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कविता

वोट
गोरख पांडेय


पहिले-पहिल जब वोट माँगे अइले
तोहके खेतवा दिअइबो
ओमे फसली उगइबो
बजड़ा के रोटिया देई-देई नुनवा
सोचलीं कि अब त बदली कनुनवा
अब जमीनदरवा के पनही न सहबो,
अब ना अकारथ बहे पाई खूनवा

दुसरे चुनउवा में जब उपरैलें त बोले लगले ना
तोहके कुँइयाँ खोनइबो
सब पियसिया मेटैबो
ईहवा से उड़ी-उड़ी ऊँहा जब गैलें
सोंचलीं इहवा के बतिया भुलैले
हमनी के धीरे से जो मनवा परैलीं
जोर से कनुनिया-कनुनिया चिलैंले

तीसरे चुनउवा में चेहरा देखवलें त बोले लगले ना
तोहके महल उठैबो
ओमे बिजुरी लगैबों
चमकल बिजुरी त गोसैयाँ दुअरिया
हमरी झोपड़िया मे घहरे अन्हरिया
सोचलीं कि अब तक जेके चुनलीं
हमके बनावे सब काठ के पुतरिया

अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तूँ बहुत कइल ना
तोहके अब ना थकइबो
अपने हथवा उठइबो
हथवा में हमरे फसलिया भरल बा
हथवा में हमरे लहरिया भरलि बा
एही हथवा से रूस औरी चीन देश में
लूट के किलन पर बिजुरिया गिरल बा
जब हम इहुँवो के किलवा ढहैबो त एही हाथें ना
तोहके मटिया मिलैबो
ललका झंडा फहरैबो
त एही हाथें ना
पहिले-पहिल जब वोट माँगे अइले ....


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