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निबंध

दौड़-धूप
बालकृष्ण भट्ट


दौड़-धूप का दरजा कहाँ तक बढ़ा हुआ है। इसका अंत पाना सहज नहीं है। सच पूछों तो संसार में हमारा जीवन सब का सब या कुछ हिस्‍सा इसका केवल दौड़-धूप है और अब इस अंग्रेजी राज में तो इस दौड़-धूप का अंत है। दौड़-धूप अपनी हद को पहुँची हुई है। घर में जितने प्राणी होंगे सब मिल कर यथोचित दौड़-धूप (स्‍ट्रगल) करते रहेंगे तभी चलेगा नहीं तो पहिया रूक जाएगी। वर्तमान शासन की प्रणाली ने हमारे नेत्र खोल दिए। भारत का अब वह समय दूर गया जब एक आदमी कमाता और दस प्राणियों का पूरा-पूरा भरण पोषण करता रहा। अब उन दस प्राणियों में नौ कमाते हों एक किसी कारण अपाहिज या निकम्‍मा निकल गया तो उसका कहीं ठिकाना नहीं। दूसरा कारण एक यह भी मालूम होता है कि देश में धन रह न गया और अल्‍यूमेंट्समन को लुभाने या फुसलानेवाले चित्‍ताकर्षक पदार्थ इतने अधिक हो गए हैं कि उन्‍हें देख जी लुभा उठता है। बिना उन्‍हें खरीदे जी नहीं मानता, न खरीदो तो अपने आराम और आसाइश में फर्क पड़ता है। जिस गृहस्‍थी का पालन पोषण साथ-आराम के दस रुपये महीने की आमदनी में होता था वहाँ अब हर एक जिंस के महँगे हो जाने से पच्‍चीस रुपये महीने की आमदनी पर भी नहीं चलता। इस दौड़-धूप में एक दूसरे के मुकाबले आगे बढ़ जाने की चेष्‍टा जिसे अँगरेजी में 'कंपटीशन' और हमारी बोलचाल में हिसका या उतरा-चढ़ी कहेंगे कोढ़ में खाज के समाज है।

इस उतरा-चढ़ी में बहुत से गुण हैं पर कई एक दोष भी इसमें ऐसे प्रबल हैं जिससे हमारी बड़ी हानि हो रही है। एक ही बात के लिए दो प्रतिद्वंद्वियों के होते आपस में दोनों की उतरा-चढ़ी (कंपटीशन) होने पर दोनों जी खोल कोशिश करते हैं जो कृतकार्य होता है उसके हर्ष की सीमा नहीं रहती। हमारे अपढ़ रुपये वाले जिन्‍हें न इतनी अकल न हिम्‍मत न शऊर कि बाहर निकल कदम बढ़ावें घर के भीतर ही रहा चाहें इस उतरा-चढ़ी में आय आपस में कट मरते हैं। अफीम, भाँग इत्‍यादि के ठीकों में ऐसा बहुधा देखा जाता है। इन अहमदों की उतरा-चढ़ी में प्रजा का धन खूब लुटता है। विदेशी राजा ठहरा, कर्मचारी ऐसी हिकमत काम में लाते हैं कि उतरा-चढ़ी में इन महाजनों का टेंडर हर साल बढ़ता ही जाए। ऐसा ही दो धनियों में आपस की स्‍पर्द्धा हो गई तो दोनों छोर में मिल जाते हैं। दो विद्यार्थियों में स्‍पर्द्धा का होना दोनों के लिए बहुत उपकारी है। एक दूसरे में स्‍पर्द्धा ही से यह संसार चल रहा है। संसार या संस्‍कृति के माने ही दौड़-धूप है और दौड़-धूप की अंतिम सीमा प्रतिस्‍पर्द्धा या उतरा-चढ़ी है। कुलीनता का घमंड दूसरे प्रतिस्‍पर्द्धा इन दोनों से हमारा समाज जर्जरित होता जाता है। ब्‍याह-शादियों में करतूत का बढ़ जाना जिससे बहुधा लोग कर्जदार हो बिगड़ जाते हैं यह बस इसी उतरा-चढ़ी का प्रतिफल है। उतरा-चढी 'कंपटीशन' न हो तो केवल दौड़-धूप (स्‍ट्रगल) को बुरी न कहेंगे।

इधर हिंदुस्‍तान का अध:पात आलस्‍य और सुस्‍ती ही से हुआ तब तक देश रंजापूजा था लोग हाथ पर हाथा रखे पागुर करते बैठे रहे। विलायती पंप के द्वारा जब सब रस खिंच गया तो अब चेत आई। भाँति-भाँति की दौड़-धूप में लोग अब इस समय लग रहे हैं पर वह पम्‍प ऐसा तले तक गड़ गया है कि हमारी दौड़-धूप का भी सारांश उसी पम्‍प में खिंच जाता है। हाँ इस कदर दौड़-धूप करने से पेट अलबत्‍ता पाल लेते हैं। इतना परिश्रम न करें तो कदाचित भूखों मर जाएँ। धन्‍य भारत के वे दिन जब शांति देवी के उपासक हमारे ऋषि-मुनि अपने पुण्‍याश्रम में आध्‍यात्मिक चिंतन में अपना काल बिताते हुए दौड़-धूप और फिक्र चिंता का नाम भी नहीं जानते थे। भारत की परम उन्‍नति का समय यही था।

जुलाई, 1906 ई.


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