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कविता

चंदन पानी
दिव्या माथुर


हम चंदन पानी न हो पाये
चंदन पानी न हो पाये
कोल्हू के बैल से घूमते गए
गले में रस्सी लटकाये
दिन रात पसीना बहा कर भी
इक बूँद तेल की न पाये
तैरा किए सतहों पर ही
चंदन पानी न हो पाये
पहल करे कब कैसे कौन
तोड़ न पाए कभी मौन
कभी साथ बैठे न सपने सजाए
नियति के भरोसे पछताए
दिन और रात रहे उम्र भर
चंदन पानी न हो पाये
चुरा ली नज़र झट कभी जो मिली
उँगलियाँ हमारी न उलझीं कभी
गलबँहियों की तो खूब कही
मुँह बाए गए रस्में निभाये
दिल की थाह बिना पाए
चंदन पानी न हो पाये
सरकारी चक्की में पिसे
अफ़सर बनने की चाह लिए
बच्चों का अपने पेट काट
घूस में लाखों स्र्पये दिए
आँखों से अपनी अलग गिरे
चंदन पानी न हो पाये
बढ़ा पिता का रक्तचाप
माँ के गठिए का दर्द बढ़ा
मनमानी बच्चों की बढ़ी
फ़ासला हमारे बीच बढ़ा
बस रहे दूरियाँ तय करते
चंदन पानी न हो पाए
समय क़तर कैंची से हम
अब जीवन फिर से शुरू करें
थाम लो पतवार तुम्हीं
अपने रंग में रंग डालो मुझे
पानी और तेल नहीं रहें
हम चंदन पानी हो जाएँ।


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