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कविता

कामना
अब्बास अली बास


जेहि धोइ धरा विधि ने विधि सों, सोइ आइ धरा दुख दारिद दाहत,
तन पाहन-गौतम-‍नारि तरी, तिहुँ लोक अजौं गुन गाइ सराहत।
हठि केवट धोइ पिया सकुटुंब, जिन्‍हें परसे जग पावत राहत,
वहि पावन-पाँवन कै कै रज-पावन, 'बास' अपावन पावन चाहत।

उद्धव से -
निज नैनन नीके निहारे जिन्हें बिसरै न बिसारेहुँ रूप सलोना,
यहि हाथेन छाँछ प्रलोभन माँ नचवायेन केतना भुलाय अबौं ना।
पुलकाय, भोराय, दुहाइन गाय, चोराय के बँसरी, हैं देखेन रोना।
अब आवै न आवै, मिलैं न मिलै, मुल मोरे गोपाल काँ ब्रह्म कहौ ना।

प्रति रोम रह्यो रमि रूप मनोरम, का मन माँ अनुमानिय कइसे।
अटके रहे द्वार गलीन अलीन के, लीन ह्वै ध्‍यान में ध्‍यानिय कइसे।
पड़ै पाँव किसोरी के चोरी नाहीं, वरजोरी वन्‍हें सनमानिय कइसे।
यहि गोचर माँ गो चराये सगोचर, वन्‍हैं अगोचर मानिय कइसे।

 


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