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कविता

पहले से ही
संजय चतुर्वेदी


इतने बड़े शहर में
नहीं मिलता एक कमरा
एक गिलास पानी
और थोड़ी-सी तसल्ली
एक मेज
इस्तेमाल करने के लिए अपनी तरह
एक कुर्सी बैठने को चुपचाप
खिड़कियाँ नहीं मिलतीं

कागजों पर पहले से ही कुछ लिखा होता है।

 


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हिंदी समय में संजय चतुर्वेदी की रचनाएँ