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कविता

कम्मो बनाम शन्नो बनाम पारो
श्रीरंग


सड़क के किनारे
पटरी पर
शन्नो गाती - बीड़ी जलइलेऽऽऽ
शन्नो के साथ वहीद
बजाता हरमुनियम

ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ
वहीद शन्नो का आदमी...
कम्मो
हाथ में घुँघरू बाँध
बजाती ढोल
धागे नति नक धिन...

कम्मो
शन्नो की लौठी की लड़की
पहले मरद की निशानी
हबीब
शन्नो का पहला मन्सेधू
रहता पारो के साथ
बदचलन कमीनी छिनार पारो के साथ
बताती शन्नो...

पारो
शन्नो की छोटी बहन
दूसरे बाप की लड़की
शन्नो गाती
'मुन्नी बदनाम हुई
डार्लिंग तेरे लिएऽऽऽऽ...

कम्मो
जानती पिताओं को
औरत को
मर्द को
भूख को
कम्मो इतनी समझदार कि
उसे मर्द की गंध अच्छी लगने लगी
अच्छी लगने लगी दारू की गंध...
कम्मो
डरती भूख की गंध से...

कम्मो
सोती नए पिता के साथ
कम्मो का आदमी
होने वाला शौहर
सोता
कम्मो की माँ के साथ
यही सब होता
सामने वाली कोठी में भी
अपने आधुनिक रूप में
टी.वी. धारावाहिकों की तरह
बिना किसी मजबूरी के...।

 


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