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निबंध

रंगमंच विषयक
मोहन राकेश


2.रंगमंच और शब्द

(धर्मयुग द्वारा आयोजित एक विशेष परिचर्चा)

राइटर्ज़ यूनियन में केवियार, बोर्श और शाशलिक का लंच खाने के बाद मीरा के कमरे में नाटककार एलैक्सी आर्बुज़ोफ़ से लम्बी बातचीत हुई।

आर्बुज़ोफ़ के एक ही नाटक से परिचय था जो अँग्रेज़ी में 'प्रॉमिस इन लेनिनग्राड' के शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में सोम बेगेनल ने 'यात्रिक' की ओर से उसे मंच पर प्रस्तुत किया था।

इंटरप्रेट करने का काम एलबर्ट से नहीं सँभला, तो मीरा ने स्वयं यह दायित्व अपने ऊपर ले लिया। मीरा जिस तरह दोनों ओर की बातों का अनुवाद करती रही, उससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि सोवियत संघ से आनेवाला कोई भी सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल क्यों इस काम के लिए मीरा को अपने साथ रखना चाहता है।

बातचीत रंगमंच में शब्द और नाटककार की भूमिका को लेकर हुई।

आज पश्चिम के कुछ देशों में सिनेमा की तरह रंगमंच को भी 'निर्देशक का माध्यम' कहा जाने लगा है। क्या सचमुच आनेवाले कल को रंगमंच में नाटककार की वह भूमिका नहीं रह जाएगी जो आज तक रही है? और यदि भूमिका आज से भिन्न होगी, तो किस रूप में?

आर्बुज़ोफ़ का विचार था कि यह केवल एक काल्पनिक संकट है, वास्तविक नहीं।

-वास्तविक प्रश्न नाटककार और निर्देशक के सम्बन्ध का है। जहाँ दोनों के बीच तालमेल नहीं होता, वहाँ स्वाभाविकतया एक संकट खड़ा होता है। पर सही तालमेल रहने पर दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम कर सकते हैं।

निज़ी तौर पर उन्हें अपने यहाँ के निर्देशक से कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि दोनों में अच्छा तालमेल था और उनका आपसी सम्बन्ध एक बहुत अच्छे धरातल पर निभ रहा था।

-पहले एक युवा नाटककार के रूप में अपने निर्देशकों से मेरी यह माँग रहा करती थी कि वे अक्षरश: मेरे दिये रंग-संकेतों के अनुसार चलें। परन्तु समय बीतने के साथ मेरा दृष्टिकोण अब बिल्कुल बदल गया है। अब मैं अपने निर्देशक से अपने लिखे एक-एक शब्द और एक-एक संकेत के अनुसार चलने की माँग नहीं करता। अब मैं इसे एक सहयोगी प्रयास के रूप में लेता हूँ और नाटककार के रूप में मेरी भूमिका उस सहयोग का एक अंग होने में ही है। मेरी दृष्टि में रंगमंचीय निष्पत्ति में निर्देशक तथा अभिनेताओं की भी उतनी ही भूमिका रहती है जितनी नाटककार की।

परन्तु वह रंगमंचीय निष्पत्ति मूलत: किसकी कल्पना पर आधारित होती है? निर्देशक की या नाटककार की?

आर्बुज़ोफ़ का विचार था कि इस निष्पत्ति में दोनों की कल्पना का समान योग रहता है।

-एक निर्देशक भी उतना ही सर्जनात्मक व्यक्ति होता है जितना कि एक नाटककार। रंगमंच पर जो निष्पत्ति सामने आती है, उसका पूरा श्रेय मैं अपने को नहीं दे सकता। एक निर्देशक की सर्जनात्मक प्रतिभा को उसका श्रेय मुझे देना ही चाहिए।

यह मान लेने पर भी कि समूचा रंग-अनुभव बहुतों के, विशेष रूप से नाटककार, निर्देशक और अभिनेताओं के सहयोगी प्रयास पर निर्भर करता है, क्या यह प्रश्न फिर भी बना नहीं रहता कि उस अनुभव का वास्तविक बीज क्या है? बाद में सहयोग की अपेक्षा रखते हुए भी, क्या उस बीज को प्रस्तुत करने में नाटककार की एक अकेली और अनिवार्य भूमिका नहीं है? वह रंगमंच जो आज नाटककार की इस भूमिका को अस्वीकार करना चाहता है, क्या वह अपने प्रयत्नों में नाटकीय रंगमंच के बीज को ही अस्वीकार नहीं कर रहा? नाटककार और निर्देशक के सहयोग की बात जिस स्तर पर सही है, उससे पहले के एक और स्तर को झुठलाकर क्या हम केवल एक आंशिक समाधान तक ही नहीं पहुँचते? क्योंकि एक नाटक के प्रस्तुत किये जाने में नाटककार का क्रियात्मक सहयोग समय और स्थान दोनों दृष्टियों से सीमित होता है। सम्भावना है कि एक नाटक नाटककार के समय के बाद भी खेला जाए और जिस स्थान पर नाटककार रहता है, उससे बाहर तो कई जगह वह खेला ही जाता है। व्यक्ति के रूप में नाटककार के सहयोग की बात भूलकर, उसकी वास्तविक भूमिका को पांडुलिपि की भूमिका के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए। जो अस्वीकार है, वह भी एक निश्चित पांडुलिपि का ही अस्वीकार है। क्या यह अस्वीकार आनेवाले कल को नाटक की सम्भावनाओं को अधिक विस्तृत कर देगा या उन्हें केवल बिखरा-भर देगा?

आर्बुज़ोफ़ ने समय और स्थान की सीमा का समर्थन किया।

-मैंने सोवियत यूनियन से बाहर अपने एक नाटक का एक बार ऐसा प्रदर्शन देखा था जो मेरे विचार में मेरे वास्तविक अर्थ के बहुत निकट था, हालाँकि व्यक्तिगत रूप से उस निर्देशक के साथ मेरा कुछ भी सम्पर्क नहीं था। इसके विपरीत यहाँ मास्को में ही एक निर्देशक ने, जिसका मैं नाम नहीं लूँगा, एक बार मेरा एक नाटक इस रूप में प्रस्तुत किया था कि देखने पर मुझे उसमें और सब कुछ मिला-सिवाय अपने नाटक के।

ये दोनों उदाहरण पांडुलिपि की भूमिका को ही रेखांकित करते थे। क्या इस भूमिका को अस्वीकार करके नाटक की सीमाओं का विस्तार करना सम्भव था?

आर्बुज़ोफ़ ने बहुत सतर्क ढंग से अपनी बात रखी।

-बिना नाटककार की पांडुलिपि के भी एक अच्छा नाटकीय प्रस्तुतीकरण सम्भव है। यहाँ तक कि बिना शब्दों के भी।

उन्होंने एक उदाहरण दिया जहाँ नाटक का चरम था, पूरे चार मिनट की नि:शब्दता।

परन्तु एक नाटक के अन्तर्गत लम्बी नि:शब्दता और आग्रह के साथ किया गया एक शब्दहीन प्रयोग, ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं? शब्दों के बीच की नि:शब्दता अपने में नाटकीय तनाव को वहन करने के कारण बहुत सार्थक हो सकती है-उसका अनुपात पहले आये और बाद में आनेवाले शब्दों पर निर्भर करता है। वह अपने शब्दों की यात्रा का ही एक पड़ाव है-दोनों ओर के शब्दों को जोड़ता एक अन्तराल। परन्तु एक वास्तविक रंग-अनुभव को जन्म देने में शब्दों और ध्वनियों की क्या एक अनिवार्य भूमिका नहीं है? यह भूमिका उनकी आज तक की भूमिका से अलग और भिन्न हो सकती है, परन्तु उसकी अनिवार्यता का कारण है एक माध्यम के रूप में नाटकीय रंगमंच का शब्दों और ध्वनियों को निरन्तरता पर निर्भर करना। इस अर्थ में शब्द और ध्वनियाँ इस माध्यम का आधार हैं जबकि...।

आर्बुज़ोफ़ ने विरोध किया।

-शब्दों और ध्वनियों को इस माध्यम का आधार आप किस रूप में कह सकते हैं? मैं तो समझता हूँ कि मुख्य रूप से यह एक बिम्ब-प्रधान माध्यम है-या कह सकते हैं शब्दों और बिम्बों का एक सन्तुलित माध्यम। शब्द और ध्वनिप्रधान माध्यम केवल रेडियो-नाटक है।

शब्दों और ध्वनियों को नाटकीय रंगमंच का आधार मानने का अर्थ बिम्ब का अस्वीकार नहीं है। अर्थ केवल इतना है कि इस माध्यम की आन्तरिक निरन्तरता शब्दों और ध्वनियों पर निर्भर करती है। यह उसी तरह है जैसे सिनेमा में यह आन्तरिक निरन्तरता बिम्बों पर निर्भर करती है। भ्रान्ति इसलिए पैदा होती है कि कुछ स्तरों पर एक-सी भूमिका का निर्वाह करने के कारण हम सिनेमा और रंगमंच को, एक नाटकीय अनुभव को जन्म देने की दृष्टि से,परस्पर परिवर्ती माध्यम स्वीकार करके चलते हैं। परन्तु इस दृष्टि से, आज के दो समानान्तर माध्यम होते हुए भी, ये मूलत: एक-दूसरे से भिन्न हैं और परस्पर-परिवर्ती कदापि नहीं हैं। बिम्बों के साथ-साथ शब्दों और ध्वनियों की योजना दोनों में होती है, परन्तु सिनेमा की आधारभूत निरन्तरता लगातार खंडित होते चलते बिम्बों की निरन्तरता है, जबकि रंगमंच में स्थिति सर्वथा इसके विपरीत है। यहाँ बिम्ब अपेक्षया स्थिर रहता है-यन्त्र और विद्युत की सहायता से उसे खंडित करने के सारे प्रयत्न भी इस स्थिरता को एक सीमित अर्थ में ही तोड़ पाते हैं। और सम्भावना के उस स्तर तक तो इसे ले जाया ही नहीं जा सकता जहाँ यह सिनेमा के बिम्ब-परिवर्तन या विखंडन से होड़ ले सके। सिनेमा मूलत: एक दृश्य माध्यम है जहाँ शब्दों और ध्वनियों की एक सहायक अत: गौड़ भूमिका है। वहाँ दृश्य की अपेक्षा के अनुसार शब्दों और ध्वनियों का संयोजन होता है, और उस माध्यम की प्रगति को देखते हुए लगता है कि आगे चलकर उसकी आधारभूत विशेषता और रेखांकित होगी। इसके विपरीत रंगमंच मूलत: एक श्रव्य माध्यम है।

आर्बुज़ोफ़ ने फिर विरोध किया।

-रंगमंच श्रव्य माध्यम नहीं है। वह भी मूलत: एक दृश्य माध्यम है।

रंगमंच मूलत: दृश्य माध्यम है, यह केवल एक संस्कारगत धारणा नहीं है। इस धारणा का कारण यह अतीत संसर्ग है कि नाटक 'देखा' जाता है। जब तक सिनेमा जैसे माध्यम का आविष्कार नहीं हुआ था, तब तक इस धारणा को लेकर शंका भी नहीं उठती थी। हमारे साहित्य-शास्त्र में तो नाटक को संज्ञा ही दृश्य-काव्य की दी गयी है। परन्तु आज क्योंकि नाटक के दो अलग-अलग माध्यमों की तुलना की जा सकती है, इसलिए मूल तत्त्वों का प्रश्न भी वास्तव में आज ही उठाया जा सकता है। दोनों माध्यमों का मूल अन्तर यही है कि एक में दृश्य की अपेक्षा शब्द को जन्म देती है और दूसरे में शब्द की अपेक्षा दृश्य को। दृश्य और शब्द रहते दोनों में ही हैं,परस्परापेक्षा भी दोनों में दोनों की होती है, परन्तु अलग-अलग अर्थ में, क्योंकि दोनों जगह दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं। रंगमंच में दृश्य की आपेक्षिक स्थिरता के बावजूद जो एक आन्तरिक गति रहती है, वह शब्दों और ध्वनियों की निरन्तरता से ही उपजती है,क्योंकि यहाँ जो 'देखा' जाता है, वह 'सुने जा रहे' का ही रूपान्तर होता है। आज तक ऐसे प्रश्न को उठाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की गयी, क्योंकि इस शताब्दी के आरम्भ तक रगमंच ही एकमात्र नाटकीय माध्यम था। दृश्य के साक्षात्कार का पूरा सुख-सन्तोष हमें उसी से प्राप्त होता था। परन्तु रंगमंच में दृश्य के अधूरेपन ने ही एक नए दृश्य माध्यम को इतनी शीघ्रता से विकसित हो जाने दिया, यहाँ तक कि कुछ ही दर्शकों में रंगमंच के बचे रहने पर ही किया जाने लगा। आज का रंगमंच का संकट भी हमारे फंडामेंटल्ज में न जाकर ऊपर-ऊपर से स्थिति का सुधार करने के प्रयत्नों के कारण है। यदि हम रंगमंच की शब्द-निर्भरता को आधार मानकर चलें...।

आर्बुज़ोफ़ ने दूसरी आपत्ति की।

-रंगमंचीय नाटक की अतिरिक्त शब्द-निर्भरता ही क्या आज के असन्तोष का वास्तविक कारण नहीं है? इससे मुझे तो लगता है कि वास्तविक स्थिति जो आप कह रहे हैं उससे सर्वथा विपरीत है। और जहाँ तक संकट का प्रश्न है,उसकी बात करना भी मुझे अवास्तविक लगता है क्योंकि पूरे पश्चिम में रंगमंच के दर्शकों की संख्या आज भी बहुत बड़ी है।

रंगमंच की शब्द-निर्भरता का अर्थ रंगमंच में शब्द की आधारभूत भूमिका है। इस भूमिका का निर्वाह माध्यम की सीमाओं में शब्दों के संयम से हो सकता है, उनके अतिरिक्त तथा अनपेक्षित प्रयोग से नहीं। शब्दों की बाढ़ से, या बिना नाटकीय प्रयोजन के प्रयुक्त शब्दों से, रंग-सिद्धि सम्भव नहीं, क्योंकि बिम्ब को जन्म देने के साथ-साथ उस बिम्ब से संयोजित रहने की सम्भावना भी शब्दों में होनी आवश्यक है। यह प्रश्न शब्दों के प्रयोग में एक विशेष नाटककार की सफलता और असफलता का है। एक विशेष नाटककार का अतिरिक्त शब्द-मोह, या साहित्यिक अथवा अन्य कारणों से अनपेक्षित शब्दों के प्रयोग का उसका आग्रह, उद्भूत बिम्ब से शब्दों के संयोजित न हो सकने के कारण रंग-अनुभव के मार्ग में बाधा भी बन सकता है। क्योंकि स्थापना इतना ही है कि रंगमंच में बिम्ब का उद्भव शब्दों के बीज से होता है।

यहाँ आकर आर्बुज़ोफ़ ने भी वही प्रश्न किया जो कुछ दिन पहले दिल्ली में हुई बातचीत में जर्मन निर्देशक मेहरिंग (बिल्ली चली पहनकर जूता) ने किया था।

-ऐसे में मूक अभिनय के लिए आप क्या कहेंगे? क्या वह अपने में एक सम्पूर्ण रंग-अनुभव नहीं है?

स्वतन्त्र मूक अभिनय रंगमंच का एक अलग प्रकार है जिसका अलग से विवेचन किया जा सकता है। नाटकीय रंगमंच के अन्तर्गत मूक अभिनय भी लम्बी नि:शब्दता की तरह शब्दों के बीच की कड़ी है। शब्दों से उद्भूत बिम्ब में से एक बिम्ब यह भी हो सकता है, होता है। हमारा भाषा-संस्कार इस बात का प्रमाण है कि शब्दों की यात्रा में बहुत बार बहुत कुछ अनकहे शब्दों द्वारा कहा जाता है। ये अनकहे शब्द बिम्ब के साथ-साथ यात्रा करते हुए बिना ध्वनियों के भी अपना अर्थ ध्वनित कर देते हैं। परन्तु स्वतन्त्र मूक अभिनय को नाटकीय रंगमंच के प्रश्न से अलग करके देखना होगा। जैसे रेडियो-नाटक केवल श्रव्य माध्यम है, उसी तरह इसे केवल दृश्य माध्यम के रूप में स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। इतना फिर भी कहा जा सकता है कि स्वतन्त्र मूक अभिनय को जितनी सार्थकता के साथ सिनेमाई स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जा सकता है, उतनी सार्थकता के साथ रंगमंच पर नहीं। इसके बावजूद संसार के सुप्रसिद्ध मूक अभिनेताओं के रंगमंच को अपनाये रहने का कारण रंगमंच का तीसरा आयाम भी है और अभिनय को व्यक्तिगत प्रदर्शनी तक सीमित रखने का व्यावसायिक आग्रह भी। सम्भवत: यही कारण है कि रंगमंच में बिम्ब की एकतारता से सीमित होने के कारण अधिकांशत: मूक-अभिनय छोटे-छोटे कथा-खंडों या अनुभव-खंडों में विभाजित रहता है। उसे सम्पूर्ण नाटकीय भूमिका देने के छिटपुट प्रयत्न अजायबघरी कला-प्रयोगों के रूप में थोड़ी-बहुत सफलता भले ही प्राप्त कर लें, रंग-नाटक का सामान्य स्वर वे कभी नहीं बन सकते, जब तक कि स्लाइड्ज या दूसरे ऐसे ही माध्यमों से उन्हें शब्दों की सहायता न दी जाए।

आर्बुज़ोफ़ का विचार फिर भी यही था कि रंग-अनुभव की सार्थकता दृश्य और श्रव्य के सामंजस्य में है और इस सामंजस्य को छोडक़र और कुछ महत्त्व नहीं रखता।

सामंजस्य की बात बिल्कुल सही है, इसे अस्वीकार करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। प्रश्न केवल सामंजस्य के स्वरूप का है। अलग-अलग नाटकीय माध्यमों में इस सामंजस्य का स्वरूप अलग-अलग है। एक जगह, अर्थात् सिनेमा में,इस सामंजस्य में, मुख्य भूमिका बिम्ब की है और दूसरी जगह, अर्थात् रंगमंच में, शब्द की। पिछले कुछ वर्षों में, एक बिम्बाश्रयी माध्यम होने के नाते, सिनेमा ने जिस रूप में प्रगति की है और अपने लिए नए आयामों को खोजने का प्रयत्न किया है, उसी के प्रभाव से वे लोग जो किसी-न-किसी रूप में इन दोनों को प्रतिस्पर्धात्मक माध्यम मानकर चलते हैं, रंगमंच में भी शब्द की भूमिका का तिरस्कार करने लगे हैं। इसी दृष्टि के कारण एक ओर रंगमंच में दृश्य का जादू खड़ा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है, तो दूसरी ओर सिनेमा की तरह ही खुले सेक्स-सम्बन्धों तथा नग्नता के चित्रण पर अधिकाधिक बल दिया जाने लगा है। इनमें से दूसरी प्रवृत्ति सम्भवत: यहाँ के रंगमंच में नहीं है हालाँकि अब तक मैंने यहाँ का रंगमंच अधिक नहीं देखा...।

आर्बुज़ोफ़ सन्तुष्ट नहीं हुए।

-आप यह मानकर चल रहे हैं कि रंगमंच में आज एक संकट का अनुभव किया जा रहा है, जबकि मैं इस मान्यता से ही सहमत नहीं हूँ। जैसा कि मैंने पहले कहा है, पश्चिम में रंगमंच आज भी बहुत लोकप्रिय है। इसलिए यहाँ के सन्दर्भ में प्रतिस्पर्धा का प्रश्न केवल काल्पनिक है। हमारे यहाँ सभी तरह का रंगमंच है-लिखित नाटकों पर आधारित रंगमंच भी और ऐसा रंगमंच भी जो केवल दृश्य-प्रधान है और किसी साहित्य-कृति के आधार की अपेक्षा नहीं रखता। दोनों का अपना-अपना स्थान है और दर्शक-वर्ग दोनों में एक-सी रुचि रखता है। अगर आप मुझसे पूछें, तो मैं कहूँगा कि हमारे नाट्य-लेखन में आज तक इतनी अधिक साहित्यिकता है कि जितनी जल्दी उसके अतिरेक को झाड़ा जा सके, उतना ही अच्छा है।

इसमें मतभेद नहीं है कि इस अतिरिक्त साहित्यिकता से नाट्य-लेखन को जितनी जल्दी और जिस मात्रा में मुक्त किया जा सके, करना चाहिए। नाट्य-लेखन के आधार के रूप में जिस स्वीकृति की बात की जा रही है, वह इस साहित्यिकता की नहीं, शब्द की दायित्व की है। नाट्य-लेखन में साहित्यिकता के आग्रह के लिए हम लोग स्वयं भी अपनी-अपनी आलोचना कर सकते हैं। परन्तु कल के रंगमंच के सम्बन्ध में सोचते हुए हमें इस आत्मालोचना से भ्रान्त नहीं होना चाहिए। यहाँ जिस चीज़ को रेखांकित किया जा रहा है, वह रंगमंच में साहित्यिक शब्द के प्रयोग का आग्रह नहीं, अनुकूल नाटकीय शब्द की अनिवार्यता का आग्रह है। नाटकीय रंगमंच में शब्द का तिरस्कार अन्तत: इस रंगमंच के अस्तित्व के लिए ही चुनौती बन जाएगा, क्योंकि तकनीकी इन्द्रजाल से रंगमंच की दृश्य सम्भवनाओं को अधिकाधिक विस्तृत करने के सारे प्रयत्न अन्तत: सिनेमा की तुलना में उसकी सीमाओं और विशेषताओं को ही सामने लाते हैं। जहाँ तक पश्चिम में रंगमंच की लोकप्रियता का प्रश्न है, वह या तो एक वर्ग के आज तक के साहित्यिक एवं नाट्य-संस्कार पर आधारित है, या दूसरे वर्ग की त्रि-आयामी नग्नता की भूख पर। यह विश्लेषण गम्भीर रंगमंच को लेकर है, हीन स्तर के उस रंगमंच को लेकर नहीं जो किसी भी तरह के व्यावसायिक लटके अपनाकर लोगों को अपने त्रि-आयामी आकर्षण में बाँध रखना चाहता है। सवाल एक चली आ रही परंपरा और रोज़मर्रा की एक आदत का भी है। फिर भी पिछले बीस वर्षों में स्थिति शायद बहुत बदल गयी होती, अगर प्राय: सभी देशों में रंगमंच को बड़े पैमाने पर राजकीय सहायता न दी जाती। एक देश से दूसरे देश की स्थिति में मौलिक अन्तर हो सकता है-सम्भव है समाजवादी देशों में फिलहाल परिस्थिति का दबाव उस रूप में महसूस न किया जा रहा हो जिस रूप में अन्य देशों में। इसलिए जिस संकट की बात की जा रही है, वह इस विशेष सन्दर्भ में केवल काल्पनिक लग सकता है, पर विश्व रंगमंच की कल की दिशा को लेकर सोचने पर आज के निर्देशक और नाटककार के लिए यह एक वास्तविक संकट है, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि एबसर्ड नाटक से आगे जीवन के वर्तमान सन्दर्भ का कोई बड़ा नाटक पिछले दशक में सामने नहीं आया। इसलिए स्वीकार किया जा सकता है कि आज के रंगमंच के लिए उपयुक्त शब्द प्रस्तुत करने में समकालीन नाटककार बहुत हद तक असफल रहा है। सिनेमा की दृश्यात्मकता में इन वर्षों में क्योंकि बहुत प्रगति हुई है, इसलिए रंगमंच के पिछड़ेपन का एहसास भी शायद बहुत से लोगों के लिए एक कुंठा बन गया है...।

आर्बुज़ोफ़ पल-भर सोचते रहे।

-यदि इस तर्क से चला जाए, तो आनेवाले कल के लिए किस तरह के रंगमंच की कल्पना करनी चाहिए?

रंगमंच का मूल तर्क ही रहा है उसकी प्रतीकात्मकता और सादगी। प्रतीकात्मकता को यदि कल के लिए उस रूप में स्वीकार न भी किया जाए, तो उसकी सादगी को बनाये रखना बहुत आवयक है। रंगमंच को किसी भी तरह की चकाचौंध का पर्याय बना देना उसके अन्तर्हित तर्क को ही पराजित करना है। शब्द, अभिनेता और इन दोनों का संयोजन करनेवाले निर्देशक के अतिरिक्त और कुछ ऐसा नहीं है जो नाटकीय रंगमंच की अनिवार्य शर्त हो। पर इससे शब्द का दायित्व बहुत बढ़ जाता है। शब्द के दायित्व का अर्थ है नाटककार का दायित्व जिसे वह आज पूरा कर पा रहा। मैं सिनेमाई अभिनय की तुलना में रंगमंचीय अभिनय में अभिनेता की उन्मुक्तता को भी बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, परन्तु यह उन्मुक्तता तभी सार्थक हो सकती है जब वह उस संयम के अन्तर्गत हो जो शब्दों का है...।

आर्बुज़ोफ़ ने एक और आपत्ति की।

-शब्दों के संयम में एक अभिनेता के लिए आशुता (इम्प्रोवाइज़ेशन) की कितनी सम्भावना रह जाती है? आप सहमत होंगे कि एक महान अभिनेता बिना शब्दों के भी अपनी आन्तरिक उद्भावनाओं से महान नाट्य-अनुभव की सृष्टि कर सकता है।

शब्दों के संयम का अर्थ शब्दों का कठघरा नहीं है। एक महान नाट्य-अनुभव में अभिनेता की उद्भावनाओं का बहुत बड़ा योग रहता है, परन्तु उन उद्भावनाओं की भूमि बोले या अनबोले शब्दों द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है। क्योंकि वास्तविक अभिनय शब्दों 'का' नहीं, शब्दों 'के बीच में' होता है। परन्तु यदि शब्दों के संयम को बीच से बिलकुल निकाल दिया जाए, तो केवल अभिनेता की उद्भावनाओं से वहाँ तो महान नाट्य-अनुभव सम्भव है जहाँ अभिनेता स्वयं अपने लिए शब्द-रचना की भी बहुत बड़ी क्षमता रखता है। अन्यथा एकाध फ्रीक उदाहरण को छोडक़र, प्राय: सम्भावना यही है कि अधिकांश 'हैपनिंग्ज़' की तरह सारी चीज़ आवेश से बिखराव तक की यात्रा बनकर रह जाए।

आर्बुज़ोफ़ मुस्कराए।

-मैं अब तक एक तरह से अपने से ही तर्क कर रहा था। वैसे मैं आपकी आधार-दृष्टि से असहमत नहीं हूँ कि नाटकीय रंगमंच के एक निष्पत्ति तक पहुँचने में पहली भूमिका नाटककार की है। मूल भाव और ढाँचे उसी के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह भी सच है कि बहुत बार अभिनेता तथा निर्देशक उसमें से ऐसे सूक्ष्म अर्थ ढूँढ़ निकालते हैं जिन्हें सचेत रूप से नाटककार स्वयं पहले से नहीं जानता। परन्तु नाटककार द्वारा अनजाने होकर भी ये सूक्ष्म अर्थ उस रचना में ही अन्तर्हित होते हैं। मेरा आरम्भिक विरोध इसलिए भी था कि मुझे लगा कि आप शब्द और ध्वनि को रंगमंच का एकमात्र तत्त्व मानते हैं...।

बात एकमात्र तत्त्व की नहीं, रंगमंच के आधारभूत तत्त्व या उसकी पहली आन्तरिक अपेक्षा की है। कथ्य इतना ही है कि दृश्य अपने में रंगमंच का अनिवार्य तत्त्व होते हुए भी अपने में स्वतन्त्र नहीं। वह एक परिणति है-शब्द की। और व्यापक अर्थ में शब्द का अर्थ शब्द और ध्वनि दोनों हैं।

एक बात उन्होंने फिर भी दोहरायी।

-यह सब ठीक है, पर अपने यहाँ इस दृष्टि से मुझे कोई संकट नज़र नहीं आता। हो सकता है आपके देश की परिस्थिति बहुत भिन्न हो...।

एक देश में क्या परिस्थिति है, बात इसकी ही नहीं। बात रंगमंच के रूप में रंगमंच के प्रश्नों पर सोचने की है, यद्यपि एक विशेष व्यक्ति के सोचने का कारण उसके अपने परिवेश में उन प्रश्नों की प्रासंगिकता ही हो सकती है। हमारा रंगमंच जो कुछ ही समय पहले तक पश्चिमी रंगमंच के सोच-विचार तथा आन्दोलनों से जुडक़र अपना विकास करने की दिशा में उन्मुख था, इधर आकर बहुत हद तक इस मोह से मुक्त हुआ है। हमारे आज के प्रश्न नि:सन्देह हमारे अपने सन्दर्भ के हैं, परन्तु व्यापक रूप से वे समूचे रंगमंच के आधारभूत प्रश्न भी हैं।

कुछ देर गौटोव्स्की के प्रयोगों तथा 'प्रामिस इन लेनिनग्राड' के दिल्ली-प्रदर्शन की चर्चा के बाद बातचीत समाप्त हुई।


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