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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 12. हिंदुस्तानियों से परिचय पीछे     आगे

ईसाई संबंधों के बारे में अधिक लिखने से पहले उसी समय के दूसरे अनुभवों का उल्लेख करना आवश्यक है।

नेटाल में जो स्थान दादा अब्दुल्ला का था, प्रिटोरिया में वही स्थान सेठ तैयब हाजी खानमहम्मद का था। उनके बिना एक भी सार्वजनिक काम चल नहीं सकता था। उनसे मैंने पहले हफ्ते में जान-पहचान कर ली। मैंने उन्हें बताया कि मैं प्रिटोरिया के प्रत्येक हिंदुस्तानी के संपर्क में आना चाहता हूँ। मैंने हिंदुस्तानियों की स्थिति का अध्ययन करने की अपनी इच्छा प्रकट की और इन सारे कामों में उनकी मदद चाही। उन्होंने खुशी से मदद देना कबूल किया।

मेरा पहला कदम तो सब हिंदुस्तानियों की एक सभा करके उनके सामने सारी स्थिति का चित्र खड़ा कर देना था। सेठ हाजी महम्मद हाजी जूसब के यहाँ यह सभा हुई, जिनके नाम मेरे पास एक शिफारिशी पत्र था। इस सभा में मेमन व्यापारी विशेष रूप से आए थे। कुछ हिंदू भी थे। प्रिटोरिया में हिंदुओं की आबादी बहुत कम थी।

यह मेरे जीवन का पहला भाषण माना जा सकता है। मैंने काफी तैयारी की थी। मुझे सत्य पर बोलना था। मैं व्यापारियों के मुँह से यह सुनता आ रहा था कि व्यापार में सत्य नहीं चल सकता। इन बात को मैं तब भी नहीं मानता था, आज भी नहीं मानता। यह कहनेवाले व्यापारी मित्र आज भी मौजूद है कि व्यापार के साथ सत्य का मेल नहीं बैठ सकता। वे व्यापार को व्यवहार कहते है, सत्य को धर्म कहते है और दलील यह देते है कि व्यवहार एक चीज है, धर्म दूसरी। उनका यह विश्वास है कि व्यवहार में शुद्ध सत्य चल ही नहीं सकता है। अपने भाषण में मैंने इस स्थिति का डटकर विरोध किया और व्यापारियों को उनके दोहरे कर्तव्य का स्मरण कराया। परदेश में आने से उनकी जिम्मेदारी देश की अपेक्षा अधिक हो गई है, क्योंकि मुट्ठी भर हिंदुस्तानियों की रहन-सहन से हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों को नापा-तौला जाता है।

अंग्रेजों की रहन-सहन की तुलना में हमारी रहन-सहन गंदी है, इसे मैं देख चुका था। मैंने इसकी ओर भी उनका ध्यान खींचा। हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, अथवा गुजराती, मद्रासी, पंजाबी, सिंधी, कच्छी, सूरती आदि भेदों को भुला देने पर जोर दिया।

अंत में मैंने यह सुझाया कि एक मंडल की स्थापना करके हिंदुस्तानियों के कष्टों और कठिनाइयों का इलाज अधिकारियों से मिलकर और अर्जियाँ भेजकर करना चाहिए, और यह सूचित किया कि मुझे जितना समय मिलेगा उतना इस काम के लिए मैं बिना वेतन के दूँगा।

मैंने देखा कि सभा पर मेरी बातों का अच्छा प्रभाव पड़ा।

मेरे भाषण के बाद चर्चा हुई। कइयों में मुझे तथ्यों की जानकारी देने को कहा। मेरी हिम्मत बढ़ी। मैंने देखा कि इस सभा में अंग्रेजी जाननेवाले कुछ ही लोग थे। मुझे लगा कि ऐसे परदेश में अंग्रेजी का ज्ञान हो तो अच्छा है। इसलिए मैंने सलाह दी कि जिन्हें फुरसत हों वे अंग्रेजी सीख ले। मैंने यह भी कहा कि अधिक उमर हो जाने पर भी पढ़ा जा सकता है। और इस तरह पढ़नेवालों के उदाहरण भी दिए। और कोई क्लास खुले तो उसे अथवा छुट-फुट पढ़नेवाले मिलें तो उन्हें पढ़ाने की जिम्मेदारी मैंने खुद अपने सिर ली। क्लास तो नहीं खुला, पर तीन आदमी अपनी सुविधा से और उनके घर जाकर पढ़ाने की शर्त पर पढ़ने के लिए तैयार हुए। इनमें दो मुसलमान थे। दो में से एक हज्जाम था और एक कारकुन था। एक हिंदू छोटा दुकानदार था। मैंने सबकी बात मान ली। पढ़ाने की अपनी शक्ति के विषय में तो मुझे कोई अविश्वास था ही नहीं। मेरे शिष्यों को थका मानें तो वे थके कहे जा सकते है पर मैं नहीं थका। कभी ऐसा भी होता कि मैं उनके घर जाता और उन्हें फुरसत होती। पर मैंने धीरज न छोड़ा। इनमें से किसी को अंग्रेजी का गहरा अध्ययन तो करना न था। पर दोनों ने करीब आठ महीनों में अच्छी प्रगति कर ली, ऐसा कहा जा सकता है। दोने हिसाब-किताब रखना और साधारण पत्र-व्यवहार करना सीख लिया। हज्जाम को तो अपने ग्राहकों के साथ बातचीत कर सकने लायक ही अंग्रेजी सीखनी थी। दो व्यक्तियों ने अपनी इस पढ़ाई के कारण ठीक-ठीक कमाने की शक्ति प्राप्त कर ली थी।

सभा के परिणाम से मुझे संतोष हुआ। निश्चय हुआ कि ऐसी सभा हर महीने या हर हफ्ते की जाय। यह सभा न्यूनाधिक नियमित रूप से होती थी और उसमें विचारों का आदान-प्रदान होता रहता था। नतीजा यह हुआ कि प्रिटोरिया में शायद ही कोई ऐसा हिंदुस्तानी रहा होगा, जिसे मैं पहचाने न लगा होऊँ अथवा जिसकी स्थिति से मैं परिचित न हो गया होऊँ।

हिंदुस्तानियों की स्थिति का ऐसा ज्ञान प्राप्त करने का परिणाम यह आया कि मुझे प्रिटोरिया में रहनेवाले ब्रिटिश एजेंट से परिचय करने की इच्छा हुई। मैं मि. जेकोब्स डि-वेट से मिला। उनकी सहानुभूति हिंदुस्तानियों के साथ थी। उनका प्रभाव कम था पर उन्होंने यथासंभव मदद करने और मिलना हो तब आकर मिल जाने के लिए कहा। रेलवे के अधिकारियों से मैंने पत्र-व्यवहार शुरू किया और बतलाया कि उन्हीं के कायदों के अनुसार हिंदुस्तानियों को ऊँचे दर्जे में यात्रा करने से रोका नहीं जा सकता। इसके परिणाम-स्वरूप यह पत्र मिला कि अच्छे कपड़े पहने हुए हिंदुस्तानियों को ऊँचे दर्जे के टिकट दिए जाएँगे। इससे पूरी सुविधा नहीं मिली, क्योंकि किसने अच्छे कपड़े पहने हैं, इसका निर्णय तो स्टेशन मास्टर को ही करना था न?

ब्रिटिश एजेंट ने हिंदुस्तानियों के बारे में हुए पत्र-व्यवहार संबंधी कई कागज पढ़ने को दिए। तैयब सेठ ने भी दिए थी। उनसे मुझे पता चला ऑरेंज फ्री स्टेट से हिंदुस्तानियों को किस निर्दयता के साथ निकाल बाहर किया गया था। सारांश यह कि ट्रान्सवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट के हिंदुस्तानियों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का गहरा अध्ययन मैं प्रिटोरिया में कर सका। इस अध्ययन का आगे चल कर मेरे लिए पूरा उपयोग होनेवाला है, इसकी मुझे जरा भी कल्पना नहीं थी। मुझे तो एक साल के अंत में अथवा मुकदमा पहले समाप्त हो जाए तो उससे पहले ही स्वदेश लौट जाना था।

पर ईश्वर ने कुछ और ही सोच रखा था।


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