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कविता

दायरे
दिव्या माथुर


ना इच्छा की
कहीं भागने की
ना जीवन को ही
कोसा कभी
हल को कंधे पर लादे सदा
बस आँख झुकाए जुगाली की

रस्सी तुड़ाते
लात मारते
और किसी भी
दिशा भागते
सिर पर जब थे सींग लदे
क्यूँ खाये तुमने डंडे
क्यूँ आँख पे पट्टी बँधवाए

रहे घिसटते जीवन भर
एक ही दायरे के भीतर
क्यों सदा लगाते रहे चक्कर
बेतुकी बात का पैर ना सिर
एक ज़रा से तेल की ख़ातिर?

बैल ने मुझे दो टूक जवाब दिया,
ये तुम कह रही हो?


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