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निबंध

राजा और प्रजा
बालकृष्ण भट्ट


सेव्‍य सेवक मालिक और नौकर तथा पति और पत्‍नी का सा संबंध राजा और प्रजा का है। प्रगाढ़ भक्ति के साथ सेवक जो अपने सेव्‍य की सेवा मन बच कर्म से करता है तो सेव्‍य उससे संतुष्‍ट हो, उसकी सकल कामना पुरै देता है। ऐसा ही उदार कद्रदाँ मालिक खैरख्‍वाह चाकर की चाकरी से राजी हो कृपा दृष्टि की वृष्टि करते उसकी ओर एक बार चितै देते ही समस्‍त संपत्ति का भंडार उसे बना देता है। इसी के विरुद्ध चालाक चालबाज खुदगर्ज मालिक शुद्ध भाव चाकर की चाकरी का मन से कायल होकर भी अपनी चालाकी से नहीं चूकता। सेवक की सिधाई और उसके अनेक उत्‍तम गुणों की सराहना अपने फुटहे सुख से न कर उसमें दोष ही दोष देखने को सदा दिव्‍य दृष्टि रहता है। इसलिए कि खुदगरजी का पतला स्‍वार्थांध वह स्‍वामी जो अपने सेवक की सिफतों को कबूल कर लेता है तो उसे कायल हो जाना पड़ता है और अपने बराबर वालों में उसकी नौकरी होती है। ऐसी ही शुद्ध भाव से पति की सेवा करने वाली पति प्राणा पत्‍नी पति चाहे कैसा अवगुणी, कुरूप और कड़ाई करने वाला हो पर वह साध्‍वी मन, बच, कर्म से उसकी सेवा टहल से मुख नहीं मोड़ती। जहाँ राजा और प्रजा दोनों अपना-अपना काम भरपूर समझते हैं और अपना-अपना काम कर रहे हैं वहाँ का भला क्‍या कहना 'रमंते सर्व संपद:' विचार तो इस समय वहाँ का किया जाता है जहाँ प्रजा सिधाई के सा‍थ अपना काम कर रही है पर बुद्ध मुष्टि मालिक के समान राजा अपनी चालाकी की चाल से नहीं चूकता। सब तरह अपना स्‍वार्थ साधता है और प्रजा का प्राण सम धन बटोरे लेता है। 'एकस्‍य क्षणिका प्रीति रन्‍य: प्राणैर्विपुज्‍यते' प्रजा तो यहाँ तक क्षीण धन हो गई है कि अकाल की कौन कहे सस्‍ती में भी अधिकांश लोग एक जून खा कर रहते हैं पर राजा के वर्ग वाले प्रजा के धन से गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और वर्ग को अशि‍ष्‍ट, असभ्‍य, अर्द्धशिक्षित और मूर्ख बना रहे हैं। उनकी आगे बढ़ने की चेष्‍टा पर हँस रहे हैं। करावलंब देना तो एक ओर रहा उन्‍हें हतोत्‍साह किया चाहते हैं। जब कभी किसी बात में बहुत कहने सुनने से करावलंब भी देते हैं तो वह चाल के साथ चतुराई से खाली नहीं रहता। उस करावलंब में भी निज का कुछ न कुछ फायदा रहता ही है। बद्ध मुष्टि तो यहाँ तक कि सरकारी कोई महकमा नहीं है जिसमें उस महकमे के खर्च अदा कर फायदा न रहे। पहले के बादशाह लोग ऐसे बात करते थे जिसमें उनके खजाने का रुपया प्रजा में फैले अब शासन के काम में यहाँ तक बनियई देखी जाती है कि बहुत ही छोटे फायदे पर सरकार की नजर रहती है। जैसा पहले चिट्ठी का टिकट बेचने वाले को आध आना या एक पैसा रुपया कमीशन दिया जाता था दो चार जगह बड़े शहरों में टिकट लिफाफा और कार्ड मिलते थे अब उठा दिया गया केवल शहर के डाकखानों में टिकट मिल सकता है। मान लो साल में दो चार हजार रुपये का फायदा सरकार को इससे हुआ होगा पर लोगों को तकलीफ और तरद्दुद कितना इसमें हुआ कि एक पैसे का कार्ड लेना हो तो आध मील चल कर पोस्‍टऑफिस में आओ तब टिकट मिले। फिर बहुधा हर जून वहाँ इतनी भीड़ रहती है कि रेलवे स्‍टेशन का टिकट घर इसके सामने मात है। जब राजा को यहाँ तक निज लाभ पर दृष्टि है तब प्रजा निष्किंचन न होने से कहाँ तक बच सकती है। स्‍वदेशी की तरक्‍की देख सरकार को यहाँ के मजदूरों और कुलियों पर दया आई है। फैक्‍टरी कमीशन निकाला गया है जहाँ-जहाँ कपडे़ आदि की मिलें है वहाँ-वहाँ यह कमीशन जाए कुलियों का हाल दरियाफ्त करेगी और कोई ऐसा एक्‍ट पास कर देगी कि यहाँ के माल से विलायत का माल सस्‍ता पड़े और इस कमीशन में जो खर्च होगा वह इंडिया गवर्नमेंट के माथे अवश्‍य ही पथेगा। सरकार हम लोगों में 'प्राइमरी' और 'टेक्‍नीकल एजूकेशन' प्राथमिक तथा शिल्‍प-शिक्षा का प्रचार किया चाहती है गवर्नमेंट का यह प्रस्‍ताव सर्वथा सराहने लायक है किंतु तब जब कि इससे हमारी उत्‍तम शिक्षा में बाधा न आए। यदि बढ़ई, लुहार का काम सीख हमारी उत्‍तम शिक्षा में हानि आई और उच्‍च शिक्षा की ओर गवर्नमेंट मंदादर हो गई तो इस प्राथमिक और शिल्‍प शिक्षा को नमस्‍कार है। गवर्नमेंट की हर एक बातों में ऐसा ही देखा गया है कि जिस रास्‍ते पर हम नहीं गए उस ओर हमें ले जाती है पर जब हम अपनी दिमागी कूबत से उसमें पारंगत हो पैरने लगते हैं तब उसमें हमें रोकने की फिक्र में लगती है। कोई समय था तब हम सर्वथा पश्चिमी शिक्षा से अ‍नभिज्ञ थे तब हमारे में शिक्षा का प्रचार किया गया अब हम जब उसमें निपुण हो उनकी नीति का मर्म जानने लगे तो अब उत्‍तम शिक्षा देने में संकोच होने लगा। सरकार की गूढ़ नीति का जो कुछ भीतरी मतलब हो पर इतना अवश्‍य कहा जाएगा कि प्रजा को राजा की ओर से छनक अवश्‍य हो गई और वह छनक रोज-रोज बढ़ती जाती है। इसी से हम कहते हैं राजा और प्रजा में प्रेम भाव उठता जाता है। प्रजा का प्रेम तो है पर राजा में चाल और स्‍वार्थ उस प्रेम को घटाने को घुन सा लगता जाता है। राज चिरस्थाई होने के लिए इस घुन को हटाने में ही कल्‍याण हैं।

रशियन्, फ्रेंच, जर्मन आदि यूरोप की और-और जातियों के सामने इंडिया गवर्नमेंट बड़े अभिमान के साथ कहती है कि हिंदुस्‍तान में हमारा शासन बड़ा उदार शासन है। किंतु अन्‍य जाति वाले इस उदारता का मर्म क्‍या जानें। राजा का तो क्‍या प्रजा का भाव राजा की ओर निस्‍संदेह उदार है। यहाँ के थोड़े से पढे़-लिखों को छोड़ साधारण लोग राजशासन Palitics में इतना अनभिज्ञ हैं कि राजनैतिक एंच, पेंच कुछ समझते ही नहीं। धर्मशास्‍त्रों में जैसा राजा का मान लिखा है वैसा ही वर्तते हैं। विदेशी राजा है या स्‍वदेशी इसकी बिल्‍कुल निर्ख न कर सरल अकुटिल भाव से राजा की आज्ञा मानने में उद्यत हैं। कितने तो ऐसे भी हैं कि गुलामी में पड़े-पड़े मुल्‍की जोश उनमें इतना बुझ गया है कि सर्वथा निराश हो कह रहे हैं। 'कोड नृप होहिं हमैं का हानी। चेरी छोड़ न होउब रानी।' इस दशा में गवर्नमेंट अपने उदार शासन का जितना घमंड करे सुन लेना पड़ता है। इस उदार शासन ही की पोल खोलने बदौलत आज दिन कई एक संपादक जेल का क्‍लेश झेल रहे हैं। हमारी गवर्नमेंट पर ईश्‍वर सानुकूल है सब भाँत उसका सितारा चमक रहा है। भाग्‍यवश ऐसे लोग शासन के लिए मिल गए हैं कि इस हालत में जो कुछ ये कहें सब सोहता है। पुराने क्रम के लोगों में राजनैतिक जोश का आना एक ओर रहे डरपोक इतने हैं कि उनका कथन है, ''राजसेवा मनुष्‍याणां मसि धारावलेहनम्। पंचानन परिष्‍वं गोव्‍यालोवदन चुंबनम्'' मनुष्‍यों के लिए राजसेवा तलवार की धार को चाटना है। शेर के साथ कुश्‍ती लड़ना है और नागिन के मुख को चूमना है। ऐसे ही ऐसे ख्‍यालों ने देश को इस दशा में ढकेल दिया अब जो उनको चिताने की फिक्र की जाती है तो वह विद्रोह में दाखिल किया जाता है। क्‍या कहना उदार भाव का अंत है एक ओर चालाकी और चतुराई का छोर है। दूसरी तरफ सिधाई और गावदीपन का खातिमा है। इस दशा में भारत दलित हो दिन दीन-दीन होता गया तो कौन सा ताज्‍जुब है।


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