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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 28. पूना में पीछे     आगे

सर फिरोजशाह मेहता ने मेरा मार्ग सरल कर दिया। बंबई से मैं पूना गया। मुझे मालूम था कि पूना में दो दल थे। मुझे तो सबकी मदद की जरूरत थी। मैं लोकमान्य तिलक से मिला। उन्होंने कहा, 'सब पक्षों की मदद लेने का आपका विचार ठीक है। आपके मामले में कोई मतभेद नहीं हो सकता। लेकिन आपके लिए तटस्थ सभापति चाहिए। आप प्रो. भांडारकर से मिलिए। वे आज कल किसी आंदोलन में सम्मिलित नहीं होते। पर संभव है कि इस काम के लिए आगे आ जाएँ। उनसे मिलने के बाद मुझे परिणाम से सूचित कीजिए। मैं आपकी पूरी मदद करना चाहता हूँ। आप प्रो. गोखले से तो मिलेंगे ही। मेरे पास आप जब आना चाहें, निःसंकोच आइए।'

लोकमान्य का यह मेरा प्रथम दर्शन था। मैं उनकी लोकप्रियता का कारण तुरंत समझ गया।

यहाँ से मैं गोखले के पास गया। वे फर्ग्यूसन कॉलेज में थे। मुझ से बड़े प्रेम से मिले और मुझे अपना बना लिया। उनसे भी मेरा यह पहला ही परिचय था। पर ऐसा जान पड़ा, मानो हम पहले मिल चुके हो। सर फीरोजशाह मुझे हिमालय जैसे, लोकमान्य समुद्र जैसे और गोखले गंगा जैसे लगे। गंगा में मैं नहा सकता था। हिमालय पर चढ़ा नहीं जा सकता था। समुद्र में डूबने का डर था। गंगा की गोद में तो खेला जा सकता था। उसमें डोगियाँ लेकर सैर की जा सकती थी। गोखले ने बारीकी से मेरी जाँच की - उसी तरह, जिस तरह स्कूल में भरती होते समय किसी विद्यार्थी की की जाती है। उन्होंने मुझे बताया कि मैं किस-किस से और कैसे मिलूँ और मेरा भाषण देखने को माँगा। मुझे कॉलेज की व्यवस्था दिखाई। जब जरूरत हो तब मिलने को कहा। डॉ. भांडारकर के जवाब की खबर देने को कहा और मुझे बिदा किया। राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान गोखले ने जीते-जी मेरे हृदय में प्राप्त किया और स्वर्गवास के बाद आज भी जो स्थान उन्हें प्राप्त है, वह और कोई पा नहीं सका।

रामकृष्ण भांडारकार ने मेरा वैसा ही स्वागत किया, जैसा कोई बाप बेटे का करता है। उनके यहाँ गया तब दुपहरी का समय था। ऐसे समय में भी मैं अपना काम कर रहा था, यह चीज ही इस उद्यम शास्त्री को प्यारी लगी। और तटस्थ सभापति के लिए मेरे आग्रह की बात सुनकर 'देट्स इट देट्स इट' (यह ठीक है, यह ठीक है) के उद्गार उनके मुँह से सहज ही निकल पड़े।

बातचीत के अंत में वे बोले, 'तुम किसी से भी पूछोगे तो वह बतलाएगा कि आजकल मैं किसी राजनीतिक काम में हिस्सा नहीं लेता हूँ, पर तुम्हें मैं खाली हाथ नहीं लौटा सकता। तुम्हारा मामला इतना मजबूत है और तुम्हारा उद्यम इतना स्तुत्य है कि मैं तुम्हारी सभा में आने से इनकार कर ही नहीं सकता। यह अच्छा हुआ कि तुम श्री तिलक और श्री गोखले से मिल लिए। उनसे कहो कि मैं दोनों पक्षो द्वारा बुलाई गई सभा में खुशी से आऊँगा और सभापति-पद स्वीकार करूँगा। समय के बारे में मुझसे पूछने की जरूरत नहीं है। दोनों पक्षो को जो समय अनुकूल होगा, उसके अनुकूल मैं हो जाऊँगा।' यों कहकर उन्होंने धन्यवाद और आशीर्वाद के साथ मुझे बिदा किया।

बिना किसी हो-हल्ले और आडंबर के एक सादे मकान में पूना की इस विद्वान और त्यागी मंडली ने सभा की, और मुझे संपूर्ण प्रोत्साहन के साथ बिदा किया।

वहाँ से मैं मद्रास गया। मद्रास तो पागल हो उठा। बालासुंदरम के किस्से का सभा पर गहरा असर पड़ा। मेरे लिए मेरा भाषण अपेक्षाकृत लंबा था। पूरा छपा हुआ था। पर सभा ने उसका एक एक शब्द ध्यानपूर्वक सुना। सभा के अंत में उस 'हरी पुस्तिका' पर लोग टूट पड़े। मद्रास में संशोधन औप परिवर्धन के साथ उसकी दूसरी आवृति दस हजार की छपाई थी। उसका अधिकांश निकल गया। पर मैंने देखा कि दस हजार की जरूरत नहीं थी। मैंने लोगों के उत्साह का अंदाज कुछ अधिक ही कर लिया था। मेरे भाषण का प्रभाव तो अंग्रेजी जाननेवाले समाज पर ही पड़ा था। उस समाज के लिए अकेले मद्रास शहर में दस हजार प्रतियों की आवश्यकता नहीं हो सकती थी।

यहाँ मुझे बड़ी से बड़ी मदद स्व. जी. परमेश्वरन पिल्लै से मिली। वे 'मद्रास स्टैंडर्ड' के संपादक थे। उन्होंने इस प्रश्न का अच्छा अध्ययन कर लिया था। वे मुझे अपने दफ्तर में समय-समय पर बुलाते थे और मेरा मार्गदर्शन करते थे। 'हिंदू' के जी. सुब्रह्मण्यम से भी मैं मिला था। उन्होंने और डॉ. सुब्रह्यण्यम ने भी पूरी सहानुभूति दिखाई थी। पर जी. परमेश्वरन पिल्लै ने तो मुझे अपने समाचार पत्र का इस काम के लिए मनचाहा उपयोग करने दिया और मैंने निःसंकोच उसका उपयोग किया भी। सभा पाच्याप्पा हॉल में हुई थी और मेरा खयाल है कि डॉ. सुब्रह्मण्यम उसके सभापति बने थे। मद्रास में सबके साथ विशेषकर अंग्रेजी में ही बोलना पड़ता था, फिर भी मैंने बहुतों से इतना प्रेम और उत्साह पाया कि मुझे घर जैसा ही लगा। प्रेम किन बंधनों को नहीं तोड़ सकता?


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