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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 22. धर्म-निरीक्षण पीछे     आगे

इस प्रकार मैं हिंदुस्तानी समाज की सेवा में ओतप्रोत हो गया, उसका कारण आत्म-दर्शन की अभिलाषा थी। ईश्वर की पहचान सेवा से ही होगी, यह मानकर मैंने सेवा-धर्म स्वीकार किया था। मैं हिंदुस्तान की सेवा करता था, क्योंकि वह सेवा मुझे अनायास प्राप्त हुई थी। मुझे उसे खोजने नहीं जाना पड़ा था। मैं तो यात्रा करने, काठियावाड़ के षड्यंत्रों से बचने और आजीविका खोजने के लिए दक्षिण अफ्रीका गया था। पर पड़ गया ईश्वर की खोज में - आत्म-दर्शन के प्रयत्न में। ईसाई भाइयों ने मेरी जिज्ञासा को बहुत तीव्र कर दिया था। वह किसी भी तरह शांत होनेवाली न थी। मैं शांत होना चाहता तो भी ईसाई भाई-बहन मुझे शांत होने न देते। क्योंकि डरबन में मि. स्पेन्सर वॉल्टन ने, जो दक्षिण अफ्रीका के मिशन के मुखिया थे, मुझे खोज निकाला। उनके घर में मैं कुटुंबी-जैसा हो गया। इस संबंध का मूल प्रिटोरिया में हुआ समागम था। मि. वॉल्टन की रीति-नीति कुछ दूसरे प्रकार की थी। उन्होंने मुझे ईसाई बनने को कहा हो, सो याद नहीं। पर अपना जीवन उन्होंने मेरे सामने रख दिया और अपनी प्रवृत्तियाँ - कार्यकलाप मुझे देखने दिया। उनकी धर्मपत्नी बहुत नम्र परंतु तेजस्वी महिला थीं।

मुझे इस दंपती की पद्धति अच्छी लगती थी। अपने बीच के मूलभूत मतभेदों को हम दोनों जानते थे। ये मतभेद आपसी चर्चा द्वारा मिटनेवाले नहीं थे। जहाँ उदारता, सहिष्णुता और सत्य होता है, वहाँ मतभेद भी लाभदायक सिद्ध होते है। मुझे इस युगल की नम्रता, उद्यमशीलता और कार्यपरायणता प्रिय थी। इसलिए समय-समय पर मिलते रहते थे।

इस संबंध ने मुझे जाग्रत रखा। धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन के लिए जो फुरसत थी, अब असंभव थी। पर जो थोड़ा समय बचता, उसका उपयोग मैं वैसे अध्ययन में करता था। मेरा पत्र-व्यवहार जारी था। रायचंदभाई मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे। किसी मित्र ने मुझे नर्मदाशंकर की 'धर्म विचार' पुस्तक भेजी। उसकी प्रस्तावना मेरे लिए सहायक सिद्ध हुई। मैंने नर्मदाशंकर के विलासी जीवन की बातें सुनी थी। प्रस्तावना में उनके जीवन में हुए परिवर्तनों का वर्णन था। उसने मुझे आकर्षित किया और इस कारण उस पुस्तक के प्रति मेरे मन में आदर उत्पन्न हुआ। मैं उसे ध्यानपूर्वक पढ़ गया। मैक्समूलर की 'हिंदुस्तान क्या सिखाता है?' पुस्तक मैंने बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ी। थियॉसॉफिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित उपनिषदों का भाषांतर पढ़ा। इससे हिंदू धर्म के प्रति आदर बढ़ा। उसकी खूबियाँ मैं समझने लगा। पर दूसरे धर्मो के प्रति मेरे मन में अनादर उत्पन्न नहीं हुआ। वाशिंग्टन अरविंग कृत मुहम्मद का चरित्र और कार्लाइल की मुहम्मद-स्तुति पढ़ी। मुहम्मद पैगंबर के प्रति मेरा सम्मान बढ़ा। 'जरथुस्त के वचन' नामक पुस्तक भी मैंने पढ़ी।

इस प्रकार मैंने भिन्न-भिन्न संप्रदायों का थोड़ा-बहुत ज्ञान प्राप्त किया। मेरा आत्म-निरीक्षण बढ़ा। जो पढ़ा और पसंद किया, उसे आचरण में लाने की आदत पक्की हुई। अतएव हिंदू धर्म से सूचित प्राणायाम-संबंधी कुछ क्रियाएँ, जितनी पुस्तक की मदद से समझ सका उतनी मैंने शुरू की। पर वे मुझे सधीं नहीं। मैं उनमें आगे न बढ़ सका। सोचा था कि वापस हिंदुस्तान जाने पर उनका अभ्यास किसी शिक्षक की देखरेख में करूँगा। पर वह विचार कभी पूरा नहीं हो सका।

टॉल्सटॉय की पुस्तकों का अध्ययन मैंने बढ़ा लिया। उनकी 'गॉस्पेल्स इन ब्रीफ' (नए करार का सार), 'व्हॉट टु डू' (तब क्या करें? ) आदि पुस्तकों ने मेरे मन में गहरी छाप डाली। विश्व-प्रेम मनुष्य को कहाँ तक ले जा सकता है, इसे मैं अधिकाधिक समझने लगा।

इसी समय एक दूसरे ईसाई कुटुंब के साथ मेरा संबंध जुडा। उसकी इच्छा से मैं हर रविवार को वेरिलयन गिरजे में जाया करता था। अक्सर हर रविवार की शाम को मुझे उनके घर भोजन भी करना पड़ता था। वेरिलयन गिरजे का मुझ पर अच्छा असर नहीं पड़ा। वहाँ जो प्रवचन होते थे, वे मुझे शुष्क जान पड़े। प्रेक्षकों में भक्तिभाव के दर्शन नहीं हुए। यह ग्यारह बजे का समाज मुझे भक्तों का नहीं, बल्कि दिल बहलाने और कुछ रिवाज पालने के लिए आए हुए संसारी जीवों का समाज जान पड़ा। कभी कभी तो इस सभा में मुझे बरबस नींद के झोंके आ जाते। इससे मैं शरमाता। पर अपने आसपास भी किसी को ऊँघते देखता, तो मेरी शरम कुछ कम हो जाती। अपनी यह स्थिति मुझे अच्छी नहीं लगी। आखिर मैंने इस गिरजे में जाना छोड़ दिया।

मैं जिस परिवार में हर रविवार को जाता था, कहना होगा कि वहाँ से तो मुझे छुट्टी ही मिल गई। घर की मालकिन भोली, परंतु संकुचित मन की मालूम हुई। हर बार उनके साथ कुछ न कुछ धर्मचर्चा तो होती ही रहती थी। उन दिनों मैं घर पर 'लाइट ऑफ एशिया' पढ़ रहा था। एक दिन हम ईसा और बुद्ध के जीवन की तुलना करने लगे। मैंने कहा, 'गौतम की दया देखिए। वह मनुष्य-जाति को लाँघकर दूसरे प्राणियों तक पहुँच गई थी। उनके कंधे पर खेलते हुए मेमने का चित्र आँखों के सामने आते ही क्या आपका हृदय प्रेम से उमड़ नहीं पड़ता? प्राणिमात्र के प्रति ऐसा प्रेम मैं ईसा के चरित्र में नहीं देख सका।'

उस बहन का दिल दुखा। मैं समझ गया। मैंने अपनी बात आगे न बढ़ाई। हम भोजनालय में पहुँचे। कोई पाँच वर्ष का उनका हँसमुख बालक भी हमारे साथ था। मुझे बच्चे मिल जाएँ तो फिर और क्या चाहिए? उसके साथ मैंने दोस्ती तो कर ही ली थी। मैंने उसकी थाली में पड़े मांस के टुकड़े का मजाक किया और अपनी रकाबी में सजे हुए सेव की स्तुति की। निर्दोष बालक पिघल गया और सेव की स्तुति में सम्मिलित हो गया।

पर माता? वह बेचारी दुखी हुई।

मैं चेता। चुप्पी साध गया। मैंने चर्चा का विषय बदल दिया।

दूसरे हफ्ते सावधान रहकर मैं उनके यहाँ गया तो सही, पर मेरे पाँव भारी हो गए थे। मुझे यह न सूझा कि मैं खुद ही वहाँ जाना बंद कर दूँ और न ऐसा करना उचित जान पड़ा। पर उस भली बहन ने मेरी कठिनाई दूर कर दी। वे बोलीं, 'मि. गांधी, आप बुरा न मानिएगा, पर मुझे आप से कहना चाहिए कि मेरे बालक पर आपकी सोहबत का बुरा असर होने लगा है। अब रोज मांस खाने में आनाकानी करता है। और आपकी उस चर्चा की याद दिलाकर फल माँगता है। मुझसे यह न निभ सकेगा। मेरा बच्चा मांसाहार छोड़ने से बीमार चाहे न पड़े, पर कमजोर तो हो ही जाएगा। इसे मैं कैसे सह सकती हूँ? आप जो चर्चा करते है, वह हम सयानों के बीच शोभा दे सकती है। लेकिन बालकों पर तो उसका बुरा ही असर हो सकता है।'

'मिसेज... मुझे दुख है। माता के नाते मैं आपकी भावना को समझ सकता हूँ। मेरे भी बच्चे हैं। इस आपत्ति का अंत सरलता से हो सकता है। मेरे बोलने का जो असर होगा, उसकी अपेक्षा मैं जो खाता हूँ या नहीं खाता हूँ, उसे देखने का असर बालक पर बहुत अधिक होगा। इसलिए अच्छा रास्ता तो यह है कि अब से आगे मैं रविवार को आपके यहाँ न आऊँ। इससे हमारी मित्रता में कोई बाधा न पहुँचेगी।'

बहन ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया, 'मैं आपका आभार मानती हूँ।'


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