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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 13. कुलीपन का अनुभव पीछे     आगे

ट्रान्सवाल और ऑरेन्ज फ्री स्टेट के हिंदुस्तानियों की स्थिति का पूरा चित्र देने का यह स्थान नहीं है। उसकी जानकारी चाहनेवाले को 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास' पढ़ना चाहिए। पर यहाँ उसकी रूपरेखा देना आवश्यक है

ऑरेन्ज फ्री स्टेट में तो एक कानून बनाकर सन 1888 में या उससे पहले हिंदुस्तानियों के सब हक छीन लिए गए थे। यहाँ हिंदुस्तानियों के लिए सिर्फ होटल में वेटर के रूप में काम करने या ऐसी कोई दूसरी मजदूरी करने की गुंजाइश रह गई थी। जो व्यापारी हिंदुस्तानी थे, उन्हें नाममात्र का मुआवजा देकर निकाल दिया गया था। हिंदुस्तानी व्यापारियों ने अर्जियाँ वगैरा भेजी, पर वहाँ उनकी तूती की आवाज कौन सुनता?

ट्रान्सवाल में सन 1885 में एक कड़ा कानून बना। 1886 में उसमें कुछ सुधार हुआ। उसके फलस्वरूप यह तय हुआ कि हर एक हिंदुस्तानी को प्रवेश फीस के रूप में तीन पौंड जमा कराने चाहिए। उनके लिए अलग छोड़ी गई जगह में ही वे जमीन मालिक हो सकते थे। पर वहाँ भी उन्हें व्यवहार में जमीन का स्वामित्व नहीं मिला। उन्हें मताधिकार भी नहीं दिया गया था। ये तो खास एशियावासियों के लिए बने कानून थे। इसके अलावा जो कानून काले रंग के लोगों को लागू होते थे, वे भी एशियावासियों पर लागू होते थे। उनके अनुसार हिंदुस्तानी लोग पटरी (फुटपाथ) पर अधिकारपूर्वक चल नहीं सकते थे और रात नौ बजे के बाद परवाने बिना बाहर नहीं निकल सकते थे। इस अंतिम कानून का अमल हिंदुस्तानियों पर न्यूनाधिक परिमाण में होता होता था। जिनकी गिनती अरबों में होती थी, वे बतौर मेहरबानी के इस नियम से मुक्त समझे जाते थे। मतलब यह कि इस तरह की राहत देना पुलिस की मर्जी पर रहता था।

इन दोनों नियमों का प्रभाव स्वयं मुझ पर क्या पड़ेगा, इसकी जाँच मुझे करानी पड़ी थी। मैं अक्सर मि. कोट्स के साथ रात को घूमने जाया करता था। कभी-कभी घर पहुँचने में दस बज जाते थे। अतएव पुलिस मुझे पकड़े तो? यह डर जितना मुझे था उससे अधिक मि. कोट्स को था। अपने हब्शियों को तो वे ही परवाने देते थे। लेकिन मुझे परवाना कैसे दे सकते थे? मालिक अपने नौकर को ही परवाना देने का अधिकारी था। मैं लेना चाहूँ और मि. कोट्स देने को तैयार हो जाएँ, तो भी वह नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि वैसा करना विश्वासघात माना जाता।

इसलिए मि. कोट्स या उनके कोई मित्र मुझे वहाँ के सरकारी वकील डॉ. क्राउजे के पास ले गए। हम दोनों एक ही 'इन' के बारिस्टर निकले। उन्हें यह बात असह्य जान पड़ी कि रात नौ बजे के बाद बाहर निकलने के लिए मुझे परवाना लेना चाहिए। उन्होंने मेरे प्रति सहानुभूति प्रकट की। मुझे परवाना देने के बदले उन्होंने अपनी तरफ से एक पत्र दिया। उसका आशय यह थी कि मैं चाहे जिस समय चाहे जहाँ जाऊँ, पुलिस को उसमें दखल नहीं देना चाहिए। मैं इस पत्र को हमेशा अपने साथ रखकर घूमने निकलता था। कभी उसका उपयोग नहीं करना पड़ा। लेकिन इसे तो केवल संयोग ही समझना चाहिए।

डॉ. क्राउजे ने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण दिया। मैं कह सकता हूँ कि हमारे बीच में मित्रता हो गई थी। मैं कभी-कभी उनके यहाँ जाने लगा। उनके द्वारा उनके अधिक प्रसिद्ध भाई के साथ मेरी पहचान हुई। वे जोहानिस्बर्ग में पब्लिक प्रोसिक्युटर नियुक्त हुए थे। उन पर बोअर युद्ध के समय अंग्रेज अधिकारी का खून कराने का षड्यंत्र रचने के लिए मुकदमा चला था और उन्हें सात साल के कारावास की सजा मिली थी। बेंचरों ने उसकी सनद भी छीन ली थी। लड़ाई समाप्त होने पर डॉ. क्राउजे जेल से छूटे, सम्मानपूर्वक ट्रान्सवाल की अदालत में फिर से प्रविष्ट हुए और अपने धंधे में लगे। बाद में ये संबंध मेरे लिए सार्वजनिक कार्यों में उपयोगी सिद्ध हुए और मेरे कई सार्वजनिक काम इनके कारण आसान हो गए थे।

पटरी पर चलने का प्रश्न मेरे लिए कुछ गंभीर परिणामवाला सिद्ध हुआ। मैं हमेशा प्रेसिडेंट स्ट्रीट के रास्ते एक खुले मैदान में घूमने जाया करता था। इस मुहल्ले में प्रेसिडेंट क्रूगर का घर था। यह घर सब तरह के आडंबरों से रहित था। इसके चारों ओर कोई अहाता नहीं था। आसपास के दूसरे घरों में और इसमें कोई फर्क नहीं मालूम होता था। प्रिटोरिया में कई लखपतियों के घर इसकी तुलना में बहुत बड़े, शानदार और अहातेवाले थे। प्रेसिडेंट की सादगी प्रसिद्ध थी। घर के सामने पहरा देनेवाले संतरी को देखकर ही पता चलता था कि यह किसी अधिकारी का घर है। मैं प्रायः हमेशा ही इस सिपाही के बिलकुल पास से होकर निकलता था, पर वह मुझे कुछ नहीं कहता था। सिपाही समय-समय पर बदला करते थे। एक बार एर सिपाही ने बिना चेताए, बिना पटरी पर से उतर जाने को कहे, मुझे धक्का मारा, लात मारी और नीचे उतार दिया। मैं तो गहरे सोच में पड़ गया। लात मारने का कारण पूछने से पहले ही मि. कोट्स ने, जो उसी समय घोड़े पर सवार होकर गुजर रहे थे, मुझे पुकारा और कहा, 'गांधी, मैंने सब देखा है। आप मुकदमा चलाना चाहे तो मैं गवाही दूँगा। मुझे इस बात का बहुत खेद है कि आप पर इस तरह हमला किया गया।'

मैंने कहा, 'इसमें खेद का कोई कारण नहीं है। सिपाही बेचारा क्या जाने? उसके लिए काले-काले सब एक से ही हैं। वह हब्शियों को इसी तरह पटरी पर से उतारता होगा। इसलिए उसने मुझे भी धक्का मारा। मैंने तो नियम ही बना लिया है मुझ पर जो भी बीतेगी, उसके लिए मैं कभी अदालत में नहीं जाऊँगा। इसलिए मुझे मुकदमा नहीं चलाना है।'

'यह तो आपने अपने स्वभाव के अनुरूप ही बात कही है। पर आप इस पर फिर से सोचिए। ऐसे आदमी को कुछ सबक तो देना ही चाहिए।'

इतना कहकर उन्होंने उस सिपाही से बात की और उसे उलाहना दिया। मैं सारी बात तो समझ नहीं सका। सिपाही डच था और उसके साथ उनकी बातें डच भाषा में हुई। सिपाही ने मुझसे माफी मागी। मैं तो उसे पहले ही माफ कर चुका था।

लेकिन उस दिन से मैंने वह रास्ता छोड़ दिया। दूसरे सिपाही को इस घटना का क्या पता होगा? मैं फिर से लात किसलिए खाऊँ? इसलिए मैंने घूमने जाने के लिए दूसरा रास्ता पसंद कर लिया।

इस घटना ने प्रवासी भारतीयों के प्रति मेरी भावना को अधिक तीव्र बना दिया। इन कायदों के बारे में ब्रिटिश एजेंट से चर्चा करके प्रसंग आने पर इसके लिए एक 'टेस्ट' केस चलाने की बात मैंने हिंदुस्तानियों से की।

इस तरह मैंने हिंदुस्तानियों की दुर्दशा का ज्ञान पढ़कर, सुनकर और अनुभव करके प्राप्त किया। मैंने देखा कि स्वाभिमान का रक्षा चाहनेवाले हिंदुस्तानियों के लिए दक्षिण अफ्रीका उपयुक्त देश नहीं है। यह स्थिति किस तरह बदली जा सकती है, इसके विचार में मेरा मन अधिकाधिक व्यस्त रहने लगा। किंतु अभी मेरा मुख्य धर्म तो दादा अब्दुल्ला के मुकदमे को ही सँभालने का था।


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