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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 15. धार्मिक मंथन पीछे     आगे

अब फिर ईसाई मित्रों के साथ अपने संपर्क पर विचार करने का समय आया है।

मेरे भविष्य के बारे में मि. बेकर की चिंता बढ़ती जा रही थी। वे मुझे वेलिंग्टन कन्वेन्शन में ले गए। प्रोटेस्टेंट ईसाइयों में कुछ वर्षों के अंतर से धर्म-जागृति अर्थात आत्मशुद्धि के लिए विशेष प्रयत्न किए जाते हैं। ऐसा एक सम्मेलन वेलिंग्टन में था। उसके सभापति वहाँ के प्रसिद्ध धर्मनिष्ठ पादरी रेवरेंड एंड्रमरे थे। मि. बेकर को यह आशा थी कि इस सम्मेलन में होनेवाली जागृति, वहाँ आनेवाले लोगों के धार्मिक उत्साह और उनकी शुद्धता की मेरे हृदय पर ऐसी गहरी छाप पड़ेगी कि मैं ईसाई बने बिना रह न सकूँगा।

फिर मि. बेकर का अंतिम आधार था प्रार्थना की शक्ति। प्रार्थना में उन्हें खूब श्रद्धा थी। उनका विश्वास था कि अंतःकरण पूर्वक की गई प्रार्थना को ईश्वर सुनता ही है। प्रार्थना से ही मूलर (एक प्रसिद्ध श्रद्धालु ईसाई) जैसे व्यक्ति अपना व्यवहार चलाते हैं, इसके दृष्टांत भी वे मुझे सुनाते रहते थे। प्रार्थना की महिमा के विषय में मैंने उनकी सारी बातें तटस्थ भाव से सुनी। मैंने उनसे कहा कि यदि ईसाई बनने का अंतर्नाद मेरे भीकर उठा तो उसे स्वीकार करने में कोई वस्तु मेरे लिए बाधक न हो सकेगी। अंतर्नाद के वश होना तो मैं इसके कई वर्ष पहले सीख चुका था। उसके वश होने में मुझे आनंद आता था। उसके विरुद्ध जाना मेरे लिए कठिन और दुखद था।

हम वेलिंग्टन गए। मुझ 'साँवले साथी' को साथ में रखना मि. बेकर के लिए भारी पड़ गया। मेरे कारण उन्हें कई बार अड़चनें उठानी पड़ती थी। रास्ते में हमें पड़ाव करना था, क्योंकि मि. बेकर का संघ रविवार को यात्रा न करता था और बीच में रविवार पड़ता था। मार्ग में और स्टेशन पर पहले तो मुझे प्रवेश देने से ही इनकार किया गया और झक-झक के बाद जब प्रवेश मिला तो होटल के मालिक ने भोजन-गृह में भोजन कराने से इनकार कर दिया। पर मि. बेकर यों आसानी से झुकनेवाले नहीं थे। वे होटल में ठहरनेवालों के हक पर डटे रहे। लेकिन मैं उनकी कठिनाइयों को समझ सका था। वेलिंग्टन में भी मैं उनके साथ ही ठहरा था। वहाँ भी उन्हें छोटी-छोटी अड़चनों का सामना करना पड़ता था। अपने सद्भाव से वे उन्हें छिपाने का प्रयत्न करते थे, फिर भी मैं उन्हें देख ही लेता था।

सम्मेलन में श्रद्धालु ईसाइयों का मिलाव हुआ। उनकी श्रद्धा को देखकर मैं प्रसन्न हुआ। मैं मि. मरे से मिला। मैंने देखा क कई लोग मेरे लिए प्रार्थना कर रहे है। उनके कई भजन मुझे बहुत मीठे मालूम हुए।

सम्मेलन तीन दिन चला। मैं सम्मेलन में आनेवालों की धार्मिकता को समझ सका, उसकी सराहना कर सका। पर मुझे अपने विश्वास में, अपने धर्म में, परिवर्तन करने का कारण न मिला। मुझे यह प्रतीति न हुआ कि ईसाई बन कर ही मैं स्वर्ग जा सकता हूँ अथवा मोक्ष पा सकता हूँ। जब यह बात मैंने अपने भले ईसाई मित्रों से कही तो उनको चोट तो पहुँची, पर मैं लाचार था।

मेरी कठिनाइयाँ गहरी थीं। 'एक ईसा मसीह ही ईश्वर के पुत्र है। उन्हें जो मानता है वह तर जाता है।' - यह बात मेरे गले उतरती न थी। यदि ईश्वर के पुत्र हो सकते हैं, तो हम सब उसके पुत्र हैं। यदि ईसा ईश्वर तुल्य है, ईश्वर ही है तो मनुष्य मात्र ईश्वर के समान है, ईश्वर बन सकता है। ईसा की मृत्यु से और उनके रक्त से संसार के पाप धुलते है, इसे अक्षरशः सत्य मानने के लिए बुद्धि तैयार नहीं होती थी। रूपक के रूप में उसमें सत्य चाहे हो। इसके अतिरिक्त, ईसाइयों का यह विश्वास है कि मनुष्य के ही आत्मा है, दूसरे जीवों के नहीं, और देह के नाश के साथ उनका संपूर्ण नाश हो जाता है, जब कि मेरा विश्वास इसके विरुद्ध था। मैं ईसा को एक त्यागी, महात्मा, दैवी शिक्षक के रूप में स्वीकार कर सकता था, पर उन्हें अद्वितीय पुरुष के रूप में स्वीकार करना मेरे लिए शक्य न था। ईसा की मृत्यु से संसार को एक महान उदाहरण प्राप्त हुआ। पर उनकी मृत्यु में कोई गूढ़ चमत्कारपूर्ण प्रभाव था, इसे मेरा हृदय स्वीकार नहीं कर सकता था। ईसाइयों के पवित्र जीवन में मुझे कोई ऐसी चीज नहीं मिली जो अन्य धर्मावलंबियों के जीवन में न मिली हो। उनमें होनेवाले परिवर्तनों जैसे परिवर्तन मैंने दूसरों के जीवन में भी होते देखे थे। सिद्धांत की दृष्टि से ईसाई सिद्धांतों में मुझे कोई अलौकिकता नहीं दिखाई पड़ी। त्याग की दृष्टि से हिंदू धर्मावलंबियों का त्याग मुझे ऊँचा मालूम हुआ। मैं ईसाई धर्म को संपूर्ण अथवा सर्वोपरि धर्म के रूप में स्वीकर न कर सका।

अपना यह हृदय-मंथन मैंने अवसर आने पर ईसाई मित्रों के सामने रखा। उसका कोई संतोषजनक उत्तर वे मुझे नहीं दे सके।

पर जिस तरह मैं ईसाई धर्म को स्वीकार न कर सका, उसी तरह हिंदू धर्म की संपूर्णता के विषय में अथवा उसकी सर्वोपरिता के विषय में भी मैं उस समय निश्चय न कर सका। हिंदू धर्म की त्रुटियाँ मेरी आँखों के सामने तैरा करती थीं। यदि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग है, तो वह सड़ा हुआ और बाद में जुड़ा हुआ अंग जान पड़ा। अनेक संप्रदायों की, अनेक जात-पाँत की हस्ती को मैं समझ न सका। अकेले वेदों के ईश्वर-प्रणीत होने का अर्थ क्या है? यदि वेद ईश्वर प्रणित है तो बाइबल और कुरान क्यों नहीं?

जिस तरह ईसाई मित्र मुझे प्रभावित करने के लिए प्रयत्नशील थे, उसी तरह मुसलमान मित्र भी प्रयत्न करते रहते थे। अब्दुल्ला सेठ मुझे इस्लाम का अध्ययन करने के लिए ललचा रहे थे। उसकी खूबियों की चर्चा तो वे करते ही रहते थे।

मैंने अपनी कठिनाइयाँ रायचंद भाई के सामने रखीं। हिंदुस्तान के दूसरे धर्मचारियों के साथ भी पत्र-व्यवहार शुरू किया। उनकी ओर से उत्तर मिले। रायचंद भाई के पत्र से मुझे बड़ी शांति मिली। उन्होंने मुझे धीरज रखने और हिंदू धर्म का गहरा अध्ययन करने की सलाह दी। उनके एक वाक्य का भावार्थ यह था, 'निष्पक्ष भाव से विचार करते हुए मुझे यह प्रतीति हुई है कि हिंदू धर्म में जो सूक्ष्म और गूढ़ विचार हैं, आत्मा का निरीक्षण है, दया है, वह दूसरे धर्मो में नहीं है।'

मैंने सेल का कुरान खरीदा और पढ़ना शुरू किया। कुछ दूसरी इस्लामी पुस्तकें भी प्राप्त की। विलायत में ईसाई मित्रो से पत्र व्यवहार शुरू किया। उनमें से एक ने एडवर्ड मेंटलैंड से मेरा परिचय कराया। उनके साथ मेरा पत्र-व्यवहार चलता रहा। उन्होंने एना किंग्सफर्ड के साथ मिलकर 'परफेक्ट वे' (उत्तम मार्ग) नामक पुस्तक लिखी थी। वह मुझे पढ़ने के लिए भेजी। उसमें प्रचलित ईसाई धर्म का खंडन था। उन्होंने मेरे नाम 'बाइबल का नया अर्थ' नामक पुस्तक भी भेजी। ये पुस्तकें मुझे पसंद आई। इनसे हिंदू मत की पुष्टि हुई। टॉल्सटॉय की 'वैकुंठ तेरे हृदय में है' नामक पुस्तक ने मुझे अभिभूत कर लिया। मुझ पर उसकी गहरी छाप पड़ी। इस पुस्तक की स्वतंत्र विचार शैली, इसकी प्रौढ़ नीति और इसके सत्य के सम्मुख मि. कोट्स द्वारा दी गई सब पुस्तकें मुझे शुष्क प्रतीत हुईं।

इस प्रकार मेरा अध्ययन मुझे ऐसी दिशा में ले गया, जो ईसाई मित्रो की इच्छा के विपरीत थी। एडवर्ड मेंटलैंड के साथ मेरा पत्र व्यवहार काफी लंबे समय तक चला। कवि (रायचंद भाई) के साथ तो अंत तक बना रहा। उन्होंने कई पुस्तकें मेरे लिए भेजी। मैं उन्हें भी पढ़ गया। उनमें 'पंचीकरण', 'मणिरत्नमाला', 'योगवसिष्ठका', 'मुमुक्षु-प्रकरण', 'हरि-मद्रसूरिका', 'षड्दर्शन-समुच्चय' इत्यादि पुस्तकें थी।

इस प्रकार यद्यपि मैंने ईसाई मित्रों की धारणा से भिन्न मार्ग पकड़ लिया था, फिर भी उनके समागम ने मुझमें जो धर्म-जिज्ञासा जाग्रत की, उसके लिए तो मैं उनका सदा के लिए ऋणी बन गया। अपना यह संबंध मुझे हमेशा याद रहेगा। ऐसे मधुर और पवित्र संबंध बढ़ते ही गए, घटे नहीं।


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