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कविता

मुक्ति
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


आगे पाँच
और पीछे पाँच
दाहिने एक
और बाएँ एक
वे चल रहे हैं कसे हुए

कुछ लोग जिनकी आँखों पर पट्टी बँधी है
ले जाए जा रहे हैं

आगे बूटों की सधी आवाज
और पीछे पछुआ में फटे होंठ-सा एक गाँव

यह पतझर का मौसम है शायद
पत्ते झर रहे हैं बेशुमार

एक पेड़ होगा नीम का
और उसके नीचे एक निखहरी चारपाई
जिस पर बाबा बैठे होंगे उदास

वे जानते हैं
जिस दिन वह मरेंगे
मैं नहीं रहूँगा उनके पास

शरीक होना सबसे बड़ी यातना है बाबा
लेकिन मुक्ति क्या है उसके सिवा?

 


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