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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 23. घर की व्यवस्था पीछे     आगे

मैं बंबई में और विलायत में घर बसा चुका था, पर उसमें और नेटाल में घर की व्यवस्था जमाने में फर्क था। नेटाल में कुछ खर्च मैंने केवल प्रतिष्ठा के लिए चला रखा था। मैंने मान लिया था कि नेटाल में हिंदुस्तानी बारिस्टर के नाते और हिंदुस्तानियों के प्रतिनिधि के रूप में मुझे काफी खर्च करना चाहिए, इसलिए मैंने अच्छे मुहल्ले में अच्छा घर लिया था। घर को अच्छी तरह सजाया भी था। भोजन सादा था पर अंग्रेज मित्रों को न्योतना होता था और हिंदुस्तानी साथियों की भी न्योतता था, इस कारण स्वभावतः वह खर्च भी बढ़ गया था।

नौकर की कमी तो सब कहीं जान पड़ती थी। किसी को नौकर के रूप में रखना मुझे आया ही नहीं।

एक साथी मेरे साथ रहता था। एक रसोइया रखा था। वह घर के आदमी जैसा बन गया था। दफ्तर में जो मुहर्रिर रखे थे, उनमें से भी जिन्हें रख सकता था, मैंने घर में रख लिया था।

मैं मानता हूँ कि यह प्रयोग काफी सफल रहा। पर उसमें से मुझे संसार के कड़वे अनुभव भी हुए।

मेरा वह साथी बहुत होशियार था और मेरे खयाल के मुताबिक मेरे प्रति वफादार था। पर मैं उसे पहचान न सका। दफ्तर के एक मुहर्रिर को मैंने घर में रख लिया था। उसके प्रति इस साथी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। साथी ने ऐसा जाल रचा कि मैं मुहर्रिर पर शक करने लगा। यह मुहर्रिर बहुत स्वतंत्र स्वभाव का था। उसने घर और दफ्तर दोनों छोड़ दिए। मुझे दुख हुआ। कही उसके साथ अन्याय तो नहीं हुआ? यह विचार मुझे कुरेदने लगा।

इसी बीच मैंने जिस रसोइए को रखा था, उसे किसी कारण से दूसरी जगह जाना पड़ा। मैंने उसे मित्र की सार-सँभाल के लिए रखा था। इसलिए उसके बदले दूसरा रसोइया लगाया। बाद में मुझे पता चला कि वह आदमी उड़ती चिड़िया भाँपनेवाला था। पर मेरे लिए वह इस तरह उपयोगी सिद्ध हुआ, मानो मुझे वैसे ही आदमी की जरूरत हो!

इस रसोइए को रखे मुश्किल से दो या तीन दिन हुए होंगे। इस बीच उसने मेरे घर में मेरे अनजाने चलनेवाले अनाचार को देख लिया और मुझे चेताने का निश्चय किया। लोगों की यह धारणा बन गई थी कि मैं विश्वासशील और अपेक्षाकृत भला आदमी हूँ। इसलिए इस रसोइए को मेरे ही घर में चलनेवाला भ्रष्टाचार भयानक प्रतीत हुआ।

मैं दोपहर के भोजन के लिए दफ्तर से एक बजे घर जाया करता था। एक दिन कोई बारह बजे होंगे। इतने में यह रसोइया हाँफता-हाँफता आया और मुझसे कहने लगा, 'आप को कुछ देखना हो तो खड़े पैरों घर चलिए।'

मैंने कहा, 'इसका अर्थ क्या है? तुम्हें मुझे बताना चाहिए कि काम क्या है। ऐसे समय मुझे घर चलकर क्या देखना है?'

रसोइया बोला, 'न चलेंगे तो आप पछताएँगे। मैं आपको इससे अधिक कहना नहीं चाहता।'

उसकी ढृढ़ता से मैं आकर्षित हुआ। मैं अपने मुहर्रिर को साथ लेकर घर गया। रसोइया आगे चला।

घर पहुँचने पर वह मुझे दूसरी मंजिल पर ले गया। जिस कमरे में वह साथी रहता था, उसे दिखा कर बोला, 'इस कमरे को खोलकर देखिए।'

अब मैं समझ गया। मैंने कमरे का दरवाजा खटखटाया।

जवाब क्यों मिलता? मैंने बहुत जोर से दरवाजा खटखटाया। दीवार काँप उठी। दरवाजा खुला। अंदर एक बदचलन औरत को देखा। मैंने उससे कहा, 'बहन, तुम तो यहाँ से चली ही जाओ। अब फिर कभी इस घर में पैर न रखना।'

साथी से कहा, 'आज से तुम्हारा और मेरा संबंध समाप्त होता है। मैं खूब ठगाया और मूर्ख बना। मेरे विश्वास का यह बदला तो न मिलना चाहिए था।'

साथी बिगड़ा। उसने मेरा सारा पर्दाफाश करने की धमकी दी।

'मेरे पास कोई छिपी चीज है ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है, उसे तुम खुशी से प्रकट करो। पर तुम्हारे साथ मेरा संबंध तो अब समाप्त हुआ।'

साथी और गरमाया। मैंने नीचे खड़े मुहर्रिर से कहा, 'तुम जाओ। पुलिस सुपरिंटेंडेट से मेरा सलाम बोलो और कहो कि मेरे एक साथी ने मुझे धोखा दिया है। मैं उसे अपने घर में रखना नहीं चाहता। फिर भी वह निकलने से इनकार करता है। मेहरबानी करके मुझे मदद भेजिए।'

अपराध में दीनता होती है। मेरे इतना कहने से ही साथी ढीला पड़ा। उसने माफी माँगी। सुपरिंटेंडेट के यहाँ आदमी न भेजने के लिए वह गिड़गिड़ाया और तुरंत घर छोड़कर जाना कबूल किया। उसने घर छोड़ दिया।

इस घटना ने मुझे जीवन में ठीक समय पर सचेत कर दिया। यह साथी मेरे लिए मोहरूप और अवांछनीय था, इसे मैं इस घटना के बाद ही स्पष्ट रूप में देख सका। इस साथी को रखकर मैंने अच्छे काम के लिए बुरे साधन को पसंद किया था। बबूल के पेड़ से आम की आशा रखी थी। साथी का चाल-चलन अच्छा नहीं था, फिर भी मैंने मान लिया था कि वह मेरे प्रति वफादार है। उसे सुधारने का प्रयत्न करते हुए मैं स्वयं लगभग गंदगी में सन गया था। मैंने हितैषियों की सलाह का अनादर किया था। मोह ने मुझे बिलकुल अंधा बना दिया था। यदि इस दुर्घटना से मेरी आँखें न खुली होतीं, तो मुझे सत्य का पता न चलता, तो संभव है कि जो स्वार्पण मैं कर सका हूँ, उसे करने में मैं कभी समर्थ न हो पाता। मेरी सेवा सजा अधूरी रहती, क्योंकि वह साथी मेरी प्रगति को अवश्य रोकता। अपना बहुत सा समय मुझे उसके लिए देना पड़ता। उसमें मुझको अंधकार में रखने और गलत रास्ते ले जाने की शक्ति थी।

पर जिसे राम रखे, उसे कौन चखे? मेरी निष्ठा शुद्ध थी, इसलिए अपनी गलतियों के बावजूद मैं बच गया और मेरे पहले अनुभव ने मुझे सावधान कर दिया।

उस रसोइए को शायद भगवान ने ही मेरे पास भेजा था। वह रसोई बनाना नहीं जानता था, इसलिए वह मेरे यहाँ रह न सकता था। पर उसके आए बिना दूसरा कोई मुझे जाग्रत नहीं कर सकता था। वह स्त्री मेरे घर में पहली ही बार आई हो, सो बात नहीं। पर इस रसोइए जितनी हिम्मत दूसरों को हो ही कैसे सकती थी? इस साथी के प्रति मेरे बेहद विश्वास से सब लोग परिचित थे।

इतनी सेवा करके रसोइए ने तो उसी दिन और उसी क्षण जाने की इजाजत चाही। वह बोला, 'मैं आपके घर में नहीं रह सकता। आप भोले भंडारी ठहरे। यहाँ मेरा काम नहीं।'

मैंने आग्रह नहीं किया।

उक्त मुहर्रिर पर शक पैदा करानेवाला यह साथी ही था, यह बात मुझे अब मालूम हुई। उसके साथ हुए अन्याय को मिटाने का मैंने बहुत प्रयत्न किया, पर मैं उसे पूरी तरह संतुष्ट न कर सका। मेरे लिए यह सदा ही दुख की बात रही। फूटे बरतन को कितना ही पक्का क्यों न जोड़ा जाए, वह जोड़ा हुआ ही कहलाएगा, संपूर्ण कभी नहीं होगा।


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