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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 8. प्रिटोरिया जाते हुए पीछे     आगे

मैं डरबन में रहनेवाले ईसाई हिंदुस्तानियों के संपर्क में भी तुरंत आ गया। वहाँ की अदालत में दुभाषिया मि. पॉल रोमन कैथोलिक थे। उनसे परिचय किया और प्रोटेस्टेंट मिशन के शिक्षक स्व. मि. सुभान गॉडफ्रे से भी परिचित हुआ। इन्हीं के पुत्र जेम्स गॉडफ्रे यहाँ दक्षिण अफ्रीका में भारतीय प्रतिनिधि मंडल में पिछले साल आए थे। इन्हीं दिनों स्व. पारसी रुस्तम जी से परिचय हुआ और तभी स्व. आदमजी मियाँ खान के साथ जान पहचान हुई। ये सब भाई अभी तक काम के सिवा एक-दूसरे से मिलते न थे, लेकिन जैसा कि हम आगे चलकर देखेंगे, बाद में ये एक-दूसरे के काफी नजदीक आए।

मैं इस प्रकार जान-पहचान कर रहा था कि इतने में फर्म के वकील की तरफ से पत्र मिला कि मुकदमे कि तैयारी की जानी चाहिए और खुद अब्दुल्ला सेठ को प्रिटोरिया जाना चाहिए अथवा किसी को वहाँ भेजना चाहिए।

अब्दुल्ला सेठ ने वह पत्र मुझे पढ़ने को दिया और पूछा, 'आप प्रिटोरिया जाएँगे?' मैंने कहा, 'मुझे मामला समझाइए, तभी कुछ कह सकूँगा। अभी तो मैं नहीं जानता कि मुझे वहाँ क्या करना होगा।' उन्होंने अपने मुनीमों से कहा कि वे मुझे मामला समझा दे।

मैंने देखा कि मुझे ककहरे से शुरू करना होगा। जब मैं जंजीबार में उतरा था तो वहाँ की अदालत का काम देखने गया था। एक पारसी वकील किसी गवाह के बयान ले रहे थे और जमा-नामे के सवाल पूछ रहे थे। मैं तो जमा-नामे में कुछ समझता ही न था। बही-खाता न तो मैंने हाईस्कूल में सीखा था और न विलायत में।

मैंने देखा कि इस मामले का दार-मदार बहियों पर है। जिसे बही-खाते की जानकारी हो वही इस मामले को समझ और समझा सकता है। जब मुनीम नामे की बात करता तो मैं परेशान होता। मैं पी. नोट का मतलब नहीं जानता था। कोश में यह शब्द न मिलता था। जब मैंने मुनीम के सामने अपना अज्ञान प्रकट किया जब उससे पता चला कि पी. नोट का मतलब प्रामिसरी नोट है। मैंने बही-खाते की पुस्तकें खरीदी और पढ़ डाली। कुछ आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ। मामला समझ में आया। मैंने देखा कि अब्दुल्ला सेठ बही-खाता लिखना नहीं जानते थे। पर उन्होंने व्यावहारिक ज्ञान इतना अधिक प्राप्त कर लिया था कि वे बही-खाते की गुत्थियाँ फौरन सुलझा सकते थे। मैंने उनसे कहा, 'मैं प्रिटोरिया जाने को तैयार हूँ।' सेठ ने कहा, 'आप कहाँ उतरेंगे?'

मैंने जवाब दिया, 'जहाँ आप कहे।'

'तो मैं अपने वकील को लिखूँगा। वे आपके लिए ठहरने का प्रबंध करेंगे। प्रिटोरिया में मेरे मेमन दोस्त है। उन्हें मैं अवश्य लिखूँगा, पर उनके यहाँ आपका ठहरना ठीक न होगा। वहाँ हमारे प्रतिपक्षी की अच्छी रसाई है। आपके नाम मेरे निजी कागज-पत्र पहुँचें और उनमें से कोई उन्हें पढ़ ले तो हमारे मुकदमे को नुकसान पहुँच सकता है। उनके साथ जितना कम संबंध रहे, उतना ही अच्छा है।'

मैंने कहा, 'आपके वकील जहाँ रखेंगे वहीं मैं रहूँगा, अथवा मैं कोई अलग घर खोज लूँगा। आप निश्चिंत रहिए, आपकी एक भी व्यक्तिगत बात बाहर न जाएगी। पर मैं मिलता-जुलता तो सभी से रहूँगा। मुझे तो प्रतिपक्षी से मित्रता कर लेनी है। मुझ से बन पड़ा तो मैं इस मुकदमे को आपस में निबटाने की भी कोशिश करूँगा। आखिर तैयब सेठ आपके रिश्तेदार ही तो है न?'

प्रतिपक्षी स्व. तैयब हाजी खानमहमम्द अब्दुल्ला सेठ के निकट संबंधी थे। मैंने देखा कि मेरी इस बात पर अब्दुल्ला सेठ कुछ चौंके। पर उस समय तक मुझे डरबन पहुँचे छह-सात दिन हो चुके थे। हम एक-दूसरे को जानने और समझने लग गए थे। मैं अब 'सफेद हाथी' लगभग नहीं रहा था। वे बोले, 'हाँ... आ.. आ, यदि समझोता हो जाए तो उसके जैसी भली बात तो कोई है ही नहीं। पर हम रिश्तेदार हैं, इसलिए एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचानते हैं। तैयब सेठ जल्दी माननेवाले नहीं हैं। हम भोलापन दिखाएँ तो वे हमारे पेट की बात निकालवा लें और फिर हमको फँसा लें। इसलिए आप जो कुछ करें सो होशियार रहकर करें।'

मैंने कहा कि आप तनिक भी चिंता न करें। मुझे मुकदमे की बात तैयब सेठ से या किसी और से करने की आवश्यकता ही नहीं है। मैं तो इतना ही कहूँगा कि आप दोनों आपस में झगड़ा निबटा लें, तो वकीलों के घर न भरने पड़ें।

मैं सातवें या आठवे दिन डरबन से रवाना हुआ। मेरे लिए पहले दर्जे का टिकट कटाया गया। वहाँ रेल में सोने की सुविधा के लिए पाँच शिलिंग का अलग टिकट कटाना होता था। अब्दुल्ला सेठ ने उसे कटाने का आग्रह किया, पर मैंने हठवश अभिमानवश और पाँच शिलिंग बचाने के विचार से बिस्तर का टिकट कटाने से इनकार कर दिया।

अब्दुल्ला सेठ ने चेताया, 'देखिए, यह देश दूसरा है, हिंदुस्तान नहीं है। खुदा की मेहरबानी है। आप पैसे की कंजूसी न कीजिए। आवश्यक सुविधा प्राप्त कर लीजिए।'

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और निश्चिंत रहने को कहा।

ट्रेन लगभग नौ बजे नेटाल की राजधानी मेरित्सबर्ग पहुँची। यहाँ बिस्तर दिया जाता था। रेलवे के किसी नौकर ने आकर पूछा, 'आपको बिस्तर की जरूरत है?'

मैंने कहा, 'मेरे पास अपना बिस्तर है।'

वह चला गया। इस बीच एक यात्री आया। उसने मेरी तरफ देखा। मुझे भिन्न वर्ण का पाकर वह परेशान हुआ, बाहर निकला और एक-दो अफसरों को लेकर आया। किसी ने मुझे कुछ न कहा। आखिर एक अफसर आया। उसने कहा, 'इधर आओ। तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है।'

मैंने कहा, 'मेरे पास पहले दर्जे का टिकट है।'

उसने जबाव दिया, 'इसकी कोई बात नहीं। मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है।'

'मैं कहता हूँ कि मुझे इस डिब्बे में डरबन से बैठाया गया है और इसी में जाने का इरादा रखता हूँ।'

अफसर ने कहा, 'यह नहीं हो सकता, तुम्हें उतरना पडेगा, और न उतरे तो सिपाही उतारेगा।'

मैंने कहा, 'तो फिर सिपाही भले उतारे मैं खुद तो नहीं उतरूँगा।'

सिपाही आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे धक्का देकर नीचे उतर दिया। मैंने दूसरे डिब्बे में जाने से इनकार कर दिया। ट्रेन चल दी। मैं वेटिंग रूम में बैठ गया। अपना 'हैंड बैग' साथ में रखा। बाकी सामान को हाथ न लगाया। रेलवेवालों ने उसे कहीं रख दिया। सरदी का मौसम था। दक्षिण अफ्रीका की सरदी ऊँचाईवाले प्रदेशों में बहुत तेज होती है। मेरित्सबर्ग इसी प्रदेश में था। इससे ठंड खूब लगी। मेरा ओवरकोट मेरे सामान में था। पर सामान माँगने की हिम्मत न हुई। फिर से अपमान हो तो? ठंड से मैं काँपता रहा। कमरे में दीया न था। आधी रात के करीब एक यात्री आया। जान पड़ा कि वह कुछ बात करना चाहता है, पर मैं बात करने की मनःस्थिति में न था।

मैंने अपने धर्म का विचार किया, 'या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए, नहीं तो जो अपमान हो उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुँचना चाहिए और मुदकमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए। मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी। मुझे जो कष्ट सहना पड़ा है, सो तो ऊपरी कष्ट है। वह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है। महारोग है रंग-द्वेष। यदि मुझमें इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति हो तो उस शक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए। ऐसा करते हुए स्वयं जो कष्ट सहने पड़ें सो सब सहने चाहिए और उनका विरोध रंग-द्वेष को मिटाने की दृष्टि से ही करना चाहिए।'

यह निश्चय करके मैंने दूसरी ट्रेन में जैसे भी हो आगे ही जाने का फैसला किया।

सबेरे ही सबेरे मैंने जनरल मैनेजर को शिकायत का लंबा तार भेजा। दादा अब्दुल्ला को भी खबर भेजी। अब्दुल्ला सेठ तुरंत जनरल मैनेजर से मिले। जनरल मैनेजर ने अपने आदमियों के व्यवहार का बचाव किया, पर बतलाया कि मुझे बिना रुकावट के मेरे स्थान तक पहुँचाने के लिए स्टेशन मास्टर को कह दिया गया है। अब्दुल्ला सेठ ने मेरित्सबर्ग के हिंदू व्यापारियों को भी मुझसे मिलने और मेरी सुख-सुविधा का खयाल रखने का तार भेजा और दूसरे स्टेशनों पर भी इसी आशय के तार रवाना किए। इससे व्यापारी मुझे मिलने स्टेशन पर आए। उन्होंने अपने ऊपर पड़नेवाले कष्टों की कहानी मुझे सुनाई और मुझसे कहा कि आप पर जो बीती है, उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। जब हिंदुस्तानी लोग पहले या दूसरे दर्जे में सफर करते है तो अधिकारियों और यात्रियों की तरफ से रुकावट खड़ी होती ही है। दिन ऐसी ही बातें सुनने में बीता। रात पड़ी। मेरे लिए जगह तैयार ही थी। बिस्तर का जो टिकट मैंने डरबन में काटने से इनकार किया था, वह मेरित्सबर्ग में कटाया। ट्रेन मुझे चार्ल्सटाउन की ओर ले चली।


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