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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 3
साहित्य शास्त्र : सिद्धांत और व्यवहार पक्ष

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम कल्पना का आनन्द पीछे     आगे

पहिला प्रकरण

हमारी दृष्टि हमारी इन्द्रियों में सबसे अधिक पूर्ण और आनन्ददायिनी है। चित्त को अधिकांश प्रकार के भावों से यह पूर्ण करती है, दूर से दूर की वस्तुओं से बातचीत करती है और अपने नियत आनन्द के अनुभव से बिना थके और संतुष्ट हुए सबसे अधिक काल तक अपनी क्रिया में तत्पर रहती है। इसमें संदेह नहीं कि हमारी स्पर्शेन्द्रिय हमें पदार्थों के विस्तार, रूप तथा रंग के सिवाय और अन्यान्य भावों का, जिनका प्रवेश नेत्रपथ से होता है, बोध करा सकती है; किन्तु साथ ही पदार्थों की संख्या, दूरी और उनके पिंड के विषय में उसकी क्रिया बहुत ही संकुचित और परिमित है। हमारी दृष्टि उन सब अभावों को पूरा करने के लिए बनाई गई है। हमारा अवलोकन एक प्रकार का अधिक कोमल और प्रसृत स्पर्श है, जो अगणित वस्तु-समुदाय को अपने अंतर्गत करता है, वृहद् से वृहद् रूपों का बोध कराता है और संसार के सबसे दूर स्थित भागों को हमारी पहुँच के भीतर लाता है। 

यही इन्द्रिय है, जो कल्पना को सामग्री प्रदान करती है, इसलिए कल्पना के आनन्द से (जिसका प्रयोग इस निबंध में कई जगह किया जायगा) मेरा अभिप्राय उस आनन्द से है, जो दृश्य पदार्थों से प्राप्त होता है, चाहे वे पदार्थ ही हम लोगों के सम्मुख हों अथवा उनका रूप हम चित्र, प्रतिमा वा वर्णनों द्वारा अपने मन में लावें। निस्सन्देह हमारे चित्त में एक भी प्रतिरूप ऐसा न निकलेगा जो नेत्रों के द्वार से न गया हो; किन्तु हम लोगों को उन स्वरूपों को, जो एक बार प्राप्त हुए, धारण करने, और घटा बढ़ाकर ऐसे रूपों में लाने की शक्ति है, जो कल्पना को सबसे अधिक प्रिय होते हैं। इसी शक्ति के प्रभाव से मनुष्य घोर कारागार में रहकर भी ऐसे ऐसे दृश्यों की बहार ले सकता है, जो इस सम्पूर्ण भूमण्डल पर नहीं पाए जा सकते। 

पाठकों को स्मरण रखना होगा कि कल्पना के आनन्द से मेरा अभिप्राय केवल उस आनन्द से है, जो दृष्टि द्वारा उत्पन्न होता है। मैं इस आनन्द को दो भागों मे विभक्त करूँगा। पहिले तो मैं उस प्रथम श्रेणी के आनन्द के विषय में कहूँगा, जो सर्वथा ऐसे पदार्थों ही से उत्पन्न होता है, जो हमारे नेत्रों के सामने है; तदन्तर उस द्वितीय श्रेणी के आनन्द के विषय में, जो दृश्य पदार्थों के केवल ध्यान मात्र से उत्पन्न होता है, जब कि वे पदार्थ हम लोगों की आँख के सामने नहीं रहते, वरन् हमारी स्मृति में लाए जाते हैं, अथवा कल्पना द्वारा रमणीय रूपों में निर्मित किए जाते हैं। 

कल्पना का आनन्द अपने पूर्ण रूप में न तो ऐसा भद्दा ही है जैसा इन्द्रियों का; और न ऐसा संस्कृत ही है, जैसा विचार या विवेचन का। इस अंतिम प्रकार (विचार) के आनन्द का साधन निस्सन्देह उत्तम है, क्योंकि उसकी स्थिति मनुष्य के किसी नवीन-प्राप्त-ज्ञान व आत्मा की उन्नति पर रहती है। किन्तु यह भी स्वीकार करना पडेग़ा कि कल्पना का आनन्द भी वैसा ही बड़ा और हृदयग्राही है, एक सुन्दर दृश्य चित्त का उतना ही रंजन करता है, जितना एक तत्तव का उद्धाटन; और वाल्मीकि के एक सर्ग ने गौतम के न्याय सूत्रों की अपेक्षा अधिक पाठकों का मनोरंजन किया है। इसके अतिरिक्त कल्पना के आनन्द की इस अंश में विशेषता है कि यह अधिक प्रत्यक्ष होता है और अधिक सुगमता-पूर्वक प्राप्त किया जाता है। ऑंखों का खोलना है कि दृश्य प्रवेश कर जाता है। नाना रंग अपने-आप, देखने वाले के बहुत ही अल्प विचारों द्वारा, कल्पना पटल पर अंकित हो जाते हैं। हम लोग जब किसी वस्तु की ओर देखते हैं तो उसके अंग-संयोग से मोहित हो जाते हैं और तुरंत उसके सौंदर्य को, बिना इसकी जिज्ञासा किए कि उस सौंदर्य का कारण क्या है, स्वीकार कर लेते हैं। 

एक सहृदय मनुष्य ऐसे-ऐसे आनन्दों का अनुभव करता है, जो गँवार लोग स्वप्न में भी नहीं पा सकते। वह एक चित्र से वार्तालाप कर सकता है, प्रतिमा से अपना जी बहला सकता है, वर्णनों में एक गुप्त-सुख प्राप्त करता है और हरे-भरे खेतों और मैदानों को केवल देखने में ही उससे अधिक संतुष्ट होता है, जितना उनका स्वामी उन पर अधिकार रखने में। जितनी वस्तु वह देखता है, उनमें उसे एक प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है और प्रकृति के सबसे बेढंगे और उजाड़ भाग भी उसके आनन्द में सहायता पहुँचाते हैं। वह संसार को एक दूसरे ही रूप में देखता है, और उसमें बहुत सी सुन्दर वस्तुओं का पता लगाता है, जो जन-साधारण की दृष्टि से छिपी रहती है। 

बहुत कम ऐसे लोग निकलेंगे जो, निरुद्यम (काहिल) रहकर भी पाप शून्य हों, या जो ऐसे आनन्द के लोलुप हों, जो पाप न हो। उद्यम के पथ से जहाँ एक पग भी वे भटके, तहाँ बुराई वा मूर्खता में जा फँसते हैं, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने दोष-रहित आनन्द की सीमाओं, को, जहाँ तक संभव हो, बढाता रहे, जिसमें वह समय पड़ने पर निर्भयतापूर्वक उसका आश्रय ले सके और उससे इस प्रकार का सुख प्राप्त करे, जैसा एक बुद्धिमान पुरुष को उचित है। इस प्रकार का आनन्द कल्पना ही का है, जो न तो विचार की ऐसी ही प्रवत्ति ही की आवश्यकता रखता है, जो हमारे और कार्यों में दरकार होती है, और न चित्त को ऐसी काहिली और बेपरवाही में पड़ने देता है, जो इन्द्रियों के आनन्द में लीन होने से उत्पन्न होती हैं। यह शक्तियों को एक प्रकार का बहुत ही मधुर परिश्रम देता है, जो बिना किसी कष्ट और कठिनता के, उनको निरुद्यमता वा आलस्य से उठाकर सचेत करता है। 

यहाँ पर हमें यह भी कह देना चाहिए कि कल्पना का आनन्द, विचार वा विवेचना के आनन्द से, जिसमें मस्तिष्क को बड़ा कठिन परिश्रम पड़ता है, अधिक स्वास्थयकर है। सुन्दर दृश्य, चाहे वे प्रकृति में हों, चाहे चित्र वा काव्य में, शरीर और मन, दोनों पर बहुत उत्तम प्रभाव डालते हैं, और न कि केवल कल्पना ही को शुद्ध और कान्तिमयी करते हैं, वरन शोक और विषाद का भी नाश करते हैं और मनुष्य को नस-नस में सुख और शांति का संचार करते हैं। इसी कारण बेकन (Bacon) ने अपने 'स्वास्थ्य' शीर्षक निबंध में अपने पाठकों को सुन्दर काव्य अथवा दृश्य के अवलोकन की सम्मति देना उपयुक्त विचार। जहाँ पर उसने जटिल और पेचीले विषयों की ओर मन देने का निषेध किया है, वहीं पर ऐसी पुस्तकों के अध्यलयन की भी सम्मति दी है, जो चित्त को सुंदर और रमणीय वस्तुओं से पूर्ण करती है, जैसे इतिहास, आख्यान और प्राकृतिक वर्णन इत्यादि। 

मैंने भूमिका की भाँति कल्पना के उस आनन्द का, जो इस समय हमारे इस निबंध का आलोच्य विषय है, लक्षण निर्धारित कर दिया और बहुत विचार करके इस आनन्द को प्राप्त करने की सम्मति अपने पाठकों को दी। मैं अब दूसरे प्रकरण में उन विविध मूलों की परीक्षा करूँगा, जिनसे ये आनन्द उत्पन्न होते हैं। 
 

दूसरा प्रकरण 
प्रथम श्रेणी का आनन्द

मैं पहिले कल्पना के उस प्रथम श्रेणी के आनन्द पर विचार करूँगा-जो पदार्थों के वास्तविक अवलोकन और निरीक्षण से प्राप्त होता है। मेरी समझ में यह आनन्द किसी ऐसी वस्तु के देखने से उत्पन्न होता है, जो बड़ी असाधारण और सुन्दर होती है। इसमें संदेह नहीं और संभव है कि कोई बात ऐसी भयानक अथवा घृणित देख पड़े कि किसी पदार्थ से उत्पन्न भय वा घृणा उस आनन्द से बढ़ जाय, जो उसकी बड़ाई, असाधारणता और सौंदर्य से प्राप्त होता है, किन्तु उस घृणा में भी, जो उत्पन्न होगी, आनन्द का ऐसा मिश्रण रहेगा कि हमें जान पड़ेगा, जैसे इन्हीं तीनों उपर्युक्त गुणों में से किसी एक गुण की मात्रा अधिक हो गई है। 

बड़ाई-बड़ाई से मेरा तात्पर्य किसी एक पदार्थ के पिंड से नहीं है, किन्तु समस्त दृश्य को एक अकेला खंड मानकर उसकी बड़ाई से है। जैसे एक खुले हुए बराबर मैदान का दृश्य, विस्तृत ऊसर रेगिस्तान, विपुल पर्वत राशि, ऊँची-ऊँची चट्टानें और समुद्र का अपार जल विस्तार इत्यादि। इनको देखकर हम इनके सौंदर्य के असाधारणत्व से आकर्षित नहीं होते, वरन् उस बोंगे चमत्कार से, जो प्रकृति की इन विशाल रचनाओं में पाया जाता है। हमारी कल्पना ऐसी वस्तुओं से पूर्ण होना तथा ऐसे पदार्थों को ग्रहण करना चाहती है जो उसमें समा न सकें। ऐसे विस्तृत और असीम दृश्यों से हम लोग एक आनन्दमय आश्चर्य में डूब जाते हैं और हमारी आत्मा उनका ध्यायन करके एक प्रकार की मनोरंजक निस्तब्धता का अनुभव करती है। मनुष्य का चित्त सवभावत: ऐसी वस्तुओं से घृणा करता है, जो उस पर किसी प्रकार की रुकावट डालती हैं। जबकि दृष्टि किसी संकीर्ण स्थान में बँधी रहती और चारों ओर पहाड़ी और ऊँची नीची दीवारों से घिरी रहती है, उस समय वह अपने को कारागार में समझती है। इसके प्रतिकूल, एक विस्तीर्ण क्षितिज स्वाधीनता का स्वरूप है, जहाँ पर उसको बहुत दूर तक विचरने, निसर्ग के आधिक्य से चमत्कृत होने तथा उन अनेक प्रकार के पदार्थों में जो उसके सामने पड़ते हैं, लीन होने के लिए पूरा स्थान मिलता है। ऐसे विस्तृत और असीम दृश्य हमारी कल्पना को वैसे ही आनन्ददायक है, जैसे नित्य और अनन्त विषयक विवेचना, बुद्धि या विचार को। किन्तु यदि इस विशालता के साथ असाधारणत्व और सौंदर्य का भी संयोग हो जाता है-जैसे ज्वार भाटे के सहित समुद्र में, सुन्दर तारों से विभूषित आकाश में तथा नदी, वन और पहाड़ों में विभक्त एक विस्तीर्ण भूमि में,-तो हमारा आनन्द और भी बढ़ जाता है; क्योंकि तब वह एक से अधिक सिद्धान्तों के अनुसार उत्पन्न होता है। 

प्रत्येक वस्तु, जो नवीन वा असाधारण होती है, इस कारण कल्पना में आनन्द उपजाती है कि आत्मा को वह रमणीय आश्चर्य से पूर्ण करती है, उसके कौतूहल को सन्तुष्ट करती है, और उसको एक ऐसा भाव प्रदान करती है जो पहिले उसको प्राप्त न था। यथार्थ में हम लोग एक ही प्रकार के पदार्थों से इतने परिचित हो जाते हैं और उन्हीं वस्तुओं को बार-बार देखते-देखते इतने ऊब जाते हैं कि जो कुछ उनमें नयापन वा असाधारणत्व होता है, वह मानवजीवन के परिवर्तन करने में और अपनी अद्भुतता से चित्त को आकर्षित करने में बहुत कम योग देने लगता है। अस्तु।

असाधारण-यही (नवीनता वा असाधारणता) हमारे आनन्द को वज: करती रहती है, यही भयानक वस्तुओं को भी मनोहरता प्रदान करती है और यही प्रकृति के कार्यों की अपूर्णता को भी हमारे लिए आनन्द-दायिनी बनाती है। यही हममें भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं के लिए रुचि उत्पन्न करती है, जिससे हमारा चित्त प्रत्येक क्षण किसी नई वस्तु की ओर जाता रहता है और हमारे ध्याजन को किसी पदार्थ विशेष पर अधिक काल तक स्थिर रहकर अपनी मिट्टी नहीं खराब करती। यही उन वस्तुओं की भी, जो बड़ी और सुन्दर होती हैं, शोभा वृद्धि करती है और उन्हें हमारे चित्त को दूना आनन्द प्राप्त करने में समर्थ करती हैं। उदाहरणार्थ, जैसे बगीचे, खेत और चरागाह, यों तो सब ऋतुओं में देखने में सुखद होते हैं, किन्तु ऐसे मनोरंजक कभी नहीं होते, जैसे वसन्त ऋतु के आरम्भ में, जब कि वे संपूर्ण नये और ताजे रहते हैं और हमारे नेत्र भी उनसे बहुत परिचित और अभ्यस्त नहीं रहते। इसी कारण से कोई वस्तु स्थल को इतना सुहावना नहीं बनाती है, जितना नदी, दर्रा और झरने, जहाँ पर कि दृश्य सदैव बदलता रहता और प्रत्येक क्षण दृष्टि को ऐसी वस्तु से रज्जित करता रहता है, जो नई होती है। हम लोग पहाड़ियों और घाटियों को देखने से बहुत शीघ्र ऊब जाते हैं, जहाँ पर प्रत्येक वस्तु एक ही स्थान पर एक ही अवस्था में स्थिर रहती है; किन्तु ऐसे पदार्थों के अवलोकन से हमारा चित्त प्रफुल्लित और उत्तेेजित होता है, जो सर्वदा चलायमान रहते हैं और देखनेवाले की आँख के सामने से होकर गमन करते रहते हैं। 

सुन्दरता-किन्तु कोई वस्तु चित्त में इतनी नहीं धाँसती, जितनी सुन्दरता, जो कि तुरंत एक गुप्त सुख और आनन्द को कल्पना में फैला देती है और जो वस्तु विशाल और असाधारण होती हैं, उनको संपूर्णता प्रदान करती है। इसको देखते ही चित्त आन्तरिक प्रसन्नता से पूर्ण हो जाता है और उसकी समस्त क्रियाएँ आनन्दमय हो जाती हैं। सच पूछिए तो किसी एक पदार्थ में दूसरे की अपेक्षा विशेष कोई वास्तविक सुन्दरता वा कुरूपता नहीं होती; क्योंकि संभव है कि हम लोग ऐसे स्वभाव के बनाए जाते कि जो वस्तु हमें अब घृणित जान पड़ती है, वही तब रुचिकर प्रतीत होती! किन्तु अनुभव द्वारा हम देखते हैं कि पदार्थों में कुछ ऐसे परिवर्तन होते हैं, जिनको चित्त, बिना किसी विचार के, देखने के साथ ही सुन्दर वा कुरूप कह देता है। ऐसे ही हम देखते हैं कि प्रत्येक प्रकार का जीव सुन्दरता का अपना पृथक्-पृथक् लक्षण रखता है और उनमें से प्रत्येक अपने ही वर्ग की सुन्दरता से सबसे अधिक आकर्षित होता है। यह बात एक ही रंग और आकारवाले पक्षियों के बीच प्रत्यक्ष देखी जाती है जहाँ पर नर अपने ही वर्ग की मादा के साथ आनन्द पाता है, और दूसरे वर्ग के पक्षियों में कोई बात सुन्दरता की नहीं देखता। 

एक दूसरे प्रकार की सुंदरता है, जो हम प्रकृति तथा शिल्प के निर्माणों में देखते हैं। यह कल्पना पर उस शक्ति के साथ तो प्रभाव नहीं डालती, जैसा अपने वर्ग की सुन्दरता, किन्तु तिस पर भी यह हममें आन्तरिक प्रसन्नता तथा उन वस्तुओं और स्थानों से, जिनमें हम उसको देखते हैं, एक प्रकार का प्रेम उपजाती है। यह सुन्दरता रंगों के विभेद और चमत्कार में, खंडों की योजना और उनके प्रमाण में, पदार्थों के संविधान और गठन में अथवा इन सबके उपयुक्त मिश्रण में होती है। इन कई प्रकार के सौंदर्यों में रंग ही नेत्र को सबसे अधिक आनन्ददायक होता है। प्रकृति में हम कोई भी ऐसा चमत्कृत और मनोहर दृश्य नहीं देखते, जैसा कि सूर्य के उदय और अस्त के समय आकाशमंडल में; जब कि प्रकाश के रंग बिरंग के छींटे भिन्न-भिन्न आकार और स्थिति के बादलों पर दिखलाई पड़ते हैं। इसी से कवि लोग, जो कि सर्वदा कल्पना ही को संबोधन करते हैं; बहुधा और वस्तुओं की अपेक्षा रंग ही से अपनी उपमाएँ अधिक लेते हैं।

जिस प्रकार कल्पना प्रत्येक ऐसी वस्तु को देख, जो बड़ी असाधारण और सुन्दर होती है; प्रफुल्लित होती है और जितना ही इन सब गुणों को एक ही वस्तु में एकत्र पाती है, उतना ही और अधिक आनन्दित होती है, उसी प्रकार यदि बीच में कोई दूसरी इन्द्रिय (आँख के सिवाय) भी सहायता दे देती है तो उसको एक नया सुख प्राप्त होने लगता है। जैसे कोई लगातार नाद-जैसे पक्षियों का कलरव, पानी गिरने का शब्द इत्यादि-प्रत्येक क्षण देखनेवाले के चित्त को उत्तेजित करता है और उस स्थल की सुन्दरता को और, जो उसके सामने है, उसको और भी अधिक आकर्षित कर देता है; वैसे, यदि उस स्थान पर भीनी-भीनी सुगंध भी आने लगती है तो वह कल्पना के आनन्द को और भी अधिक बढ़ा देती और सम्मुख-स्थित दृश्य की हरियाली और उसके रंगों को और भी रोचक बना देती है; क्योंकि दोनों इन्द्रियों (चक्षु और घ्राण) के अनुभव एक दूसरे का अनुमोदन करते और एक साथ उत्पन्न होने से चित्त में पृथक्-पृथक् प्रविष्ट होने की अपेक्षा अधिक आनन्द देते हैं; उसी प्रकार जैसे किसी चित्र के बहुत से रंग, जब उनका व्यवहार उत्तमता-पूर्वक किया जाता है, एक दूसरे के विकास करते और अपनी स्थिति के कारण और भी शोभा प्राप्त करते हैं। 

 

तीसरा प्रकरण

यद्यपि हमने पिछले प्रकरण में यह विचार स्थिर किया कि किस प्रकार प्रत्येक वस्तु जो बड़ी, नवीन, वा सुन्दर होती है कल्पना को आनन्दित करती है तथापि हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हम लोगों के लिए इस आनन्द का कोई वास्तविक कारण बतलाना असंभव है क्योंकि न तो हम भावना ही के स्वभाव के विषय में कुछ जानते हैं और न मनुष्य की आत्मा ही के तत्तव के विषय में, जो कि हमें उस बात के अनुसंधान में सहायता पहुँचाता कि एक में कौन सी बात दूसरी की रुचि के अनुकूल अथवा प्रतिकूल होती है। इसलिए इस ज्ञान के बिना जो कुछ हम कर सकते हैं, वह इतना ही है कि आत्मा की उन क्रियाओं पर विचार करें; जो सबसे अधिक प्रिय होती हैं और जो बातें चित्त को प्रसन्न और अप्रसन्न करने वाली होती हैं, उनको एक-दूसरे से पृथक् करें, बिना उन मूल कारणों का अन्वेषण किए हुए, जिनसे यह प्रसन्नता उत्पन्न होती है। 

अन्तिम कारण (आदि नहीं) हम लोगों की विचार-दृष्टि को अधिक प्रत्यक्ष होते हैं, क्योंकि एक ही कार्य के अंतर्गत वे कई एक होते हैं। ये यद्यपि उतने संतोषदायक नहीं होते, पर दूसरे (मूल) से अधिक काम के होते हैं, क्योंकि यह हमें सृष्टिकर्ता की बुद्धि और दया की प्रशंसा करने का अधिक अवसर देते हैं। 

किसी बड़ी वस्तु के देखने से जो हमें आनन्द होता है, उसका एक अंतिम कारण यह भी हो सकता है कि जगदीश्वर ने मनुष्य की आत्मा को ऐसा बनाया है कि उस सच्चिदानन्द के अतिरिक्त और कोई वस्तु उसके चरम और वास्तविक आनन्द का कारण नहीं हो सकती। हमारे आनन्द का अधिकांश उसी सर्वव्यापक के अस्तित्व का ध्या न करने में है, जिसमें वह हमारी आत्मा में ऐसे ध्याकन के लिए रुचि उत्पन्न करे; इसीलिए उसने उसको स्वभावत: ऐसी वस्तुओं के चिंतन में आनन्द दिया है, जो विशाल और असीम होती है। हमारी प्रशंसा, जो कि हमारे चित्त की एक बहुत आनन्ददायिनी क्रिया है, तुरन्त ऐसी वस्तु के ध्याजन से जागृत हो जाती है, जो कल्पना में बहुत सा स्थान छेंकती है, अत: जब हम उस परमेश्वर के महत्तव का ध्या न करते हैं, जिसके लिए न तो काल और स्थान का कोई बन्धान है और न जिसको जीवधारियों की प्रौढ़ से प्रौढ़ शक्तियाँ अनुमान कर सकती हैं, तो यही प्रशंसा बढ़ते-बढ़ते प्रगाढ़ आश्चर्य और भक्ति के रूप में परिणत हो जाती है। 

परमेश्वर ने उन वस्तुओं के ध्या न में, जो नवीन वा असाधारण होती है, इस कारण आनन्द रख दिया है, जिसमें वह हमें ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्तेाजित करे और अपनी सृष्टि की अद्भुत-अद्भुत वस्तुओं को ढूँढ़ने में हमें लगाये; क्योंकि हर एक नई बात में एक ऐसा आनन्द भरा रहता है, जो उस कष्ट का, जो उसको प्राप्त करने के हेतु उठाना पड़ता है, पुरस्कार स्वरूप हो जाता है और इस प्रकार नई-नई वस्तुओं के अन्वेषण का कारण होता है। 

उसने उन वस्तुओं को, जो हमारे वर्ग में सुन्दर होती हैं, इस कारण आनन्ददायिनी बनाया है, जिससे समस्त जीवधारी अपने-अपने वर्ग की वृद्धि करने में तत्पर हों और संसार को निवासियों से पूर्ण करें, क्योंकि यह बात ध्यामन देने योग्य है कि यदि प्राकृतिक नियम के विरुद्ध कोई राक्षस उत्पन्न हो जाता है (जो दुष्ट संयोग से होता है) तो वह अपने अनुरूप जीव उत्पन्न करने और एक नए प्रकार की सृष्टि चलाने में सर्वथा असमर्थ होता है। सो यदि समस्त जीव अपने ही वर्ग के सौंदर्य से आकर्षित न हों तो उत्पत्ति का अन्त हो जाय और पृथ्वी मानवशून्य हो जाय। 

अन्त में उसने, और-और वस्तुओं में जो सुन्दरता होती है, उसको आनन्द-कारक बनाया है, अथवा यों कहिए कि इतने अधिक पदार्थों को हमारी दृष्टि में सुन्दर करके दिखलाया है, जिसमें वह अपनी सृष्टि को विशेष सुहावनी और रमणीय बनाए। उसमें हमारे चारों ओर की प्राय: समस्त वस्तुओं की कल्पना में रुचिकर भावना उत्पन्न कने की शक्ति ही है, इसलिए हम लोगों के लिए यह असम्भव है कि उसके कार्यों को बेपरवाही अथवा अश्रद्धा से देखें और बिना आन्तरिक सुख और प्रमोद के अनेक प्रकार की सुन्दर वस्तुओं का अवलोकन करें। यदि हम पदार्थों को उनके यथार्थ रूप और गति में देखें तो नेत्रों के लिए यह एक अत्यंत तुच्छ दृश्य होगा; और ये पदार्थ हमारे चित्त में जो ऐसे ऐसे भाव उत्पन्न करते हैं, जो उनके अंग में स्थित किसी वस्तु से सर्वथा भिन्न होते हैं (जैसे प्रकाश और रंग) इसका हम और क्या कारण दे सकते हैं। सिवाय इसके कि सृष्टि को आभूषणों से विभूषित करने और कल्पना के निकट उसको अधिक रोचक बनाने के लिए ही ऐसा होता है। हम अपने चारों ओर सुन्दर दृश्य और छाया देखते हैं, हम पृथ्वी और आकाश में काल्पनिक चमत्कार देखते हैं, और संपूर्ण सृष्टि पर इस अलौकिक सौन्दर्य, धारा का प्रवाह देखते हैं, किन्तु प्रकृति के कैसे भद्दे और उजाड़ दृश्य से हमारे नेत्रों का सत्कार किया जायगा, यदि उसके समस्त रंग लोप हो जायँ और आलोक और छाया के नाना भेद जाते रहें। जैसे हमारी आत्मा इस समय आनन्दमय स्वप्न में डूबी और चकित सी है और हम चारों ओर इस प्रकार घूमते हैं, जैसे किसी तिलस्मी कहानी का नायक, जो सुन्दर-सुन्दर वन, नदी और हरे भरे मैदान देखता है और साथ ही पक्षियों का कलरव और झरनों का मधु कलकल सुनता है, कि इतने; ही में सहसा जादू के उस पर से हट जाने से वह स्वप्नवत् दृश्य खंडित हो जाता है और अपने को ऊसर भूमि अथवा निर्जन रेगिस्तान में खड़ा पाता है। संभव है कि आत्मा शरीर से वियोग होने के उपरांत प्रथम इसी प्रकार की किसी अवस्था में रहती हो और द्रव्यों को ऐसे ही रूप में देखती हो, किन्तु रंग का ध्या न कल्पना में ऐसा सुहावना और प्रिय है कि यह भी संभव है कि आत्मा उससे रहित न की जाती हो, वरन् जैसे इस समय सूक्ष्मपदार्थ (Etser) के चक्षुरिन्द्रिय पर नाना आघातों से यह ध्या न उत्पन्न होता है, वैसे ही तब और किसी सामयिक कारणों द्वारा यह उत्तेीजित किया जाता हो।

मैंने यहाँ पर यह मान लिया है कि पाठक उस बड़े आविष्कार से जानकार हैं, जो इस समय विज्ञान के समस्त अन्वेषियों द्वारा स्वीकृत किया गया है, अर्थात् प्रकाश और रंग जैसे कल्पना को बोध होते हैं, केवल चित्त में एक प्रकार की भावना मात्र हैं, वे पदार्थों में स्थित कोई गुण नहीं हैं। यह बात बहुत से आधुनिक तत्तवज्ञों द्वारा सिद्ध की गई है और वास्तव में इस विद्या के अत्यंत चमत्कारक रहस्यों में से है।


चौथा प्रकरण

यदि हम प्रकृति और शिल्प के निर्माणों के मनुष्य की कल्पना को सुख देने के गुण पर विचार करें तो हम दूसरे को पहिले की अपेक्षा अधिक हीन पावेंगे, क्योंकि यद्यपि वे कभी-कभी वैसे ही सुन्दर और अद्भुत देख पड़ते हैं, किन्तु उनमें वह विस्तार और आधिक्य नहीं होता, जो देखनेवाले के चित्त को इतना अधिक रुचिकर होता है। शिल्प की रचना वैसी ही बारीक और कोमल हो सकती है, जैसी प्रकृति की; किन्तु बनावट में वह वैसी विशाल और प्रभावशाली नहीं हो सकती। प्रकृति की बेपरवाही के और बेढंगे कामों में शिल्प की बारीकी और काट छाँट की अपेक्षा कोई बात अधिक महत्तव और निपुणता की पाई जाती है। किसी एक बड़े हर्म्य और उद्यान की शोभा का विस्तार एक बहुत ही संकीर्ण स्थान के बीच होता है; ध्यापन उस पर से शीघ्रता से दौड़ जाता है और संतुष्ट होने के लिए किसी और वस्तु की आवश्यकता रखता है; किन्तु प्रकृति के विस्तीर्ण क्षेत्रों में दृष्टि बिना किसी बंधन के नीचे ऊपर भ्रमण करती है और बिना किसी नियमित संख्या और सीमा के न जाने कितने प्रकार के स्वरूपों का आनन्द लेती है। इसी कारण से हम देखते हैं कि कविजन सदैव ग्रामीण-जीवन को पसन्द करते हैं, जहाँ पर प्रकृति अपनी पूर्णता को प्राप्त रहती है और ऐसे ऐसे दृश्य प्रदान करती है, जो कल्पना को सबसे अधिक आह्लाद-कारक होते हैं। 
परन्तु यद्यपि बहुत से नैसर्गिक बेढंगे दृश्य बनावटी दृश्यों से अधिक मनोरंजक होते हैं, तथापि प्रकृति के कार्यों को उसी हिसाब से और भी अधिक आनन्ददायक पाते हैं, जितना ही वे मनुष्य की कारीगरी से समानता रखते हैं; क्योंकि तब हमारी प्रसन्नता सिद्धान्तों से उत्पन्न होती है-अर्थात् एक तो पदार्थों ही की रुचिरता से और दूसरे उनके अन्य पदार्थों के सादृश्य से। हम पदार्थों की सुन्दरता को परस्पर मिलान करने से उतने ही प्रसन्न होते हैं, जितना उनको अवलोकन करने से; और उनमें से जिसको चाहते हैं, उसको अपने चित्त में मूल अथवा छाया मानकर धारण करते हैं। इसी से हम किसी ऐसे स्थान को देख, जो भले प्रकार अलंकृत होता है और खेतों, हरे-भरे मैदानों, वन और नदियों में विभक्त होता है, प्रसन्न होते हैं। स्फटिक (संगमरमर) की खान के दरारों में पेड़, नगर और बादलों के दृश्य, जो कभी-कभी निर्मित मिलते हैं, चट्टानों और विवरों में उभड़े हुए चित्र विचित्र स्वरूप, तथा वे समस्त वस्तुएँ, जिनमें ऐसे भेद और क्रम होते हैं, जो मनुष्य की कारीगरी से मिलते जुलते हैं और जिनको हम दैवी रचना कहते हैं, हमारे चित्त को आनन्द से पूर्ण करते हैं। 

यदि प्रकृति की रचना की शोभा, जितनी ही वह शिल्प से समानता रखती है, उतनी ही अधिक बढ़ जाती है, तो यह निश्चय है कि शिल्प के निर्माण प्रकृति के निर्माणों से समानता रखने से और भी अधिक प्रतिष्ठा लाभ करते हैं, क्योंकि यहाँ पर न कि, केवल सादृश्य ही आनन्दप्रद है, वरन् मूल विशेष पूर्ण रहता है। सबसे उत्तम दृश्य जो मैंने आज तक देखा, वह एक परदे पर, जिसमें एक बड़ी नदी और एक उपवन का दृश्य एक साथ खींचा गया था। उसमें नदी के जल की ऊँची नीची तरंगें उपयुक्त और चमकीले रंगों में दिखाई गई थीं; एक ओर से एक नाव धीरे-धीरे पानी पर चल रही थी, किनारे पर उपवन के पेड़ों की हरी-हरी पत्तियाँ हवा लगने से हिल रही थीं, जिनकी छाया नदी के जल में जाकर पड़ती थी; एक ओर हरिनों का एक झुंड भी कूदता हुआ दिखाया गया था। मैं स्वीकार करता हूँ कि ऐसे दृश्य की नवीनता कल्पना की प्रसन्नता का एक कारण हो सकती है, किन्तु यथार्थ में इसका मुख्य कारण उसकी प्रकृति से समानता है; क्योंकि यहाँ पर, और चित्रों की भाँति हम केवल रंग और आकार ही नहीं दरसाया हुआ पाते हैं, वरन् उन पदार्थों की गति भी, जो चित्रित किए गए हैं।

हम पहिले कह चुके हैं कि प्रकृति में शिल्प की विचित्रता की अपेक्षा कोई बात अधिक प्रभावशालिनी और भव्य होती है। अतएव जब हम किसी अंश में इसका अनुकरण देखते हैं तो वह हमको उसकी अपेक्षा अधिक शुद्ध और ऊँचे प्रकार का आनन्द देता है, जो हम शिल्प के बारीक और सुडौल स्वरूपों से प्राप्त करते हैं। यही कारण है, जिससे इंग्लैंड के बगीचे ऐसे मनोरंजक नहीं होते, जैसे फ्रांस और इटली के; जहाँ पर हम भूमि का बहुत सा भाग उद्यान और जंगल के रमणीय मिश्रण से आच्छादित पाते हैँ, जो कि सर्वत्र एक कृत्रिम बेढंगेपन का दृश्य सामने उपस्थित करता है और उस सफाई और सजावट की अपेक्षा अधिक मनोहर होता है जो इंग्लैंड में देखी जाती है। निस्सन्देह देश के ऐसे भागों में, जहाँ बस्ती बहुत घनी और खेती की उपज बहुत अधिक है-उसका परिणाम सर्वसाधारण के लिए बुरा और व्यवसायी लोगों के कम लाभ का होगा कि इतनी भूमि खेती और चरागाह से निकालकर अलग करें; किन्तु ऐसा क्यों न किया जाय कि जगह-जगह पर पेड़ लगाकर समस्त भूमि एक प्रकार का उद्यान बना डाली जाय, जिसमें उसके स्वामी को उतना ही लाभ पहुँचेगा, जितना आनन्द एक दलदल (लाल) जिसमें बेंत उगे हों, और एक पहाड़, जो देवदार के वृक्षों से आच्छादित हो, खाली ठूंठे रहने की अपेक्षा, न कि केवल अधिक सुन्दर ही हैं, वरन् आयवर्ध्दक। अनाज के खेत बहुत सुहावने लगते हैं, पर यदि कहीं उनके बीच की मेंड़ों पर थोड़ा और ध्याेन दिया जाय और चरागाहों की स्वाभाविक बूटेकारी मनुष्य की कारीगरी द्वारा कुछ और प्रवर्ध्दित कर दी जाय और उनके चारों ओर ऐसे फूल-पौधों की टट्टियाँ कई पंक्तियों में लगा दी जायँ, जो उस भूमि में उत्पन्न हो सकते हैं, तो मनुष्य अपनी ही सम्मति का एक मनोहर और रमणीय स्थल बना सकता है। 

भ्रमणकार, जिन्होंने चीन देश के विषय में लिखा है, कहते हैं कि उस देश के निवासी यूरोपियनों की बगीचा लगाने की प्रणाली पर हँसते हैं, जिसमें कि सीधी-सीधी लकीरों का प्रयोग होता है, क्योंकि वे कहते हैं कि कोई भी मनुष्य पेड़ों को सीधी बराबर पंक्तियों में रख सकता है; वे अपना गुण उपरोक्त प्रकार के ही कामों में दिखाते हैं; और इसलिए वे उस शैली को, जिस पर वे चलते हैं, सदा छिपाए रहते हैं। जान पड़ता है कि वे अपनी भाषा में कोई ऐसा शब्द रखते हैं, जिससे वे बगीचे की उस सुंदरता को प्रगट करते हैं, जो देखते ही तत्काल कल्पना को लुभा लेती है, यद्यपि वे यह नहीं जानते कि वास्तव में वह कौन सी वस्तु है, जो इतना मनोहर प्रभाव डालती है। ऍंगरेजी माली इसके विपरीत, प्रकृति का अनुकरण करने के स्थान पर, जहाँ तक संभव होता है, उससे दूर ही रहते हैं। वहाँ के वृक्ष गावदुम, वृत्तकार और त्रिभुजाकार बनाए जाते हैं। प्रत्येक पौधो और झाड़ी पर हम कैंची का चिद्द लगा हुआ पाते हैं। मैं नहीं जानता कि मेरी यह सम्मति विलक्षण हो, पर मैं तो एक वृक्ष को अपनी डालियों और पत्तिायों के पूर्ण विकास और विस्तार में देखना, उसकी अपेक्षा, जब कि वह काट छाँटकर रेखागणित की शक्ल बना दिया जाता है, अधिक पसंद करता हूँ और समझता हूँ कि फूलों का एक साधारण उपवन मालियों के गोलम्बरों और कियारियों की सजावट से कहीं बढ़कर सुन्दर दिखलाई पड़ता है।


पाँचवाँ प्रकरण

मैंने पहिले यह दिखलाया कि प्रकृति की रचना का कल्पना पर कैसा प्रभाव पड़ता है; तदुपरान्त साधारणत: प्रकृति और शिल्प दोनों के निर्माणों पर भी विचार किया कि किस प्रकार ऐसे दृश्यों को उपस्थित करने में, जो देखनेवाले के चित्त को सबसे अधिक प्रसन्न करते हैं, वे एक दूसरे की सहायता करते हैं। अब मैं यहाँ पर उस कला-विशेष पर कुछ विचार करूँगा, जो तत्काल ही कल्पना में उस प्रथम श्रेणी के आनन्द को उत्पन्न कर देती है, जो हमारे इस लेख का विषय है। यह कला भवन निर्माण करने की है, जिसकी आलोचना मैं पूर्वकथित विचारों ही की दृष्टि से करूँगा; बिना उन नियमों और सूत्रों का उल्लेख किए हुए, जिनको इस कला के बडे-बड़े आचार्यों ने स्वरचित इस विषय के अनेक ग्रंथों में बड़ी लम्बी चौड़ी व्याख्या के साथ निर्धारित किया है।

किसी इमारत की बड़ाई या तो उसके विस्तार किंवा शरीर के संबंध में होती है, अथवा उसकी रचना-प्रणाली के संबंध में। पहिली बात में तो हम प्राचीनों को-विशेष पूर्वीय जातियों को-आधुनिक लोगों की अपेक्षा कहीं बढ़ा चढ़ा पाते हैं। 

बाबेल की लाट की बात जाने दीजिए, जिसके विषय में एक प्राचीन ग्रंथकार लिखता है कि उसके समय में उसकी नींव दिखाई देती थी, जो कि चौड़े-चौड़े पहाड़ों की भाँति प्रतीत होती थी। आप ऐसे निशान निर्माणों की ओर देखिए, जैसे वैबलिन की दीवार। वहाँ की छत पर के उद्यान और ज्यूपिटर वेल्स का बृहन्मदिर जो एक मील ऊँचा था, अर्थात् प्रत्येक मरातिम एक एक फर्लांग की ऊँचाई का था, जिन सबके ऊपर वैबलिन का मान मंदिर था। मुझे यहाँ उस भारी चट्टान का भी उल्लेख कर देना चाहिए, जो संपूर्ण काटकर मेप्पेरामेस रानी की प्रतिमा के रूप में बना डाली गई थी, और उसके आस-पास की चट्टानों का भी, जो आधीन राजाओं के रूप में खड़ी थी, तथा उस आश्चर्यमय कृत्रिम ताल का भी, जो समस्त इफरात के जल को तब तक धारण किए रहा, जब तक कि उस नदी के जल के बहाने के निमित्त नई नहरें नहीं बनाई गईं। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो शिल्प के ऐसे अद्भुत कार्यों को कहानी समझते हैं, किन्तु मुझे तो इस प्रकार के संदेह का कोई कारण नहीं देख पड़ता, सिवाय इसके कि हम लोगों के बीच इस समय ऐसे कोई उदाहरण नहीं हैं। उस काल में पृथ्वी के उन भागों में इमारत बनाने में बहुत सी सुगमताएँ भी, जो तब से आज तक कभी कहीं प्राप्त नहीं हुईं। पृथ्वी फलदार वृक्षों से भरी पूरी थी, लोग बहुधा भेड़ इत्यादि पालकर निर्वाह करते थे, जिसमें कि खेती की अपेक्षा कम मनुष्यों की आवश्यकता होती थी। मनुष्यों के एक बड़े समूह को काम में लगाए रखने के लिए तब बहुत से व्यवसाय और व्यापार नहीं थे; विचारशील पुरुषों को लीन होने के लिए तब कला और विज्ञान के नाना विभाग नहीं थे; और उन सबसे बढ़कर तो बात यह थी कि राजा सर्वथा स्वाधीन था; इसलिए जब वह लड़ाई पर जाता था तो वह अपनी सारी प्रजा को अपने साथ ले लेता था। सो...मिस तीस लाख आदमियों के साथ ले रण-क्षेत्र में गई, पर तिस पर भी अपने शत्रुओं की संख्या से उसने हार खाई। अतएव कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जब शान्ति स्थापित हुई और उसने अपना ध्या न इमारतों की ओर झुकाया तो ऐसे-ऐसे अद्भुत और विशाल भवन, जिनमें असंख्य मजदूर लगते थे, बनाकर खड़े कर दिए गए। इसके अतिरिक्त वहाँ का जलवायु ऐसा था कि घनघोर जाड़ा और कुहिरा; जिसके कारण पाश्चात्य मजदूरों को वर्ष में छ: महीने बैठे रहना पड़ता है, कोई विघ्न नहीं करते थे। मैं जलवायु की सुगमताओं में उस बात का उल्लेख किया चाहता हूँ, जो पृथ्वी के विषय में इतिहासकारों ने लिखा है कि उसमें से एक प्रकार का स्वाभाविक गारा पसीज कर निकलता था, जो कि वही है, जिसका वावेल के निर्माण में व्यवहार होता बाइबिल में वर्णित है-'वे गारे के स्थान पर लसीली मिट्टी काम में लाते थे।'' 

मिश्र देश में अब तक हम इन प्राचीनों के स्तूप पाते हैं, जो उन वर्णनों के सर्वथा अनुकूल हैं, जो उनके विषय में किए गए हैं। कोई भी यात्री, जो वहाँ गया होगा, उसने उस बड़ी भूलभुलैयाँ के अवशेषों को देखा होगा, जिसका विस्तार एक पूरे प्रांत भर का था और जिसके विविध भागों के अंतर्गत कोई 100 मंदिर थे।

चीन की दीवार, उन पूर्वीय गौरव और महत्तव के चिद्दों में से है, जो भूगोल के नक्शे में भी प्रत्यक्ष रहते हैं; यद्यपि उसका वर्णन एक गप्प समझा जाता, यदि वह दीवार अब तक न खड़ी होती।

उन बड़ी-बड़ी इमारतों के लिए, जिन्होंने संसार के बहुतेरे देशों को मंडित किया है, हम मनुष्य की भक्ति के अनुगृहीत हैं। इसी भक्ति ने मनुष्यों को मंदिर इत्यादि बनाने में संलग्न किया, न कि केवल इसलिए कि बड़े-बड़े विशाल भवन बनाकर वे देवता को उसमें निवास करने के लिए आह्वान करें वरन् इसलिए भी कि ऐसे विशाल निर्माण चित्त को उन्नत और बडे विचारों को समावेश होने के लिए प्रशस्त करें, और उसको देवता से साक्षात्कार के योग्य बनावें। क्योंकि प्रत्येक वस्तु, जो वृहत् होती है, देखनेवाले के चित्त पर भय और भक्ति का संचार कर देती है और आत्मा की स्वाभाविक बड़ाई का ध्यातन दिलाती है। 

अब मैं आगे इमारतों की रचना-प्रणाली की बड़ाई के विषय में विचार करूँगा, जो कि कल्पना पर इतना प्रभाव डालती है कि एक छोटी-सी इमारत, जिसमें यह बड़ाई प्रगट होती है, अपने से बीस गुनी बड़ी इमारत की अपेक्षा, जिसकी प्रणाली तुच्छ और साधारण होती है, अधिक सुंदर भावों से चित्त को पूर्ण करती है। जैसे कोई मनुष्य उस प्रताप सूचक भाव को देख, जो कि लेसियस की बनाई हुई सिकन्दर की मूर्ति में छलकता था-यद्यपि वह मनुष्य की डील से ऊँची न थी- जितना चकित होता, कदाचित् उतना (Athos) पहाड़ को देखकर नहीं, यदि वह समस्त काटकर जैसा कि फ़िदियस ने प्रस्ताव किया था, उस समय बिजली के स्वरूप में बना डाला जाता, जिसके एक हाथ में नदी और दूसरे हाथ में नगर होता। 

कोई मनुष्य अपने चित्त की अवस्था पर तो विचार करे, जब वह रोम के पेंथियान (Pantheon at Rome) के पहिले फाटक पर पहुँचता है तो किस प्रकार की विशाल और चमत्कारिणी वस्तुओं से उसकी कल्पना पूर्ण हो जाती है, और साथ ही यह भी देखें कि उसकी अपेक्षा कितना कम प्रभाव एक गाथिक (Gothic Cathedral) गिरजे के भीतरी दृश्य का चित्त पर होता है, चाहे वह पहिले से पाँच गुना बड़ा हो। इसका कारण एक ही रचना-प्रणाली की बड़ाई और दूसरे की उसकी तुच्छता ही है- और कुछ नहीं।

इस विषय पर मैंने एक फ्रांसीसी ग्रंथकार की आलोचना देखी है, जिससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मैं अपने पाठकों के लिए उसको ग्रंथकार ही के शब्दों में यहाँ पर उध्दृत करता हूँ। वह कहता है-''मैं यह बात देखता हूँ, जो मुझे बड़ी अद्भुत प्रतीत होती है। वह यह है कि सतह (पृष्ठ) के समान विस्तार में एक प्रणाली तो विशाल और मनोहारिणी देख पड़ती है और दूसरी क्षुद्र और हीन। इसका कारण सूक्ष्म और असाधारण है। मेरी जान तो इमारतों में यह प्रणाली की मनोहरता लाने के लिए हमें इस प्रकार चलना चाहिए कि पिंड के प्रधान अंग बहुत कम भागों में विभक्त हों और वे बड़े हों; और उनकी रचना स्पष्ट और गंभीर हो तथा नेत्रों को कोई बात तुच्छ और लघु न दिखाई दे।'' इसी प्रकार की कारीगरी कल्पना पर सबसे अधिक शक्ति के साथ प्रभाव डालती है; और यही प्रणाली सुंदर और विशद देख पड़ती है; इसके प्रतिकूल जहाँ छोटी छोटी महीन बेल बूटियों की अधिकता रहती है, जो कि दृष्टि के कोणों को इतनी अधिक परस्पर गुछी हुई किरणों में छितरा देती है कि समस्त लीपपोत मालूम होता है, वहाँ कल्पना पर एक बहुत हीन और क्षुद्र प्रभाव पड़ता है। 

इमारत के समस्त स्वरूपों में कोई ऐसे प्रभावशाली नहीं होते जैसे नतोदर (Concave) और उन्नतोदर (Converse); और हम प्राचीन और अर्वाचीन यूरोप की तथा चीन इत्यादि पूर्वीय देशों की उन समस्त इमारतों का अधिक भाग, जो ठाटबाट के हेतु निर्माण की गई हैं, गोल खम्भों और मिहराबदार छतों से बना हुआ पाते हैं। इसका कारण तो मैं यह समझता हूँ कि इन आकारों में (गोल तथा मिहराबदार) हम और दूसरे आकारों की अपेक्षा अंग का अधिक भाग देख पाते हैं। इसमें संदेह नहीं कि और भी ऐसे आकार हैं, जिनमें आँख 2/3 भाग तक सतह (पृष्ठ) को देख सकती है; किन्तु ऐसे आकारों में दृष्टि को बहुत से कोनों पर विभक्त होना पड़ता है, इससे एक ध्याकन नहीं बँधाने पाता, वरन् एक ही प्रकार के कई भाव उत्पन्न होते हैं। किसी गुम्बज (शिवालय इत्यादि के) को बाहर से देखिए तो उसका आधा भाग आपकी दृष्टि के अंतर्गत आ जायगा; फिर उसी गुम्बज को भीतर से देखिए तो एक ही बार में उसका सारा दृश्य आपके सामने उपस्थित हो जायगा; उसका सारा भीतरी झुकाव (नवांश) तुरन्त आँख पर आकर पड़ेगा; आपकी दृष्टि केन्द्र हो जायगी, जो कि परिधि की समस्त रेखाओं को खींचकर एकत्र कर लेगी। एक सम चतुर्भुज खम्भे में आँख बहुधा एक बार में सतह का चौथाई भाग ही देख पाती है; और एक चौखूँटी पटी हुई छतवाली कोठरी में दृष्टि को प्रथम इसके कि वह समस्त भीतरी सतह से जानकार हो जाय, सब बाहुओं पर ऊँचे-नीचे भटकना पड़ता है। इसी कारण से आकाश का दृश्य, जो एक मिहराब के भीतर से होकर आता है, उसकी अपेक्षा चित्त को कहीं अधिक आकर्षित करता है, जो चतुर्भज वा और दूसरे आकारों के बीच में देखा जाता है। इन्द्रधनुष का आकार उनके गौरव का उतना ही कारण होता है जितना, रंग और उसके सौंदर्य का, जैसा कि सिराक के पुत्र ने कहा है-''इन्द्रधनुष की ओर देखो और उसकी प्रशंसा करो, जिसने उसे बनाया है; यह अपने चमत्कार में बहुत ही सुन्दर है, यह आकाश को एक सुंदर वृत्त से नापता है और उस सर्वशक्तिमान के हाथों ने उसे झुकाया है।'' 

मैं इमारतों की उस बड़ाई के विषय में, जो चित्त पर प्रभाव डालती हैं,कह चुका। इसके अनन्तर मैं इस कला में जो बात नई और सुंदर होती है औरउसके देखने से जो आनन्द मिलता है, उसके विषय में भी कुछ कहता, किन्तु मैं देखता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य स्वभावत: इमारत के इन दोनों गुणों के विषय में उससे अधिक मर्मज्ञ होता है, जितना कि उस बड़ाई के विषय में; जिसका मैंने वर्णन किया; इस कारण मैं पाठकों को और कष्ट नहीं दिया चाहता। मेरे लिए अब इतनाही कहना बस है कि इन समस्त कलाओं (भवन निर्माण) में और कोई दूसरी बातनहीं है, जो कल्पना को आनंदित करती है; यह वही,-बड़ाई, असाधारणता और सौंदर्यहै।


छठवाँ प्रकरण

मैंने कल्पना के आनन्द का पहिले ही दो विभाग किया; एक तो वह, जो ऐसे पदार्थों से उत्पन्न होता है, जो यथार्थ में हमारे नेत्रों के सन्मुख है; और दूसरा वह, जो ऐसे पदार्थों से उद्भूत होता है, जिनको हमारी ऑंखों ने एक बार देखा और जो हमारे चित्त में फिर से या तो सर्वथा उसी की क्रिया से अथवा किसी और बाहरी वस्तु, जैसे प्रतिभा और वर्णन, द्वारा लाए जाते हैं। पहिले विभाग पर तो मेरा विचार हो चुका; अब मैं दूसरे पर हाथ लगाता हूँ जिसको मैंने पहिचान के लिए कल्पना को द्वितीय श्रेणी का आनन्द कहा है। जब मैं कहता हूँ कि वर्णन और प्रतिमा इत्यादि से जो भाव हमें प्राप्त होते हैं, वे वे ही हैं, जो एक बार कभी हमारी दृष्टि के सन्मुख आ चुके हैं, तो इससे यह न समझना चाहिए कि हमने उसी स्थान, उसी कार्य और उसी व्यक्ति को, जो वर्णित वा निर्मित है, देखा है। इतना ही बहुत है कि हमने ऐसे स्थान, ऐसे व्यक्ति और ऐसे कर्मों को देखा है, जो उनसे मिलते-जुलते वा समानता रखते हैं, जो प्रदर्शित हैं। क्योंकि कल्पना में यह शक्ति है कि जो-जो भावनाएँ विशेष उसको एक बार प्राप्त हुईं, उनको अपनी रुचि के अनुकूल घटावे, बढ़ावे वा परावर्तित करे।

पदार्थों के रूप दरसाने में प्रतिमाकारी ही सबसे अधिक स्वाभाविक होती है और पदार्थों में सबसे अधिक समानता दिखलाती है। एक साधारण बात से इसकी परीक्षा कीजिए। एक जन्म से अंधो मनुष्य के हाथ में एक पत्थर की प्रतिमा दे दीजिए; वह अपनी उँगलियों को फेरकर कांटी के चिह्न और चढ़ाव उतार का पता लगा लेगा और बड़ी सुगमता से विचार कर लेगा कि किस प्रकार एक मनुष्य अथवा पशु का स्वरूप प्रदर्शित किया गया है। पर यदि वह अपना हाथ एक चित्र पर फेरे, जहाँ कि समस्त चिकना और बराबर रहता है तो वह कभी नहीं विचार कर सकता कि किस प्रकार मनुष्य के अंग के उभाड़ और उसकी गहराई एक साधारण पटल पर, जो कहीं ऊँचा नीचा नहीं है, दरसाई गई है। वर्णन चित्र से भी अधिक उन वस्तुओं से दूर रहता है, जिनको वह प्रदर्शित करता है। क्योंकि एक चित्र अपने मूल से बहुत अधिक मेल खाता है; पर अक्षर और मात्राओं में यह गुण नहीं होता, रंग समस्त भाषा बोलते हैं, किन्तु शब्द किसी जाति विशेष ही द्वारा समझे जाते हैं। इसी कारण से हम कहते हैं कि यद्यपि मनुष्यों की आवश्यकता ने उन्हें पहिले वाणी की खोज में तत्पर किया, पर लिखने का आविष्कार चित्रकारी के पीछे हुआ है। कहा जाता है कि स्पेनवाले पहिले पहिल जब अमेरिका पहुँचे, उस समय मेक्सिको (Mexico) के राजा के पास जो संदेश भेजा जाता था, वह चित्र द्वारा; उसके देश के समाचार पेंसिल के आकार बनाकर भेजे जाते थे, जो कि लिखने की अपेक्षा अधिक स्वाभाविक रीति थी-यद्यपि तदपेक्षा बहुत ही अपूर्ण; क्योंकि वचन के छोटे-छोटे जोड़ों का आकार बनाना बहुत ही कठिन है और सम्बन्ध की विभक्तियाँ और संयोजक के चिह्नों का चित्र बनाना कोई साधारण काम नहीं है। इसी प्रकार दृश्य पदार्थों को ऐसी ध्वीनिमें, जो सर्वथा भावशून्य हैं (अर्थात् जो केवल ध्वकनिमात्र है वर्णात्मक शब्द नहीं) प्रदर्शित करने का यत्न-जैसे बाँसुरी के सुर में किसी पदार्थ का वर्णन करना इससे भी विलक्षण होगा। यद्यपि यह सत्य है कि ध्वकनिके कृत्रिम चढ़ाव उतार में इस प्रकार के भाव अस्पष्ट और अपूर्ण रूप में चित्र में उत्पन्न हो जाते हैं। और हम देखते हैं कि गान विद्या के ज्ञाता लोग सुननेवालों को संग्राम के उद्वेग में कर देते हैं, उनके चित्र को शोक और उदासीनता से पूर्ण कर मृत्यु का रूप सन्मुख उपस्थित कर देते हैं, तथा उनको नन्दन कानन का मनोरंजक स्वप्न दिखाने लगते हैं। इन सब उदाहरणों में कल्पना का यह द्वितीय श्रेणी का आनन्द चित्त की उस क्रिया से उद्भुत होता है, जो कि मूल पदार्थों से उत्पन्न भावों से मिलान करती है और जो कि हम उन पदार्थों की प्रतिमा, उनके चित्र तथा वर्णनों से प्राप्त करते हैं। हम लोगों के लिए इसका वास्तविक कारण बतलाना कि क्यों चित्त की इस क्रिया के साथ इतना आनन्द लगा रहता है, असम्भव है; जैसा कि मैं पहिले कह चुका हूँ, किन्तु हम अकेले सिद्धान्त के अनुसार अनेक प्रकार के आनन्द उत्पन्न होते देखते हैं, क्योंकि चित्त की यही क्रिया हम लोगों में न कि केवल चित्रकारी, प्रतिमाकरी तथा वर्णनों ही की ओर अभिरुचि दिलाती है, वरन् भाड़ों की कला और उनकी क्रियाओं में हमें आनन्द अनुभव कराती है। इसी प्रकार से विविध भाँति की विनोद और दिल्लगी की उक्तियाँ हमारे चित्त का रंजन करती हैं, जिनमें कि जैसा कि मैं पहिले कह चुका हूँ, भावों का परस्पर मिलान होता है। और हमारा यह कहना भी अत्युक्ति न होगी कि इसी के प्रभाव से बहुत-सी बेसिर पैर की मिथ्या बातें भी हमारे चित्त को प्रसन्न करती हैं। उदाहणारार्थ-जैसे अक्षरों का उलटफेर, स्वरों का मेल, जैसा अन्त्यानुप्रास और प्रतिध्वानिमें, अथवा शब्दों का परस्पर सादृश्य, जैसा यमक और श्लेष में; तथा समस्त पर किंवा कविता का दूसरे पदार्थों के अनुरूप होना-जैसा अन्योक्ति और व्यंग्य में। चित्त की इस क्रिया में इतना आनन्द उत्पन्न करने का अंतिम कारण कदाचित् हम लोगों का सत्य की खोज के लिए उत्तेतजित करना है; क्योंकि एक वस्तु की दूसरी वस्तु से पहिचान कराना तथा अपने विचारों से कौन-सा विचार यथार्थ है, इसका पता लगाना, उनको आपस में मिलान करने और प्रकृति के नाना पदार्थों के सादृश्य और विभेद पर ध्याआन देने ही पर निर्भरहै।

किन्तु मैं यहाँ पर कल्पना के उसी आनन्द के विषय में विचार करूँगा, जो शब्दों द्वारा उत्पन्न किए हुए भावों से प्राप्त होता है। क्योंकि बहुत सी बातें, जो वर्णनों के विषय में पाई जाती हैं वे ही प्राय: चित्रकारी और प्रतिमाकरी में भी समभाव से घटित होती हैं। 

शब्दों में, यदि उनका व्यवहार उत्तमता से किया जाय, इतनी बड़ी शक्ति होती है कि कभी कभी पदार्थों का वर्णन स्वयं उन पदार्थों की अपेक्षा अधिक सुन्दर भावों से चित्त को पूर्ण करता है। वर्णनों (शाब्दिक) द्वारा पाठकगण दृश्यों को कल्पना पर जितना अधिक चटकीले रंगों में ख्ािंचा हुआ हुआ तथा उनका जितना सजीव चित्र निर्मित किया हुआ पाते हैं, उतना उनके यथार्थ अवलोकन द्वारा नहीं। इस बात में कभी कभी कवि प्रकृति से भी बढ़ जाता है। यद्यपि, इसमें संदेह नहीं कि वह अपना दृश्य उसी (प्रकृति) से लेता है, तथापि वह उसको अधिक चटकीला करता है और उसकी शोभा को बढ़ाता है, तथा समस्त खंड को ऐसा सजीव बना देता है कि वे स्वरूप जो पदार्थों से प्राप्त होते हैं, उनकी अपेक्षा धुंधले और अस्पष्ट जान पड़ने लगते हैं, जो उनके वर्णनों में दरसाए जाते हैं। कारण इसका कदाचित् यह है कि पदार्थों को देखने से उनका उतना ही भाग कल्पना पर चित्रित होता है, जितना हमारे नेत्रों के सामने रहता है; परन्तु उनके वर्णन में कवि अपनी इच्छानुसार उनका जितना विस्तृत दृश्य चाहता है, दिखलाता है और उनके ऐसे-ऐसे भागों का हमारे लिए पता लगाता है, जिन पर, जब पहिले हमने उन पदार्थों को देखा था, या तो हमने ध्यातन ही नहीं दिया, या जो हमारी दृष्टि के बाहर थे। जब हम किसी वस्तु की ओर देखते हैं, तब उसके विषय में जो भाव उत्पन्न होता है, वह दो या तीन छोटे छोटे सामान्य भावों से मिलकर ही बना रहता है; किन्तु जब कवि उसी को दरसाता है, तब या तो वह हमें उसके विषय में एक अधिक प्रवर्ध्दित भाव प्रदान करता है, अथवा हमारे चित्त में केवल ऐसे ही भावों को उत्पन्न करता है, जो कल्पना पर सबसे अधिक प्रभाव डालते हैं। 

इस बात का विचार करना भी समय का सदुपयोग ही होगा कि क्यों ऐसा होता है कि बहुतेरे पाठक, जो एक ही भाषा के जाननेवाले होते हैं और उन शब्दों का अर्थ समझते हैं, जिनको वे पढ़ते हैं, एक ही वर्णन के विषय में भिन्न-भिन्न रुचि रखते हैं। हम देखते हैं कि एक ही पद को कोई तो पढ़कर आकर्षित हो जाता है और कोई उसी को बेपरवाही के साथ झट से पढ़ जाता है, एक तो उसी में एक उत्तम स्वाभाविक चित्र खींचा हुआ पाता है और दूसरा उसमें किसी प्रकार की अनुरूपता और यथार्थता नहीं देखता। इस भिन्न भिन्न रुचि का कारण या तो एक की अपेक्षा दूसरे की कल्पना की पूर्णता है, अथवा एक ही शब्द से प्रत्येक पाठक का भिन्न-भिन्न भाव ग्रहण करना। क्योंकि किसी वर्णन की उत्तमता के समझने तथा उसके विषय में विचार करने के लिए ऐसा मनुष्य होना चाहिए, जो जन्म से उत्तम कल्पनावाला हो और जिसने भाषा के शब्दों की शक्ति और उनके प्रभाव को भली भाँति तौला हो; जिसमें कि वह यह समझ सके कि कौन-कौन से शब्द किन-किन भावों के प्रगट करने के लिए उपयुक्त हैं और दूसरे शब्दों के संयोग से उन शब्दों में कितनी अधिक सुन्दरता और शक्ति आ जायगी। उन आकारों के धारण करने के लिए, जो बाहरी पदार्थों से प्राप्त होते हैं, कल्पना को तीव्र होना चाहिए; और यह जानने के लिए कि कैसे कैसे वाक्य उन्हें उत्तमता-पूर्वक पटावृत्त और विभूषित करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त हैं, विचार को स्वच्छ होना चाहिए। वह मनुष्य, जिसमें इन सब बातों का अभाव है, चाहे वह किसी वर्णन का आभास मात्र समझ ले, किन्तु उसकी सुन्दरता को वह स्पष्ट रूप से नहीं समझ सकता, उसी प्रकार, जैसे एक क्षीण दृष्टिवाला मनुष्य अपने सामने के किसी स्थल का धुधंला और अस्पष्ट दृश्य तो देख सकता है, किन्तु उसके समस्त भागों का आनन्द नहीं ले सकता और न उसके नाना रंगों को अपने पूर्ण विकास और चमत्कार में देख सकता है।


सातवाँ प्रकरण

प्राय: देखने में आता है कि उन बहुत सी वस्तुओं में से, जिनको हमने पहिले कभी देखा है, यदि एक भी वस्तु ध्यावन में आ जाती है तो समस्त दृश्य का दृश्य सामने उपस्थित हो जाता है और ऐसे ऐसे भाव जागृत हो जाते हैं जो पहिले कल्पना में निद्रित थे। जैसे कोई सुगंध अथवा रंग विशेष चट हमारे चित्त में बगीचों और खेतों का ध्याथन दिला देता है जहाँ पर हमने पहिले उसको देखा था; और जो जो स्वरूप उसके आसपास थे उनको भी वह लाकर सामने खड़ा कर देता है। हमारी कल्पना केवल एक संकेत मात्र पा जाती है और चट हमको नगरों और उपवनों, मैदानों और जंगलों में पहुँचा देती है। यह भी देखा जाता है कि जब हमारा चित्त उन दृश्यों को जिन्हें एक बार हम देख चुके हैं ध्यादन करता है तो जो जो बातें उनमें हमें सुन्दर देख पड़ी थीं वे ध्यादन करने पर और भी अधिक सुन्दर प्रतीत होती हैं, स्मृति मूल पदार्थों की रमणीयता को और बढ़ा देती है। एक कार्टिशियन(Cartesion) तत्तववेत्ताा इन दोनों बातों का कारण निम्नलिखित शब्दों में बतलाएगा। 

वे विविध भाव जिनको हम बगीचों वा नैसर्गिक दृश्यों से प्राप्त करते हैं; चित्त में एक साथ प्रविष्ट होते हैं और उनकी जुदा जुदा लकीरें मस्तिष्क में लग जाती हैं जोकि एक दूसरे से बहुत पास पास रहती हैं, अत: जब कभी कल्पना में इनमें से एक भाव भी उत्पन्न हो जाता है और अपनी निज की लकीर में एक उत्तोजक रस का प्रवाह प्रेषित कर देता है, तो यह उत्तोजक रस अपनी गति के आवेग में न कि केवल उसी लकीर विशेष में से होकर बहता है जिसमें कि वह परिचलित किया गया वरन् उनमें से भी बहुतों में से जो उसके आसपास रहती हैं। इसी युक्ति से वह और भी कुछ भावों को जागृत कर देता है जो कि पुन: एक नए सिरे से उत्तोजक रस को प्रेषित करते हैं और उसी प्रकार यह रस उनकी निकटवर्ती लकीरों को भी खोल देता है, यहाँ तक कि अन्त में समस्त भावों का समूह उपट आता है और वह सारा बगीचा किंवा नैसर्गिक दृश्य कल्पना में उद्भूत हो जाता है। चूँकि उस आनन्द ने जो हमने इन स्थानों से प्राप्त किया था उस घृणा को दबा दिया था जोकि हमें उनसे उत्पन्न हुई थी इस कारण से आनन्दकारक भावों की रेखाएँ बहुत चौड़ी अंकित हुईं और इसके विपरीत घृणित भावों की रेखाएँ इतनी संकीर्ण कि वे बहुत शीघ्र मुँद गईं और इस उत्तोजक रस को ग्रहण करने में असमर्थ हो गईं।

इस बात की जिज्ञासा करना तो व्यर्थ है कि यह पदार्थों की कल्पना करने की शक्ति वस्तुत: किसी मनुष्य की दूसरे की अपेक्षा अधिक आत्मिक-सम्पन्नता से उत्पन्न होती है अथवा मस्तिष्क की बारीकी से। परन्तु, यह तो निश्चय है कि एक उत्कृष्ट ग्रन्थकार में यह शक्ति अपने पूर्ण रस और विकास में जन्म से होनी चाहिए जिसमें कि वह बाहरी पदार्थों से सुन्दर और सजीव भाव प्राप्त कर सके, उनको देर तक धारण कर सके और समय पर उनको ऐसे स्वरूपों में सजा सके जो पढ़नेवाले के चित्त को सबसे अधिक चुटीले होते हैं। कवि को अपनी कल्पना को सुधारने में उतना ही परिश्रम करना चाहिए जितना दार्शनिक को अपनी विचारशक्ति की अभिवृद्धि करने में। उसको प्राकृतिक कार्यों की ओर रुचि प्राप्त करनी चाहिए और तरह-तरह के ग्रामीण दृश्यों से भली-भाँति परिचित हो जाना चाहिए।

जब वह इस प्रकार ग्रामीण स्वरूपों से परिचित हो गया और अपनी कवित्च शक्ति को और भी विस्तृत करना चाहता है तब उसको राज दरबार के ठाट-बाट और सजावट से जानकार होना चाहिए। शिल्प की रचनाओं में भी जो बात सुन्दर और विशाल होती है उसका भी ज्ञान अच्छी तरह सम्पादन कर लेना चाहिए चाहे वह चित्र में हो अथवा प्रतिमा में, चाहे वर्तमान समय की बड़ी-बड़ी इमारतों में हो अथवा उनके अवशेषों में जो प्राचीन समय में विद्यमान थीं। ये सब बातें मनुष्य के हृदय को खोलने में तथा कल्पना को विस्तीर्ण करने में सहायता पहुँचाती हैं; और इनका प्रभाव सब प्रकार की लिखावट पर पड़ता है, यदि ग्रंथकार इस बात को जानता है कि उनका व्यवहार किस ढंग पर करना चाहिए। कदाचित् यह कहने की आवश्यकता न होगी कि बड़े-बड़े काव्यों में भी यही बड़ाई, असाधारणता वा सुन्दरता है जो चित्त को चमत्कृत करती है।


आठवाँ प्रकरण

कल्पना की यह द्वितीय श्रेणी का आनन्द उसकी अपेक्षा अधिक विस्तृत और व्यापक है जो नेत्रों के अवलोकन से प्राप्त होता है; क्योंकि एक उपयुक्त वर्णन में न कि केवल वही वस्तु जो कड़ी, असाधारण वा सुन्दर होती है वरन् वह भी जो हमारी रुचि के प्रतिकूल होती है, हमारे चित्त को प्रसन्न करती है। यहाँ पर हमारा आनन्द एक दूसरे ही सिद्धान्त पर रहता है; अर्थात् चित्त की उसी क्रिया से यह उत्पन्न होता है जो उन भावों को जो शब्दों से उत्पन्न होते हैं उन भावों से मिलान करती है जो वर्णित पदार्थों से प्राप्त होते हैं; और क्यों चित्त की यह क्रिया इतना आनन्द देती है इसका विचार हम पहिले कर चुके हैं। अतएव इसी कारण से यदि उपयुक्त शब्दों में उसका स्वरूप दरसाया जाय तो ग्राम के गोबड़ौर का (यद्यपि उसको देखने से एक प्रकार की अरुचि होगी) वर्णन भी कल्पना को आनन्द-दायक होता है। यद्यपि वास्तव में तो इसे कल्पना का आनन्द न कहके विचार वा विवेचना का आनन्द कहना चाहिए क्योंकि हम उस स्वरूप से जो वर्णन में दरसाया जाता है उतना प्रसन्न नहीं होते हैं जितना उस वर्णन के उस स्वरूप को प्रगट करने की योग्यता से। 

परंतु यदि ऐसी वस्तु का वर्णन जो छोटी, साधारण वा कुरूप होती है कल्पना को रुचिकर होता है तो जो वस्तु बड़ी असाधारण वा सुन्दर होती है उसका वर्णन तो और भी अधिक हृदयग्राही होगा; क्योंकि तब हम दरसाए हुए पदार्थ को केवल मूल से मिलान करने ही से नहीं प्रसन्न होंगे वरन् स्वयं मूल के स्वरूप से भी आनन्दित होंगे। बहुतेरे पाठक मैं समझता हूँ कि मिल्टन के नर्क के वर्णन को पढ़कर उतना मोहित न होते होंगे जितना स्वर्ग के। यद्यपि अपने-अपने ढंग के दोनों ही बहुत उपयुक्त हैं, किन्तु एक में भयानक अग्नि और दुर्गन्धि की कल्पना उतनी सुहावनी नहीं है जितनी दूसरे में फूलों के उपवन, और हरे-भरे कक्ष। 

एक बात और है जिससे वर्णन सबसे अधिक रोचक हो जाता है; वह यह कि जब वह ऐसी-ऐसी बातों को दरसाता है जो पढ़नेवाले के चित्त में कोई उत्तेिजना उत्पन्न करती हैं और उसके मनोवेगों पर शक्ति के साथ प्रभाव डालती हैं। क्योंकि इससे हम तुरंत चंचल हो जाते हैं जिससे आनन्द और भी व्याप्त हो जाता है और कई प्रकार से हमें लीन करता है। जैसे चित्रकारी में, किसी के चेहरे के चित्र की ओर जो यथातथ्य उतरा हो देखने से हम प्रसन्न होते हैं; किन्तु यदि वह किसी ऐसे चेहरे का चित्र है जो सुन्दर है तो हमारी प्रसन्नता और भी बढ़ जाती है। और यदि कहीं उस सौन्दर्य में उदासीनता और शोक का भाव भी मिश्रित कर दिया जाता है तब तो हमारे आनन्द का कहीं ठिकाना नहीं रहता। चित्त के दो प्रबल वेग जिनको गंभीर प्रकार की कविता उभाड़ने का यत्न करती है वे भय और दया हैं। यहाँ पर लोगों को आश्चर्य होगा कि यह कैसे होता है कि वे मनोवेग जो और दूसरे अवसरों पर तो दु:खदायक होते हैं किन्तु जब उपर्युक्त वर्णनों द्वारा वे उत्तेरजित किए जाते हैं तो बहुत ही मनोरंजक होते हैं। यह तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे-ऐसे प्रकरणों को पढ़कर हम आनन्दित हों जो आशा, आधाद, प्रशंसा, प्रेम तथा इसी प्रकार के और वेग उत्पन्न करते हैं; क्योंकि वे मनोवेग चाहे जिस अवसर पर उत्पन्न होंगे, हमें बिना आन्तरिक प्रसन्नता प्रदान किए न रहेंगे। परंतु यह कैसे होता है, कि किसी वर्णन द्वारा भयभीत अथवा हताश किए जाने से हम प्रसन्न होते हैं, जबकि उसी शोक और भय के दूसरे अवसरों पर उत्पन्न होने से हम इतने विह्नल हो जाते हैं?

यदि हम इस आनन्द की भली प्रकार परीक्षा करें तो हम देखेंगे कि यह वास्तव में किसी ऐसी वस्तु के वर्णन से नहीं उत्पन्न होता है जो भयानक होती है वरन् हमारे उसे पढ़ते समय अपने विषय में विचार करने से। जब हम ऐसी भयानक वस्तुओं को देखते हैं तो यह विचार करके कुछ कम प्रसन्न नहीं होते कि हमें उनका कोई भय नहीं है। हम उन्हें भयानक तो समझते हैं किन्तु उसके साथ ही हानि पहुँचाने में असमर्थ; इसलिए जितना ही अधिक वे अपना भयानक रूप दिखलाती हैं उतना ही हम उनसे अपने को रक्षित समझकर और भी प्रसन्न होते हैं। सारांश यह है कि हम किसी वर्णन की भयानक बातों को उसी कौतूहल के साथ देखते हैं जैसे एक मरे हुए राक्षस वा दैत्य को। 

यही कारण है कि हम व्यतीत आपदाओं को विचार करके भी प्रसन्न होते हैं या किसी भारी चट्टान को दूर से देखकर हर्षित होते हैं जिसको यदि अपने सिर के ऊपर लटकती हुई हम देखें तो एक दूसरे ही प्रकार के भय से हमारा चित्त पूर्ण हो जाय। 

इसी प्रकार जब हम पीड़ा, क्लेश, मृत्यु तथा इसी प्रकार की और दारुण घटनाओं के विषय में पढ़ते हैं तो हमारा आनन्द उस शोक से नहीं उत्पन्न होता है जो ऐसे दु:खमय वर्णनों से हमें प्राप्त होता है वरन् हमारे भीतर ही भीतर अपनी अवस्था को उस क्लेशित व्यक्ति की अवस्था से मिलान करने से। ऐसे वर्णन हमें अपनी अवस्था का यथार्थ मूल्य समझना तथा अपने सौभाग्य की सराहना करना, जिससे हम इस प्रकार की आपदाओं से बचे हैं, सिखलाते हैं। यह एक ऐसे प्रकार का आनन्द है जो हम उस समय नहीं प्राप्त कर सकते जब हम यथार्थ में किसी मनुष्य को उसी पीड़ा से क्लेशित देखते हैं जो वर्णन में दरसाई गई है, क्योंकि तब वह वस्तु हमारी इन्द्रियों के बहुत ही निकट हो जाती है और हमें इतना अखर जाती है कि अपने विषय में विचार करने को समय और अवकाश ही नहीं मिलता। हमारा ध्याुन पीड़ित व्यक्ति के क्लेश और दु:ख की ओर इतना झुका रहता है कि उसे हम अपने सुख की ओर नहीं फेर सकते। परन्तु, इसके प्रतिकूल हम उन आपदाओं को जो इतिहास अथवा काल में पढ़ते हैं या तो व्यतीत समझते हैं अथवा कल्पित; इससे हमारे चित्त में अपनी अवस्था का ध्या न इस प्रकार दबे पाँव प्रवेश करता है कि हमें जान नहीं पड़ता और पीड़ित पुरुष के क्लेश से जो दु:ख होता है उसको दबा देता है। 

परन्तु मनुष्य का चित्त पदार्थों में कोई बात उससे और पूर्ण चाहता है जितना उनमें देखता है और प्रकृति में कोई ऐसा दृश्य नहीं देखता जो उसके आनन्द की सबसे उच्च अभिलाषाओं को सन्तुष्ट कर सके-अथवा यों कहिए कि कल्पना उससे कहीं अधिक बड़ी, असाधारण और सुन्दर वस्तुओं का अनुमान कर सकती है जिन्हें हम अपनी ऑंखों से देखते हैं, और कोई न कोई त्रुटि इन आँख से देखी हुई वस्तुओं में वह बोध कराती है। इसी से यह कवि का कर्तव्य है कि कल्पना का उसी की रुचि के अनुकूल अनुरंजन करे, अर्थात् जहाँ पर वह किसी सत्य और वास्तविक वस्तु का वर्णन करता है वहाँ पर प्रकृति को पूर्ण और दुरुस्त करे और जहाँ वह किसी कल्पित वस्तु का वर्णन करता है वहाँ प्रकृति की अपेक्षा अधिक सौंदर्यों को बटोर कर एकत्रिात करे।

उसके लिए प्रकृति की धीमी चाल के अनुसार एक से दूसरी ऋतु में जाना तथा फूलों और पौधों के विषय में उसके सामयिक नियमों का पालन करना कोई आवश्यक नहीं है। वह अपने वर्णन में वसंत और शिशिर की शोभा एक साथ दिखला सकता हे और उसको रोचक बनाने के लिए समस्त वर्ष की शोभा से थोड़ी थोड़ी सहायता ले सकता है। उसके पारिजात, गुलाब और कदंब एक साथ फूल सकते हैं। उसकी (कवि की) भूमि किसी वर्ग विशेष के पौधों ही के लिए नहीं बनी है, आम और अखरोट समान रूप में उसमें मिल सकते हैं; अर्थात् प्रत्येक देश की जलवायु के पौधों के लिए उसकी भूमि उपयुक्त होती है : नारंगियों का वन वहाँ खड़ा मिल सकता है; हर एक झाड़ी फूलों से लदी हुई देखी जा सकती है, और यदि वह कवि मसालों का उपवन भी वहाँ होना उचित समझता है तो वह तुरंत उन्हें पैदा होने भर के लिए उष्णता ला सकता है। यदि ये सब मिलकर भी रोचक दृश्य नहीं उपस्थित कर सकते तो वह नए प्रकार के फूलों की सृष्टि करता है जो उनकी अपेक्षा अधिक मधूर सुगंधवाले तथा चटकीले रंगवाले होते हैं जो प्रकृति के उपवनों में पाए जाते हैं। उसके विहंगों का कलरव इतना मधूर और हृदयग्राही हो सकता है और उसके वन इतने निबिड़ और सघन हो सकते हैं जितना वह चाहे। दृश्य छोटा हो वा बड़ा उसके लिए दोनों बराबर हैं : वह अपने झरनों को आधा मील की ऊँचाई से वैसी ही सुगमता से गिरा सकता है जैसी बीस गज की ऊँचाई से; वायु को वह जिस ओर चाहे बहा सकता है; और नदी की धारा को वह ऐसे ऐसे घुमावों के साथ बहा सकता है जो कल्पना को सबसे अधिक आनन्ददायक होते हैं। सारांश यह कि प्रकृति का गढ़ना उसके हाथ में रहता है, उसको वह जैसी शोभा चाहता है वैसी प्रदान कर सकता है; किन्तु उसको वह अत्यन्त ही न सुधार डाले और उससे बढ़ जाने के निमित्त यत्न करने में कहीं बे सिर पैर की व्यर्थ बातों में न फँस जाय।
 

नौवाँ प्रकरण

एक लिखने की रीति है जिसमें कवि प्रकृति की ओर बिलकुल नहीं दृष्टिपात करता और अपने पाठकों के चित्र को ऐसे-ऐसे पात्रों के कर्मों और स्वभाव से पूर्ण कर देता है जिनका सिवाय उसकी रचना में और कहीं अस्तित्व नहीं। अप्सरा, डाइन, भूत प्रेत, और मृत पुरुषों की आत्मा इत्यादि इसी प्रकार की हैं। ऐसी रचनाओें में जो सर्वथा कवि की कल्पना ही पर निर्भर रहती हैं यह सबसे कठिन है क्योंकि इसमें उसके चलने के लिए कोई नमूना नहीं रहता उसको बिलकुल अपनी ही गढ़ंत पर काम करना होता है।

इस प्रकार की रचना के लिए चित्त की एक बहुत ही विलक्षण प्रवृत्ति की आवश्यकता है; और किसी ऐसे कवि का इसमें कृतकार्य होना असंभव है जिसके भाव निराले न हों और जिसकी कल्पना स्वभाव ही से उपजाऊ और संशयी न हो। इसके अतिरिक्त उसको किस्से कहानियों, पुराने-पुराने व्याख्यानों तथा बूढ़े लोगों की जनश्रुति इत्यादि में भली प्रकार प्रवीण होना चाहिए, जिसमें वह हम लोगों की स्वाभाविक रुचि के अनुसार अपने को ले चले, और जिन भावों को बचपन में हमने ग्रहण किया था उनका अनुमोदन करे; क्योंकि अन्यथा यह भूतों और डाइनों को अपने ही वर्ग के लोगों के समान बोलावेगा, न कि उन दूसरी ही श्रेणी के जीवों की तरह जिनके वार्तालाप का अभिप्राय तथा जिनकी विचार करने की प्रणाली मनुष्यों से भिन्न होती है। 

मैं मि. वेजश् की भाँति यह नहीं कहता कि कोई बंधन नहीं है कि भूत प्रेत अर्थसूचक ही बात बोलें; परन्तु इतना तो अवश्य कहूँगा कि उनके अर्थ कुछ विलक्षण और असम्बद्ध होने चाहिए जिसमें वे बोलनेवाले के स्वरूप और अवस्था के अनुकूलहों।

इस प्रकार के वर्णन पढ़नेवाले के चित्त में एक प्रकार का आनन्दकारक त्राास उत्पन्न करते हैं और उसकी कल्पना को उन पात्रों की विलक्षणता और नवीनता से रंजित करते हैं जो उनमें दरसाए गए हैं। ये हमारी स्मृति में उन कहानियों को लाते हैं जिन्हें हमने लड़कपन में सुना था; और उन अन्तरस्थित भय और आशंकाओं का अनुमोदन करते हैं जो मनुष्य के चित्त में स्वाभाविक हैं। हम लोग दूसरे देश के लोगों की भिन्न चाल-ढाल और रहन-सहन देखकर प्रसन्न होते हैं। कितने और अधिक हम प्रसन्न होंगे यदि मानो एक नई सृष्टि में ही हम पहुँचा दिए जायँ और वहाँ दूसरे ही प्रकार के जीवों के आकार और व्यवहार देखें। शुष्क-हृदय तथा तर्कप्रिय मनुष्य इस प्रकार की कविता का यह कहकर विरोध करते हैं कि उसके वर्णन इतने संभव नहीं होते की किसी प्रकार का प्रभाव कल्पना पर डालें। किन्तु इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि हमें निश्चय है कि इस जगत् में हम लोगों के अतिरिक्त और भी बुद्धि सम्पन्न जीव हैं तथा और भी इस प्रकार की आत्माएँ हैं जो मनुष्य की आत्मा से भिन्न नियमों से प्रतिबद्ध हैं। इसलिए जब हम इनमें से किसी को स्वाभाविक रीति पर दरसाया हुआ पाते हैं तो उसे सर्वथा असंभव और निर्मूल नहीं समझ लेते वरन् बहुतेरे लोग तो पहिले ही से उनके विषय में ऐसी सम्मति रखते हैं जो चट उन्हें ऐसी बातों पर विश्वास लाने को बाधय कर देती है। हम लोगों ने, और कुछ नहीं तो उनके पक्ष में इतने मनोहर वर्णन सुने हैं कि हम असत्यता की ओर देखने की परवाह ही नहीं करते हैं और बड़े मन से ऐसे रोचक प्रलापों में अपने को लीन होने देते हैं। 

अत्यन्त प्राचीन काल के लोगों में कविता की यह प्रथा प्रचलित न थी, क्योंकि, यथार्थ में, इसके सारे भाग की उत्पत्ति माधयमिक काल के अंधाकार और भ्रम से है जबकि मनुष्यों के दिल बहलाव के लिए तथा उनको डराकर अपने मत पर दृढ़ करने के लिए धर्म की आड़ में जाल रचे जाते थे। संसार में विद्या और विज्ञान का प्रकाश फैलने के पहिले लोग प्रकृति को बहुत ही पूज्य तथा भय की दृष्टि से देखते थे और यंत्रा मंत्रा भूत प्रेत आदि की आशंकाओं से चकित होना बहुत पसन्द करते थे। कोई भी गाँव देश ऐसा न था जहाँ एक भूत न हो; श्मशानों पर सर्वत्र भूतों का डेरा रहता था; प्रत्येक ताल के किनारे चुड़ैलों की मंडली बैठती थी; एक भी ग्रामीण ऐसा न था जिसने एक भूत न देखा हो। 

यूरोप के कवियों में ऍंगरेज कवि ही प्राय: इसमें अधिक कुशल होते हैं, चाहे इस कारण कि उनमें इस प्रकार की कहानियाँ बहुत हैं अथवा उस देश की प्रतिभा इस प्रकार की रचना के लिए विशेष उपयुक्त है क्योंकि ऍंगरेज लोग स्वभाव से कल्पना प्रिय होते हैं। 

ऍंगरेज कवियों में शेक्सपियर ही इस प्रकार की रचना में सबसे बढ़ा चढ़ा है। वह कल्पना की उस प्रचुरता के प्रभाव से जो उसमें इतने पूर्ण रूप से थी अपने पाठकों के चित्त और कोमल ओर संशयी भाग को द्रवीभूत कर सका और ऐसे-ऐसे स्थलों पर कृतकार्य होने में समर्थ हुआ जहाँ उसकी प्रतिभा की शक्ति के अतिरिक्त और आश्रय और आधार न था। उसके भूत प्रेत और परियों की वार्ताओं में कोई बात ऐसी बीहड़ पर साथ ही ऐसी गंभीर है कि हम उनको बिना स्वाभाविक समझे नहीं रह सकते यद्यपि हमारे पास उनकी परीक्षा के लिए कोई साधन नहीं है। यह भी हम स्वीकार करेंगे कि यदि इस प्रकार के जीवों की सृष्टि जगत् में है तो यह बहुत संभव है कि वे इसी प्रकार की बोली बोलते होंगे और ऐसे ही कर्म करते होंगे जैसा उसने दरसाया है। 

एक प्रकार के और कल्पित जीव हैं जो हमें कवियों की रचना में कभी कभी मिलते हैं, अर्थात् जब रचयिता किसी मनोवेग, पाप, सत्य, धर्म इत्यादि दृग्गोचर स्वरूप में प्रदर्शित करता है और उनको अपने काव्य के पात्र बनाता है। प्रबोध चन्द्रोदय नाटक में आशा, आलस्य, रोग इत्यादि सब मनुष्यों के रूप में प्रगट हुए हैं। इन सब प्रकारों की रचना बहुत ही मनोहारिणी और ओजस्विनी होती है। मैं स्थानाभाव से इन कल्पित पात्रों का उल्लेख मात्र यहाँ कर सकता हूँ। इस भाँति हम देखते हैं कि कितने रूपों में कविता कल्पना को सम्बोधान करती है; क्योंकि इसके कार्य का क्षेत्र न कि केवल सम्पूर्ण प्रकृति ही का मंडल है वरन् यह अपनी एक नई सृष्टि निर्माण करती है, ऐसे ऐसे व्यक्तियों का दर्शन कराती है जो इस भूमण्डल पर नहीं पाए जाते, और यहाँ तक कि आत्मा की विविध क्रियाओं को उसके सद्भावों और विकारों को गोचर आकार और स्वभाव में दिखला देती है। 

मैं अब अपने अगले दो प्रकरणों में यह विचार करूँगा कि किस प्रकार काव्य के अतिरिक्त और दूसरे प्रकार की लिखावट कल्पना को आनन्दित करने में योग्यता रखती है और फिर वहीं से इस निबंध की समाप्ति करूँगा।


दसवाँ प्रकरण

जैसे कि काव्य तथा काल्पनिक साहित्य के रचयितागण अपनी बहुत सी सामग्रियों को बाहरी पदार्थों से लेते हैं और उनको अपने मनोनुकूल एक साथ संयोजित करते हैं वैसे ही लेखकों का एक और समुदाय है जो प्रकृति का अनुगामी होने के लिए उनकी अपेक्षा अधिक विवश है और अपना सारा दृश्य उसी से लेता है। इतिहासकार, वैज्ञानिक, भ्रमणकार, भूगोलकार तथा वे सब जो भूस्थित वास्तविक पदार्थों का वर्णन करते हैं इसी समुदाय के अंतर्गत हैं। 

इतिहासकार का यह प्रधान गुण है कि वह उपयुक्त शब्दों में अपनी सेना का सुमन्त्रित होना और संग्राम में तत्पर होना वर्णन करे; हम लोगों की आँख के सामने बड़े लोगों के द्वेष, गर्व और छल को दरसावे और इतिहास की बहुत सी घटनाओं में क्रम क्रम से हमें ले चले। घटनाओं का धीरे धीरे यथाक्रम उद्भूत होना और हम पर इसी रीति से प्रगट होना कि हमको पहिले से उनका कुछ ज्ञान न होने पावे हमें बहुत प्रिय है; जिसमें कि हम एक प्रकार के मनोरंजक संदेह में पड़े रहें और हमें अनुमान बाँधाने का तथा वर्णन किए हुए दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष को अवलम्बन करने का समय मिले। यह मैं स्वीकार करता हूँ कि इससे इतिहासकार का जितना गुण प्रकट होता है उतना यथार्थवाद नहीं, किन्तु मैं तो उसका उल्लेख उतने ही अंश में करना चाहता हूँ जितना कल्पना को प्रफुल्लित करने में समर्थ है। इन बातों में लिवी (Livy) अपने आगे और पीछे के सब इतिहासकारों से बढ़ा चढ़ा है। वह प्रत्येक वस्तु का ऐसा सजीव वर्णन करता है कि उसका समस्त इतिहास एक सुन्दर चित्र प्रतीत होता है, और हर एक कथा के ऐसे चुटीले वृत्तान्तों की ओर झुकता है कि उसका पढ़नेवाला एक प्रकार का निरीक्षक हो जाता है और उन समस्त मनोवेगों का अनुभव करने लगता है जो वर्णन के विविध भागों से संबंध रखते हैं। 

किन्तु इस श्रेणी के लेखकों में कल्पना को इतना कोई सन्तुष्ट और प्रशस्त नहीं करते हैं जितना नए विज्ञान की पुस्तकों के प्रणेतागण; चाहे हम उनके पृथ्वी तथा आकाश विषयक सिद्धान्तों का और यन्त्रों द्वारा उनके नाना आविष्कारों का विचार करें अथवा प्रकृति विषयक उनके और अनुमानों पर ध्याउन दें। हम हर एक हरी पत्ताी की लाखों ऐसे जीवों से गुथी हुई देखकर कुछ कम प्रसन्न नहीं होते हैं जिनको कि खाली आँख कभी नहीं देख सकती। धातु, पौधों तथा तारों के विषय में जो पुस्तकें होती हैं उनमें कोई बात कल्पना और बुद्धि दोनों के बहुत ही रोचक होती है। किन्तु जब हम एक बेर समस्त पृथ्वी की ओर तथा उन सब उपग्रहों की ओर जो उसके निकटवर्ती हैं दृष्टि डालते हैं तो हम इतने लोकों को अन्तरिक्ष में एक दूसरे के समानान्तर लगते हुए तथा अपनी अपनी कक्षाओं पर ऐसे अद्भुत चमत्कार और वेग के साथ परिक्रमण करते हुए देखकर एक मनोरंजक आश्चर्य से पूर्ण हो जाते हैं। यदि इनके उपरान्त हम (Ether) सूक्ष्म पदार्थ के अपार क्षेत्रों का विचार करते हैं जो ऊँचाई में शनैश्चर से लेकर स्थिरीकृत ग्रहों तक (Fixed stars) पहुँच गए हैं और इधर-उधर इतने विस्तार में फैले हुए हैं जिसका पारावार नहीं तो हमारी कल्पना-शक्ति ऐसे विपुल दृश्य से भर उठती है जिसके समावेश के लिए उसको बहुत ही फैलना पड़ता है। किन्तु यदि हम और आगे बढ़ते हैं और विचार करते हैं कि स्थिरीकृत यह आग के अपार समुद्र हैं और प्रत्येक के साथ भिन्न भिन्न वर्ग के उपग्रह हैं; और फिर नए नए आकाश और नए नए प्रकाश का पता लगाते हैं जो इथर (Ether) के अगाधा समुद्र में इस प्रकर मग्न पड़े हैं कि बड़े से बड़े दूरवीक्षण यंत्रो द्वारा भी नहीं देखे जा सकते तो हम सूर्यों और लोकों की भूलभुलैया में फँस जाते हैं और प्रकृति के चमत्कार और विस्तार से स्तम्भित हो जाते हैं। 
कल्पना को कोई बात इतनी प्रिय नहीं है जितना पदार्थों के परस्पर विस्तार-संबंध को विचार करके क्रम क्रम से प्रवर्ध्दित होना, जब वह मनुष्य के शरीर को संपूर्ण पृथ्वी के पिंड से मिलान करती है; पृथ्वी को उस वृत्त से जो उसके चारों ओर वह बनाती है, उस वृत्त को स्थिरीकृत ग्रहों के मंडल से, स्थिरीकृत ग्रहों के मंडल को संपूर्ण सृष्टि से और समस्त सृष्टि को उस अपार शून्य-स्थान से जो उसके चारों ओर फैला हुआ है; अथवा जब कल्पना नीचे की ओर जाती है और मनुष्य के शरीर को किसी मटर से भी सौ गुने छोटे जानवर से मिलान करती है, फिर उस जीव के विशेष विशेष अवयवों से, तदनन्तर उन पुरजों से जो उन अवयवों में क्रिया उत्पन्न करते हैं; तदुपरान्त उस शक्ति से जो उन पुरजों को चलाती हैं और पुन: इन समस्त भागों की उस समय की सूक्ष्मता से जब कि वे पूरी बाढ़ को नहीं पहुँचे रहते हैं और यदि इन सबके पीछे इस शक्ति के क्षुद्रातिक्षुद्र अंश को हम लेते हैं और उसके द्वारा एक संसार निर्मित होने की संभावना पर विचार करते हैं जिसमें कि उतने ही विस्तार में पृथ्वी और आकाश, तारे और उपग्रह तथा सब तरह के जीव परस्पर उसी संबंध के साथ सन्निविष्ट रहेंगे जैसा कि हमारे इस संसार में, तो इस प्रकार का विचार अपनी सूक्ष्मता के कारण उन लोगों को उपहास-जनक जान पड़ता है जिन्होंने अपना ध्यामन इस ओर नहीं फेरा है यद्यपि उसकी स्थिति दृढ़ प्रमाणों के आधार पर है। यहीं तक नहीं, हम इस विचार को और भी आगे ले जा सकते हैं और इस क्षुद्र जगह के छोटे से छोटे कण में भी तत्तव के ऐसे अतुल भंडार का पता लगा सकते हैं जिससे एक दूसरा ब्रह्मांड तक निर्मित हो सकता है। 

इस विषय को मैंने विस्तार के साथ वर्णन किया है क्योंकि मैं समझता हूँ कि इसके कल्पना की यथार्थ पहुँच और उसकी त्रुटि को बोध हो जायगा और विदित हो जायगा कि किस प्रकार उसका प्रवेश बहुत ही थोड़े स्थान के बीच है और किस प्रकार किसी ऐसी वस्तु को ग्रहण करने के लिए जो अत्यंत छोटी वा अत्यंत बड़ी होती है जब वह यत्न करती है तो चट रोक दी जाती है। यदि कोई मनुष्य किसी ऐसे जीव के शरीर पिंड को जो सरसों से बीस गुना छोटा है, एक ऐसे जीव से मिलान करे जो सरसों से सौ गुना छोटा है, अथवा अपने ध्या न में पृथ्वी के सहस्र व्यासों की लम्बाई को उसी के दस लाख व्यासों की लम्बाई से मिलान करे तो उसे तुरंत जान पड़ेगा कि ऐसी ऐसी असाधारण मात्रा की सूक्ष्मता और विशालता का अन्दाज करने के लिए उसके चित्त में कोई पृथक् पृथक् माप नहीं है। हमारी बुद्धि अलबत्तो हमारे चारों ओर अनुसंधान का मार्ग खोल देती है; किन्तु कल्पना को वह बहुत शीघ्र अदृश्य हो जाता है। कल्पना अपने में एक तरह का रन्धा्र बोध करने लगती है जिसको कि वह किसी और विशेष गोचरपिण्ड की सामग्री से भरना चाहती है। हम इस शक्ति को न तो सिकोड़ कर सूक्ष्मता के अन्त तक ले जा सकते हैं और न फैलाकर विशालता के सिरे पर पहुँचा सकते हैं। जब हम पृथ्वी की परिधि का ध्या न करते हैं तो वह वस्तु हमारी शक्ति की पहुँच से अत्यंत बड़ी हो जाती है और जब हम एक परमाणु का अनुमान करने के लिए यत्न करते हैं तब वह हमारे लिए कुछ भी नहीं रह जाती। 

संभव है कि यह त्रुटि स्वयं आत्मा में न हो, वरन् जब वह शरीर के सहयोग से काम करती है तब उसमें यह दोष आ जाता हो। कदाचित् मस्तिष्क में इतने तरह के चिह्नों के लिए स्थान ही न हो अथवा चेतना शक्ति उनको इस ढंग पर निर्मित करने में असमर्थ हो कि वे इतनी बड़ी अथवा इतनी छोटी भावानाओं को उत्तेिजित कर सकें। जो कुछ हो, हम यह मान सकते हैं कि दूसरे उच्च श्रेणी के जीव हमसे इस बात में बहुत बढ़े चढ़े हैं; और संभव है कि मनुष्य की आत्मा आगामी काल में (शरीर से पृथक् होने पर) जैसे और सब बातों में वैसे ही इस शक्ति में भी पूर्णता प्राप्त करेगी; यहाँ तक कि कल्पना विचार के साथ साथ चलने और विस्तार के समस्त जुदे जुदे परिमाण और क्रम के लिए पृथक् पृथक् भाव रखने में सक्षम होगी। 
 

ग्यारहवाँ प्रकरण

कल्पना का आनन्द ऐसे ही ग्रंथकारों के ऊपर अवलम्बित नहीं है जो भौतिक पदार्थों में कुशल होते हैं वरन् बहुधा नीति, समालोचना तथा द्रव्यों से निकाले हुए और और निरूपण के गंभीर कर्तव्योंर में भी हम इस आनन्द को पाते हैं। ये लोग यद्यपि प्रकृति के दृग्गोचर भागों का स्पष्टतया वर्णन नहीं करते हैं तथापि वे प्राय: अपने उदाहरण, रूपक और अपनी उपमाएँ उनसे लेते हैं। इस प्रकार के दृष्टान्तों से बुद्धि में स्थित कोई तत्तव मानो कल्पना में प्रतिबिम्बित हो जाता है; हम किसी विचार में रंग और आकार देखने लगते हैं और भावों को भौतिक द्रव्यों पर झलकाया हुआ पाते हैं। जब कल्पना बुद्धि की बातों को अवतरण करने और मानसिक सांसारिक भावों को खींचकर भौतिक संसार में लाने में लगी रहती है उस समय चित्त बहुत प्रसन्न होता है और उसकी दो शक्तियाँ एक साथ ही परितुष्ट होती हैं। 

किसी ग्रंथकार का गुण मनोरंजक दृष्टान्तों के चुनाव में प्रगट होता है जो कि प्राय: प्रकृति वा शिल्प के विशाल और सुन्दर निर्माणों से लिए जाते हैं; क्योंकि यद्यपि जो बात नई वा असाधारण होती है, कल्पना को प्रसन्न करती है पर दृष्टान्त का मुख्य उद्देश्य किसी ग्रंथकार के वाक्यों का स्पष्टीकरण है इसलिए इसको सर्वथा ऐसे ही पदार्थों से लेना चाहिए जो उन वाक्यों की अपेक्षा जिन्हें स्पष्ट करना है, अधिक परिचित और जाने हुए हों। 

रूपक यदि उत्तमतापूर्वक चुने जाते हैं तो किसी प्रसंग के बीच बीच में प्रकाश की ज्योति की भाँति हो जाते हैं जो कि अपने आसपास की सारी वस्तुओं को स्पष्ट और सुन्दर कर देती हैं। एक उत्कृष्ट उपमा यदि कौशल के साथ रक्खी जाती है तो अपने चारों ओर चमत्कार फैला देती है और संपूर्ण पद को कान्तिमय कर देती है। ये विविध प्रकार के दृष्टांत (रूपक, उपमा इत्यादि) केवल दिखाने की भिन्न भिन्न प्रणालियाँ हैं; जिसमें ये कल्पना को आनन्दित कर सकें इसलिए सादृश्य या तो बहुत ही ठीक अथवा बहुत सुन्दर और रोचक होना चाहिए; जैसे कि हम किसी ऐसे चित्र की ओर देखना पसंद करते हैं जिसमें अनुरूपता ठीक अथवा चेष्टा और भाव सुन्दर होता है। परंतु हम बहुधा बड़े बड़े लेखकों को भी इस बात में दोषी पाते हैं; बड़े बड़े पंडित लोग अपने दृष्टान्त और उदाहरण प्राय: उन शास्त्रों से लेते हैं जिनमें वे सबसे अधिक दक्ष होते हैं, अतएव उनके पांडित्य का समावेश लोग उनके सर्वथा भिन्न विषयों के प्रतिपादन में पाते हैं। मैंने 'प्रेम' पर एक बड़ा प्रबंधा पढ़ा है जिसको सिवाय एक गहिरे रासायनिक के और कोई नहीं समझ सकता, और बहुत से धार्मोपदेश सुने हैं जिनको दार्शनिकों की मंडली के बीच सुनना चाहिए। इसके विपरीत, कामकाजी लोग ऐसे दृष्टान्तों का आश्रय लेते हैं जो अत्यंत ही परिचित और क्षुद्र होते हैं। ये लोग या तो पाठकों को शतरंज या गेंद के खेल की ओर ले जाते हैं अथवा तरह-तरह के व्यवसाय की ओर ले जाते हैं अथवा तरह तरह के व्यवसाय और व्यापार की धाुन में एक दूकान से दूसरी दूकान पर ले जाकर खड़ा करते हैं। यह ठीक है कि इन दोनों प्रकार की बातों में भी न जाने कितने तरह के सुन्दर दृष्टान्त मिल सकते हैं पर सबसे हृदयग्राही प्रकृति के कामों में ही पाए जाते हैं जो कि समस्त शक्तियों को प्रत्यक्ष होते हैं और उनसे बढ़ के आनन्द-दायक होते हैं जो कि कला और विज्ञान में पाए जाते हैं। 

कल्पना पर प्रभाव डालने का यही गुण है जो उत्तम बुद्धि को भी अलंकृत करता है और एक मनुष्य की रचना को दूसरे मनुष्य की रचना से विशेष रोचक बनाता है। यों तों प्राय: सब तरह की लिखावट को यह उज्ज्वल करता है पर कविता का तो यह जीव और सर्वस्व है। जिस काव्य में यह गुण भली प्रकार झलकाया गया है उसको यह युगान्तरों से रक्षित रखता आया है, चाहे उसमें सिवाय इसके और कोई बात प्रशंसा की न हो; और जिसमें सब शोभा विद्यमान रहती है पर इसकी हीनता रहती है वह रचना शुष्क और नीरस जान पड़ती है। इसमें कोई बात सृष्टि की सी होती है; यह एक प्रकार का अस्तित्व प्रदान करता है और पाठकों के सामने ऐसे बहुत से पदार्थों को लाता है जो इस जगत् में नहीं पाए जाते। यह प्रकृति में बहुत सी बातें बढ़ाता है और परमेश्वर के कार्यों के बहुत से भेद दिखलाता है। संक्षेपत: यह सृष्टि के उत्तम दृश्यों को भी विभूषित और कान्तिमय कर सकता है, अथवा चित्त को उनसे अधिक चमत्कारक कौतुक और आभास दिखला सकता है जो उसके किसी भाग में पाए जा सकते हैं। 

हम उन आनन्दों के बहुत से मूलों का पता लगा चुके जो कल्पना को संतुष्ट करते हैं; अब यहाँ पर कदाचित् उन विपरीत वस्तुओं को अलग करके दिखलाना कठिन न होगा जो उसको अरुचि और भय से पूर्ण कर देती है, क्योंकि कल्पना उतना ही क्लेश अनुभव कर सकती है जितना आनन्द। जबकि मस्तिष्क पर किसी दुर्घटना का आघात पहुँचता है, वा चित्त रोग और दु:स्वप्नों से विचलित हो जाता है तब कल्पना उन्मादकारक और उदासीन भावों से उपप्लुत हो जाती है। और अपने ही निर्मित सहस्रों भीषण आकारों से स्वयं भयभीत होती है। 
प्रकृति में कोई दृश्य ऐसा क्लेशकर नहीं है जैसा एक व्यग्र मनुष्य का जब कि उसकी कल्पना व्यथित और उसकी सारी आत्मा व्यस्त और आकुल रहती है। बाबलिन भी अपनी उजाड़ अवस्था में ऐसा करुणोत्पादक नहीं है। पर इस दुखदायी प्रसंग को मैं छोड़े देता हूँ। मैं अब उपसंहार की भाँति केवल यही विचार करूँगा कि यह शक्ति परमात्मा को मनुष्य की आत्मा के ऊपर कितना अधिकार देतीहै और हम एक कल्पना ही से सीमा तक का सुख और दु:ख प्राप्त कर सकते हैं। 

हम पहिले ही देख चुके हैं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की कल्पना के ऊपर कितना प्रभाव रखता है और किस सुगमता के साथ वह उसके भीतर तरह तरह के स्वरूप ले जाता है। विचार तो कीजिए कि कितनी बड़ी शक्ति उस जगदीश्वर में स्थित होगी, जो कल्पना पर प्रभाव डालने की सब रीतियों को जानता है, जो उसमें जिन जिन भावों को चाहे संचार कर सकता है और उन भावों में जिस मात्रा तक का भय वा आनन्द चाहे भर सकता है। वह बिना शब्दों की सहायता ही के चित्त में स्वरूप उद्दीपित कर सकता है और बिना पिंड वा बाहरी पदार्थों के ही ऐसे दृश्य हमारे सामने ला सकता है, जो नेत्रों को प्रत्यक्ष जान पड़ते हैं। वह कल्पना को ऐसी सुन्दर और चमत्कारिणी भावनाओं से मोहित कर सकता है, अथवा उसको ऐसे ऐसे कराल भूतों और प्रेतों से सता सकता है कि हम मृत्यु की बाट जोहने और जीवन को एक बोझ समझने लगते हैं। सारांश यह है कि वह कल्पना को इतना आनन्दित वा क्लेशित कर सकता है, जितना किसी एक जीव के निमित्त स्वर्ग वा नर्क बना देने के लिए दरकार होता है।


(एडिसन के ‘Plesures of Imagination’ का अनुवाद, नागरीप्रचारिणी पत्रिका, सन् 1905)
[चिन्तामणि भाग-3]


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