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कविता

रूमाल
गोरख पांडेय


नीले पीले सफेद चितकबरे लाल
रखते हैं राम लाल जी कई रूमाल
वे नहीं जानते किसने इन्हें बुना
जा कर कई दुकानों से खुद इन्हें चुना
तह-पर-तह करते खूब सँभाल-सँभाल
ऑफिस जाते जेबों में भर दो-चार
हैं नाक रगड़ते इनसे बारंबार
जब बॉस डाँटता लेते एक निकाल
सब्जी को ले कर बीवी पर बिगड़ें
या मुन्ने की माँगों पर बरस पड़ें
पलकों पर इन्हें फेरते हैं तत्काल
वे राजनीति से करते हैं परहेज
भावुक हैं, पारटियों को गाली तेज
दे देते हैं कोनों से पोंछ मलाल
गड़बड़ियों से आजिज भरते जब आह
रंगीन तहों से कोई तानाशाह
रच कर सुधार देते हैं हाल


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