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कविता

सही भाषा
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


अभी-अभी लौटा हूँ उस अंधकार से
जहाँ वे पूछते हैं तुम्हारे शब्दों के अर्थ
उन्हें कैसे समझाता
कि शब्द अर्थ ही होता है
या फिर व्यर्थ होता है।
उन्होंने उन फैसलों को नहीं समझा
जिन्हें तुमने अपनी रोशनी में लिखा था
और वे अपने अंधकार में कराहते हुए ठंडे हो गए
ईश्वर को पुकारते और भद्दी गलियाँ बकते हुए
तुम मेरी आँखों में अब भी उन्हें देख सकते हो
उनमें वे अनकहे शब्द हैं
जो मरते समय उनकी जुबान पर थे।
तुम चाहो तो उस अंधकार की ओर लौट सकते हो
जिसमें वे अपने बाल-बच्चों सहित खो गए
उस अंधकार में असंख्य ध्वनियाँ हैं
उस मिट्टी, पानी, धूप, हवा तक पहुँचाने के लिए
जहाँ सही भाषा बनती है
और कोश और परिभाषाएँ।

 


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