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कविता

मुक्ति एक्सप्रेस
दिव्या माथुर


माँ ने लगाया न सीने से
पहचानी पिता ने बेटी नहीं
भैया पुकारती राखी रही
पर कोई कलाई न आगे बढ़ी

चाची ने तरेर के आँख कहा
क्या रस्ते में न थी कोई नदी
नगर को लौटी नगरवधू
मुक्ति एक्सप्रेस में जो थी क़ैदी

डब डब करती उन आँखों को
स्वागत नज़र न आया कहीं
थीं मानवता से कहीं अधिक
मज़बूत सलाख़ें लोहे की

अब स्वागत होगा साँझ ढले
शान से इन अबलाओं का
ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने को
चकलों में जुटेगा फिर मजमा

बेधड़क कलाई बेगाने
थामेंगे बताए बिना रिश्ता
नित गाली, मार और यौन रोग
क्या यही हश्र होगा इनका?
 

(मुक्ति एक्सप्रैस नाम की रेलगाड़ी में भारतीय सरकार ने कुछ वेश्याओं को घर भिजवाने का असफल प्रयत्न किया था)


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