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कविता

बेड़ियों के विरुद्ध
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


(संदर्भ वियतनाम)

वे हमेशा बेरहम होते हैं
दूसरों का आकाश अपनी मुट्ठियों में बंद करने वाले
निचोड़ लेते हैं होंठों की मुस्कान
घनहर खेतों में सुरंगें बिछा देते हैं।

कोई भी नाम दे लो
उनकी व्यवस्था में कोई संवेदना नहीं होती।
तुम भाग्यवान हो जो महसूस कर सकते हो
गो उनकी व्यवस्था सबसे पहले संवेदना को भोथर करती है
फिर धीरे-धीरे जातीय यादों को धुँधली कर देती है।

तुम महसूस कर सकते हो
कि दिन तुम्हारी चमड़ी में
इतना कभी नहीं चुभा था
तुम महसूस कर सकते हो
कि रातें इतनी लंबी कभी नहीं हुई थीं
तुम देख सकते हो इस अँधेरे मौसम में
उफनती नदियों को रेत होते
खामोश पहाड़ों - जंगलों को काँपते
और इसके पहले कि बंद आकाश
धुएँ में घुटने लगे
और इस बदनसीब बस्ती में शोलों की बारिश शुरू हो
तुम चाहो तो नली सीधी कर सकते हो
चाहो तो कविता में साँस ले सकते हो
यह वह समय है
जब तुम इंतजार नहीं कर सकते।
वे एक बर्बर कानून बनाते हैं
स्कूल की जगह खोलते चले जाते हैं
देशी रक्त में विदेशी शराब मिलाकर
हड्डियों से चूसते रहते हैं धरती की संपदाएँ

और एक निश्चित समय के बाद
तुम्हें ऐसी सुनसान पगडंडी पर छोड़ देते हैं
जहाँ कोई विकल्प नहीं होता
ऐसे मौसम में
जब कि मरी हुई आत्माएँ अपना हक माँग रही हों
और बेड़ियाँ बढ़ी आ रही हों जकड़ लेने के लिए
तुम न आत्मसमर्पण कर सकते हो
न आत्महत्या।
और तुम क्या कर सकते हो सिवा इसके
कि झाड़ियों-जंगलों में छिपते रेंगते रहो
पीठ और हथेलियों पर लिए हुए अपनी जिंदगी?

बंदूकों में ढूँढ़ते हैं किसान अपनी अस्मिता
स्त्रियाँ बच्चों की आँखों में टटोलती हैं अपना भविष्य
जवानी के दिन उन्हें याद नहीं आते
बच्चे भूल चुके हैं ककहरे।

हवाबाजों से कहो उनका गणित गलत साबित होगा
इस वक्त कोई भी ग्रह अपनी धुरी पर
सही सलामत नहीं रह सकता
आदमी अपनी धुरी पर दृढ़ हो गया है
और यह वक्त है
तुम वापस कर दो हमारा आकाश
हमारी मिट्टी
हमारी शिनाख्त।

 


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