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कविता

सुनो भाई साधो !
गोरख पांडेय


माया महाठगिनि हम जानी,
पुलिस फौज के बल पर राजे बोले मधुरी बानी
यह कठपुतली कौन नचावे पंडित भेद न पावें
सात समंदर पार बसें पिय डोर महीन घुमावें
रूबल के संग रास रचावे डालर हाथ बिकानी
जन-मन को बाँधे भरमावे जीवन मरन बनावे
अजगर को रस अमृत चखावे जंगल राज चलावे
बंधन करे करम के जग को अकरम मुक्त करानी
बिड़ला घर शुभ लाभ बने मँहगू घर खून-पसीना
कहत कबीर सुनो भाई साधो जब मानुष ने चीन्हा
लिया लुआठा हाथ भगी तब कंचनभृग की रानी

(विद्रोही संत कवि से क्षमा-याचना सहित)


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