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कविता

पुनर्जन्म
दिव्या माथुर


आँखें थीं हिरणी की सी
चोटी ज्यूँ पूँछ गिलहरी की
उम्र से अपनी लंबी कहीं
पहने थी वो इक छींट छपी

लंबे लंबे घूँघट थे
जहाज़नुमा साफ़ों के तले
ढकेलने पर वह बढ़ती थी
काली लंबी मूँछों में घिरे

कुछ रेलमपेल में गाते थे
रघुपति राघव राजा राम
कुछ कोसते थे हत्यारे को
लेकर अजीब सा एक नाम

तर थे घूँघट, तर थीं मूँछें
था माजरा क्या किससे पूछें
उचक उचक देखा उसने
इक अर्थी को फूलों से लदे

फिर घेरा तंग होने लगा
पूँछ फँसी और फटी
उधड़ी सीवन को पकड़ हुए
नन्ही लड़की रस्ता भटकी

घुप्प अँधेरा सन्नाटा
न चोट कोई न दर्द कहीं
सुनिश्चित सी निश्चिंत जगह
जहाँ थी कोई भीड़ नहीं

न घूँघट थे, न ही थे साफ़े
न मूँछें थीं न ही अपना कोई
अजीब बात थी बड़ी की वह
घबराई नहीं न ही रोई ही

यादें हैं अवचेतन में
जिनसे मेरा मस्तिष्क भरा
मुझे कोई तो बतलाए
इन सपनों का आधार है क्या?


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