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लोककथा

प्रजापीड़क
खलील जिब्रान

अनुवाद - बलराम अग्रवाल


जवानी के दिनों में एक दिन मैं पहाड़ियों के पीछे स्थित एक महात्मा की वाटिका में गया। वहाँ गुणों की प्रकृति पर हम परस्पर बात कर ही रहे थे कि एक लुटेरा थकान से लँगड़ाता हुआ उस रिज़ पर आया। वाटिका में आकर वह महात्मा के आगे घुटनों पर झुका और बोला, "महात्मा जी! मुझ पर कृपा करो। मैं अपने पापों के बोझ तले दबा जा रहा हूँ।"

महात्मा ने कहा, "मेरे पाप भी मुझ पर भारी हैं।"

लुटेरे ने कहा, "लेकिन मैं एक चोर और लुटेरा हूँ।"

महात्मा ने कहा, "मैं भी एक चोर और लुटेरा हूँ।"

लुटेरे ने कहा, "मैं हत्यारा हूँ। मारे गए लोगों की चीखें मेरे कानों में गूँजती हैं।"

महात्मा ने उत्तर दिया, "मैं भी एक हत्यारा हूँ और मेरे कानों में भी मारे गए लोगों की चीखें गूँजती हैं।"

लुटेरे ने कहा, "मैंने अनगिनत अपराध किए हैं।"

महात्मा ने कहा, "मेरे अपराध भी गिने नहीं जा सकते।"

इस पर लुटेरा उठ खड़ा हुआ। उसने महात्मा को घूरकर देखा। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक आ गई। और फिर हमें वही छोड़कर वह उछलता-कूदता पहाड़ी से नीचे उतर गया।

मैं महात्मा की ओर मुड़ा और उनसे पूछा, "आपने कब अनगिनत अपराध कर डाले? यह आदमी तुम्हारी बातों को झूठी मानकर यहाँ से गया है।"

"यह तो सच है कि उसे मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ।" महात्मा ने उत्तर दिया, "लेकिन यहाँ से वह बहुत हल्का होकर गया है।"

उसी समय हमें दूर से आता लुटेरे का गान सुनाई दिया; और उस गान से वह समूची घाटी गूँज उठी।


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