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निबंध

दल का अगुआ कैसा हो?
बालकृष्ण भट्ट


दल या जमात का अगुआ सदा एक होता है दो चार नहीं जहाँ दो-चार अगुआ बनते हैं और वे अपनी प्रतिष्‍ठा और अपनी राय सब के ऊपर रखा चाहते हैं वह जमात छिन्‍न-भिन्‍न हो जाती है। सब लोग तितर-बितर हो उस दो कायम नहीं रखा चाहते। इसी बुनियादी पर कहा गया है -

''सर्वे यत्र विनोतार: सर्वे पंडित मानिन:।
सर्वे महत्‍व मिच्छंति तद्वृंद मवसीदति।''

जहाँ सभी अगुआ बनते हैं, सब लोग अपने को बुद्धिमान मानते हैं, एक ही आदमी की अकल पर रहनुमा नहीं हुआ चाहते, सभी अपना-अपना बड़प्‍पन चाहते हैं वह जमात मुसीबत में पड़ी जाती है। कदाचित इसी बात का खयाल कर किसी ने कहा है 'न गणस्‍याग्रमी गच्‍छेत्' किसी दल का अगुआ न हो अर्थात पहले किसी बात का नमूना आप न दिखलाए इसलिए कि उस काम के बन जाने पर नमूना बनने वाले को विशेष लाभ नहीं और जो उसके नमूना दिखलाने से काम बिगड़ गया तो सब लोग उसी की फजीहत करने लगते हैं। पर यह तो क्‍लीवता और नामर्दी है। सैकड़ों बुराइयाँ हमारे समाज में इसी से नहीं मिटाए मिटतीं किसी को इतना साहस नहीं है कि पहले खुद कर दिखाए। अच्‍छे पढ़े-लिखे लोगों में इतनी हिम्‍मत नहीं है तब अपढ़ बेचारों का क्‍या कहना? जैसा बाल्‍य विवाह के संबंध में किसी को साहस नहीं होता कि रजोदर्शन के उपरांत कन्‍या का विवाह करने में नमूना बने।कांफ्रेंस और कमेटियों में बहस और विवाद बहुत करेंगे पर करके कुछ न दिखाएँगे। सच मानिए बाल्‍य विवाह की जड़ कभी नहीं कट सकती जब तक कन्‍या में रजोदर्शन की कैद कायम है। अस्‍तु अब यहाँ पर विचार यह है कि अगुआ कैसा होना चाहिए। अगुआ में सबसे बड़ी बात यह है कि वह अपने मन से कोई काम न कर गुजरे जब तक सब की राय न ले ले और सबों का मन न टटोल ले। दूसरे उसमें शांति और गमखोरी की बड़ी जरूरत है। जिस काम के बनने पर उसका लक्ष्‍य है उस पर नजर भिड़ाये रहें दल में कुछ लोग ऐसे हैं उसके लक्ष्‍य के बड़े विरोधी हैं और वे हर तरह पर उस काम को बिगाड़ा चाहते हैं। अगुआ को ऐसी-ऐसी बात कहेंगे और खार दिलाएँगे कि वह उधर से मुँह मोड़ बैठे और क्रोध में आप सर्वथा निरस्‍त हो जाय। ऐसी दशा में यदि उसमें और गमखोरी न हुई तो बस हो चुका काहे को वह उस काम के साधने में कभी कृतकार्य होगा। फिर अगुआ अपने सिद्धांत का दृढ़ और मुनसिफ मिजाज हो। कहावत है 'सुनै सब की करै अपनै मन की' क्षुद्र से क्षुद्र का भी निरादर न करे अपने मंतव्‍य के विरुद्ध राय देने वालों को ऐसे ढंग से उतार लाए कि 'न साँप मरै न लाठी टूटै' सिवा इसके अगुआ को सर्व प्रिय ही दिल अजीज होना चाहिए जब तक सब लोग उसे प्‍यार न करेंगे और चित्‍त से उसका आदर न करेंगे तब तक उसके कहने को स्‍वीकार कैसे कर सकते हैं। किसी का आदर तभी होता है जब मन में उसको रहने की जगह हो।

अगुआ के लिए चरित्र का शुद्ध होना बड़ी भारी बात है। जो चरित्र के शुद्ध नहीं हैं जिनका चाल-चलन दगीला है वे कैसे दूसरों के चित्‍त पर असर पैदा कर सकते हैं। विशेष कर सामाजिक मामलों में जो समाज का अग्रणी हो उसे चरित्र का पवित्र होना ही चाहिए। जैसा धर्म संबंध में हमारा अगुआ गुरु होता है बहुधा गुरु वही किया जाता और माना जाता है जिसका चरित्र कहीं से किसी अंश में दूषित न हो 'वर्णानां ब्राह्मण: गुरु:' चारों वर्ण में ब्राह्मण गुरु या अगुआ है तो निश्‍चय हुआ कि ब्राह्मण निर्दूषित चरित्र हों। इस समय ब्राह्मण जो दूषित चरित्र हो गए तो लोगों को उन पर आक्षेप करने का मौका मिल गया है। और-और प्रांतों की हम नहीं कहते हमारे यू.पी. में इस समय सबों की रुचि के समान अच्‍छे राजनैतिक अगुआ को बड़ी जरूरत है। हमारे नई उमंग वाले बिना किसी अगुआ के बिलबिला रहे हैं कोई हाथ पकड़ उन्‍हें चलाने वाला नहीं मिलता। शांति प्रिय छोटे लाट श्रीमान हुयेट साहेब अपने प्रांत में शांति बहुत चाहते हैं उन्‍हें इस प्रांत के अगुआओं को धन्‍यवाद देना चाहिए यह इन अगुआओं की करतूत है कि देश में अशांति नहीं फैलने पाती और अगुआ लोग ऐसी हिकमत से काम कर रहे हैं कि पंजाब और बंगाल की तरह यहाँ अब तक अशांति ने कदम नहीं रखा। पर हमारे अगुआ दोनों ओर से च्‍युत हैं। 'दोनों दीन से गए पांडे, न रहे भात न रहे माड़े' समय पर जहाँ उचित समझते हैं गवर्नमेंट की ओर से अनीति समझ सरकार को टोंक देते हैं और उस अन्‍याय के दूर करने को चिताते और न्‍याय माँगते हैं इससे गवर्नमेंट में कदर नहीं पाते। इधर गरम दल वाले उन्‍हें सरकार का खुशामदी और खैरख्‍वाह कह बदनाम किए हुए हैं। उन्‍हें उचित रहा दोनों को खुश रखते और दोनों से सुर्खरूई पाते। नहीं तो प्रजा की ओर से सुर्खरूई तो बहुत आवश्‍यक थी। नि:संदेह अगुआ होने का काम बड़ा टेड़ा और बिना सिंहासन का राज्‍य है। राजा का अटल और सुस्थिर राज्‍य तभी होता है जब सबों को प्रसन्‍न करता हुआ प्रजा को मनोरंजन हो। वैसा ही अगुआ का रोब और दबदबा तभी रहेगा जब वह सबों के मन की करेगा नहीं तो वह एम से मीठा दूसरे से खट्टा बना रहेगा और जिस काम को करना चाहता है कृतकार्य उसमें कभी न होगा।

फरवरी, 1908 ई.


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