है
पेड़ के नीचे मरी पड़ी है एक चिड़िया
खून का निशान तक नहीं
डर के मारे मर गई
सूरज धीरे-धीरे डुबो रहा है सारी दुनिया को
अब न वो सुंदरता है
न वो डर
सब डूब गया है सूरज में
पता नहीं कहाँ होंगी वे सब चीजें।

 


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