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कविता

ऐलान
गोरख पांडेय


फावड़ा उठाते हैं हम तो
मिट्टी सोना बन जाती है
हम छेनी और हथौड़े से
कुछ ऐसा जादू करते हैं
पानी बिजली हो जाता है
बिजली से हवा-रोशनी
औ' दूरी पर काबू करते हैं
हमने औजार उठाए तो
इनसान उठा
झुक गए पहाड़
हमारे कदमों के आगे
हमने आजादी की बुनियाद रखी
हम चाहें तो बंदूक भी उठा सकते हैं
बंदूक कि जो है
एक और औजार
मगर जिससे तुमने
आजादी छीनी है सबकी

हम नालिश नहीं
फैसला करते हैं

 


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