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कविता

हे भले आदमियो !
गोरख पांडेय


डबडबा गई है तारों-भरी
शरद से पहले की यह
अँधेरी नम
रात
उतर रही है नींद
सपनों के पंख फैलाए
छोटे-मोटे हजार दुखों से
जर्जर पंख फैलाए
उतर रही है नींद
हत्यारों के भी सिरहाने
हे भले आदमियो !
कब जागोगे
और हथियारों को
बेमतलब बना दोगे ?
हे भले आदमियो !
सपने भी सुखी और
आजाद होना चाहते हैं

 


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