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निबंध

हमारी मृगतृष्‍णा
बालकृष्ण भट्ट


अनंत असीम मरुस्थली में भटक कर गया हुआ बटोही जैसा दूर से चमकती मरु-मरीचिका देख जलाशय के भ्रम से दौड़ता हुआ व्‍याकुल हो गिर पड़ता है। वैसा ही हम दु:ख, दारिद्रय, प्रपीड़ित हो आशा मरीचिका के पीछे दौड़ रहे हैं। एक दिन, दो दिन नहीं एक मास, दा मास नहीं, अपितु डेढ़ सौ वर्ष के ऊपर हो गए पर उस अनंत असीम आशा मृगतृष्‍णा का अंत न मिला। मन में यही भावना रही कि कर्तुमकर्तुमन्‍यथा कर्तुं समर्थ जगत्‍तारक ने हम लोग समस्‍त भारतीय प्रजा के उद्धारार्थ श्‍वेतद्वीप निवासियों को देव दूत बना कर भेजा है और 30 करोड़ प्रजा का धन, प्रान, जीवन उनके हस्‍तगत कर दिया है। स्‍वाधीनता प्रिय ये श्‍वेत द्वीप निवासी यहाँ की अशिक्षित जनता को दासत्‍व की श्रृंखला से मुक्‍त कर देंगे और भारत को उन्‍नति के उच्‍च शिखर पर स्‍थापित कर देंगे। महामति मेकाले अपने एक लेख में इस तरह का विकत्‍थन कर भी गए हैं कि ब्रिटेन निवासियों का यहाँ पदार्पण करना यहाँ वालों का सौभाग्‍य है। हम मेकाले के विकत्‍थन की प्रतीक्षा करते बराबर दिन गिन रहे हैं। किंतु भारत के दिष्‍टाकाश में उस सौभाग्‍य सहस्रांशु का अब तक उदय न हुआ वरन वह सौभाग्‍य सूर्य निविड़ अंधकार पूर्ण तिमिर राशि में ऐसा तिरोहित हो रहा है कि कहीं टटोलने से भी उसका पता नहीं मिलता। भारत के प्राचीन नृपति गण प्रजा को पुत्र निर्विशेष पालन करते थे और प्रजा रंजन अपना श्रेष्‍ठ धर्म मानते थे। अब के समान राजा का स्‍वार्थ प्रजा के स्‍वार्थ का प्रतिद्वंद्वी न था, प्रजा में अमंगल और अशांति फैलने से राजा नरकपाल के डर से अधीर हो जाता था। प्रजा भी इसीलिए परम राज भक्‍त होती थी। यह वही भूमि है जहाँ राजा प्रजा के संतुष्‍ट करने को अपना सर्वस्‍व सुख त्‍याग देते थे -

स्‍नेहंदयां च मैत्रींच यदिवा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्‍य मुंचतो नास्तिमे व्‍यथा।।

चिर काल से परंपरागत अभ्‍यास वश वर्तमान शासकों की इतनी स्‍वार्थ निष्‍ठा और इतने विषय भाव पर भी प्रजा की भक्ति राजा की ओर नहीं कम होती। राजकुमार प्रिंस आफ वेल्‍स ले विलायत पहुँच अपनी स्‍पीच में यहाँ के लोगों में राजभक्ति की बड़ी प्रशंसा की है। जिस पर पयोनियर को हृदय के शूल सदृश पीड़ा पैदा हुई और जो मन में आया हम लोगों को कह सुनाया। हमारी थोथी तारीफ भी जिसे न सुहाई तो उससे बढ़ कर बुरा चाहने वाला शत्रु हमारा दूसरा कौन होगा। राजकुमार के उस कथन पर पायोनियर जरा भी न सनका जहाँ पर उन्‍होंने अंगरेजों की बड़ी तारीफ के साथ यह कहा कि ''ये हिंदुस्‍तान के शासन में बड़ा परिश्रम करते हैं'' राजकुमार चार दिन के लिए यहाँ आए थे भीतरी बातें उन्‍हें क्‍या मालूम, यह उक्‍त श्रीमान क्‍या जाने कि उनके देशवासी यहाँ मनमाना गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं। एक-एक कर्मचारी जब यहाँ से लौट विलायत जाते हैं तो नवाब बन यहाँ से विदा होते हैं। विलायत में चाहे कुली कबारी भी रहे हों पर यहाँ आय हुजूर बन जाते हैं। अस्‍तु, प्रथम जब‍ ब्रिटिश राज कर्मचारी यहाँ आए तब यहाँ के लोग बिना किसी छल-छिद्र शासन की डोर इनके हाथ पकड़ाय सुख से अपने कालयापन की आशा करने लगे। निर्विघ्‍न जीवन यात्रा तथा सार्वजनीन सामाजिक उन्‍नति के लिए राजपुरुषों का मुँह जोहते रहे। उस समय यह कभी नहीं सोचा गया था कि राज कर्मचारी निज स्‍वार्थ के लिए हमारे स्‍वार्थ के प्रतिद्वंद्वी होंगे। किंतु यह आशा मरु मरीचिका सी दुराशाही हुई। फिर भी ईश्‍वर का धन्‍यवाद है कि भ्रांत और मायामुग्‍ध यहाँ के लोगों को उसने सुसमय से चैतन्‍यता का संचार करा दिया। चतुर लोगों की चातुरी का भेद खुलने लगा, नहीं तो हम उस मरु मरीचिका के पीछे कब तक धावमान रहते सो कौन जान सकता है। आघात पर आघात सहती हुई सुषुप्ति अवस्‍था में निद्रित इस जाति की अब भी जो कुछ-कुछ निद्रा भंग होने लगी इसे कल्‍याण ही समझना चाहिए।

हम पहले कह आए हैं कि निर्बल का किया कुछ नहीं होता, अब भी हम लोग अपने स्‍वरूप को पहचान लें और पूर्व पुरुषों के दिखाए पथ से मुँह न मोड़ आत्‍मगौरव और आत्‍मोत्‍कर्ष विश्‍वान में तन, मन से तत्‍पर हो जाएँ तो इस मृगतृष्णा के पार हो जा सकते हैं। नहीं तो मरुस्थलली में भ्रमण सदृश केवल कर्मचारियों पर अपनी भावी उन्‍नति के लिए निर्भर रहना नितांत भूल है। लार्ड कर्जन का धन्‍यवाद है जो हमारे नेत्रों में न जानिए कौन-सा तीव्र अंजन लगाए यहाँ से विदा हुए और हमें अच्‍छी तरह देख पड़ने लगा कि हम सर्वथा मरु मरीचिका में भ्रमण कर रहे हैं। लगातार ऐसा ही दो-तीन वाइसराय इन्‍हीं के सदृश आते रहें तो हम पूरी तरह सचेत हो जाएँ और यह मरु मरीचिका भी अपने ओर-छोर को पहुँचे।

1906 ई.


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