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कविता

गजल - 1
गोरख पांडेय


कैसे अपने दिल को मनाऊँ मैं कैसे कह दूँ तुझसे कि प्यार है
तू सितम की अपनी मिसाल है तेरी जीत में मेरी हार है

तू तो बाँध रखने का आदी है मेरी साँस-साँस आजादी है
मैं जमीं से उठता वो नगमा हूँ जो हवाओं में अब शुमार है

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर, मेरे शीशे पर, मेरे ख्वाब पर
यूँ जो पर्त-पर्त है जम गया किन्हीं फाइलों का गुबार है

इस गहरे होते अँधेरे में मुझे दूर से जो बुला रही
वो हसीं सितारों के जादू से भरी झिलमिलाती कतार है

ये रगों में दौड़ के थम गया अब उमड़नेवाला है आँख से
ये लहू है जुल्म के मारों का या फिर इन्कलाब का ज्वार है

वो जगह जहाँ पे दिमाग से दिलों तक है खंजर उतर गया
वो है बस्ती यारो खुदाओं की वहाँ इंसां हरदम शिकार है

कहीं स्याहियाँ, कहीं रौशनी, कहीं दोजखें, कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए मेरे पास सिर्फ नकार है


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