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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 2. संसार प्रवेश पीछे     आगे

बड़े भाई ने मुझे पर बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँध रखी थी। उनको पैसे का, कीर्ति का और पद का लोभ बहुत था। उनका दिल बादशाही था। उदारता उन्हें फिजूलखर्ची की हद तक ले जाती थी। इस कारण और अपने भोले स्वभाव के कारण उन्हें मित्रता करने में देर न लगती थी। इस मित्र-मंडली की मदद से वे मेरे लिए मुकदमे लानेवाले थे। उन्होंने यह भी मान लिया था कि मैं खूब कमाऊँगा, इसलिए घरखर्च बढ़ा रखा था। मेरे लिए वकालत का क्षेत्र तैयार करने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं रखी थी।

जाति का झगड़ा मौजूद ही था। उसमें दो तड़ें पड़ गई थीं। एक पक्ष ने मुझे तुरंत जाति में ले लिया। दूसरा पक्ष न लेने पर डटा रहा। जाति में लेनेवाले पक्ष को संतुष्ट करने के लिए राजकोट ले जाने से पहले भाई मुझे नासिक ले गए। वहाँ गंगा-स्नान कराया और राजकोट पहुँचने पर जाति-भोज दिया।

मुझे इस काम में कोई रुचि न थी। बड़े भाई के मन में मेरे लिए अगाध प्रेम था। मैं मानता हूँ कि उनके प्रति मेरी भक्ति भी वैसी ही थी। इसलिए उनकी इच्छा को आदेश मानकर मैं यंत्र की भाँति बिना समझे उनकी इच्छा का अनुसरण करता रहा। जाति का प्रश्न इससे हल हो गया।

जाति की जिस तड़ से मैं बहिष्कृत रहा, उसमें प्रवेश करने का प्रयत्न मैंने कभी नहीं किया, न मैंने जाति के किसी मुखिया के प्रति मन में कोई रोष रखा। उनमें मुझे तिस्कार से देखनेवाले लोग भी थे। उनके साथ मैं नम्रता का बरताव करता था। जाति के बहिष्कार संबंधी कानून का मैं संपूर्ण आदर करता था। अपने सास-ससुर के घर अथवा अपनी बहन के घर मैं पानी तक न पीता था। वे छिपे तौर पर पिलाने को तैयार होते, पर जो काम खुले तौर से न किया जा सके, उसे छिपकर करने के लिए मेरा मन ही तैयार न होता था।

मेरे इस व्यवहार का परिणाम यह हुआ कि जाति की ओर से मुझे कभी कोई कष्ट नहीं दिया गया। यहीं नहीं, बल्कि आज भी मैं जाति के एक विभाग में विधिवत बहिष्कृत माना जाता हूँ, फिर भी उनकी ओर से मैंने सम्मान और उदारता का ही अनुभव किया है। उन्होंने कार्य में मदद भी दी है और मुझ से यह आशा तक नहीं रखी कि जाति के लिए मैं कुछ-न-कुछ करूँ। मैं ऐसा मानता हूँ कि यह मधुर फल मेरे अप्रतिकार का ही परिणाम है। यदि मैंने जाति में सम्मिलित होने की खटपट की होती, अधिक तड़े पैदा करने का प्रयत्न किया होता, जातिवालों का छेड़ा-चिढ़ाया होता तो वे मेरा अवश्य विरोध करते और मैं विलायत से लौटते ही उदासीन और अलिप्त रहने के स्थान पर खटपट के फंदे में फँस जाता और केवल मिथ्यात्व का पोषण करनेवाला बन जाता।

पत्नी के साथ संबंध अब भी जैसा मैं चाहता था वैसा बना नहीं था। विलायत जाकर भी मैं अपने ईर्ष्यालु स्वभाव को छोड़ नहीं पाया था। हर बात में मेरा छिद्रान्वेषण और मेरा संशय वैसा ही बना रहा। पत्नी को अक्षर-ज्ञान तो होना चाहिए। मैंने सोचा था कि यह काम मैं स्वयं करूँगा, पर मेरी विषयासक्ति ने मुझे यह काम करने ही न दिया और अपनी इस कमजोरी का गुस्सा मैंने पत्नी पर उतारा। एक समय तो ऐसा भी आया जब मैंने उसे उसके मायके भेज दिया और अतिशय कष्ट देने के बाद ही फिर से अपने साथ रखना स्वीकार किया। बाद में मैंने अनुभव किया कि इसमें मेरी नादानी के सिवा कुछ नहीं था।

बच्चों की शिक्षा के विषय में भी मैं सुधार करना चाहता था। बड़े भाई के बालक थे और मैं भी एक लड़का छोड़ गया था, जो अब चार साल का हो रहा था। मैंने सोचा था कि इन बालकों से कसरत कराऊँगा, इन्हें अपने सहवास में रखूँगा। इसमें भाई की सहानुभूति थी। इसमें मैं थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त कर सका था। बच्चों का साथ मुझे बहुत रुचा और उनसें हँसी-मजाक करने की मेरी आदत अब तक बनी हुई है। तभी से मेरा यह विचार बना है कि मैं बच्चों के शिक्षक का काम अच्छी तरह कर सकता हूँ।

खाने-पीने में भी सुधार करने की आवश्यकता स्पष्ट थी। घर में चाय-काफी को जगह मिल चुकी थी। बड़े भाई ने सोचा कि मेरे विलायत से लौटने से पहले घर में विलायत की कुछ हवा तो दाखिल हो ही जानी चाहिए। इसलिए चीनी मिट्टी के बरतन, चाय आदि जो चीजें पहले घर में केवल दवा के रूप में और 'सभ्य' मेहमानों के लिए काम आती थी, वे सब के लिए बरती जाने लगीं। ऐसे वातावरण में मैं अपने 'सुधार' लेकर पहुँचा। ओटमील पारिज (जई की लपसी) को घर में जगह मिली, चाय-काफी के बदले कोको शुरू हुआ। पर यह परिवर्तन तो नाममात्र को ही था, चाय-काफी के साथ कोको और बढ़ गया। बूट-मोजे घर में घुस ही चुके थे। मैंने कोट-पतलून से घर को पुनीत किया!

इस तरह खर्च बढ़ा। नवीनताएँ बढ़ीं। घर पर सफेद हाथी बँध गया। पर यह खर्च लाया कहाँ से जाय? राजकोट में तुरंत धंधा शुरू करता हूँ, तो हँसी होती है। मेरे पास ज्ञान तो इतना भी न था कि राजकोट में पास हुए वकीस से मुकाबले में खड़ा हो सकूँ, तिस पर फीस उससे दस गुनी लेने का दावा! कौन मूर्ख मुवक्किल मुझे काम देता? अथवा कोई ऐसा मूर्ख मिल भी जाए तो क्या मैं अपने अज्ञान में धृष्टता और विश्वासघात की वृद्धि करके अपने ऊपर संसार का ऋण और बढ़ा लूँ?

मित्रों की सलाह यह रही कि मुझे कुछ समय के लिए बंबई जाकर हाईकोर्ट की वकालत का अनुभव प्राप्त करना और हिंदुस्तान के कानून का अध्ययन करना चाहिए और कोई मुकदमा मिल सके तो उसके लिए कोशिश करनी चाहिए। मैं बंबई के लिए रवाना हुआ। वहाँ घर बसाया। रसोइया रखा। ब्राह्मण था। मैंने उसे नौकर की तरह कभी रखा ही नहीं। यह ब्राह्मण नहाता था, पर धोता नहीं था। उसकी धोती मैली, जनेऊ मैला। शास्त्र के अभ्यास से उसे कोई सरोकार नहीं। लेकिन अधिक अच्छा रसोइया कहाँ से लाता?

'क्यों रविशंकर (उसका नाम रविशंकर था), तुम रसोई बनाना तो जानते नहीं, पर संध्या आदि का क्या हाल है?'

'क्या बताऊँ भाईसाहब, हल मेरा संध्या-तर्पण है और कुदाल खट-करम है। अपने राम तो ऐसे ही बाम्हन है। कोई आप जैसा निबाह ले तो निभ जाए, नहीं तो आखिर खेती तो अपनी है ही।'

मैं समझ गया। मुझे रविशंकर का शिक्षक बनना था। आधी रसोई रविशंकर बनाता और आधी मैं। मैंने विलायत की अन्नाहारवाली खुराक के प्रयोग यहाँ शुरू किए। एक स्टोव खरीदा। मैं स्वयं तो पंक्ति-भेद का मानता ही न था। रविशंकर को भी उसका आग्रह न था। इसलिए हमारी पटरी ठीक जम गई। शर्त या मुसीबत, जो कहो सो यह थी कि रविशंकर ने मैल से नाता न तोड़ने और रसोई साफ रखने की सौगंध ले रखी थी!

लेकिन मैं चार-पाँच महीने से अधिक बंबई में रह ही न सकता था, क्योंकि खर्च बढ़ता जाता था और आमदनी कुछ भी न थी। इस तरह मैंने संसार में प्रवेश किया। बारिस्टरी मुझे अखरने लगी। आडंबर अधिक, कुशलता कम। जवाबदारी का खयाल मुझे दबोच रहा था।


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