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कविता

माँ - 2
दिव्या माथुर


मेरा सुख दुख
अपनी कमज़ोर आँखों से पढ़ लेती है
अपने जोड़ों का दर्द भूल
मुझे अपने से सटा वह लेती है
सफ़ेद बाल हैं प्रकाशस्तंभ
मेरी कश्ती कभी नहीं डोली
है ध्रुव तारे सी साथ सदा
मैं रास्ता कभी नहीं भूली
पाँव पोंछता रहता है
अब भी उसका उजला आँचल
आज भी मेरे सिर पर है
उसकी दुआओं का गगनांचल।


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