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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 4
भाषा, साहित्य और समाज विमर्श

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम उर्दू राष्ट्रभाषा पीछे     आगे

निजाम की राजधानी हैदराबाद में Young men’s Improvement Society के बीच खडे होकर डॉक्टर निशिकान्त चटर्जी ने उर्दू का खूब गुणानुवाद किया और उसे भारतभाषा होने के योग्य बतलाया। उन्होंने उठते ही कहा कि 'क्या अच्छा होता यदि ऍंगरेजी यहाँ की देशभाषा हो जाती। पर यह बात असम्भव देख पड़ती है।' मैं भी कहता हूँ कि क्या अच्छा होता यदि भारतवासी आज कन्दराओं में से ऑंख मलते निकलते, उनका कोई इतिहास न होता, उनकी कोई भाषा न होती, उनका कोई साहित्य न होता। डॉक्टर साहब ने फिर कहा 'मैं बहुत दिनों से ऐसी देशभाषा की खोज में था जो सारे हिन्दुस्तान की भारतीय भाषा हो सके, अन्त में इतिहास परम्परा और शब्द भंडार के विचार से उर्दू ही इस योग्य देख पड़ी। सौ वर्ष से अधिक हुए कि ऍंगरेज शासकों के ध्यान में यह बात आई और वे फोर्ट विलियम कॉलेज द्वारा उसका पोषण और संस्कार करने लगे। इसी से ऍंगरेजी राज्य और पादरी लोग ही उसके पालनकर्ता कहे जाते हैं।'

जिस उर्दू की चर्चा दिल्ली के शाही दरबारों में भी औरंगजेब के पीछे मुगल राज्य के अधोपतन के साथ शुरू हुई उसकी इतिहास परम्परा के सामने हिन्दी की इतिहास परम्परा कुछ न ठहरी। जो पृथ्वीराज के समय के वीरों की भाषा रही, जिसमें अमीर खुसरो और मलिक मुहम्मद जायसी ने पहेलियाँ और कहानियाँ कहीं, जिसके महाकवियों ने भारत में भक्ति और प्रेम का स्रोत बहाया क्या उसके गौरव को भुलाने ही में अब देश का कल्याण् है? डॉक्टर साहब ने जो उर्दू के शब्द भंडार की बात कही वह भी विलक्षण ही है। हिन्दी शब्दों के सिवाय जो शब्द उर्दू में हैं वे अरबी, फारसी, तुर्की आदि के हैं। ये विदेशी शब्द अधिकतर सीख सीखकर भाषा में भरे जाते हैं इसमें तो कुछ सन्देह ही नहीं। उन संस्कृत शब्दों की ओर जिनका प्रचार न केवल सारे हिन्दुस्तान ही में वरन् सिंहलद्वीप, ब्रह्म देश और श्याम आदि में है उर्दू भूलकर भी नहीं ताकती। और कहाँ तक कहें संस्कृत के उन साधारण शब्दों के लिए भी जो गाँव गाँव घर घर सुनने में आते हैं उर्दू में जगह नहीं। जैसे सुख दु:ख, माया, प्रेम, प्रीति, कलह, शोक, शोभा, रीति, प्राण, जीवन, ज्ञान, ऐश्वर्य, वैभव, मुख्य अतिथि, चिन्ता, अस्तित्व, पाप, पुण्य, धान इत्यादि। हिन्दी उन फारसी वा अरबी शब्दों को अपनाने में जरा भी संकोच नहीं करती जो लोगों के व्यवहार में आ गए हैं। यह प्रवृत्ति उसकी अपनी है। सूरदास और तुलसीदास आदि अरबी फारसी के शब्दों को जो देश में बस गए हैं, पूरा पूरा ग्रहण करते हैं। बहुत से ऐसे ठेठ हिन्दी के साधारण शब्द जिनके बिना हमारा नित्य का व्यवहार नहीं चल सकता पर जिनके बिना अरबी फारसी का काम बड़े मजे से चला आता है, उन्हें हम क्या समझें! यही न कि उर्दू साहित्य से और हमारे सांसारिक जीवन से बहुत कम लगाव दिखाई पड़ता है। वैज्ञानिक, दार्शनिक और गम्भीर विषयों को समझाने के लिए हिन्दी संस्कृत से सहायता लेते हैं, जिसके समझने और जाननेवाले इस देश में फारसी अरबी की अपेक्षा दस गुने अधिक हैं। दूसरी बात यह है कि उर्दू हिन्दुस्तानी, बंगाली, मराठी, गुजराती आदि किसी की शब्द परम्परा से नहीं मिलती अत: वह इन भाषाओं के बोलनेवालों के बीच प्रचार कैसे पा सकती है। पर हिन्दी से उनका बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। कहीं कहीं तो केवल क्रिया आदि के रूपों को बदलने ही से दो भाषाएँ एक हो जाती हैं। अत: स्पष्ट है कि राजभाषा बनाने के लिए हम हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती आदि ही में से किसी को चुन सकते हैं। उर्दू की ओर तो ध्यान ही नहीं जा सकता। ये भिन्न भिन्न भाषाभाषी थोड़ी बहुत राह दे सकते हैं, अपनी भाषाओं को बिलकुल किनारे नहीं कर सकते। हिन्दी की कोई पुस्तक उठाकर पढ़िए, उसे आपके पास बैठे हुए बंगाली, महाराष्ट्री और गुजराती थोड़ा बहुत सब समझ लेंगे पर उर्दू की कोई इबारत पढ़ने लगिए तो वे आपका मुँह ताकने लगेंगे। डॉक्टर साहब की भाँति क्या सब बंगालियों को अपने मधुसूदनदत्ता, बंकिम और नवीन के वाक्यों पर कुछ भीममत्वनहीं ? क्या वे उनकी शब्दावली को बिलकुल पलट देंगे और गालिब और सौदा की भाषा लिखने पढ़ने लगेंगे। क्या हम अपने सूर, तुलसी, रहीम तथा हरिश्चन्द्र और प्रतापनारायण को बिलकुल भूल जायँ ? इन हिन्दी, बंगला, मराठी आदि भाषाओं के ठेठ शब्द भी प्राय: मिलते जुलते क्या एक ही हैं। और वे सब आवश्यकतानुसार संस्कृत से सहायता लेती हैं। रह गईं तमिल और तैलंगी, वे भी संस्कृत शब्दों की सहायता से चलतीहैं। इस एकता को नष्ट करने की जो चेष्टा करे वह देश का हितैषी कभी नहीं हो सकता।

इस बात को दुनिया जानती है कि उर्दू में संस्कृत वा प्राकृत शब्दों की रत्तीर भर भी गुजर नहीं। अब उर्दू का ढाँचा और व्याकरण बिलकुल हिन्दी का है, उसके शब्द भी बहुत से हिन्दी के हैं, अत: व्याकरण सम्बन्धी किसी बात की खोज के लिए प्राकृत से होते हुए संस्कृत तक जाना होगा। इसी प्रकार शब्दों की व्युत्पत्ति भी प्राकृत और संस्कृत में टटोलनी होगी पर यह बात उर्दू पंडितों के लिए असम्भव ही है क्योंकि उर्दू साहित्य सेवा के लिए अरबी और फारसी की लियाकत की जरूरत होती है न कि संस्कृत और प्राकृत की। प्राय: सब उर्दू लेखक इन संस्कृत और प्राकृत शब्दों से लगाव न रखने के कारण अपनी भाषा के शब्दों की व्युत्पत्ति आदि कुछ भी नहीं जानते। उनका व्याकरण विचार लखनऊ और दिल्ली के मुहावरों तक ही खत्म हो जाता है। हिन्दी में विभक्ति, प्रत्यय पर जो लेख संवाद पत्रों में निकले उन्हें उर्दू वालों ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा। पर हिन्दी पढ़ने लिखने वाले लोग चाहे वे संस्कृत न भी जानें बहुत से संस्कृत शब्दों के जानकार रहते हैं और प्राचीन (700 वर्ष तक के) ग्रन्थों को पढ़ते पढ़ते शब्दों की क्रमागत बनावट आदि का पूरा पूरा ध्यान रख सकते हैं। अत: देश में उर्दू फैलाना मानो एक तरह से मूर्खता फैलाना है, किसी उर्दू पंडित ने कुछ दिन हुए इतिहास की एक पुस्तक लिखी। उसमें मौर्यवंश का जिक्र करते हुए आपने लिखा''यह खानदान मोरिया इसलिए कहलाया कि उसके झंडों पर मोर का निशान बना रहता था।'' उर्दू द्वारा ऐसे ही लोगों की सृष्टि होगी?

इसके बाद डॉक्टर निशिकान्त चटर्जी निजाम साहब के दरबार की तारीफ करते हुए उनकी शायरी की तारीफ करते हैं और कहते हैं कि 'आसफ' (निजाम बहादुर का तखल्लुस) की गजलें उनके राज्य के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक सबके मुँह से सुनाई पड़ती हैं। निजाम बहादुर की तारीफ गाकर फिर आप उनके वजीर महाराज सर किशुन परशाद की तारीफ करते हैं, जो अपनी शायरी में अपना तखल्लुस 'शाद' रखते हैं। मालूम होता है कि इसी इतने के लिए आपने इतना बखेड़ा रखा।

आप अपने पक्ष के समर्थन में ये पाँच दलीलें पेश करते हैं

1. उर्दू भारतवर्ष की देशभाषा रही है और है। यह ढाका से लेकर कराची और लाहौर से लेकर तंजौर तक बोली और समझी जाती है। अत: उसके बोलने वाले और भाषाओं के बोलने वालों की अपेक्षा अधिक हैं।

जो बात हिन्दी के विषय में बड़े बड़े विद्वानों द्वारा कही जा रही है उसी को डॉक्टर साहब ने उर्दू पर चढ़ाया है। हिन्दी बोलने वाली जनसंख्या ही को आपने कौशल से उर्दू बोलने और समझने वाली बतलाया है। पर इसे कोई स्वीकार नहीं कर सकता। उर्दू में जो हिन्दी के शब्द मिले हैं, उन्हीं ने आपको यह कहने का अवसर दिया है। आपके 'तशरीफ लाइए' 'इस्म शरीक' और 'दौलतखाना' को समझने वाले किन किन प्रान्तों में मिलेंगे, बताइए तो। 'बैठिए', 'आपका नाम क्या है', 'घर कहाँ है' जब कहा जाएगा तभी सभी प्रान्त के लोग समझेंगे। ये वाक्य ठेठ हिन्दी के हैं और समझ लिए गए। अब यदि हम इनके स्थान पर संस्कृत मिलाकर 'विराजिए', 'आपका स्थान कहाँ है', कहें तो भी और प्रान्त वाले अच्छी तरह से समझ लेंगे। अब पक्षपात छोड़कर विचारने की बात है कि देश में हिन्दी के समझने वाले अधिक हैं कि उर्दू के।

2. उर्दू अंगरेजी के समान एक मिलीजुली और खिचड़ी भाषा है जिसमें हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों के भाव हैं। इस कथन की असारता हम पहले दिखा चुके हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस भाषा में हिन्दुओं के कोई भाव नहीं हैं। इसमें उनके धार्मिक शब्द तक नहीं, उनके पूर्व पुरुषों की अधिक चर्चा नहीं। इसमें हमारे नित्य के काम के शब्दों का समावेश नहीं। हमारी बहुत सी ऐसी गृहस्थी की चीजें हैं जिनका नाम लेना भी उर्दू को नापसन्द है। हमारे जीवन से इस भाषा का कोई लगाव नहीं। बहुत से ऐसे संस्कृत शब्द हैं जिसे इस देश के स्त्रीथ पुरुष, पढ़े अनपढ़े सब बोलते हैं पर जिनके उच्चारण करने तक की सामर्थ्य उर्दू में नहीं। किन्तु हमारे मुसलमान भाइयों के भाव और शब्द हिन्दी में बराबर पाए जाते हैं। मलिक मुहम्मद जायसी, नूर मुहम्मद आदि ने अपने धर्म की बहुत सी बातें अपनी हिन्दी पुस्तकों में लिखी हैं। हिन्दी अरबी वा फारसी के शब्दों को उच्चारण करने में जरा सा भी नहीं हिचकती। मुसलमान लोग भी ईसाइयों की भाँति यदि अपने धर्म की बातों को हिन्दी में लिखा करें तो बड़ी अच्छी बात हो।

डॉक्टर साहब ने हिन्दी और उर्दू के बीच एंग्लो सैक्सन और अंगरेजी का सम्बन्ध बतलाकर बड़ी विचित्रता की है। डॉक्टर साहब को जानना चाहिए कि हिन्दी एक मिलीजुली और साहित्य की ऊँची भाषा है। इसको विदेशी विद्वानों ने भी स्पष्ट कहा है। बेट साहब ने लिखा है

The number of Persian and Arabic words is sufficient to prove that Hindi, in common with other languages, is composite.

3. उर्दू अंगरेजी के समान एक कामकाजी और लचकदार भाषा है जिसमें जितनी नई बातें मिलाई जायँ सब मिल सकती हैं। इससे भविष्य में उसकी बेहद उन्नति हो सकती है।

इसकी जाँच तो पहले हो चुकी। जिसमें हमारे नित्य के बोलचाल के संस्कृत शब्दों के उच्चारण करने की क्षमता नहीं, हमारे घरेलू और कामकाज के शब्द जिसकी नादरुचि के अनुकूल नहीं वह कितनी नई बातों को ग्रहण कर सकती है, समझने की बात है। नई बातों को ग्रहण करने का गुण हिन्दी में है। यह हिन्दी ही का गुण था कि उसमें अरबी और फारसी के बहुत ही कठिन रूढ़ शब्द मिलाकर कुछ लोगों ने अपने लिखने पढ़ने के लिए एक अलग भाषा बनाई जिसकी ध्वनि यहाँ तक विदेशी हो गई कि देश की बोलचाल और कामकाज के शब्द भी उसे अपरिचित और बेमेल लगने लगे। अब हिन्दी और उर्दू में भेद किस बात का है वह सुनिए। जो अरबी फारसी आदि के शब्द बोली में मिल गए हैं हिन्दी उनका व्यवहार बड़ी खुशी से करती है। पर यदि उसे नए शब्दों की जरूरत होती है तो अपनी और बहिनों की तरह उसे संस्कृत से लेती है। यह स्थिर करने के लिए कि कौन कौन से विदेशी शब्द हमारी बोली में मिल गए हैं हम देखते हैं कि किन किन शब्दों को वे लोग बोलते हैं जिन्होंने उर्दू वा फारसी की शिक्षा कभी नहीं र्पाई। जिन शब्दों को लोग पढ़कर वा मौलवी साहब से सीखकर बोलते हैं वे हमारी भाषा के नहीं समझे जाते।

4. इसे अंगरेजी सरकार का सहारा रहा है और अब भी है। यह ठीक है कि इसका कारण यह है कि अंगरेजी सरकार ने इन प्रान्तों के शासन सम्बन्धी कागज पत्र उसी भाषा में पाए। पर अंगरेज सरकार के पहले देश का राज्य जिन लोगों के हाथ में था उनका प्रबन्ध ऐसा विस्तृत और व्यवस्थित न था कि सारी प्रजा को वे लगाव में रख सकें। जिलों और तहसीलों के अमलों और क्लर्कों की इतनी बड़ी सेना तब नहीं थी। प्रजा के बहुत से काम तो बिना किसी लिखापढ़ी के तै कर दिए जाते थे। अत: उस समय राजकाज किस भाषा में चलाया जाता है, इसकी परवा करने की किसी को उतनी जरूरत न थी। पर अब यह अवस्था नहीं है। अब सरकार इस बात को अच्छी तरह देख रही है कि कचहरियों में जो भाषा लिखीपढ़ी जाती है वह जन साधारण् की भाषा नहीं है। उसको समझने के लिए बहुत से दीन प्रजाजन को पेट काट कर पैसे खर्च करने पड़ते हैं। दूसरे सरकार से सहारा पाकर ही कोई भाषा बड़ी नहीं हो जाती, उसे आप खुद आगे चलकर स्वीकार करते हैं।

5. उर्दू ऐसी लिपि में लिखी जाती है जिसमें शीघ्र लेखन प्रणाली का गुण है और जो कैथी वा नागरी की अपेक्षा अधिक आसानी से लिखी जाती है। इसके सिवाय इसके अक्षर ऐसे सुन्दर और मनोहर होते हैं कि देखते ही बनता है। जनाब डॉक्टर साहब! यह ख्याल बहुत पुराने जमाने का है कि हिन्दी की अपेक्षा उर्दू बहुत ही जल्दी लिखी जाती है। अब यह गलत साबित हुआ। और थोड़ी जल्दी लिखी भी जाय तो उसके पढ़ने की दिक्कत उसकी तेजी से सौ गुनी हजार गुनी बढ़कर है। जिस फारसी लिपि की गड़बड़ी के कारण चौथाई प्रजा त्राहि त्राहि कर रही है, जिसमें हमारे मुँह से निकले हुए शब्दों को ठीक ठीक अंकित करने की शक्ति नहीं, उससे हमें क्या लाभ पहुँच सकता है? जिनको एक दिन में सीखकर लोग मनुष्य के मुँह से निकली हुई प्रत्येक ध्वनि को अंकित करने में समर्थ हो सकते हैं उन नागरी अक्षरों के गुण बतलाने की यहाँ जगह नहीं। जिस वर्णमाला के वैज्ञानिक क्रम और विभाग को देखकर योरोपियन विद्वान् इतने चकित हुए कि उसे अपौरुषेय तक कह डाला उसके इस रूप से जो भारतवासी अपरिचित रहे तो उसे हमारे दुर्भाग्य के कारणों में से समझना चाहिए।

रही फारसी अक्षरों की खूबसूरती की बात। निगाह से देखनेवालों की तो बात ही क्या, इस देश के अधिकांश लोग इसे जानते हैं। जिन अक्षरों का अच्छा टाइप तक नहीं ढल सकता उन्हें लेकर शिक्षित समाज क्या करेगा?

इसके उपरान्त चटर्जी साहब ने जान बीम्स और अपने उर्दू हिन्दी के शिक्षक गार्सा डि टासी के वाक्य उध्दृत करके अपने मत को पुष्ट करना चाहा है। पर डॉक्टर साहब को चाहिए था कि वे सब विद्वानों की सम्मतियों का मिलान करके देखते। डॉक्टर हार्नली ने तो साफ कहा है

With the extension of the Mohammedon Power, the use of Urdu spread over the Hindi area, but it remained the Language of those exclusively, who were more immediately connected with that power. It never became the vernacular of the people. इसके सिवाय चटर्जी साहब को जानना चाहिए कि उन दोनों विद्वानों के पीछे जिनका आपने प्रमाण दिया है, भाषा सम्बन्धी खोज बड़ी छानबीन के साथ हुई है। डॉक्टर ग्रियर्सन ने अपना क्या मत प्रकट किया है इस पर भी आपने विचार किया?

आगे चलकर चटर्जी महोदय उर्दू सेवियों को चेताते हैं कि 'भाइयो, अगर तुम उर्दू का प्रचार करना चाहते हो तो हिन्दी के अधिक शब्दों का व्यवहार करो, क्योंकि यह एक साधारण नियम है कि भाषा की उन्नति उसकी विशुद्धता, सरलता, और सुबोधता के अनुसार होती है।' इस कथन में डॉक्टर महोदय स्वीकार करते हैं कि हिन्दी के शब्द अधिक सुबोध और सरल हैं। अगर आप एक अजनबी बोली को फैलाना चाहते हैं तो इस देश की स्वाभाविक भाषा हिन्दी ने आपकी कौन सी गठरी मारी है कि आप इतने जोश से उर्दू को और सब भाषाओं से जुड़ी हिन्दी की ओर से फेरा चाहते हैं? अब तो महाराष्ट्र, बंगाल और गुजरात आदि प्रान्तों के विद्वान् भाई नागरी अक्षरों और हिन्दी भाषा के लिए उद्योग कर रहे हैं तब आप अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग क्यों पकाने लगे?

दूसरी सलाह आप यह देते हैं कि उर्दू लेखकों और ग्रन्थकारों को चाहिए कि वे लोग अपने भाव, अपने नायक नायिका और अपनी उपमाएँ भारतवर्ष से लिया करें, अरब और फारस से नहीं। अर्थात् वे हातिम, नौशेरवाँ और रुस्तम की जगह कर्ण, युधिष्ठिर और भीम की तारीफ किया करें, बुलबुल की सदा की जगह कोयल और पपीहे की वाणी सुनें। लाला और नरगिस की जगह कुन्द केतकी की बहार देखें, यारों के गन्दे कूचों को छोड़ लताकुंज और काननों के फेरा लगाएँ, ऋंगार में कफन, खून और खंजर का बीभत्स व्यापार छोड़ दें।

अन्त में आप अपने इन नीचे लिखे हुए वाक्यों से उर्दू की यथार्थ स्थिति आप ही खोल देते हैं!

''मुसलमानों को भारतवर्ष के प्राचीन ऐतिहासिक महापुरुषों का उतना ही अभिमान करना चाहिए जितना कि हिन्दुओं को। यदि इस देश के सब मुसलमान भारतवर्ष के प्रति वैसा ही प्रेम प्रगट करते जैसा कि उनके एक भाई ने किया तो आज उर्दू साहित्य पर यह कलंक न लगाया जाता कि वह परिपूर्ण और उन्नत भावों से युक्त नहीं है, वह देश की आजकल की आवश्यकताओं के उपयुक्त नहीं है, वह देश के भविष्य के शिक्षित सन्तानों के काम की नहीं है।''

पाठक, इन उपर्युक्त वाक्यों से हम क्या समझे? यही न कि उर्दू को एक विशेष वर्ग के लोगों ने अपने लिए बनाया है। वह देश के लोगों की भाषा नहीं है।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, दिसम्बर, 1909 ई.)
[ चिन्तामणि, भाग-4 ]


भाषा की उन्नति

सर्वसाधारण की शिक्षा देशभाषाओं...द्वारा हो सकता है। देश (की भाषाएँ) जितनी ही अधिक उन्नत होंगी सर्वसाधारण के विचार भी उतने ही अधिक उन्नत होंगे। भाषा की उन्नति से हमारा मतलब दो बातों से है

1. एक तो भाषा रूपी कल की उन्नति, अर्थात उसकी अवतारण वा प्रकाशन शक्ति की वृद्धि, जिससे हृदय का कोई भाव भी खींचकर बाहर निकाला जा सके, सृष्टि का कोई रहस्य भी हृदय के भीतर प्रत्यक्ष किया जा सके। यह उन्नति कुछ तो शब्दों की संख्या पर निर्भर रहती है, पर विशेषकर उनकी योजना पर। शब्दों का भंडार भरापूरा रहने पर भी नवीन और स्वतन्त्र योजना के बिना भाषा जहाँ की तहाँ पड़ी रहती है, आगे नहीं बढ़ती। अत: उसकी वृद्धि ऐसे लेखकों के हाथ में पड़कर होती है जो अपनी भावनाओं के अनुसार भाषा को ले चल सकते हैं। जिन्हें किसी शब्द के पहिले एक बँधे हुए विशेषण के सिवाय कोई दूसरा रखते डर लगता है, उनके किए कुछ नहीं हो सकता। जो कई भाषाओं की भिन्न भिन्न प्रदर्शन प्रणालियों को परखकर वस्तुओं के भिन्न भिन्न रूपों और गुणों से जानकार रहते हैं आरम्भ में वे भी अपनी भाषा द्वारा देशवासियों को विस्तृत और सूक्ष्म दृष्टि प्रदान कर सकते हैं। अंगरेजी कई भाषाओं की वर्णन प्रणालियों को लेकर अपनी इतनी उन्नति कर सकी है। जो पुस्तकें और भाषाओं से अनुवादित होकर अंगरेजी में जाती हैं वे नई बातों की जानकारी फैलाने के साथ ही साथ प्रच्छन्न रूप से अंगरेजी भाषा में नवीन नवीन वर्णन शैलियों की भी जड़ जमाती हैं। अंगरेजी भाषा पर पूर्वीय साहित्य का बड़ा भारी असर पड़ा है। संस्कृत और फारसी पुस्तकों के अनुवादों ने अंगरेजी...वर्णन शैली को प्रशस्त किया है। 19वीं शताब्दी के कई अंगरेज कवियों में जगह-जगह पूर्वीय वर्णन प्रणाली की छाया साफ दिखाई पड़ती है। इसी से संस्कृत आदि और भाषाओं के अनुवाद जहाँ तक अविकल हो सकते हैं, अंगरेजी में किए जाते हैं। पृथ्वी पर की अनेक जातियाँ ज्यों-ज्यों अपना व्यवहार एक दूसरे के साथ बढ़ाती जाती हैं त्यों त्यों उनकी भाषाओं की वर्णन प्रणालियाँ प्रशस्त होती जाती हैं। किसी वस्तु का कई रीति से वर्णन करना मानो उसे कई भिन्न भिन्न स्थानों से खड़े होकर देखना है। अच्छे लेखक वे हैं जो अपने पाठकों को ऐसे स्थान पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं जहाँ से निर्दिष्टं वस्तु का अंग-प्रत्यंग प्रत्यक्ष हो जाता है। अत: वर्णन प्रणाली की प्रशस्तता वा उन्नति पहिली चीज है। महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन इन्हीं के उद्योग...।

2. दूसरी उन्नति प्रत्येक विषय के ग्रन्थों की बढ़ती है। जब हम अच्छी समुपयोगी कल प्रस्तुत कर चुके तब हमें उससे भरपूर काम लेने और अच्छा-अच्छा माल तैयार करने का उद्योग करना चाहिए। तैयारी के समय देश की माँग और आवश्यकता का ध्या न रख लेना भी बहुत जरूरी है। हिन्दी में अभी जिन जिन विषयों के अभाव हैं उनका पूरा करना भिन्न भिन्न वर्ग के लोगों के हाथ में है। आधुनिक विज्ञान, दर्शन, शिल्प, शासन शास्त्र आदि के पारगामी जो हमारे प्रसिद्ध देशी भाई हैं हिन्दी की उनसे प्रार्थना है कि वे अपने अपने विषयों के अच्छे सर्वांगपूर्ण ग्रन्थ या तो स्वयं लिखा करें या उनकी तैयारी में सहायता दिया करें। मुझे पूरा भरोसा है कि केवल ऐसे लोगों को छोड़ जिन्हें यह सूझ रही है कि इस देश में सब विद्याओं और कलाओं का प्रचार अंगरेजी ही के द्वारा होगा और किसी के.......................पर सोचने की बात है कि क्या भारतवर्ष के प्रत्येक श्रेणी के स्त्री.-पुरुष कभी एकदम अंगरेजी बोलने लगेंगे ? अथवा जो थोड़े से लोग अंगरेजी लिखे पढ़े हैं उन्हीं से हमारी राजनीतिक, सामाजिक और औद्योगिक सब आवश्यकताएँ पूरी हो जायँगी। क्या सब दिन इस बात की जरूरत बनी रहनी चाहिए कि हम पहिले एक विदेशी भाषा सीखने का श्रम उठाएँ तब जाकर कहीं किसी वैज्ञानिक वा औद्योगिक विषय का आरम्भ करें। निश्चय समझिए कि विज्ञान और कला आदि जब तक दूसरे की भाषा में हैं तब तक वे दूसरे की सम्पत्ति हैं। फिर हम क्यों न इन विषयों को अपनी पूँजी और अपना सहारा बना लें। इनके बिना पृथ्वी पर की कोई जाति अब अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकती। मैं हर्ष से फूले अंग नहीं समाता जब देखता हूँ कि अमेरिका और इंग्लैंड की उच्च शिक्षा पाए हुए हमारे कुछ दूरदर्शी और विद्वान देश भाई इस बात को समझ रहे हैं। पंडित सत्यदेव ने, जिनके लेख 'सरस्वती' में बराबर देखने में आते हैं, अमेरिका के शिकागो नगर में 'हिन्दी साहित्य समिति' स्थापित करके बड़ी दूरदर्शिता का काम किया है। इस समिति का प्रभाव यह पड़ेगा कि जो भारतवासी अमेरिका में वैज्ञानिक शिक्षा पाने जायँगे वे अपना सम्बन्ध अपनी देशभाषा से बनाए रख सकेंगे और उसके प्रति अपने कर्तव्यम को समझते रहेंगे। बाबू महेश चरण सिंह अमेरिका से विज्ञान और कृषि की ऊँचे दरजे की शिक्षा प्राप्त करके लौटे हैं। इन्होंने रसायन शास्त्र की एक पुस्तक लिखकर हमारी आशाओं के लिए एक अच्छा आधार खड़ा कर दिया है। इसी प्रकार हम प्रत्येक विभाग के विद्वानों से कुछ न कुछ आसरा रखते हैं। जापान की राजधानी टोकियो में एक हिन्दी विद्यालय का खुलना कुछ कम आशा बाँधने वाली बात नहीं है। सुनते हैं कि जापानी लोग भी नागरी अक्षरों के गुण को कुछ-कुछ पहिचानने लगे हैं। वे देख रहे हैं कि उनकी भाषा भी नागरी अक्षरों में बड़ी सफाई के साथ लिखी जा सकती है।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, जनवरी, 1910 ई.)


मान्य भाषा

सबसे पहिले हमें यह देखना है कि साहित्य की भाषा का संगठन होता कैसे है। एक भाषा ग्रहण करने के पहिले लोग लिखने पढ़ने में अपने अपने प्रान्त की भिन्न भिन्न बोलियों का व्यवहार करते हैं। जिस भू भाग में लिखने की चर्चा तथा भिन्न भिन्न प्रदेशों के लोगों के सम्मेलन का अवसर अधिक होता है, अच्छे प्रभावशाली कवि और ग्रन्थकार होते हैं, उनकी बोली का अनुकरण धीरे-धीरे और भागों के लोग भी करने लगते हैं। इस प्रकार क्रमश: यह बोली और प्रान्तों के पढ़े लिखे लोगों पर अपना अधिकार जमाकर एक बड़े भू भाग की साहित्य भाषा बन जाती है। अत: यह सिद्ध हुआ कि साहित्य की भाषा यथार्थ में किसी एक प्रान्त की बोली ही है जो कुछ परिवर्तित और परिमार्जित होती, आवश्यकतानुसार दूसरी बोलियों के शब्दों को समेटती अन्य प्रान्तों के बीच भी फैल जाती है। वह कोई बिलकुल गढ़ी हुई, बनावटी या आकाश से उतरी हुई भाषा नहीं होती। यदि उस बोली का व्याकरण सीधा, और उसके नियम विस्तृत हुए तो वह और भी जल्दी अपने लिए जगह कर लेती है। जो लोग संस्कृत को बिलकुल बनावटी और गढ़ी हुई भाषा समझे हुए हैं उन्हें शायद यह बात अच्छी न लगे। पर यदि वे विचार कर देखेंगें तो उनके जी में भी यह बात जमने लगेगी कि आरम्भ में एक मूल आर्य भाषा से निकल कर फैली हुई अनेक बोलियों में से एक को चुनकर ही उसका संस्कार किया गया था। यदि ऐसा न होता तो पाणिनि को अपने सूत्रों में पूर्वीय और पाश्चात्य प्रयोगों का निर्देश नहीं करना पड़ता। जब कुछ आर्य लोग पंजाब से चलकर जहाँ उनकी बस्ती जम गई थी, पूर्व और दक्षिण की ओर फैलने लगे तब उनकी बोलियों में स्थानिक भाषाओं के संसर्ग से विभेद पड़ने लगा। इसी अनार्यत्व को बचाने के लिए प्राचीन वैयाकरण पंजाब और अफगानिस्तान के पास की बोली को आर्यों की टकसाली भाषा मानकर उसके नियम ढूँढ़ ढूँढ़ कर निकालने लगे। अत: यह न समझना चाहिए कि इन नियमों और सूत्रों के जितने प्रयोग सिद्ध हो सकते हैं वा जितने शब्द बन सकते हैं वे सबके सब बोलचाल में थे।

यद्यपि आरम्भ में हिन्दी कविता भिन्न भिन्न प्रदेशों में भिन्न भिन्न बोलियों में होनी आरम्भ हुई पर 16वीं शताब्दी के कृष्णोपासक वैष्णव कवियों के समय से उसे कुछ-कुछ एकरूपता प्राप्त होने लगी। देश के प्रत्येक विभाग के लोग ब्रजभाषा में ही कविता करने का प्रयत्न करने लगे। कवित्ता, सवैया, छप्पय आदि के लिए तो मानो ब्रजभाषा बनी ही थी। केवल दोहे और चौपाइयों में और प्रान्तों की बोलियों के लिए जगह रह गई। यहाँ तक कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी अपनी कवितावली की भाषा व्रज ही रक्खी। अत: हमें यह कहने में कुछ संकोच नहीं कि इन्हींल व्रज के भक्त कवियों की भाषा ऐसी हुई जो अपने मण्डल से और आगे बढ़ी और फैली। आज यदि ये ब्रजभाषा के कवि राह न निकाल गए होते तो वर्तमान हिन्दी और उर्दू गद्य को इतने विस्तृत भूभाग में स्थान न मिलता, सारे उत्तरीय भारत के लिए एक साहित्य भाषा संगठित न होती।

आगरे और दिल्ली के आसपास की बोली ही गद्य के लिए चुनी गई। लल्लू लाल ने अपना प्रेमसागर इसी बोली में लिखा। अब यह खड़ी बोली साहित्य की मान्य भाषा हो गई है। इधर बोलियों का मुख्य प्रभेद क्रिया के रूपों में देख पड़ता है। अत: यह जानने के लिए कि हिन्दी की यह टकसाली भाषा यथार्थ में कहाँ की है हमें देखना होता है कि उसकी क्रिया के रूपों का व्यवहार किस भूभाग के ग्रामों में होता है। यह जानी हुई बात है कि 'हम आते हैं', 'वे जा रहे हैं', और 'वह आवेगी' आदि वाक्य दिल्ली, आगरा, मेरठ आदि के देहातों को छोड़ बनारस, बलिया और आजमगढ़ के देहातों में नहीं बोले जाते। अत: वर्तमान हिन्दी भाषा का घर दिल्ली, आगरे के आसपास की भूमि ही कही जा सकती है। यहाँ पर खड़ी बोली और ब्रजभाषा के भेद निर्णय की आवश्यकता नहीं है। पंजाबी तथा ब्रजभाषा का संगम स्थान दिल्ली की खड़ी भाषा पर अधिक जोर दिया गया है जिससे पंजाब और गंगा जमुना के प्रदेश एक भाषा सूत्र में बाँध गए। अस्तु, किसी शब्द का कौन सा रूप ग्राह्य होगा, इसे स्थिर करने के लिए हम यह देखते हैं कि उस शब्द का कौन सा रूप ऊपर कहे हुए स्थानों में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार किस शब्द वा वाक्य की अपेक्षा कौन शब्द वा वाक्य माननीय है इसका निश्चय भी किया जाता है, जैसे बनारस, मिरजापुर, गोरखपुर आदि के पढ़े लिखे लोग 'थरिया', 'सूति जाव' आदि न लिखकर 'थाली' 'सो जाओ' लिखेंगे। इसी तरह 'गोड़' के स्थान पर वे 'पैर' ही लिखेंगे। जो लोग लिखने पढ़ने की हिन्दी में इन प्रान्तीय शब्दों को लाते हैं वे कुशिक्षित समझे जाते हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि कुछ हिन्दी लेखक इस प्रान्तीय दोष (Provincialism) से अपने को नहीं बचा सकते हैं। अभी हाल में एक पुस्तक बनी है जिसमें खड़ी बोली के साथ एक पूर्वीय जिले के प्रचलित शब्दों का बड़ा बेढंगा मेल कराया गया है।

समाप्त करने के पहिले एक बात कह देना आवश्यक है। यद्यपि यह मान्य भाषा (Standard Language) यथार्थ में एक प्रान्त की बोली ही होती है पर जब वह एक बड़े भूभाग की साहित्य भाषा हो जाती है तब वह अपनी संकीर्णता को कम करने लगती है। वह अपने अभाव की पूर्ति के लिए और और प्रान्तों के शब्दों को लेती है। यदि किसी पशु, पक्षी, वृक्ष या किसी और वस्तु का नाम उसके मूलस्थान में न हुआ तो और प्रान्तों में उनके जो नाम प्रचलित हैं वे ले लिए जाते हैं। अभी हमारी हिन्दी में बहुत से पशु पक्षी तथा और बहुत सी वस्तुओं के नाम स्थिर नहीं हैं। लोग अपने प्रान्त के अनुसार उनके लिए भिन्न भिन्न नामों का प्रयोग करते हैं। अब ये नाम उपर्युक्त प्रक्रियानुसार स्थिर हो जाने चाहिए।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, मार्च, 1910 ई.)
[ चिन्तामणि भाग-4 ]


हम हिन्दी हिन्दी क्यों चिल्लाते हैं

यह तो सब लोग जानते हैं कि आज दिन जो हिन्दी की अवस्था देखी जाती है वह पूर्व उद्योगों से उपस्थित हुई है न कि समय की स्वच्छन्द गति से। यदि आज से 40 वर्ष पहले कुछ दूरदर्शी महात्मा समय की बिगड़ी हुई चाल के विरुद्ध खड़े होकर बल न लगाते तो सर सैयद अहमद के कथनानुसार हिन्दी गँवारों की ही बोली हो जाती और फिर उसमें न 'सम्पत्तिशास्त्र', 'केमिस्ट्री' और 'वैज्ञानिक कोश' बनने की नौबत आती, न भारतमित्र, हितवार्ता और अभ्युदय देखने में आते। इन प्रदेशों के बहुत से आदमियों का गार्हस्थ जीवन किरकिरा होता चला जाता, उनके भावों से उनकी माता, पत्नी, भगिनी आदि के भावों की सहयोगिता बराबर घटती चली जाती और वे लाचार तवायफों की 'अदबी खिदमात' से अपना पेट भरते रहते। जिन परम्परागत पवित्र भावों का पोषण भारत की रमणियाँ दृढ़ता से करती आ रही हैं उनसे उन्हें अलग करने की अपेक्षा उन पुरुषों को अपने लिए दूसरे समाज में आनन्द ढूँढ़ना सहज था। हमारे देश की स्त्रियाँ राम, लक्ष्मण, सीता, सावित्री, नल दमयन्ती सम्बन्धी रोम रोम में भरे हुए आवेग को निकाल कर शीरी फरहाद और लैला मजनूँ के इश्क का सबक कहाँ तक सीखतीं। वे अपनी 'फूलों की सेज', 'पिया परदेश' 'कमल और भौंरा', 'कोयल और पपीहे', 'सावन भादों की ऍंधोरी रात' वाले प्यारे गीतों को भूल, खंजर और कफन लेकर अपने पतियों को जनाजे में सुला उन्हें सीधा कब्र का रास्ता कैसे दिखलातीं? वे सुख दु:ख, दया, माया, प्रीति आदि सीधे सादे शब्दों का बोलना छोड़ 'दक्काक', 'तगाफुल,' और 'बुग्ज़' आदि सीखने के लिए अपना गला कहाँ तक दबातीं? इसी से पुराने ढर्रे के केवल फारसी उर्दू की तालीम पाए हुए लोगों का गार्हस्थ बन्धन बहुत ढीला देखा गया है, धार्मानुकूल पवित्र प्रणय का निर्वाह उनमें बहुत कम देखा गया है। इस प्रकृति के प्रभेद का सोचनीय प्रभाव हम बहुतेरे घरानों में अब तक देख रहे हैं। देश के चिर पोषित साहित्य के भावों से सहानुभूति न रखने के कारण न जाने कितने अभागे अपनी अर्धागिंनी तक के अन्त:करण का सृष्टि सौन्दर्य नहीं देख सकते। अपने परिवार में उन्हें वह सुख और शान्ति नहीं मिल सकती जिनकी छाया में मनुष्य संसार के बड़े बड़े कार्य कर सकते हैं। हमारे इन प्रदेशों के बहुतेरे पढ़े लिखे लोगों का ग्रहस्थे जीवन रोचकतारहित, फीका और शिथिल हो गया है। उनमें सहयोग, उत्साह और प्रेम की वह मात्र नहीं जो बंग और महाराष्ट्र आदि देशों में देखी जाती है। स्त्रीो पुरुष किसी एक आख्यायिका पर, किसी एक इतिहास पर, किसी एक कविता पर वाग्विलास करते हुए यहाँ कम देखे जाते हैं। दोष अपनी हिन्दी भाषा से उदासीन कुछ पुरुषों का है। स्त्रियों से यह आशा करने की अपेक्षा कि वे विदेशी भावों को घोल कर पी जायँ इन कर्तव्यीविमूढ़ पुरुषों के लिए स्वदेशीय साहित्य की ओर ध्यान देना अधिक उचित है। हे समाज सुधार की पुकार मचानेवालो, तुमने कभी इस दोरंगेपन पर भी ध्यान दिया है ? ध्यान रक्खो कि जब तक देशी साहित्य के संचार से परिवार में भावों का सम्मेलन न होगा तब तक ये लोग अपने ग्रहस्थन जीवन से शक्ति, उत्साह और प्रफुल्लता नहीं प्राप्त कर सकते। अब से तुम हिन्दी भाषा को फैलाना अपना कर्तव्यन समझो और समाज का इस विपत्ति से उद्धार करो।

उर्दू के लेखक भी अपने बेढंगेपन को अब देखने लगे हैं। अभी उस दिन उर्दू साहित्य सम्मेलन के सभापति ने उर्दू शायरी पर देशी रंगत चढ़ाने की तजवीज बतलाई थी। पर भाइयो! 'कोयल के नगमों' और 'कदम्ब के गुंचों' से तो और भी बचना चाहिए। मेरा अभिप्राय यह कदापि नहीं कि विदेशी साहित्य का अध्य'यन न किया जाय। मेरी विनती इतनी ही है कि अपना भाषा सम्बन्धी अस्तित्व न खो दो, अपने कई सहस्र वर्षों के संचित भावों को तिलांजलि मत दो।

ऊपर हम अपनी सामाजिक हानि दिखला चुके। कहना न होगा कि जो लोग अपने परिवार के मेल में नहीं वे जनसंख्या की सहानुभूति से कितनी दूर जा पड़े होंगे, सर्वसाधारण के हृदय को कैसे स्पर्श कर सकते होंगे? उनके अक्षर, उनकी बोली तथा उनकी धारणाओं का सहारा लिए बिना वे उन पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं? अपने और प्रान्तों के भाइयों से जो भाषा सम्बन्ध था उसे तोड़ ये उर्दू को सर्वस्व मानने वाले लोग क्या बन गए इसे मैं अपने पिछले लेखों में दिखला चुका हूँ। अत: राजनीतिक सम्प्रदाय के लोगों का भी परम धर्म है कि वे इस भाषा सम्बन्धी एकता को नष्ट न होने दें और चटपट हिन्दी के प्रचार में लग जायँ।

धर्म सम्बन्धी सभाओं के लिए भी हिन्दी के द्वारा काम करना परम आवश्यक है। इस बात को ईसाई लोगों ने बहुत जल्दी समझा और अपनी पुस्तकें व पैम्फलेट आदि हिन्दी में छपवा कर अपनी शिक्षाओं का प्रचार किया। देखिए, इनके भजन देश के प्रचलित भावों को लिए हुए कैसे देशी ढंग पर बने होते हैं। यदि मुसलमान लोग भी इसी बात का अनुसरण करें और हिन्दी की ओर ध्यान दें तो उनके बहुत से भाई अपने धर्म की अमूल्य शिक्षाओं से वंचित न रहें। सनातन धर्म और आर्य समाज के प्रचारकों से भी हमारी इतनी प्रार्थना है कि वे अब हिन्दी की उन्नति के उपायों को अपनी कार्यावली में सम्मिलित करें।

अब हम अन्त में अपने हिन्दी प्रेमी भाइयों की ओर आते हैं जिन्होंने उसकी उन्नति का बीड़ा उठाया है। उनके ध्यान देने की बात यह है कि हिन्दी अभी ऐसे मार्ग पर नहीं आ गई कि आप लोग उसे समय के आधीन छोड़कर किनारे हो जायँ। इससे मेरा यह तात्पर्य नहीं कि हिन्दी में अच्छी पुस्तकें नहीं बन रही हैं, समाचार पत्र नहीं निकल रहे हैं, मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि उनके प्रचार के लिए उस जोर शोर के साथ उद्योग नहीं हो रहा है जिस जोर शोर के साथ पहले हो गया। उसके मार्ग की बाधाओं को हटाने का यत्न यथेष्ट नहीं देखने में आता। यही कारण है कि हिन्दी में अच्छी पुस्तकें भी छपती हैं समाचार पत्र भी निकलते हैं पर जितने आदमियों के हाथों में उन्हें जाना चाहिए उतने आदमियों के हाथ में वे नहीं पहुँच पाते। इस प्रकार प्रकाशकों और लेखकों का उत्साह ढीला रहता है। अस्तु, नीचे लिखी बातों का चाहे जिस प्रकार हो प्रबन्ध करना चाहिए

1. उपयुक्त स्थानों पर हिन्दी पुस्तकों की लाइब्रेरी और दुकान खोलना।

2. अंगरेजी स्कूलों में छात्राों को दूसरी भाषा हिन्दी लेने के लिए वृत्ति आदि द्वारा उत्साहित करना।

3. घूम घूम कर हिन्दी की उपयोगिता पर व्याख्यान देनेवालों का प्रबन्ध करना।

4. प्रजा को चेताना कि अदालत में दरख्वास्तें आदि हिन्दी में भी पड़ सकती हैं तथा हिन्दी में अधिक दरख्वास्तों के पड़ने का प्रबन्ध।

5. सरकार से प्रार्थना करना कि अदालत के मुहर्रिर लोग समन और डिगरी आदि की नकल हिन्दी में भी लिखा करें।

6. राजा महाराजाओं से अपने दरबार में हिन्दी को आश्रय देने और उसके साहित्य का पोषण करने के लिए अपील करना।

7. हिन्दी नाटकों का घूम घूम कर अभिनय करनेवाली व्यवसायी मंडलियों की स्थापना।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, अप्रैल-मई, 1910 ई.)
[ चिन्तामणि, भाग-4 ]


हिन्दी की पूर्व और वर्तमान स्थिति

समस्त उत्तरीय भारत के बीच हिन्दी की स्थिति क्या थी और अब क्या है इसका संक्षेप विचार आवश्यक जान पड़ता है। देश के ग्रहस्थि, सामाजिक, राजनीतिक तथा धर्म सम्बन्धी जीवन से इसका कितना लगाव रहा है तथा और देशभाषाओं से इसका क्या सम्बन्ध चला आ रहा है यही देखने का थोड़ा बहुत प्रयत्न हम यहाँ करेंगे।

कोई भाषा जितने ही अधिक व्यापारों में मनुष्य का साथ देगी उसके विकास और प्रचार की उतनी ही अधिक सम्भावना होगी। वह भाषा जो किसी विशेष अवसर वा स्थान के लिए गढ़ी जाती है लाख उपाय करने पर भी जन साधारण के नित्य प्रति के व्यवहार में नहीं घुस सकती। जिन बातों को हम अधिक सुनते हैं, जिन वस्तुओं को हम अधिक देखते हैं, जिन शब्दों को हम अधिक बोलते हैं, उन्हीं को लक्ष्य किए हुए जो साहित्य चला है वही हमारा साहित्य है और वही भूले भटकों को प्रकाश का काम देगा। हमारे हृदय को उन शब्दों को सुनकर द्रवीभूत होने का अभ्यास अधिक रहता है जो हमारे घरों में सुनाई पड़ते हैं क्योकि वहाँ प्रकृति से हमारा अधिक मेल रहता है। अब यदि हम इन शब्दों और वाक्यों को बिलकुल छोड़ दें तो हमारी लिखने पढ़ने की भाषा में वह शक्ति नहीं रह जाती। समाज भी इसी ग्रहस्थँ जीवन का एक विकास है अत: हमारी हिन्दी को जो प्रेरणा इतिहास की बड़ी बड़ी घटनाओं से मिली है वह किसी से छिपी नहीं है। लाहौर के चन्दबरदाई की वीररसोद्गारिणी कविता युद्धा में अग्रसर होते हुए महाराज पृथ्वीराज के कानों में बराबर पड़ती रही। बीकानेर के पृथ्वीराज के एक दोहे ने महाराणा प्रतापसिंह पर जादू का असर किया। भूषण के कवित्ता महाराष्ट्र के वीर छत्रापति शिवाजी के मन में औरंगजेब के अन्याय को दमन करने की उत्तोजना बराबर बनाए रहे। शेख बुरहान के चेले कुतबन और मलिक मुहम्मद जायसी ऐसे हिन्दूभावों से सहानुभूति रखनेवाले कवि हुसेनशाह और शेरशाह को लोकप्रिय और प्रजापालक बनाने में सहायक हुए। 15वीं शताब्दी से देश में हिन्दी द्वारा भक्ति का जो स्रोत उमड़ा उसने सारे उत्तरीय भारत को प्रेम और शांत रस में मग्न कर दिया। सारांश यह कि 800 वर्ष से जातीय जीवन में जितने उलट फेर होते आए उन सबका आभास हिन्दी साहित्य में विद्यमान है और किसी जाति के साहित्य का यही लक्षण है। हिन्दी आरम्भ ही से उत्तरीय भारत के एक बड़े भूखंड की लिखने की भाषा रही। उसी में जाति का पूर्व अनुभव संचित है और अब भी उसी तक जनसाधारण की पहुँच है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार देश में फैल रहा है। हिन्दी की शब्दावली को कुछ रूपान्तरों के साथ बंगला, मराठी और गुजराती आदि में व्याप्त देख दूरदर्शियों को यह सूझने लगा है कि हिन्दी उन स्थानों की भी साहित्य भाषा अच्छी तरह हो सकती है जहाँ उपर्युक्त भाषाएँ बरती जाती हैं। यद्यपि लोगों का ध्या न इस ओर अब आकर्षित हुआ है पर यह स्थिति हिन्दी को प्राचीन समय में प्राप्त थी और उसने उसके बल पर अपनी सीमा के बाहर हाथ पैर भी फैलाए थे पर पीछे भिन्न भिन्न देशभाषाओं में साहित्य की वृद्धि हो जाने पर वह कुछ दब सी गई। हिन्दी सारे उत्तरीय भारत की राष्ट्रभाषा पुराने समय में भी थी। मैथिल कवि विद्यापति ठाकुर ने अपने पदों को हिन्दी से मिलती जुलती भाषा में लिखने के अतिरिक्त कुछ कविताएँ शुद्ध हिन्दी में भी रची हैं। बंग भाषा के पुराने कवि भारतचन्द राय ने भी हिन्दी में कुछ कविताएँ की हैं। इससे प्रतीत होता है कि उत्तरीय भारत में हिन्दी किसी समय साहित्य की परिष्कृत भाषा समझी जाती थी। गुजराती के पुराने नाटकों में पहिले पात्रों का कथोपकथन ब्रजभाषा में कराया जाता था। अब भी गुजरात में ब्रजभाषा का व्यवहार बहुत है। तुलसी, सूर आदि महाकवियों के पद बहुत दूर दूर तक फैले। जम्मू में 'सुदामा मन्दिर देख डरे' आदि पद स्त्रियों में बराबर प्रचलित हैं। महाराष्ट्र के राजदरबारों में हिन्दी कवियों का बड़ा मान होता था। हिन्दी पद्य महाराष्ट्र देश में बड़ी चाह से सुने जाते थे। पहिली ही भेंट में भूषण के कविताओं को सुनकर शिवाजी का प्रसन्न होना यह सूचित करता है कि शिवाजी लिखने पढ़ने की हिन्दी अच्छी तरह जानते थे। पूना, नागपुर, इंदौर आदि के मरहठे दरबारों में हिन्दी कवियों के रहने का पता बराबर लगता है। अत: यह मान लेने में कोई संकोच नहीं कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का रूप पहिले से प्र्राप्त है। हाँ, यह ठीक है कि जानबूझकर किसी ने एक भाषा फैलाने के विचार से कोई प्रयत्न नहीं किया था। कुछ और ही कारणों से उसने अपने लिए आपसे आप जगह की थी। उसी स्थान की प्रचलित भाषा (समुदाय विशेष की गढ़ी हुई नहीं) का लोग दूर दूर तक अनुकरण करते हैं जहाँ सामाजिक, राजनीतिक तथा धर्म सम्बन्धी अभिप्रायों से भिन्न भिन्न प्रान्तों के लोग कुछ दिन आकर रहते हैं। दिल्ली और आगरा बहुत दिनों तक भारतवर्ष के प्रधान नगर रहे जहाँ अनेक भिन्न प्रदेशों के लोगों का समागम होता था। उसके अतिरिक्त करोड़ों यात्रियों का मथुरा (आगरे के पास ही है) में आकर कथा वात्तर् में दिन बिताना भी पश्चिमी हिन्दी के प्रचार का उत्तोजक हुआ। अष्टछाप के कवियों ने तो ब्रजभाषा का सिक्का और भी जमा दिया और वह साहित्य की टकसाली भाषा बन गई। यहाँ तक कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी, जिनके रामचरितमानस को डॉक्टर ग्रियर्सन साहब अवधी बोली में लिखा बतलाते हैं, कवितावली आदि की भाषा प्राय: ब्रजभाषा ही रक्खी है। दिल्ली मेरठ की खड़ी बोली भी, यद्यपि वह साहित्य क्षेत्र में अग्रसर न हो सकी, लोगों की बोलचाल पर अपना अधिकार करती रही। भिन्न भिन्न प्रान्तीय बोलियाँ बोलने वाले लोग बड़े नगरों में परस्पर इस बोली का व्यवहार बोलचाल में करने लगे। जब मौलवी लोगों ने देखा कि बोलचाल में खड़ी बोली का प्रचार खूब हो रहा है तब उन्होंने एक कपोलकल्पना की कि शाहजहाँ के लश्कर से एक नई जबान उर्दू पैदा हुई है और उसमें किताबें लिखने लगे। पीछे से जश्बान की तहकषीकषत करनेवाले आलिमों ने उसे 'बिरज भाषा, फारसी, अरबी और तुरकी का एक मुरक्कब बतलाया', यह न सोचा कि इस तरह से भी संसार में कोई नई भाषा बनी है। किसी देश की भाषा में चाहे और देश के शब्द मिल जायँ और मिलते ही हैं, तथा उसका कुछ रूपान्तर हो जाय पर एक नई भाषा नहीं बन सकती। अत: उर्दू को एक नई भाषा बतलाना भ्रम है, वह यथार्थ में फारसी अरबी मिश्रित खड़ी हिन्दी है। यही बात डॉक्टर ग्रियर्सन ने भी स्वीकार की है और हिन्दुस्तानी को पश्चिमी हिन्दी का एक भेद माना है।
इसी प्रकार जिस भाषा का व्यापार, लेनदेन वा केवल राजकाज ही में अधिक काम पड़ता है वह सर्वप्रिय साहित्य भाषा नहीं बन सकती। क्योंकि उसकी पहुँच थोड़े से ऐसे मानव व्यापारों ही तक होती है जिनकी अवधि और सीमा बहुत थोड़ी तथा जिनका योगफल जीवन के और और व्यापारों से बहुत कम होता है।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, मार्च, 1911 ई ) 
[ चिन्तामणि, भाग-3 ]


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