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निबंध

प्राचीन ग्रंथकार
बालकृष्ण भट्ट


धनंजय

भोजराज के पितृव्‍य चारों नरेश मुंज की सभा के रत्‍नों में से धनंजय भी एक हैं। इनका रचित दश रूपक नाम ग्रंथ प्रसिद्ध है। ग्रंथ की समाप्ति में धनंजय लिखते हैं -

विष्‍णो: सुतेनापि धनंजयेन। विद्वन्‍मनों राग निबद्ध हेतु:

आविष्‍कृतं मुंज महीश गोष्‍ठी वैदग्‍ध्‍य भाजा दश रूपमेतत्।।

जिससे विदित होता है कि इनके पिता का नाम विष्‍णु था और ये मुंज के समकालीन तथा उनके सभासद थे। भोजराज का समय लोगों के निर्णयानुसार सन् 997 ई. से 1051 ई. तक पूर्व में उल्लिखित हो चुका है। उनके पितृव्‍य होने के कारण मुंज का समय उनसे पूर्व ठहरा अर्थात् ख्रीष्‍ठीय 10वीं शताब्‍दी का अंतिम भाग मुंज तथा उनके समसामयिक धनंजय कवि का भी होवेगा। धनंजय के समकालीन और कवियों के नाम पह्मगुप्‍त, धनिक, हलायुध आदि हैं। जिनमें से पह्मगुप्‍त तो नव सहसांकचरित काव्‍य के रचयिता हैं। धनिक धनंजय के भाई हैं उन्होंने भी अपने पिता का नाम विष्‍णु लिखा है। हलायुध तो एक प्रसिद्ध कोषकार हैं जिनका उल्‍लेख जहाँ-कहाँ मल्लिनाथ करते हुए, देखने में आते हैं। पर ये हलायुध वे हैं या नहीं इसमें संदेह है।

धन्वंतरि

महाराज विक्रम की सभा के नवरत्‍नों में से इनका नाम पहले लिखा मिलता है जिससे इनकी विशेष विद्वत्‍ता और योग्‍यता के विषय में संदेह नहीं रह जाता। मंदराचल से मथे जाने पर समुद्र से जो 14 रत्‍न निकले उनमें अमृत का कलश हाथ में लिए धन्वंतरि का भी उल्‍लेख मिलता है। पुराणों तथा हरिवंश में धन्वंतरि काशीराज प्रसिद्ध हैं। धन्वंतरि काशी में रहते थे और वृद्ध काल का कूप आज तक काशी में उनका स्‍मारक बना हुआ है। यह कूप मुइया दारानगर में मृत्‍युंजयजी महादेव के मंदिर के पास है। लोग ऐसा भी कहते हैं कि धन्वंतरि वैद्य परलोक सिधारते समय अपनी गुणकारी औषधियों को वृद्ध काल के कुएँ में छोड़ गए जिसके प्रभाव से अब तक उस कुएँ का पानी बड़ा आरोग्‍यवर्द्धक है। निदान धन्वंतरि वैद्य काशी के निवासी और एक अति प्राचीन व्‍यक्ति सिद्ध होते हैं। कुछ लोगों का मत है कि ये ही धन्वंतरि वैद्य विक्रमादित्‍य के सभा रत्‍न और प्रसिद्ध कवि थे। पर इसमें कुछ प्रमाण नहीं मिलता है।

मेरी समझ में तो धन्वंतरि वैद्य और धन्वंतरि कवि भिन्‍न-भिन्‍न जन हैं। उसमें से वैद्यराज तो पौराणिक समय के प्रसिद्ध व्‍यक्ति हैं। जिनका कि समय ख्रीष्‍ठ के पीछे किसी भाँति हो ही नहीं सकता और न कवियों के बीच उनके उल्‍लेख करने का मेरा अभिप्राय है। पर जो धन्वंतरि कवि हैं वे विक्रम के सभा रत्‍न उज्‍जयिनी के निवासी है ख्रीष्‍ठीय छठवीं शताब्‍दी के व्‍यक्ति हैं। ये कालिदास घटकर्पर आदि के समकालीन हैं। इनका रिचत कोई ग्रंथ देखने या सुनने में नहीं आया। नवरत्‍न के श्‍लोकों में इनका रचित श्‍लोक भी मिलता है जिससे अनुमान होता है कि यह अद्भुत कवि थे।

धनिक

ये विष्‍णु कवि के पुत्र और धनंजय के भाई हैं। धनंजय रचित दशरूपक पर दशरूपकावलोक नामक तिलक इन्‍हीं ने लिखा है। इनके निज रचित ग्रंथ में विद्ध शालभंजिका के श्‍लोक उदाहरण में उठाए हैं जिससे सिद्ध होता है कि राजशेखर इनसे पहले हो चुके हैं। दशरूपकावलोक में इनके स्‍वरचित पद्य भी लिखे हैं तथा पह्मगुप्‍त और रुद्र इन कवियों का भी नाम लिखा पर इनमें से पद्मप्‍त्‍ा तो राजा मुंज के सभा रत्‍न हैं और धनंजय के साथ इनका उल्‍लेख किया जा चुका है। और रुद्र कदाचित काव्‍यालंकारकर्त्‍ता रुद्र ही होंगे उनका समय लोगों ने सन् 850 ई. अनुमान किया है। श्रृंगार तिलक के रचियता रुद्र भट्ट कदाचित ये ही काव्‍यालंकारकर्त्‍ता रहे हों पर इसका पक्‍का प्रमाण मिलना दुर्घट है।

धर्मदास

काव्‍यसंग्रह में इनका रचित विदग्‍ध मुख मंडन नामक ग्रंथ छपा है जिसके मंगलाचरण में बुद्ध देव की स्‍तुति की गई है।

सिद्धैषधानि भय दु:ख महापदानां।

पुण्यात्‍मनां परम कर्ण रसायनानि।

प्रक्षालनैक सलिलानि मनोमलानां।

शोद्धोदने: प्रवचनानि चिरंजयंति।।

जिससे अनुमान होता है कि ये बुद्ध के मानने वालों में से होंगे। पर इनका निवास स्‍थान या समय इनके रचित ग्रंथों से विदित नहीं हो सकता। विदग्‍ध मुख मंडन तो एक प्राचीन ग्रंथ जान पड़ता है। और संभव है कि ये कवि उस समय के होंगे जब भारत में बौद्ध धर्म का प्राबल्‍य सातवीं-आठवीं शताब्‍दी में भारत में रहा होगा। ऐसा इतिहास से सिद्ध होता है और जब तक भगवत्‍पाद शंकराचार्य ने बौद्धों को शास्‍त्रार्थ में परास्‍त न किया तब तक वे भारत में बढ़ते गए। यदि धर्मदास बौद्धों के प्राबल्‍य काल में सब से पिछले माने जाएँ तो उनका समय शंकराचार्य के तनिक पूर्व हो सकता है और हरिमोहन प्रामाणिक के कथानुसार उस समय मगध देश में बौद्ध मत का विशेष प्रचार ठीक मान लिया जाए तो संभव है कि ये कवि मगध के निवासी रहे होंगे। इनका समय अनुमान से ख्रोष्‍ठीय आठवीं शताब्‍दी के पूर्व मान लिया जा सकता है।

धावक

श्रीयुत महाशय पंडित ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर लिखते हैं - ''ऐसी किंवदंती प्रचलित है कि धावक नाम किसी कवि ने रत्‍नावली और नागानंद नाम नाटक बनाए। राजा श्रीहर्ष ने धन दे कर धावक को अपनी ओर झुका के उन्‍हें परितुष्‍ट किया और इन दोनों नाटकों को अपने नाम से प्रचलित करवाया। प्रसिद्ध और मुख्‍य अलंकार शास्‍त्र जाननेवाली पंडित मम्‍मट भट्ट के लेख से भी यही बात पक्‍की होती है पर धावक और राजा श्री हर्ष इन दोनों के समय में सहस्र से भी अधिक वर्षों का अंतर पड़ता है। दोनों एक ही समय के जन नहीं हो सकते। कालिदास विरचित मालविकाग्निमित्र नाटक की प्रस्‍तावना में प्राचीन नाटक लिखने हारों के बीच धावक का भी नाम लिखा मिलता है इसके अनुसार धावक विक्रमादित्‍य के भी बहुत पूर्व प्रकट हुए जान पड़ते हैं। अतएव यह किवदंती और उसका मूल स्‍वरूप मम्‍मट का भी सिद्धांत ठीक नहीं जँचता। और फिर भी श्री हर्ष का एक अच्‍छे कवि होना और सब देश की भाषा का जानना प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ से सिद्ध होता है तो विर्मूलक किवदंती तथा मम्‍मट का लेख सँभालने के लिए किसी दूसरे धावक कवि की कल्‍पना करके श्री हर्ष की कवि विषयक कीर्ति का उड़ा देना किसी रीति से भी न्‍यास नहीं जान पड़ता।''

उपरोक्‍त मत से प्रकट होता है कि धावक का समय विक्रम से भी बहुत पूर्व रहा होगा पर ध्‍यान रखना चाहिए कि मालविकाग्नि की केवल दो एक प्रतियों में धावक नाम मिलता है। भास का धावक का नामांतर होना संभव नहीं है। भास के स्‍थान में भूल से लेखक धावक लिख गया हो तो कदाचित् संभव है। ऐसे लेखकों के प्रमाण से मम्‍मट की उक्ति की भूल निकालना श्‍लाघ्‍य नहीं है। मेरी तरफ में मम्‍मट का कथन ठीक जान पड़ता है क्‍योंकि काव्‍य प्रकाश के टीकाकारों ने यहीं किंवदंती उठाई है जिसे विद्यासागर महाशय झूठी ठहराते हैं। प्रत्‍युत जिस श्री हर्ष ने धावक से ग्रंथ बनवाया वह कश्‍मीर का राजा नहीं है किंतु कान्‍यकुब्‍ज का वह हर्षवर्द्धन है जिसके यश का वर्णन बाणभट्ट ने हर्ष चरित में किया है। यदि यह बात ठीक हो तो धावक कवि बाणभट्ट के समकालीन सिद्ध होते हैं और विद्यासागर की बात कट जाती है।

निदान धावक का समय ख्रीष्‍टीय सातवीं सदी के आरंभ का भाग अनुमति होता है।

धोई

जयदेव गीत गोविंद में 'धोई कविक्ष्‍मापति:' ऐसा लिख के धोई की प्रशंसा की इसमें संशय नहीं कि ये एक अच्‍छे कवि थे। इनका रचित ग्रंथ पवनदूत नामक है जिसका विषय बिलकुल कालिदास के मेघदूत सा है। इस ग्रंथ में कुवलयवती नाम नायिका ने पवन द्वारा अपने प्राण प्रिय राजा लक्ष्‍मण के पास अपने विरह का संदेश भेजा है। इसमें संदेह नहीं कि यह राजा लक्ष्‍मण बंगाल का सेनवंशी राजा लक्ष्‍मण सेन हैं जिसके सभासद जयदेव, धोई, गोवर्द्धन, शरण, उमापतिधर आदि थे। अतएव उन सब कवियों की नाईं धोई भी बंगाल देश के निवासी होंगे। लक्ष्‍मण सेन के पिता का नाम बल्‍लालसेन था जिसने सन् 1901 ई. में दान सागर नाम ग्रंथ रचा। जयदेव आदि का समय ख्रीष्‍टीय 12 सदी का पूर्व भाग पहले निर्णीत हो चुका है और उसी के अनुसार धोई कवि का समय निश्‍चय किया जा सकता है। अर्थात् धोई का समय भी सन् 1100 ई. से 1150 ई. तक माना जा सकता है।

धोई का यह श्‍लोक प्रसिद्ध है -

इक्षुदण्‍डं कलानाथं भारतं चापि वर्णय।

इति धोई कविरर्ब्रूते प्रतिपर्वरसायनम्।।

नागो जी भट्ट

ये महाशय महाराष्‍ट्र ब्राह्मण काशी के निवासी एक प्रसिद्ध वैयाकरण हैं। इनके पिता का नाम शिव भट्ट और माता का नाम सती था। ये महाशय श्रृंगवेरपुर (सिंगरौर), के राजा राम सिंह के आश्रित थे और सिद्धांत कौमुदीकार भट्टो जी दीक्षित के पौत्र हरि दीक्षित के शिष्‍य थे। परिभाषेंदु शेखर आदि व्‍याकरण ग्रंथों के टीकाकार वैद्यनाथ बाल भट्ट इन्‍हीं नागो जी भट्ट के शिष्‍य हैं। इनके बनाए बहुतेरे ग्रंथ जिनमें से वृहंमंजूषा, लघुमंजूषा, लघुशब्‍देंदुशेखर, परिभाषेंदु, शेखर, लघुशब्‍दरत्‍न आदि व्‍याकरण ग्रंथ, प्रायश्चितेंद्र शेखर, आचारेंदु शेखर, तीर्थेंदु शेखर, आद्धेंदु शेखर आदि वाराह शेखर ग्रंथ और अनेक ग्रंथों की टीका आदि हैं। इन टीकाओं में से वाल्‍मीकीय रामायण पर रामाभिरामा टीका और काव्‍य प्रदीप पर उद्योत नामक टीका लोगों को सुपरिचित हैं। सुनने में आता है कि सोलह वर्ष की वय तक इनने कुछ विद्याभ्‍यास न किया। पीछे किसी के उपदेश से बागीश्‍वरी का जप करके बड़ी विद्या प्राप्‍त की। इनका समय ख्रीष्‍टीय 17वीं शताब्‍दी लोगों ने स्थिर किया है।

नारायण

मुहूर्त्‍त मार्त्तंड नामक जो संस्‍कृत में ज्‍योतिष का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है उसके रचयिता नारायण हैं। इन्‍हीं महाशय ने इस निज रचित ग्रंथ पर मार्त्तंड बल्‍लभा नाम की एक टीका भी की है। पं. सुधाकर जी द्विवेदी के मत से इन ग्रंथों का निर्माण काल शाके 1493 (या सन् 1571) और शाके 1494 (सन् 1572 ई.) है। यही समय स्‍वयं नारायण ने अपने ग्रंथ में लिखा है। ग्रंथ में अपना कुछ विशेष परिचय भी इनने दिया है यथा मुहूर्त्‍त मार्त्तंड के अंत में -

श्रीमत्‍कौशिक पावनो हरिपद द्वंदार्पितात्‍मा हरि स्‍तज्‍जो s नंत इलासु

रोचित गुणो नारायणस्‍तत्‍सुत:। ख्‍यातं देव गिरे: शिवालायमुदक्

तस्‍माडुदक् टापरे ग्रामस्‍तद्वसतिर्मुहूर्त्‍त भवनं मार्त्तंड मत्राकरोत् ।।

जिससे विदित होता है कि इनके पिता का नाम अनंत और निवास स्‍थान देव गिरि से कुछ दुर पर टापर नाम पर गाँव था। सन् 1571 ई. और सन् 1572 ई. में ग्रंथ बनाने से इनका समय ख्रीष्‍टीय 16वीं सदी का पिछला भाग मान लेने में कुछ भी बाधा नहीं हो सकती।

निंबादित्‍य

वैष्‍णवों के चार प्रसिद्ध संप्रदायों का नाम पद्मपुराण में लिखा मिलता है। उनमें से पहला रामानुज संप्रदाय है जो विशिष्‍टाद्वैत वाद (अर्थात ब्रह्म का परिणाम जगत् उसी प्रकार से है जैसे दूध का दही) के अनुयायी हैं। दूसरा मध्‍व संप्रदाय है जिसके मत में ब्रह्म और जीव भिन्‍न-भिन्‍न हैं। तीसरा विष्‍णु स्‍वामी का संप्रदाय मध्‍व से मिलता हुआ है दोनों भेद वादी हैं। चौथा वैष्‍णवों का संप्रदाय इन्‍हीं निंबादित्‍य का प्रवर्तित है जिसे लोग भेदाभेद बाद कहते हैं। इनके मतानुसार जैसे डाल पत्ते आदि वृक्ष से भिन्‍न है और अभिन्‍न भी वैसे ही जीव और ब्रह्म भिन्‍न भी हैं और अभिन्‍न्‍ा भी।

इनका नाम निंबादित्‍य पड़ने का यह कारण सुनने में आता है कि कोई जैन संन्यासी इनसे शास्‍त्रार्थ करने आया और वादा-विवाद करते-करते साँझ हो गई। जब जैन संन्यासी ने साँझ हो जाने पर भोजन न करने का विचार बांधी तब इन्‍हीं आचार्य ने नीम के पेड़ पर सूर्य को रोक रखा जब तक कि संन्यासी ने अपना भोजन प्रस्‍तुत करके खा न लिया। कुछ लोग वर्णन करते हैं कि जब संन्यासी ने साँझ होने पर उपवास करने का प्रस्‍ताव किया तब निंबादित्‍य ने नीम के पेड़ पर चढ़ के उन्‍हें सूर्य दिखला कर कहा कि अभी साँझ नहीं हुई है। नीम के पेड़ पर सूर्य को दिखला देने या वहाँ पर सूर्य को रोकने रखने से इन आचार्य का नाम निंबादित्‍य या निंबार्क पड़ा।

निंबादित्‍य के रचित ग्रंथ का नाम धर्माब्धिबोध है। मथुरा के पास ध्रुव तीर्थ नाम का स्‍थान है वहीं पर निंबादित्‍य की गद्दी है। लोग कहते हैं कि उनके गद्दी पर उनकी शिष्‍य हरिव्‍यास की संतान आत तक विराजमान हैं। ये लोग निंबार्क स्‍वामी का समय 1420 वर्ष से भी पूर्व बताते हैं पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि तीसरे वैष्‍णव संप्रदाय के प्रवर्त्‍तक विष्‍णु स्‍वामी सन् 1578 ई. में वर्तमान थे तो निंबादित्‍य अवश्‍य उनके पीछे हुए होंगे। अतएव इनका समय 16वीं सदी का पिछला या 14वीं सदी का प्रारंभ भाग मान लिया जा सकता है। इनके शिष्‍यों के नाम केशव भट्ट और हरि व्‍यास है।

नीलकंठ

ये महाशय एक प्रसिद्ध ज्‍योतिषी थे। इनकी बनाई ताजिक नीलकंठी नाम पुस्‍तक का पृथिवी में विशेष आदर है। इनके पिता का नाम अनंत और पितामह का नाम चिंतामणि था। प्रसिद्ध दैवज्ञ राम जिनने मुहूर्त्‍त चिंतामणि ग्रंथ बनाया इन्‍हीं के कनिष्‍ठ भाई हैं। नीलकंठ के पुत्र गोविंद भी एक प्रसिद्ध ज्‍योतिषी हैं। जिनने मुहूर्त्‍त चिंतामणि की पीयूषधारा नाम टीका लिखी है। ग्रंथारंभ में ये अपने पिता का वर्णन इस प्रकार से करते हैं।

सीमामीमांसकानां कृतसुकृतचय: कर्कशस्‍तर्कशास्‍त्रे ज्‍योति:। शास्‍त्रेच

गर्ग: फणिपति भणिति व्‍याकृ तौ शेषनाग:। पृथिवी शाकब्‍बरस्‍य

स्‍फुरदतुल सभा मंडनं पंडितेंद्र: साक्षात् श्री नीलकंठ: समजनि

जगती मंडले नील कंठ:।

जिससे स्‍पष्‍ट है कि ये मीमांसक नैयायिक ज्‍योतिषी और वैयाकरण थे तथा अकबर बादशाह के सभासद भी थे। इनका निवास स्‍थान विदर्भ देश और उनकी स्‍त्री का नाम पद्मा था।

अकबर बादशाह के समकालीन होने के कारण इनका समय 16वीं शताब्‍दी ख्रीष्‍टीय का पिछला भाग अनुमित होता है।

1904 ई.


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