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कहानी

नीली डायरी
दिव्या माथुर


रमन रिजवान की नीली डायरी में एक साथ दो नाम जुड़ने जा रहे थे। उसकी धड़कन की रफ्तार कई दिन से तेज थी; वह बहुत तनाव में था। जब भी वह एक नई औरत के शिकार पर निकलता; कुछ ऐसा ही होता था। अपनी काबलियत पर उसे कोई शक नहीं था और इसीलिए उसकी नीली डायरी मेज पर खुली रखी थी कि कब वह अपनी नई पड़ोसन रीमा कपूर का नाम उसमें लिखे।

एकाएक न जाने क्या हुआ कि अट्ठानवे के अंक पर पहुँचते ही रमन की नीली डायरी में प्रविष्टियाँ अचानक रुक गईं और एक शतक पूरा करने के लिए उसे पूरा एक साल लंबा इंतजार करना पड़ा। ऐसा नहीं था कि औरतों की कमी थी पर वह ही न जाने क्यों नकचढ़ा हो गया था। पहले वह किसी भी ऐरी गैरी नत्थु गैरी के साथ शाम गुजारने के बाद सहवास के लिए तैयार हो जाता था पर अब हर युवती में उसे कोई न कोई खामी नजर आ जाती। उसकी पुरानी माशूकाओं के विचार में स्थायी संबंध बनाने को आतुर युवतियाँ अब रमन से सावधान रहने लगी थीं क्योंकि रमन एक आजाद भँवरा था जो किसी फूल पर बैठने को तैयार नहीं था।

रमन की उत्तेजना ने एक कुटिल ख्वाहिश को जन्म दिया। अपने शतक को पूरा करने के लिए उसे सिर्फ दो औरतों की जरूरत थी और एक साथ तीन विकल्प उसके पड़ोस में आ बसे थे; अधेड़ उम्र की रीमा, रीमा की नई नवेली खूबसूरत बहू स्नेहा और अल्हड़ बेटी जारा; जो एक पका आम थी; रमन के पेड़ हिलाने भर की देर थी।

'रीमा जी, मैं शौप्पिंग जा रहा था, डू यू नीड समथिंग फ्रौम दि सुपरमार्केट? कुछ जरूरत हो तो शर्माइएगा नहीं,' नई पड़ोसन होने के नाते रीमा के घर के चक्कर बात बात में लग रहे थे। जारा और स्नेहा से भी अधिक चंचल रीमा सदा खिलखिलाती रहती थी; विशेषतः जब रमन आस पास हो। जानते हुए भी कि जारा और स्नेहा मन ही मन उसका मजाक उड़ा रहीं थीं, रमन को इसकी जरा परवाह नहीं थी। वह जानता था कि इन दोनों के नाम भी उसकी नीली डायरी में जुड़ने वाले थे। अभी जो वह उनको 'इग्नोर' कर रहा था; ये उसकी केवल एक चाल थी।

रीमा भी कोई कम शातिर नहीं थी किंतु रमन का 'चार्म' उसके सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। ऊपर से वह दर्शाती कि ये हँसी मजाक उसके लिए सिर्फ एक मनोरंजन था। किंतु अंदर ही अंदर रमन से निकटता के लिए वह तड़प रही थी। जब से रमन ने रीमा के कंधे और पीठ की मालिश की थी, उसका तन बदन रमन के आगोश के लिए मचल रहा था।

रीमा का पति, मनोज, और बेटा, अमर, दोनों अपने आयात-निर्यात के धंधे की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे और जब कभी वे विदेश में आयोजित प्रदर्शनियों में भाग लेने जाते तो हफ्तों वहीं टिके रहते; उन्हें विदेशी मस्ती का चस्का लग चुका था। लंदन में होते हुए भी वे रात के एक या दो बजे से पहले कभी घर नहीं लौटते थे और इसलिए उन्होंने अपनी बीवियों को भी ढील दे रखी थी ताकि वे झिकझिक न करें। तीन तीन खूबसूरत और तन्हा औरतों को मन बहलाने के लिए कुछ तो चाहिए। उनकी कुशलक्षेम लेने और उनकी शिकायतों के अंबार में डूबने को बेचैन उनका पड़ोसी रमन जल्दी ही उनकी आँख का तारा बन गया।

'मैं हूँ न।' कहते हुए रमन सुबह शाम हाजिर हो जाता। वे कितनी भाग्यशाली थीं कि एक नई जगह आकर घर बसाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी। नौकर चाकर, माली, ड्राइवर सभी का इंतजाम रमन ने एक हफ्ते में कर दिया था। मनमौजी, मोटे ताजे और आलसी बाप बेटा फूले नहीं समा रहे थे। उनके हाथ हिलाए बिना उनके घर की औरतें संतुष्ट थीं। उनसे रमन ने भी दोस्ताना गाँठ लिया था। मनोज के शब्दों में, वे उसे 'यूज' कर सकते थे। वे यह नहीं जानते थे कि असल में रमन उनकी बीवी, बहू और बेटी को 'यूज' करने के लिए पेंच लड़ा रहा था।

जारा का तो मन आ गया था रमन पर; एकल, कुँआरा, अमीर और बेहद आकर्षक; और क्या चाहिए एक छब्बीस साल की तलाकशुदा लड़की को? ऐस्टेट ऐजेंट होने के नाते रमन बहुत होशियार और बातूनी था। वह आता तो रीमा के न चाहते हुए भी जारा उसके पास आ बैठती। वह माने बैठी थी कि एक वही रमन की सही हकदार थी।

'बूढ़ी होने को आईं पर अभी तक छम्मक छल्लो बनी घूमती हैं।' जारा को माँ पर मन ही मन बहुत गुस्सा आता कि वह कबाब में हड्डी बनी उन दोनों के बीच में बैठी रहती थीं।

'स्नेहा, रमन के लिए मसाले वाली चाय बनाना।' जैसे ही रमन बैठक में पहुँचता, रीमा बहू से कभी चाय तो कभी शर्बत बनाने को कहती। बस एक स्नेहा ही थी जो अपने ऊपर काबू रखने के प्रयत्न में लगी थी। सास और ननद का तो कुछ नहीं जाएगा, वही बदनाम हो जाएगी। नई नवेली दुल्हन को छोड़ कर अमर पूरे समय पिता के धंधे में लगा रहता था। एक हफ्ते के हनीमून से क्या होता है? स्विट्जर्लैंड में भी उसे कहाँ चैन था, हर दस मिनट में रीमा या जारा का फोन आ जाता और घंटों यूँ ही बीत जाते। लैपटौप लैप में लिए अमर उन्हें और अपने अन्य दोस्तों को स्विटजर्लैंड की तस्वीरें दिखाता रहता और स्नेहा बालकनी में तन्हा खड़ी सुनसान वादियों को अपनी स्वप्निल आँखों में उतारती और मन में उन्हें सँभाल के रखती जाती। उसे हमेशा एक डर बना रहता था कि न जाने कब वे उसे मैके जाने को कह दें। उसे सहारा देने वाला कौन था यहाँ? उसकी एक छोटी सी गलती भी नजरंदाज नहीं की जाती थी।

बिजनेस के सिलसिले में जब कभी अमर के साथ जाना पड़ भी जाता तो स्नेहा को कुढ़ने के सिवा कुछ नहीं मिलता था। ढेरों महिलाएँ 'हे गौर्जियस', अथवा 'माइ डार्लिंग' कहती हुई अमर को आलिंगन में ले लेतीं और वह उन्हें चूमता चाटता रहता बिना यह सोचे कि उसकी लाचार पत्नी पर क्या गुजर रही होगी। फिर किसी की कमर में हाथ डाले अमर स्नेहा को किसी के साथ अकेला छोड़ कर घंटों गायब हो जाता।

'डोंट बी सो बैकवार्ड, स्नेहा, ट्राइ टु ऐनजोय यौरसैल्फ।' स्नेहा के शिकायत करने पर अमर कहता तो उसे लगता कि वह सचमुच गँवार थी। गाँव में पली-बढ़ी और लिखी-पढ़ी स्नेहा को जब देखो तब ताने ही सुनने को मिलते, कभी रीमा और जारा के तो कभी पति के।

रमन कभी स्नेहा से बात करने की कोशिश करता तो रीमा और जारा उसे ऐसे घूरतीं कि जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो। रमन जब उसे बेचैन और गहरी नजरों से देखता तो स्नेहा को लगता कि वह केवल उसी को ही चाहता था और केवल उसी के लिए घर के चक्कर भी लगा रहा था। स्नेहा रात को उसी के सपनों में खोई सो जाती और एक नई उमंग लिए उठती कि उसे नहा धोकर अच्छे से तैयार हो जाना चाहिए, न जाने कब रमन आ जाए। चाय पकड़ाते हुए उँगलियों का छू जाना ही उसे घंटों के लिए उद्वेलित कर जाता।

उधर जारा को किसी की कोई परवाह नहीं थी। उसे तो लगता था कि जब भी वह चाहेगी, रमन उसकी झोली में आ गिरेगा; और किसके लिए चक्कर लगा रहा था वह उनके घर के? आने का कोई तो बहाना चाहिए उसे? मम्मी के कंधों की मालिश भी वह जारा के लिए ही तो कर रहा था। उसे विश्वास था कि रमन जल्दी ही उसे प्रोपोज करेगा, वह बहुत उत्कंठित थी। वह नहीं जानती थी कि रमन के लिए विवाह एक गोपनीय अंतेयष्टि की रस्मों को निभाने जैसा था, जिसके मुआवजे में शोकातुर दुल्हा दुल्हन जब चाहें तब संभोग कर सकते हैं, खुल्लमखुल्ला हनीमून के लिए जा सकते हैं और बच्चे पैदा कर सकते हैं। उपहार के बदले उनके यार दोस्त मुफ्त की शैंपेन पीकर अथवा इधर उधर मुँह मार कर क्षतिपूर्ति कर लेते हैं पर जो न शैंपेन पीता हो और न ही इधर उधर मुँह मारने में विश्वास रखता हो, उसके लिए तो कुछ नहीं बचा।

जीवन भर एक ही औरत के साथ जिंदगी भर की झिक झिक में रमन नहीं पड़ने वाला। उसे तो डर था कि कहीं जारा के गड़बड़झाले में उसके दो अच्छे शिकार हाथ से निकल न निकल जाएँ। जारा से अच्छी उसे रीमा और रीमा से अच्छी स्नेहा लगती थी।

खैर, रमन की पाँचों घी में थी, एक साथ तीन खाने भरने जा रहे थे उसकी नीली डायरी के, जिसमें उन सभी औरतों के नाम हैं जिनके साथ वह सहवास कर चुका था। एक 'टिक' लगाने भर की देर थी। उसकी नब्ज इतनी तेज चल रही थी कि उसे लगा कि शायद कहीं रुक न गई हो और न जाने कब उसका दिल निकलकर फर्श पर आ गिरे! उसके हिसाब से रीमा, जारा और स्नेहा तीनों लगभग तैयार थीं पर वह पशोपेश में था कि खेल कहाँ से शुरू किया जाए। उनमें से किसी एक को अलग से बुलाना टेढ़ी खीर था। जारा सेफ बैट थी और उसे हासिल करना उसके बाएँ हाथ का खेल था पर उसे हाथ लगाने का मतलब था बाकी दो से हाथ धो लेना और स्नेहा को छूने का अर्थ था पूरे कपूर परिवार से दुश्मनी। रमन को लगा कि रीमा से ही खेल शुरू करना बेहतर होगा क्योंकि वह अपने अवैध संबंध को गुप्त रखेगी। वह यह भी जानता था कि उसकी सबसे बड़ी लूट स्नेहा होगी, जिसके लिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तैयार था।

पिछले पंद्रह सालों में वह अठानबे औरतों के साथ सो चुका था। हालाँकि उसका मन अब किसी हसीना को देखकर पहले की तरह मचलता नहीं था पर उसे अपनी नीली डायरी के अधूरा छूट जाने की बहुत फिक्र थी। 'सो सो' 'कुड हैव बीन बैटर' या ज्यादा से ज्यादा 'गुड' जैसी टिप्पणियों से भरी था उसकी नीली डायरी के पन्ने। न जाने क्यों उसे विश्वास हो च्ला था कि स्नेहा के नाम के आगे ही 'उत्तम' लिखा जाएगा। एक नजर में ही वह जान गया था कि वह आम युवतियों में से नहीं थी। स्नेहा की अदम्य कामेच्छा को वह जैसे साफ देख सकता था पर वह यह भी जानता था कि ऐडम और ईव के सेब खा लेने के बाद कुछ भी सही नहीं रहेगा।

अपने एक दोस्त की स्टैग पार्टी के लिए रमन को उस रोज मानचैस्टर जाना था और यही एक बहाना लिए वह कपूर्स के यहाँ दोपहर को गया था ये सोचकर कि शायद रीमा और जारा सो रही होंगी और उसे स्नेहा से बात करने का मौका मिल जाएगा।

'ओह डिअर, व्हाट विल वी डू विदाउट यू?' रीमा की कमर बड़े अंदाज में झूली। दरवाजे की घंटी बजते ही वह दौड़ी चली आई थी।

'डोंट वरी रीमाजी, आइ एम ऐट यौर सर्विस 24/10, यहाँ से मानचैस्टर केवल चार घंटे की ही तो ड्राइव है।' स्नेहा रसोई के दरवाजे के पीछे अधछिपी खड़ी दिखी।

'आइ वाज ओनलि जोकिंग, रमन।' रमन के कंधे को प्यार से सहलाते हुए रीमा ने कहा।

'बट रीमाजी, आइ एम सीरियस, मेरा दिलो दिमाग तो यहीं रहेगा आप सबके साथ।' 'सबके साथ' कहकर रमन ने जारा और स्नेहा को भी लपेट लिया। दोनों ने यही समझा कि ये संवाद रमन ने उन्हीं के लिए बोला था।

'कैन आइ कम विद यू रमन टु मानचैस्टर?' जारा ने, जो अभी तक नाइटसूट में थी।

'नो यू सिल्ली गर्ल, रमन अपने दोस्त की स्टैग पार्टी में जा रहा है, वहाँ लड़कियों का क्या काम?' अगर जारा चलने को तैयार थी तो स्टैग पार्टी जाए भाड़ में।

'आइ हैव नैवर बीन टु ए स्टैग पार्टी, ममा, मैं अमर के कपड़े पहन के जा सकती हूँ, कांट आइ?' जारा ने ठुनकते हुए कहा।

'इस बार जब मनोज जी और अमर विदेश जाएँगे तो मैं आप सबको मानचैस्टर घुमाने ले जाऊँगा।' रमन ने वादा किया।

तभी सिर में दर्द लिए अमर घर लौट आया, उसे हरारत सी थी।

'चलिए मैं आपको अभी डॉक्टर माथुर के पास ले चलता हूँ।' रमन ने झट अपनी सर्विसेज पेश कीं।

'अरे नहीं रमन, थोड़ी सी थकान है, जर्मनी से लौटकर जैट-लैग नहीं जा रहा। देखना, कल सुबह तक मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊँगा। स्नेहा को बेमन से अमर के साथ ऊपर सोने के कमरे में जाना पड़ा। उसके जाते ही रमन भी घर लौट आया यह कहकर कि वह लंबी ड्राइव के पहले आराम करना चाहता था।

घर वापिस आकर रमन खयाली पुलाव पका ही रहा था कि उसकी दो पुरानी और स्थायी माशूकाएँ आ टपकीं। वह घबरा गया कि कहीं आइशा और टीना को रीमा या जारा ने देख न लिया हो। कुछ बक बका दिया तो रमन का बना बनाया खेल चौपट हो जाएगा। छोटे मोटे राज बाँटने के लिए या फिर इश्क लड़ाने को जब उसे कोई नहीं मिलता, तब ये दोनों ही काम आती थीं। इनसे बिगाड़ कर वह कहाँ जाएगा? जब कभी रमन का दमा बिगड़ जाता तो आइशा और टीना ही चौबीसों घंटों उसे गोद में लिए कभी उसका सीना मलतीं तो कभी उसकी पीठ सहलाती; ऐसी सेवा करतीं कि क्या रमन की माँ ने कभी की हो। दस साल से वे दोनों पालतू कुत्तों सी उसके आगे पीछे पूँछ हिलाती घूम रही थीं; रमन के लिए तो वे अपनी जान भी दे सकती थीं। कपूर्स-देवियों के मामले में भी आइशा और टीना उसकी मदद कर सकती थीं पर रमन अपना शिकार हमेशा खुद ही करता था।

रमन के मना करने के बावजूद, आइशा और टीना उसके जाने की तैयारी के बहाने आईं थीं। वह बार बार उन्हें घर वापिस जाने की सलाह दे रहा था पर वे भी ऐसे कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थीं।

'क्या बात है रमन, आज तुम हमें टरका रहे हो?' खुशमिजाज आइशा चटखारे लेकर बोलती थी, जैसे कि उसके मुँह में इमली रखी हो।

'हाँ, हम तो सोच के आए थे कि शाम को हम तुम्हें मानचैस्टर ड्रौप कर देंगे। कल सुबह तो तुम खड़े होने लायक भी नहीं बचोगे?' गिलहरी सी फुदकती हुई टीना बोली।

'तुम लोग क्यों परेशान होती हो। मैंने सोच लिया है कि मैं ज्यादा नहीं पियूँगा। और जाने से पहले मैं जरा आराम करना चाहता हूँ।'

'तो हम कब रोक रहीं हैं, तुम करो आराम। हम लोग तो प्लैन बना कर आए थे कि तुम्हें स्टैग पार्टी में छोड़ कर हम लोग बेबी आंटी के साथ फिल्म देखेंगे और बढ़िया खाना खाएँगे। फिर कल सुबह तुम्हें घर छोड़ते हुए निकल जाएँगे।'

'हाउ नाइज औफ यू।' रमन अनुग्रहीत था। कितना ध्यान रखतीं थीं वे उसका।

'तुम जाके सो जाओ, कल के लिए मैं कुछ पका देती हूँ। पीने के बाद तुम्हारी तबीयत हमेशा खराब हो जाती है, आते ही कुछ खा लेना।' अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें। खाना बनाने के लिए आइशा सीधी रसोई में पहुँच गई।

'मेरी किचन का सत्यानास नहीं कर देना।'

'हमें पता है मिस्टर क्लैनलिनैस।' रमन झक मार के अपने सोने के कमरे में चला गया।

'तुझे तो खाने की पड़ी रहती है, आइशा, अच्छे पड़ोसियों के नाते हम रीमा से मिलकर आते हैं, रमन तो हमें उनसे मिलवाने से रहा।' फुदकती हुई टीना बोली।

'आर यू सीरियस, आइशा, 'रमन को पता लग गया तो?' आइशा डोंगे में दाल भिगोती हुई बोली।

'फिर तो वह हमारी और भी चापलूसी करेगा कि कहीं हम उसकी पोल न खोल दें।' टीना के मुँह में जैसे किसी ने नीबू निचोड़ दिया हो।

'बात बिगड़ गई तो? हम उसे कहीं नाराज न कर बैठें।' आइशा ने कहा।

'वैसे भी अब हमें एक और रमन ढूँढ़ लेना चाहिए, तुमने देखा नहीं, रह रह कर रमन की नजर रीमा के बँगले की ओर उठ रही थी।' टीना बोली। आइशा ने आलू काटने शुरू कर दिए थे; बिखरे हुए छिलकों को सफाईपसंद टीना हाथ के हाथ डस्टबिन में फेंकती जा रही थी।

'रीमा एंड कंपनी चार दिन की मेहमान हैं, सो काल्ड भले घर की बेटी बहू न जाने कब किनारा कर जाएँ।'

'वैसे भी उसकी नीली डायरी में आज भी हम टौप पर हैं, हमसे बिगाड़ कर वह कहाँ जाएगा, टीना?'

'ये हुई न बात। तुम्हारी खूबसूरती और मेरी वौलप्चुअस बौडी और हमारी सैक्सुएलिटी का क्या मुकाबला करेंगी ये माँ बेटी!' होंठों को गोल करके चुंबन देने के अंदाज में टीना बोली।

'बड़े दिन से हमने रमन की नीली डायरी नहीं पढ़ी, रीमा एंड कंपनी की एंट्रीज पढ़नी चाहिए।'

'अरे अभी तो वह पूरे परिवार को शीशे में उतार रहा है। कपूर साहेब और उनके बेटे को 'मैं हूँ न' कह कर दौरे पर भेजने वाला है, फिर देखना रमन की डायरी।'

'बेचारे कपूर्स!' आइशा ने आह भरते हुए पड़ोस के घर की ओर देखते हुए कहा।

'बेचारे क्या, वे विदेश में मजे कर रहे होंगे और उनकी बीवियाँ यहाँ।'

'तुम भी टीना, बहुत ज्यादा डाएरैक्ट हो।'

'मुझे लाग लपेट नहीं पसंद आइशा, जो कहना है साफ कहती हूँ, इसीलिए रमन मुझे पसंद करता है।'

'कौन किसे पसंद करता है टीना?' बेडरूम से बाहर आते हुए रमन ने पूछा। उसके कान रसोई में ही लगे थे।

'अरे, तुम सोए नहीं?' चलो मैं तुम्हारी मालिश कर दूँ।' बात बदलते हुए टीना बोली।

'अरे नहीं, टीना, तुम्हारी तो पीठ में तो दर्द था, अब कैसा है?'

'यू नो, वो तो चलता रहता है।'

'तो आओ, जाने से पहले मैं तुम्हारी मसाज कर दूँ।' इसके पहले कि टीना जवाब दे, बेंत की कुर्सी के पीछे खड़े होकर रमन उसके कंधे और पीठ मसलने लगा। टीना की 'आह ऊह' से आइशा परेशान हो गई। उसके हाथों में जादू था। उसे मालूम था कि कौन से नाजुक पौंइंट्स दबाने से शरीर में कहाँ कहाँ आग लग सकती थी। आइशा कब से तरस रही थी अपने शरीर पर रमन की उँगलियों की छुअन के लिए और जब देखो तब वह टीना की मालिश करने लगता।

टीना और आइशा को फिक्र थी कि रमन भला उनके महँगे शौक कब तक पूरे करता रहेगा। आजकल अच्छे और अमीर पुरुषों की बहुत कमी हो गई थी। किसी ऐरे गैरे नत्थु खैरे के साथ तो उनका गुजारा हो नहीं सकता। एक थियेटर ही देखने निकलो तो सौ पाउंड्स फुर्र से उड़ जाते थे और फिर आजकल किसी का भरोसा भी तो नहीं किया जा सकता। देखने सुनने में अच्छे दिखने वाले पुरुष हत्यारे साबित होते और फिर न जाने क्या बीमारी पाले हों। रमन को तो वे सालों से जानती थीं। कोई रिस्क वाली बात थी ही नहीं।

शाम को टीना ने अपनी मर्सेडीज पोर्च से निकाली, आइशा कूद कर आगे वाली सीट पर बैठ गई और झेंपता हुआ रमन टीना के पीछे वाली सीट पर बैठ गया।

अपने पोर्च में खड़ी जारा और रीमा की सारसनुमा गर्दनें रमन के पोर्च तक खिंची चली आईं।

'हेलो, वी वांटेड टु मीट यू।' टीना ने चिल्ला कर कहा तो रीमा और जारा ने उन्हें यूँ देखा कि उनकी नजर रमन के घर की ओर तभी ही उठी थी।

'शयोर।' जारा ने जवाब दिया। अब तक स्नेहा भी बाहर निकल आई थी। तीनों की घंटियाँ टनटना उठीं। काश कि वह उन्हें खुद ही मिलवा देता। अब क्या जवाब देगा? ये औरतें भी खूब होती हैं। जब खुद मजे ले रही हों तो कुछ नहीं पर जहाँ कोई और नजर आई कि इनका मुँह सूजा नहीं।

'वे लोग तुम दोनों को देखकर न जाने क्या सोच रही होंगी।' रमन बुड़बुड़ाया।

'यही कि एक सिंगल आदमी की दो दो गर्ल फ्रैंड्स और वो भी एक साथ!। टीना ने मजाक में कहा।

'डोंट वरी रमन, हम तुम्हारे सच्चे आशिक हैं। हम ही तुम्हें इस दलदल से भी बाहर निकाल लेंगे।' आइशा बोली। रमन को लगा कि शायद बात सँभल जाएगी। वैसे भी तो आज नहीं तो कल उसे अपनी योजना इन दोनों को बतानी ही पड़ेगी।

'रमन, इन तीनों में से तुम्हें कौन सबसे ज्यादा पसंद है?' टीना ने पूछा।

'वो जो आखिर में छिपी खड़ी है, उसका नाम स्नेहा है; उनके घर की बहू।'

'गुड गौड, रमन, आर यू मैड?' टीना और आइशा की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

'स्नेहा से दूर ही रहना रमन। उसके हजबैंड को पता लग गया ना तो तुम्हारा मर्डर करवा देगा।' आइशा ने कहा।

'मैं कौन सा उसे भगा ले जा रहा हूँ।'

'व्हाट एबाउट दि बेटी?'

'जारा; वह तो पटी पटाई है। मैं ही उसे दूर रख रहा हूँ। डिवोर्सड है न, उसके माँ बाप के दबाव में आकर कहीं मुझे उससे शादी ही न करनी पड़ जाए।' रमन ने कहा।

रमन के आग्रह पर कपूर्स के पोर्च के ठीक सामने टीना ने कार रोक दी। 'ये दोनों मेरे कालेज में थीं, टीना और आइशा।' रमन ने जल्दी से सफाई पेश की।

'नाइज टु मीट यू गाइज, हम स्टैनमोर में रहते हैं। आप कभी उधर तशरीफ लाइएगा।' आइशा ने गर्दन बाहर निकालकर कहा।

'श्योर, यू मस्ट कम टू।' रीमा ने जवाब दिया।

'लव टु,' आइशा ने हाथ से टीना की जाँघ को दबाया कि वह चलती क्यों नहीं।

'विल मिस यू।' रमन ने शर्माते और हकलाते हुए रीमा की ओर देखते हुए कहा तो टीना और आइशा ने अपनी आँखे आसमान की ओर उठाकर 'च्च च्च' किया।

'इंतहाए इश्क है, आगे आगे देखिए होता है क्या?' आइशा बोली।

'मुझे लगता है कि कल वापिस आकर इन तीनों पर मुझे फिर से मेहनत करनी पड़ेगी।' रमन का दिमाग अभी भी तीन देवियों पर ही लगा था।

'कल हमें और कपूर्स को मिल्टन कींज वाले जयपुर रैस्ट्रौं में ले चलो न। उनका खाना बेहद लजीज होता है।' टीना बोली।

'हाँ, और उनकी औंबियन्स तो भाई वाह! तुम्हारी नई माशूकाएँ झट से पट जाएँगी और हम उन्हें जता देंगे कि हम कबाब में हड्डियाँ बनने वालों में से नहीं हैं।' आइशा ने कहा। रमन ने मन ही मन तय किया कि वापिस आकर वह इन दोनों को तो नहीं पर हाँ कपूर्स को वह जरूर जयपुर ले जाएगा।

मानचैस्टर से वे दोपहर को लौटे तो रमन ने बहाना करके आइशा और टीना को बाहर से ही टरका दिया ये कहकर कि वह थोड़े खुमार में था और अब वह जमकर सोएगा। उनके जाते ही वह सीधा कपूर्स के यहाँ उन्हें न्योता देने पहुँच गया।

'आप सबको आना है, विदाउट फेल, कपूर साहब और अमर को कह दीजिएगा कि आज काम से जल्दी वापिस आ जाएँ।' रमन को आश्वस्ति चाहिए थी कि कोई बहाना बना कर कहीं वे स्नेहा को घर में ही न छोड़ आएँ जैसे कि हर बुधवार और शुक्रवार को रात के आठ से दस बजे तक रीमा और जारा घर की रखवाली के लिए स्नेहा को छोड़कर सेंट स्टीफंस चर्च में साल्सा नृत्य सीखने जाती थीं।

मिल्टन कींज जाने के लिए तीनों महिलाएँ ऐसे तैयार हुईं थीं कि जैसे एक दूसरे को मात देना चाहती हों। अमर की कार में वे पाँचों समा सकते थे पर बिना कुछ कहे सुने जारा रमन की कार में आ बैठी। रीमा चाहकर भी कुछ न कर सकी। बाप बेटा आगे और सास बहू अमर की कार में पीछे बैठी थीं।

रमन ने स्टार्टर में चिकन टिक्का और सीखकबाब के साथ आलू की टिक्की और छोले मँगवाए। काँटे छुरी से खाने में स्नेहा को दिक्कत हो रही थी और कपूर परिवार उसे ऐसे घूर रहा था कि जैसे वह उन सबकी बेइज्जती करवाने पर तुली हो।

'हाथ से खाने का मजा कुछ और ही है, ऐक्सक्यूज मी।' कहते हुए रमन ने एक टिक्का हाथ में उठा लिया तो अमर और मनोज की भी जान में जान आई और वे सब सहज होकर गपागप खाने लगे। स्नेहा की झुकी हुई पलकों के पीछे रमन ने ढेर सा आभार देखा। सभी ने स्वादिष्ट भोजन का भरपूर आनंद लिया। तीनों महिलाएँ अंदर बाहर से भीग रही थीं पर रमन की पूरी तवज्जो मनोज और अमर पर थी जैसे कि वे उसके विशेष अतिथि हों। बाप बेटा दोनों भारी भरकम और ऊँचे लंबे थे पर उनकी शक्ल बच्चों की सी थी। एक बार भी उन्होंने किसी से ये नहीं पूछा कि उन्हें खाना कैसा लगा या कि वे कुछ खा पी भी रहे थे कि नहीं।

रात के करीब ग्यारह बजे लौटते समय जारा ने अपना सिर रमन के कंधे पर टिका दिया और वह कुछ न कर सका। उसकी धड़कनों से लगभग दोहरी गति थी उसकी कार की। घर पहुँचने से काफी पहले ही रमन ने जारा को आगाह किया कि वह सीधे होकर बैठ जाए, जो जारा को नागवार गुजरा। कार के रुकते ही वह खट से उतर गई और अपने पिता के पास जा खड़ी हुई।

'लैट्स हैव सम कौफी।' अमर ने रमन को घर के अंदर आने के लिए इशारा किया।

'ओह नो, इट्स टू लेट।' रमन जानता था कि बाकी सब तो सोफों पर पसर जाएँगे; बेचारी स्नेहा को ही भाग दौड़ करनी होगी। वह यूँ ही थकी हुई लग रही थी।

बुधवार की शाम को जैसे ही रीमा और जारा साल्सा डांस के लिए घर से निकलीं, मौके का फायदा उठाकर रमन जा पहुँचा स्नेहा के द्वार। पोर्च में खड़े दोनों देर तक बात करते रहे पर चाहते हुए भी स्नेहा की हिम्मत नहीं हुई उसे अंदर बुलाने की; न जाने कब उसके ससुर और पति लौट आएँ!

'हमें लगता है कि जारा दीदी आपको चाहती हैं।' स्नेहा ने शर्माते हुए रमन से कहा।

'व्हाट?' रमन ने हैरानी जाहिर की।

'जैसे आपको कुछ नहीं पता!" वह शोखी में भर कर बोली।

'आइ डोंट नो, मुझे तो जारा बिल्कुल पसंद नहीं है।' रमन को लगा कि स्नेहा के प्रति उसकी रुखाई के बारे में जानकर स्नेहा को ठंडक पहुँची।

'ओह, उन्होंने तो पापा जी से बात चलाने को कहा है।'

'चलिए, मेरे बंगले में बैठ कर बातें करते हैं।' रमन ने उसे फुसलाने का प्रयत्न किया।

स्नेहा जानती थी कि अकेले में क्या हो सकता था। रमन को वह बहुत चाहने लगी थी पर कोई गलत कदम उठाने को वह तैयार नहीं थी। इधर उधर की हाँक कर रमन झक मार कर घर लौट आया।

जैसा कि स्नेहा ने रमन को आगाह किया था, न्योता आ पहुँचा। शनिवार की दोपहर के भोजन पर कपूर्स ने रमन को आमंत्रित किया था। रमन ने बहाना बनाया कि सप्ताहांत पर उसके माँ और पिता आने वाले थे। फिर तो रीमा उसके पीछे ही पड़ गई कि वह उन्हें भी साथ लेकर आए।

'यू कैन ब्रिंग यौर गर्ल फ्रैंड्स टू।' रीमा ने हँसते हुए रमन को ताना मारा।

'नहीं नहीं रीमा जी, प्लीज आप मुझे गलत नहीं समझिए; दे आर जस्ट ओल्ड फ्रैंड्स।'

'अरे भई, मजाक भी नहीं समझते?' रीमा आँखे नचाते हुए बोली।

'वी आर नौट दैट औरथोडौक्स, रमन।' भारी भरकम आवाज में जारा जोर जोर से हँसने लगी; उसके स्वरूप में शर्मों लिहाज का तो कोई नाम ही नहीं था।

कपूर्स से मिलने के लिए रमन के माँ बाप भी बड़े उत्साहित थे। कुछ ज्यादा ही खातिर हो रही थी उनकी। जारा ठीक रमन की नाक के नीचे इतराए चली जा रही थी। उसने आज लखनवी कुर्ता और चूड़ीदार पाजामा पहना हुआ था, जिसमें से उसके बदन की भद्दी सिलवटें साफ झाँक रही थीं। दुपट्टे का एक पल्ला उसके बाएँ कंधे पर अटका था और दूसरा बेलौस फर्श पर लिथड़ रहा था। रीमा ने जब उसे दुपट्टा ठीक से लेने को कहा तो उसने झल्लाकर दुपट्टे को उताकर सोफे पर फेंक दिया।

स्नेहा कहीं नजर नहीं आ रही थी। कपूर साहब उसमें अपना भावी दामाद देख रहे थे। खाना स्वादिष्ट था पर घबराहट में रमन से खाया नहीं जा रहा था। यदि उनमें से किसी ने शादी की बात चला दी तो वह क्या करेगा। रमन के माँ बाप अपनी खातिर तवज्जो से बड़े खुश थे, लंदन में भला कौन किसी के आगे पीछे घूमता है।

'सेंट आलबंस में जहाँ हम रहते हैं, लोग ऐसे ड्राइ हैं कि पूछिए नहीं।' रमन की माँ ने कह ही दिया।

'सैंट आलबंस तो बड़ी पौश जगह है।' जारा अपनी भद्दी आवाज में बोली तो रमन को लगा कि भैंस को जुकाम हो गया था।

'हाँ, इट इज स्पैक्टैकुलर, हमारा शौप्पिंग सैंटर भी बहुत फेमस है। आप लोग एक दिन चक्कर लगाइए न।' रमन के पिता ने उन्हें दावत दी जो उन्होंने झट स्वीकार कर ली।

बिना किसी औपचारिकता के न जाने कब कपूर परिवार के भारी भरकम एलबम रमन की गोदी में रख दिये गए; माँ बाप को उठकर रमन के आस पास बैठना पड़ा। अमर और जारा भी आकर उनके कंधों पर लद गए। एलबम में वे अपने बचपन से लेकर अब तक के फोटो दिखाने पर तुले थे; गोल मटोल बच्चे अपने भारी भरकम दादा-दादी, नाना-नानी, मौसा-मौसी और मामा-मामी के अलावा पारिवारिक मित्रों के साथ हजारों तस्वीरों में थे और हर एक तस्वीर की कहानी सुनाते हुए उन्हें बड़ा मजा आ रहा था।

आखिर में स्नेहा खीर लेकर आई। उसने हरे और सिंदूरी रंग की साड़ी पहन रखी थी। रमन को लगा कि उसका गुलाबी चेहरा कुछ पीला पड़ गया था और उसकी बड़ी बड़ी स्वप्निल आँखें उदास थीं। जारा और रीमा के बस का तो कुछ नहीं था। स्नेहा ही शायद सुबह से एक टाँग पर खड़ी थी, रमन को बहुत गुस्सा आया। चाँदी की कटोरी पकड़ाते समय स्नेहा और रमन की उँगलियाँ छू गईं। दोनों को लगा कि जैसे उनके बदन में एक करैंट दौड़ गया हो।

'बेटी, तुम तो किचन में ही लगी रहीं। तुमने अभी खाना भी खाया कि नहीं?' माँ ने रमन के मन की बात पूछ ली।

'जी हाँ।' वह साफ झूठ बोल गई। चाँदी की कटोरियों में परोसी हुई खीर वह सबको देने लगी। जब तक वह रसोई में लौट नहीं गई, रीमा और जारा की नजरें स्नेहा का पीछा करती रहीं जैसे स्नेहा से उन्हें खतरा हो।

ये तो अच्छा हुआ कि उसका मोबाइल घनघना उठा नहीं तो जारा दो परिवारों के बीच अपने बेअदब और कामुक लतीफों से सबका मनोरंजन करने चली थी। रमन जब भी उनके घर आता, जारा उसे एक लतीफा जरूर सुनाती और वह झेंप के रह जाता। फोन पर भैंस की तरह रँभाती जारा सबके दिलो दिमाग पर गाढ़ी धुंध सी छा गई। रीमा ने सबका ध्यान बँटाना चाहा।

'लगता है कि खीर आपको अच्छी नहीं लगी, जारा ने बनाई है। सुबह से रसोई में लगी थी।' रीमा ने कहा। रमन का मन एकाएक उचट गया।

'अरे वाह, क्या स्वादिष्ट खीर बनाई है जारा बेटी। तुम्हें तो इनाम मिलना चाहिए।' माँ ने कहा पर जारा तो फोन पर व्यस्त थी। रीमा ने इशारे से जारा का ध्यान माँ की ओर दिलाया तो उसने अपना हाथ हिला भर दिया। पूरे पचीस मिनटों के दौरान किसी से फोन पर बड़ी बेहूदगी से बतियाती रही। उसके माँ बाप ने भी शायद कपूर्स के मन की बात ताड़ ली थी और वे रमन की ओर उत्सुकता से देख रहे थे। रमन को लगा कि उसकी तबीयत सचमुच खराब हो चली थी। उसके माथे पर पसीने चू रहे थे।

'क्या हुआ बेटा?' माँ को चिंता हुई।

'पता नहीं, लगता है कि वाइरल शुरू हो गया है, मेरा सिर बहुत दुख रहा है।' रमन यकायक उठ के खड़ा हो गया। 'आइ डोंट वांट टु गिव इट टु ऐनिवन हियर, प्लीज ऐक्स्क्यूज मी।' कहता हुआ वह बिना पीछे देखे तेजी से बाहर निकल गया। थोड़ी देर में ही उसके माँ बाप के पीछे पीछे अमर और जारा चले आए।

'डू यू नीड ऐनि मेडिसिंस और समथिंग?' जारा ने पूछा।

'नहीं नहीं, मैं पैरासीटामौल लेकर सोने जा रहा हूँ, कल तक ठीक हो जाऊँगा।' मुँह और नाक पर एक बड़ा सा टिशू लगाए रमन बोला। 'इफ यू नीड ऐनिथिंग, जस्ट गिव अस ऐ टिंकल।' अमर ने कहा। रमन के मुँह से 'थैंक यू' तक नहीं फूटा।

पूरा इतवार कपूर्स की बातें करते ही निकल गया।

'कपूर्स तो हमारी ऐसे खातिर कर रहे थे कि जैसे तेरे साथ जारा का ब्याह रचाना चाहते हों।' माँ ने टोह लेनी चाही। चश्में के ऊपर से आँखे निकाले पिता भी रमन का चेहरा ताकने लगे।

'जारा तलाकशुदा है।' रमन ने बात वहीं दबा देनी चाही।

'तभी, रीमा अपनी तलाकशुदा लड़की को कहीं तेरे पीछे न लगा दे, कैसे बेशर्मी से देखे रही थी तुझे, मजाल है कि भाभी की परोसने में ही हैल्प कर दे।' माँ ने कहा। 'होल्ड यौर हौरसेज, माँ, मुझे जारा में कोई इनटेरैस्ट नहीं है।'

'शुक्र है भगवान का! बहू हो तो स्नेहा जैसी, कितनी खूबसूरत लग रही थी?' माँ बोलीं।

'कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि रीमा जैसी स्मार्ट माँ और मनोज जैसे हँसमुख पिता की बेटी ऐसी रफियन होगी।' पिता बोले।

'कैसी बनी ठनी बैठी थी रीमा जैसे कहीं की महारानी हो।' पिता की बात काटते हुए माँ ने कहा। रमन को अनमना देखकर वे जल्दी ही घर लौट गए।

अपने मन से ही परेशान रमन को ये समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। आज तक कभी उसे ऐसी कशमकश से नहीं गुजरना पड़ा था। अभी तक न जाने कितनी यूरोपियंस और एशियन लड़कियों के साथ उसने रातें गुजारीं थीं, अगली सुबह ही तू कौन और मैं कौन वाला हिसाब होता था। अभी तो हाथ पकड़ने का भी मौका नहीं मिला था और रमन की हालत पतली थी। यह स्वीकार करने को वह बिल्कुल तैयार नहीं था कि वह स्नेहा को चाहने लगा था। दूसरी तरफ उसे जल्दी से जल्दी अपना शतक पूरा कर लेने की पड़ी थी। वह इतना विक्षुब्ध था कि ठीक से सो भी नहीं पा रहा था। निन्यानवे का नंबर ही मनहूस था। नीली डायरी के दिन शायद पूरे हो चले थे।

बिस्तर में पड़ा रमन अभी इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि बैल बजी। वह उछल कर खड़ा हो गया। शायद टीना और आइशा न हों। अपने सोने के कमरे में से झाँका तो दरवाजे पर जारा को खड़े पाया। उसे देखते ही जारा अपना एक हाथ जोर जोर से हिलाने लगी कि वह नीचे आए। अपने को कोसता हुआ कि उसने खिड़की से क्यों झाँका, रमन गाउन पहन कर बेमन से नीचे आया।

'मम्मी ने तुम्हारे लिए काढ़ा बना के दिया है।' रमन के हाथ में एक गर्म गर्म मग पकड़ाते हुई जारा सीधी बैठक में चली आई। वह अचकचाया सा दरवाजे पर ही खड़ा रह गया। 'इट्स नाइज।' जारा ने कमरे का मुआयना करते हुए कहा।

'यू मस्ट स्टे अवे फ्रौम...' रमन की बात पूरा होने से पहले ही जारा उससे लिपट गई।

'आइ डोंट केयर, पूरे दो दिन से मम्मी मुझे रोके बैठी थीं।' रमन को लिए वह सोफे पर आ डटी।

लैट मी टेक ऐ बाथ। आइ विल जोइन यू इन ऐ सैक।'

'वी कैन टेक बाथ टुगैदर, इफ यू लाइक।' शर्म को ताक पर रहते हुए जारा ने अपना प्रस्ताव रखा।

रमन सोच रहा था कि उसे नीली डायरी के निन्यानवे खाने को पूरा करने का ये मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए पर न जाने क्यों उसके हाथ पाँव शिथिल पड़ गए। बड़ी मुश्किल से अपने को छुड़ाकर वह खड़ा हो गया।

'व्हाट्स रौंग विद यू?' जारा गुस्से में बिफरने लगी।

'नथिंग, आइ टोल्ड यू आइ ऐम नौट वेल।'

'यू लुक परफैक्टलि वैल टु मी।' वह फिर उसकी ओर बढ़ी। पीछे की ओर सरकते हुए रमन ने काढ़े के मग को मेज पर लुढ़का दिया। 'ओह माइ गौड, व्हाट ऐ मैस।' कहता हुआ वह रसोई की ओर दौड़ा।

'समथिंग इज सरटेनलि रौंग विद यू, रमन।' जारा ने रमन के गाउन की बैल्ट के नीचे की ओर आँखों से इशारा करते हुए बेहयाई से कहा।

'गैट आउट।' गुस्से में वह चिल्लाया।

'सौरी, आइ डिड्ंटट मीन इट।' जारा एकदम ठंडी पड़ गई थी। घबरा के वह दरवाजे की ओर मुड़ी ही थी कि बैल बजी। जारा ने दरवाजा खोला तो देखा रीमा खड़ी थी। वह उसके सीने से चिपक कर झूठ मूठ रोने लगी।

'व्हाट हैपंड माइ डार्लिंग?' रीमा ने रमन को देखते हुए जारा से पूछा। 'ही मे बी इनटैरेस्ट्ड इन यू।' कहती हुई वह बाहर भाग गई।

'रीमाजी, आइ टोल्ड हर टु स्टे अवे फ्रौम मी बट...' रमन की बात पूरा होने से पहले ही रीमा ने कहा। 'तुम्हें कुछ एक्सप्लेन करने की जरूरत नहीं है, रमन, आई नो। जारा इज ऐ लिट्टल ऐरोगैंट, मैं फिर आऊँगी।' रीमा ने कुछ इस तरह कहा कि जैसे कि रमन जारा को नहीं खुद उसे चाहता था। बौखलाया हुआ रमन मातमपुर्सी कर रहा था कि एक साथ दो शिकार हाथ से निकल गए थे।

'बी पेशंट, रमन, फौर माइ सेक।' होंठों पर अपनी उँगलियों को चूमकर रीमा ने रमन की ओर एक 'फ्लाइंग किस' फेंका जो रमन को लपक लेना चाहिए था पर वह सन्न खड़ा रह गया। रीमा एक ही वाक्य में वह न जाने कितना कुछ कह गई थी। मुड़कर मुड़कर पीछे देखते हुई रीमा इठलाती हुई बाहर निकल गई। वह सिर पकड़कर सोफे पर बैठ गया। रमन को लगा कि उसका कौमार्य भंग होने जा रहा हो।

ये उसे हो क्या गया था? उसने मौके का फायदा क्यों नहीं उठाया? क्यों वह राजी नहीं हुआ? शायद वह जान गया था कि इन तीनों में से एक को भी छेड़ने का मतलब था पूरे परिवार से दुश्मनी मोल लेना। नीली डायरी को उसे अब जला देना चाहिए। रीना मौका ढूँढ़ रही होगी वापिस आने का। न जाने क्यों माँ और बेटी दोनों के ही साथ हमबिस्तर होने के विचार से भी उसे वितृष्णा हो रही थी।

उसी रात को रमन ने अपने सूटकेस भरे और सेंट आलबंस जा पहुँचा। उसके माँ बाप हैरान हो गए; वह पहले कभी उनके पास रहने नहीं आया था।

अगले ही दिन टीना और आइशा आ धमकीं।

'अभी निन्यानवे के चक्कर में ही अटके हो या...' आइशा ने मजाक में पूछा।

'सचमुच ये नंबर तो बड़ा मनहूस निकला, खैर, मनहूस तो नहीं कहना चाहिए क्योंकि दो दो के औफर एक साथ आए पर मुझे रिफ्यूज करना पड़ा।'

'ओह हो, तो ये बात है। पर तुम्हारी मजनुओं जैसी ये सूरत तो कुछ और ही कह रही है।'

'तो स्नेहा के इंतजार में हो।' टीना ने कहा तो रमन को लगा कि शायद वह उसके मन की बात कह रही थी।

'छोड़ो, उसकी बात करने से क्या फायदा?' हताश आवाज में वह बोला।

'डोंट वरी, वी विल फिक्स यू विद समवन रियलि नाइज।'

'नो थैंक्स, मैं उन दोनों से छिपा बैठा हूँ, तुम दोनों मेरे घर गई थीं क्या?'

'हाँ, तुम्हें घर में न देखकर हमने सोचा कि तुम रीमा के घर पर ही मिलोगे। रीमा बड़ी बेरुखी से मिली। स्नेहा भी बीमार सी लग रही थी।' टीना ने बताया।

टीना और आइशा माँ से गप्पें मारकर चली गईं। रमन ने अपने मन को समझा लिया कि स्नेहा का इंतजार करना बेकार था और ये कि वह अब वापिस कभी अपने घर नहीं जाएगा।

अशांत, कुंठित और व्यथित रमन उधेड़बुन में बीमार दिखने लगा था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बेमन से वह अपनी एजेंसी में पहुँचा कि किसी तरह अपने को व्यस्त रखे। दोपहर को एकाएक उसे शीशे के बाहर रीमा दिखाई दी। वह जड़ हो गया। उसे एजेंसी का पता किसने दिया?

इसके पहले कि रीमा अंदर कदम रखती, रमन ही उठकर बाहर आ गया। वह स्वस्थ, कमसिन और ताजा लग रही थी। कोई उसे देखकर कह नहीं सकता था कि वह बहू बेटी वाली एक अधेड़ उम्र की औरत थी। रमन का दिमाग जल्दी जल्दी काम करने लगा। वह क्यों आई थी। जारा के लिए या खुद अपनी भूख मिटाने के लिए।

'कहीं अकेले में बात हो सकती है?' रीमा ने मुस्कुराते हुए पूछा।

'यहीं पास में ही बरिस्ता है।'

'वहाँ नहीं, कहीं प्राइवेट।' रमन के कान खड़े हो गए। शायद नीली डायरी की निन्यानवीं पंक्ति के भरने का समय आ पहुँचा था। रीमा खुद आई थी चलके उसके द्वार। पूरे आठ महीने होने को आए और नीली डायरी में वह एक भी ऐंट्रि नहीं भर सका था। मन न होते हुए भी वह रीमा के साथ सोने को तैयार था।

अपने कर्मचारियों को ये बताकर कि वह किसी को एक बिकाउ फ्लैट दिखाने के लिए जा रहा था, रमन चाबियाँ लेकर निकल आया। ये घर उसकी एजैंसी से दस मिनट की ड्राइव पर ही था। रास्ते भर दोनों नहीं बोले। एक अच्छे से घर की ड्राइव में कार रुकी, जिसके अहाते में 'फौर सेल' का बोर्ड लगा हुआ था।

'वुड यू लाइक सम टी?' रसोई में जाकर रमन ने चाय की केतली औन की और रीमा से पूछा।

'आइ हैव नौट कम हियर फौर टी।' शोखी में भर कर रीमा बोली। वे चुपचाप ऊपर सोने के कमरे में पहुँच गए। न जाने क्यों रमन को स्नेहा की याद आई। एक मन हुआ कि वह रीमा को जाने के लिए कह दे पर फिर नीली डायरी का क्या होगा और वह क्यों इनके घर की राजनीति में पड़े?

'डोंट वरी फौर कंडोम्स, आइ ऐम स्टैरेलाइज्ड।' कमरे के पर्दे बंद करते हुए रीमा ने रमन की यह दुविधा भी सुलझा दी। अपनी काली स्कर्ट और ब्लाउज तह करके रीमा ने कुर्सी पर रख दिए थे। बिस्तर पर अधलेटी सी होकर उसने रमन को अपने पास बैठने का इशारा किया, जो बेहद तनाव में था। जमीन पर उतार फेंके कपड़ों की मौन मुखरता बिस्तर पर आ पसरी और उसके बदन पर सिरपेचे की बेल सी चढ़ने लगी।

जैसा कि रमन ने मन में सोच रखा था रीमा बिल्कुल उसका उल्टा निकली। उसकी शोख अदाएँ सिर्फ दिखाने भर की थीं। अपने हाथ सिर के ऊपर उठाने, टाँगें फैलाने और 'आह आह' करने के सिवा रीमा ने कुछ नहीं किया। रमन को याद आई वह अफ्रीकन युवती, जिसने रमन के हाथ और पाँव बाँध दिए थे। शरीर पर फिसलती हुई उसकी जीभ ने रमन को इतना उत्तेजित कर दिया कि उसे लगा कि कहीं उसे दिल का दौरा ही न पड़ जाए।

रमन के विचार में संभोग का अभिप्राय मनोरंजन और विश्राम था किंतु वह बेहद तनावग्रस्त था। रीमा ने भी बिना किसी प्रेमाचार के जल्दी से जल्दी अपनी भूख मिटाना चाहा था या फिर रीमा के पास भी एक डायरी होगी; लाल या गुलाबी; जिसमें वह रमन का नाम जोड़ने की जल्दी में थी।

स्नेहा के प्रति उसका प्यार और निष्ठा उसे घर बसाने के लिए बाध्य कर रहे थे पर रमन अपने को बाँधना नहीं चाहता था और न ही उसे अभी बच्चे चाहिए थे।

'आए म सौरी, इट्स सच ए लौंग टाइम।' एक तरह से माफी माँगती हुई रीमा ने झटपट कपड़े पहने और नीचे आ गई। नीली डायरी के 'अनुभव' वाले खाने में रमन एक प्रविष्टि के लिए तैयार था।

'सो वैन आर यू कमिंग होम?' इस बात पर मनन करने के लिए रमन को सुकून चाहिए था पर रीमा के मुँह की टोंटी जो एक बार खुली तो बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अपराध भावना से ग्रसित रीमा बोले चली जा रही थी। पहला ही सत्र दुर्भाग्यपूर्ण रहा था।

'आइ डोंट नो, इट्स काइंड औफ ऐंबैरेसिंग फौर मी।'

'फौरगेट जारा। तुम चाहो तो मैं यहीं आ जाया करूँगी।'

'आइ विल फोन यू।' रमन ने झट उसे टोका।

'तुम तो अपना मोबाइल तक नहीं उठाते।' वह शिकायती अंदाज में बोली।

'ऐक्चुअलि, मेरा मोबाइल घर पर ही छूट गया था, इस वीकैंड पर शायद आऊँ।' रीमा को उसने जल्दी ही सेंट औलबंस के बस स्टेशन पर छोड़ दिया। कार से उतरकर रीमा ने रमन के होंठों को बलात चूम लिया। रमन ने फैसला किया कि वह जिंदगी में अब कभी रीमा से नहीं मिलेगा।

ऐजेंसी में बैठा रमन सोच रहा था कि गोरियों से खुले आम इश्क लड़ाने का मजा ही और था। संभोग के बाद तू कौन और मैं कौन। कोई दबाव नहीं, कोई झंझट नहीं, कोई एहसान नहीं, कोई उपकार नहीं; बस 'प्योर फन'। इंडियन औरतों की तरह नहीं कि एक बार उनके साथ सो क्या लिए कि जीवन भर का टंटा पाल लिया। रमन को ये समझ नहीं आता कि कामसूत्र के देश में संभोग पर इतने बंधन क्यों, कैसे और कब लग गए और शायद इसी वजह से यौन कुलेख और गंदी गालियों में निकलती है लोगों की कुंठा।

रमन की नीली डायरी में अभी तक एक कुँआरी कन्या के स्वाद की प्रविष्टि नहीं थी। एक जर्मन षोडसी मिली तो थी, बेहद खूबसूरत और स्मार्ट। ये पहली बार था कि किसी लड़की को देखकर उसका मन बस में नहीं रहा था और वह झट से मान भी गई थी।

'आइ एम स्टिल ए वर्जिन।' प्रेमाचार को उद्यत रमन के बदन में जैसे एक करेंट लगा हो। रमन सिर पर पाँव रखे भाग लिया था। उसके दोस्तों ने उसे डरा रखा था कि वर्जिन्स बहुत 'मैस्सी' होती हैं। हालाँकि दिल्ली से आए रमन के भतीजे ने उसे एक बार बताया था कि भारत में तो वर्जिन के लिए आदमी ढेर सारा धन खर्चने को भी तैयार रहते हैं; उसका मजा ही कुछ और है। अब शायद उसे कभी मौका न मिले; नीली डायरी के दिन पूरे होने को आए। वह थक चुका था।

फोन पर रमन ने टीना और आइशा को खूब झाड़ा कि उन्होंने उसका पता उसे क्यों दिया।

'हम तो सोच रहे थे कि तुम खुश होगे कि निन्यानवे के चक्कर से निकल गए।' आइशा ने कहा।

'हम तो तुमसे मिलने गए थे। घर के बाहर ही रीमा मिल गई और बातों बातों में उसने हमसे तुम्हारा पता ले लिया।' टीना ने सफाई दी।

'हम स्नेहा से भी मिले थे। उसके गाल पर नीले पीले निशान थे।' आइशा ने बताया तो रमन के कान खड़े हो गए।

'हमने पूछा कि यह क्या हुआ तो चौकन्नी बिल्ली सी रीमा झट बीच में आकर बोली कि वह सीढ़ियों से गिर गई थी।' टीना बोली।

'हमें तो लगता है, रमन, कि घर में उसे कोई पीटता है, क्यों टीना?'

'हाँ उसकी शक्ल देखी थी न तुमने, टीना? कैसी बीमार लग रही थी।'

'तो मैं क्या करूँ?' झुंझलाते हुए रमन बोला।

'सौरी, हम तो सोच रहे कि तुम उसे चाहते हो।'

'हमारा फर्ज था तुम्हें बताना, अब तुम्हारी मर्जी।

रीमा के साथ हमबिस्तर होने के बाद उसकी बहू के साथ चक्कर चलाना उसे वाजिब नहीं लगा पर विरोधी पक्ष के हर एतराज को बड़ी सफाई और शर्मनाक तरफदारी से खारिज करता हुआ रमन स्नेहा से मिलने का अवसर ढूँढ़ रहा था। उसकी रातों की नींद हराम हो गई थी।

ये सोचकर कि शायद निन्यानवे का नंबर उसके लिए लक्की हो, रमन उसी शाम को वापिस घर पहुँच गया। पहले तो उसने अपनी नीली डायरी में अट्ठानवे नंबर के आगे रीमा का नाम लिखा और उसके अगले खाने में 'बदतरीन' लिखकर जैसे उसने अपनी मन की भड़ास निकाली। उसे विश्वास था कि 'बेहतरीन' वाली प्रवष्टि केवल स्नेहा द्वारा पूरी होगी। रीमा तो स्नेहा के पैर के मैल बराबर भी नहीं थी!

उस दिन बुधवार था। रीमा और जारा साल्सा सीखने गई हुई थीं। डरते डरते उसने कपूर्स के घर की घंटी दबाई कि कहीं बाप या बेटा दोनों में से कोई घर न आ गया हो।

स्नेहा ने दरवाजा खोला। रमन को देखकर वह घबरा गई।

'आर यू औलराइट? रमन ने पूछा तो स्नेहा का हाथ स्वतः अपने बाएँ गाल पर चला गया।

'हू हिट यू?' रमन ने गुस्से में पूछा।

'मैं सीढ़ियों से गिर गई थी।'

'बुलशिट, इस देश में तुम्हें यह सब सहने की जरूरत नहीं है।'

'मैं क्या करूँ? इन्होंने मेरा पासपोर्ट छिपा रखा है।'

'डुप्लीकेट पासपोर्ट बनने में सिर्फ दस दिन लगते हैं।' स्नेहा की आँखें खुशी से ऐसे चमक उठीं जैसे किसी गरीब बच्चे को टौफी मिल गई हो और फिर एकाएक बुझ गईं जैसे कि धुआँ छोड़ती हुई मोमबत्ती।

'पासपोर्ट बन भी जाए तो मैं किस मुँह से घर लौटूँगी?' आँसू उसके गालों पर यूँ ढुलके कि जैसे धूप में चाकलेट बहने लगे। डर के मारे वह इधर उधर देख रही थी कि कहीं कोई देख न रहा हो।

'तुम्हारे पास मोबाइल है?' रमन ने पूछा।

'नहीं।'

'तो ये अपने पास रखो, मैं इसकी साउंड बंद कर देता हूँ ताकि किसी को पता न चले कि तुम्हारे पास मोबाइल है। ये देखो मेरा नंबर टौप पर ही है, तुम्हें सिर्फ 'काल' का बटन दबाना है, ओके?' रमन ने अपना पुराना मोबाइल उसको देते हुए कहा।

'नहीं, मैं अपने माँ बाबू को फोन नहीं करूँगी। सिर्फ परेशान होने के अलावा वे कुछ नहीं कर पाएँगे। आप भी मेरे लिए परेशान न हों; सब ठीक हो जाएगा।'

'कैसे ठीक हो जाएगा?' रमन के प्रश्न का उसने कोई जवाब नहीं दिया पर उसने देखा कि स्नेहा के चेहरे पर एक कठोरता उतर आई थी। उसे लगा कि कहीं वह कुछ खतरनाक करने की न सोच रही हो।

'आप जाइए, किसी ने मुझे आपसे बात करते देख लिया तो...'

'डोंट वरी, यहाँ किसी को चुगलखोरी के लिए समय नहीं है।

'बगल वाली फ्रांसिस अपनी बैठक की खिड़की से पूरे मोहल्ले की खबर रखती है।'

'ठीक है, मैं कल ही पासपोर्ट फौर्म ले आऊँगा। तुम्हें जो याद हो भर देना, बाकी मैं देख लूँगा।'

बिना कोई जवाब दिए स्नेहा ने जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया था। वापिस घर पहुँचते ही रमन ने फोन मिलाया।

'हेलो।' दूसरी तरफ से एक बेहद घबराई हुई आवाज आई।

'डरने की कोई बात नहीं है। मोबाइल को होशियारी से छिपा दो और घर में जब कोई न हो तो मुझे फोन करना।'

'किसी को पता लग गया तो...'

'बी बोल्ड स्नेहा, डरने की कोई बात नहीं है। मैं हूँ न; मुझ पर तुम्हें भरोसा है न? आइ प्रौमिस, तुम्हें कोई प्रौब्लम नहीं होगी।'

आँखें बंद करके रमन आराम से सोफे पर लेट गया। आज वह बहुत खुश था। पति द्वारा स्नेहा के बदन का चाहे अतिक्रमण हुआ हो, दिलो दिमाग से वह अनछुई थी। उसे लगा कि जैसे जीवन भर वह स्नेहा के ही इंतजार में था। नीली डायरी में सौवीं और आखिरी प्रविष्टि पक्की थी और रमन यह भी जानता था कि इस बार की एंट्री 'बेहतरीन' होगी।

जारा के घर लौटते ही बगल वाली फ्रांसिस ने, जो घर के बाहर ही खड़ी थी, उसे रमन के आने की खबर दे दी। उस शाम रीमा अपनी सहेलियों के साथ गप्पें मारती हुई पीछे रह गई थी।

'सो व्हाट वाज ही डुइंग इन अवर ऐब्सैंस?' जारा की आँखों से अँगारे बरस रहे थे जैसे वह स्नेहा को मार ही डालेगी।

'दीदी, वह तो आप ही को पूछ रहे थे।' डर के मारे स्नेहा के मुँह से निकल गया।

'मुझे पूछ रहा था?' जारा को विश्वास नहीं हुआ।

स्नेहा ऊपर अपने कमरे की ओर भागी। उसे रमन को सावधान कर देना चाहिए इससे पहले कि जारा फोन करके रमन से कुछ पूछे। बाथरूम को बंद करके उसने रमन को फोन पर अपने झूठ के बारे में बताया।

'डोंट वरी, मैं सँभाल लूँगा।' स्नेहा की जान में जान आई।

आरामकुर्सी पर झूलता हुआ रमन अब जारा के फोन के इंतजार में था।


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हिंदी समय में दिव्या माथुर की रचनाएँ