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कविता

लोहे ने आदमी की कुत्ते जैसी सेवा की
संजय चतुर्वेदी


लोहे ने आदमी की कुत्ते जैसी सेवा की
और वैसा ही फल पाया
सोना सिर चढ़कर बैठा
सिर फुड़वाया आदमी का आदमी से
लोहा आदमी की बातों में रहा
हाथ-पैरों में और दिमाग के धारदार हिस्से में
सोना घुस गया उसकी ख्वाबगाह में
नींदें हराम कर दीं उसकी

आदमी क्या इन सब बातों को जानता नहीं
शताब्दियों में कराहता लोहा
भविष्य में चिल्लाता है

 


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