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कविता

हमहूँ मोती जोहत बानी
मिथिलेश गहमरी


कांकर-पाथर-घोंघा-सितुहा भरल समुंदर टोहत बानी
हमहूँ मोती जोहत बानी

अनचितला में डोल गइल मन
कर से छूटल सुधि के दरपन
हर छन तलफत साँचल नेहिया
झुलस रहल जिनिगी के मधुबन
आग बुझावे खातिर बदरा माँगे अब सूरज से पानी
हमहूँ मोती जोहत बानी

काठ के उल्‍लू बोले लागल
भेद हिरामन खोले लागल
ध्‍यान लगवले बाटे बकुला
सोन मछलिया डोले लागल
पचरा गावत भूत नसावन, जबरी माँगत बा कुरबानी
हमहूँ मोती जोहत बानी

दूध भराइल कंचन गगरा
लागि गइल गेहुँअन के पहरा
सबकर प्रान परल साँसत में
काँप रहल बा आल्‍हर जियरा
गाँव-नगर में कर्फू लागल, अचके लुटा गइल राजधानी
हमहूँ मोती जोहत बानी

 


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हिंदी समय में मिथिलेश गहमरी की रचनाएँ