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कविता

बंद खिड़कियों से टकरा कर
गोरख पांडेय


घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियाँ हैं
बंद खिड़कियों से टकरा कर अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्जत है
आधी दुनिया है
जहाँ अर्चना होती उसकी
वहाँ देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है

लेकिन बंद खिड़कियों से टकरा कर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

कानूनन समान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े-बड़ों की नजरों में तो
धन का एक यंत्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है

उसे चाहिए प्यार
चाहिए खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकरा कर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना ?

घर-घर में शमशान-घाट है
घर-घर में फाँसी-घर है, घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकरा कर
गिरती है वह

गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है

हम जो जिंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दंडित हैं

 


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