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कविता

ये कैसी चुप्पियाँ हैं
श्रीरंग


खिड़कियाँ चुप हैं
जिनके पर्दे हटाती थी वह रोज सुबह
चुप हैं पौधे जिन्हें देती थी पानी
पड़ोसिनें चुप हैं
जिन्हें देती थी दूध, जोरन, दही
चाय की पत्ती
बताती थी नई-नई डिजाइनें स्वेटर की
बतियाती थी घंटों बारजे से
चुप हैं
कालोनी के बड़े बूढ़े
जिन्हें देख
जल्दी से कर लेती थी पल्लू सिर पर...

लोहबान अगरबत्ती की गंध फैल रही है
शामियाने के नीचे लिटाई जा चुकी है बहू
इस कान से उस कान में पहुँच कर भी
दबती जा रही है बात
'रफा-दफा' में जुटे हैं अपने पराए...

जिसे जाना था गई
अब कुछ करने से क्या होगा'
'कौन पालेगा बच्चों को पिता को हुई जेल तो'
सोच रहे हैं समझदार और अनुभवी लोग...

लड़कियाँ चुप हैं
लड़कियों के खिलाफ
औरतें चुप हैं औरतों के खिलाफ
आादमी चुप है आदमी के खिलाफ
ये कैसी चुप्पियाँ हैं
अपने ही खिलाफ...।

 


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