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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 9. अधिक परेशानी पीछे     आगे

ट्रेन सुबह चार्ल्सटाउन पहुँचती थी। उन दिनों चार्ल्सटाउन से जोहानिस्बर्ग पहुँचने के लिए ट्रेन नहीं थी, घोड़ों की सिकरम थी और बीच में एक रात स्टैंडरटन में रुकना पड़ता था। मेरे पास सिकरम का टिकट था। मेरे एक दिन देर से पहुँचने के कारण वह टिकट रद्द नहीं होता था। इसके सिवा अब्दुल्ला सेठ ने सिकरमवाले के नाम चार्ल्सटाउन के पते पर तार भी कर दिया था। पर उसे तो बहाना ही खोजना था, इसलिए मुझे निरा अजनबी समझकर उसने कहा, 'आपका टिकट रद्द हो चुका है। ' मैंने उचित उत्तर दिया। पर टिकट रद्द होने की बात मुझे दूसरे ही कारण से कही गई थी। यात्री सब सिकरम के अंदर ही बैठते थे। लेकिन मैं तो 'कुली' की गिनती में था। अजनबी दिखाई पड़ता था। इसलिए सिकरमवाले की नीयत यह थी कि मुझे गोरे यात्रियों के पास न बैठाना पड़े तो अच्छा हो।

सिकरम के बाहर, अर्थात कोचवान की बगल में दाएँ-बाएँ, दो बैठकें थीं। उनमें से एक पर सिकरम कंपनी का एक गोरा मुखिया बैठता था। वह अंदर बैठा और मुझे कोचवान की बगल में बैठाया। मैं समझ गया कि यह निरा अन्याय है, अपमान है। पर मैंने इस अपमान को पी जाना उचित समझा। मैं जोर-जबरदस्ती से अंदर बैठ सकूँ, ऐसी स्थिति थी ही नहीं। अगर तकरार में पड़ूँ तो सिकरम चली जाए और मेरा एक दिन और टूट जाए, और फिर दूसरे दिन क्या हो यो दैव ही जाने! इसलिए मैं समझदारी से काम लेकर बैठ गया। पर मन में तो बहुत झुँझलाया।

लगभग तीन बजे सिकरम पारजीकोप पहुँची। अब उस गोरे मुखिया ने चाहा कि जहाँ मैं बैठा था वहाँ वह बैठे। उस सिगरेट पीनी थी। थोड़ी हवा भी खानी होगी। इसलिए इसने एक मैला सा बोरा जो वहीं कोचवान के पास पड़ा था, उठा लिया और पैर रखने के पटिए पर बिठाकर मुझसे कहा, 'सामी, तू यहाँ बैठ। मुझे कोचवान के पास बैठना है।' मैं इस अपमान को सहने में असमर्थ था। इसलिए मैंने डरते-डरते कहा, 'तुमने मुझे यहाँ बैठाया और मैंने वह अपमान सह लिया। मेरी जगह तो अंदर थी, पर तुम अंदर बैठ गए और मुझे यहाँ बिठाया। अब तुम्हें बाहर बैठने की इच्छा हुई है और सिगरेट पीनी है, इसलिए तुम मुझे अपने पैरों के पास बैठाना चाहते हो। मैं अंदर जाने को तैयार हूँ, पर तुम्हारे पैरों के पास बैठने को तैयार नहीं।'

मैं मुश्किल से इतना कह पाया था कि मुझ पर तमाचों की वर्षा होने लगी, और वह गोरा मेरी बाँह पकड़कर मुझे नीचे खींचने लगा। बैठक के पास ही पीतल के सींखचे थे। मैंने भूत की तरह उन्हें पकड़ लिया और निश्चय किया कि कलाई चाहे उखड़ जाए पर सींखचे न छोड़ूँगा। मुझ पर जो बीत रही थी उसे अंदर बैठे हुए यात्री देख रहे थे। वह गोरा मुझे गालियाँ दे रहा था, खींच रहा था, मार भी रहा था। पर मैं चुप था। वह बलवान था और मैं बलहीन। यात्रियों में से कइयों को दया आई और उनमें से कुछ बोल उठे, 'अरे भाई, उस बेचारे को वहाँ बैठा रहने दो। उसे नाहक मारो मत। उसकी बात सच है। वहाँ नहीं तो उसे हमारे पास अंदर बैठने दो।' गोरे ने कहा, 'हरगिज नहीं।' पर थोड़ा शरमिंदा वह जरूर हुआ। अतएव उसने मुझे मारना बंद कर दिया और मेरी बाँह छोड़ दी। दो-चार गालियाँ तो ज्यादा दी, पर एक होटेंटाट नौकर दूसरी तरफ बैठा था, उसे अपने पैरों के सामने बैठाकर खुद बाहर बैठा। यात्री अंदर बैठ गए। सीटी बजी। सिकरम चली। मुझे शक हो रहा था कि मैं जिंदा मुकाम पर पहुँच सकूँगा या नहीं। वह गोरा मेरी ओर बराबर घूरता ही रहा। अँगुली दिखाकर बड़बड़ाता रहा, 'याद रख, स्टैंडरटन पहुँचने दे फिर तुझे मजा चखाऊँगा।' मैं तो गूँगा ही बैठा रहा और भगवान से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करता रहा।

रात हुई। स्टैंडरटन पहुँचे। कई हिंदुस्तानी चेहरे दिखाई दिए। मुझे कुछ तसल्ली हुई। नीचे उतरते ही हिंदुस्तानी भाइयों ने कहा, 'हम आपको ईसा सेठ की दुकान पर ले जाने के लिए खड़े हैं। हमें अब्दुल्ला का तार मिला है।' मैं बहुत खुश हुआ। उनके साथ सेठ ईसा हाजी सुमार की दुकान पर पहुँचा। सेठ और उसके मुनीम-गुमाश्तों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया। मैंने अपनी बीती उन्हें सुनाई। वे बहुत दुखी हुए और अपने कड़वे अनुभवों का वर्णन करके उन्होंने मुझे आश्वस्त किया। मैं सिकरम कंपनी के एजेंट को अपने साथ हुए व्यवहार की जानकारी देना चाहता था। मैंने एजेंट के नाम चिट्ठी लिखी। उस गोरे ने जो धमकी दी थी उसकी चर्चा की और यह आश्वासन चाहा कि सुबह आगे की यात्रा शुरू होने पर मुझे दूसरे यात्रियों के पास अंदर की जगह दी जाए। चिट्ठी एजेंट को भेज दी। एजेंट ने मुझे संदेशा भेजा, 'स्टैंडरटन से बड़ी सिकरम जाती है और कोचवान वगैरा बदल जाते हैं। जिस आदमी के खिलाफ आपने शिकायत की है, वह कल नहीं रहेगा। आपको दूसरे यात्रियों के पास ही जगह मिलेगी।' इस संदेशे से मुझे थोड़ी बेफिकरी हुई। मुझे मारनेवाले उस गोरे पर किसी तरह का कोई मुकदमा चलाने का तो मैंने विचार ही नहीं किया था। इसलिए यह प्रकरण यहीं समाप्त हो गया। सबेरे ईसा सेठ के लोग मुझे सिकरम पर ले गए, मुझे मुनासिब जगह मिली और बिना किसी हैरानी के मैं रात जोहानिस्बर्ग पहुँच गया।

स्टैंडरटन एक छोटा सा गाँव है। जोहानिस्बर्ग विशाल शहर है। अब्दुल्ला सेठ ने तार तो वहाँ भी दे ही दिया था। मुझे मुहम्मद कासिम कमरुद्दीन की दुकान का नाम पता भी दिया था। उनका आदमी सिकरम के पड़ाव पर पहुँचा था, पर न मैंने उसे देखा और न वह मुझे पहचान सका। मैंने होटल में जाने का विचार किया। दो-चार होटलों के नाम जान लिए थे। गाड़ी की। गाड़ीवाले से कहा कि ग्रांड नैशनल होटल में ले चलो। वहाँ पहुँचने पर मैनेजर के पास गया। जगह माँगी। मैनेजर ने क्षणभर मुझे निहारा, फिर शिष्टाचार की भाषा में कहा, 'मुझे खेद है, सब कमरे भरे पड़े है।' और मुझे बिदा किया। इसलिए मैंने गाड़ीवाले से मुहम्मद कासिम कमरुद्दीन की दुकान पर ले चलने को कहा। वहाँ अब्दुलगनी सेठ मेरी राह देख रहे थे। उन्होंने मेरा स्वागत किया। मैंने होटल की अपनी बीती उन्हें सुनाई। वे खिलखिलाकर हँस पड़े। बोले, 'वे हमें होटल में कैसे उतरने देंगे?'

मैंने पूछा, 'क्यों नहीं?'

'सो तो आप कुछ दिन रहने के बाद जान जाएँगे। इस देश में तो हमीं रह सकते है, क्योंकि हमें पैसे कमाने है। इसीलिए नाना प्रकार के अपमान सहन करते हैं और पड़े हुए हैं।' यो कहकर उन्होंने ट्रान्सवाल में हिंदुस्तानियों पर गुजरनेवाले कष्टों का इतिहास कह सुनाया।

इन अब्दुलगनी सेठ का परिचय हमें आगे और भी करना होगा। उन्होंने कहा, 'यह देश आपके समान लोगों के लिए नहीं है। देखिए, कल आपको प्रिटोरिया जाना है। वहाँ आपको तीसरे दर्जे में ही जगह मिलेगी। ट्रान्सवाल में नेटाल से अधिक कष्ट है। यहाँ हमारे लोगों को पहले या दूसरे दर्जे का टिकट ही नहीं दिया जाता।'

मैंने कहा, 'आपने इसके लिए पूरी कोशिश नहीं की होगी।'

अब्दुलगनी सेठ बोले, 'हमने पत्र-व्यवहार तो किया है, पर हमारे अधिकतर लोग पहले-दूसरे दर्जे में बैठना भी कहाँ चाहते है?'

मैंने रेलवे के नियम माँगे। उन्हें पढ़ा। उनमें इस बात की गुंजाइश थी। ट्रान्सवाल के मूल कानून सूक्ष्मतापूर्वक नहीं बनाए जाते थे। रेलवे के नियमों का तो पूछना ही क्या था? मैंने सेठ से कहा, 'मैं तो फर्स्ट क्लास में ही जाऊँगा। और वैसे न जा सका तो प्रिटोरिया यहाँ से 36 मील ही तो है। मैं वहाँ घोड़ागाड़ी करके चला जाऊँगा।'

अब्दुलगनी सेठ ने उसमें लगनेवाले खर्च और समय की तरफ मेरा ध्यान खींचा। पर मेरे विचार से वे सहमत हुए। मैंने स्टेशन मास्टर को पत्र भेजा। उसमें मैंने अपने बारिस्टर होने की बात लिखी, यह भी सूचित किया कि मैं हमेशा पहले दर्जे में ही सफर करता हूँ, प्रिटोरिया तुरंत पहुँचने की आवश्यकता पर भी उनका ध्यान खींचा, और उन्हें लिखा कि उनके उत्तर की प्रतीक्षा करने जितना समय मेरे पास नहीं रहेगा, अतएव पत्र का जवाब पाने के लिए मैं खुद ही स्टेशन पहुँचूँगा और पहले दर्जे का टिकट पाने की आशा रखूँगा।

इसमें मेरे मन में थोड़ा पेच था। मेरा यह खयाल था कि स्टेशन मास्टर लिखित उत्तर तो 'ना' का ही देगा। फिर, कुली बारिस्टर कैसे रहते होंगे, इसकी भी वह कल्पना न कर सकेगा। इसलिए अगर मैं पूरे साहबी ठाठ में उसके सामने जाकर खड़ा रहूँगा और उससे बात करूँगा तो वह समझ जाएगा और शायद मुझे टिकट दे देगा। अतएव मैं फ्रॉक कोट, नेकटाई वगैरा डालकर स्टेशन पहुँचा। स्टेशन मास्टर के सामने मैंने गिन्नी निकालकर रखी और पहले दर्जे का टिकट माँगा।

उसने कहा, 'आपने ही मुझे चिट्ठी लिखी है?'

मैंने कहा, 'जी हाँ। यदि आप मुझे टिकट देंगे तो मैं आपका एहसान मानूँगा। मुझे आज प्रिटोरिया पहुँचना ही चाहिए।'

स्टेशन मास्टर हँसा। उसे दया आई। वह बोला, 'मैं ट्रान्सवालर नहीं हूँ। मैं हालैंडर हूँ। आपकी भावना को मैं समझ सकता हूँ। आपके प्रति मेरी सहानुभूति है। मैं आपको टिकट देना चाहता हूँ। पर एक शर्त पर, अगर रास्ते में गार्ड आपको उतार दे और तीसरे दर्जे में बैठाए तो आप मुझे फाँसिए नहीं, यानी आप रेलवे कंपनी पर दावा न कीजिए। मैं चाहता हूँ कि आपकी यात्रा निर्विघ्न पूरी हो। आप सज्जन हैं, यह तो मैं देख ही सकता हूँ।'

यों कहकर उसमें टिकट काट दिया। मैंने उसका उपकार माना और उसे निश्चित किया। अब्दुलगनी सेठ मुझे बिदा करने आए थे। यह कौतुक देखकर वे प्रसन्न हुए, उन्हें आश्चर्य हुआ। पर मुझे चेताया, 'आप भली भाँति प्रिटोरिया पहुँच जाएँ तो समझूँगा कि बेड़ा पार हुआ। मुझे डर है कि गार्ड आपको पहले दर्जे में आराम से बैठने नहीं देगा, और गार्ड ने बैठने दिया तो यात्री नहीं बैठने देंगे।'

मैं तो पहले दर्जे के डिब्बे में बैठा। ट्रेन चली। जर्मिस्टन पहुँचने पर गार्ड टिकट जाँचने आया। मुझे देखते ही खीझ उठा। अँगुली से इशारा करके मुझसे कहा, 'तीसरे दर्जे में जाओ।' मैंने पहले दर्जे का अपना टिकट दिखाया। उसने कहा, 'कोई बात नहीं, जाओ तीसरे दर्जे में।'

इस डिब्बे में एक ही अंग्रेज यात्री था। उसने गार्ड का आड़े हाथों लिया, 'तुम इन भले आदमी को क्यों परेशान करते हो? देखते नहीं हों, इनके पास पहले दर्जे का टिकट है? मुझे इनके बैठने से तनिक भी कष्ट नहीं है।'

यों कहकर उसने मेरी तरफ देखा और कहा, 'आप इत्मीनान से बैठे रहिए।'

गार्ड बड़बडाया. 'आपको कुली के साथ बैठना है तो मेरा क्या बिगड़ता है।' और चल दिया।

रात करीब आठ बजे ट्रेन प्रिटोरिया पहुँची।


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