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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 4
भाषा, साहित्य और समाज विमर्श

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम हिन्दी और हिन्दुस्तानी पीछे    

आज इस विज्ञ और कर्मकुशल समाज के बीच जो अपनी भाषा और उसमें साहित्य की गतिविधि का निरीक्षण करके दोनों का मार्ग स्वच्छ और परिष्कृत करने के लिए इस पुण्य भूमि पर एकत्र है, मेरा हृदय एक अपूर्व आनन्द का अनुभव भी करता है और रह रहकर संकोच से दबता भी है। संकोच का कारण हैज़ो स्थान मुझे यहाँ दिया गया है उससे यही प्रकट होता है कि आप लोग मुझसे अपने पवित्र प्रयत्न और शुभ अनुष्ठान में कुछ सहायता पहुँचने की आशा रखते हैं। पर अपनी शक्ति और योग्यता पर दृष्टि रखते हुए उस आशा के किसी अंश की भी पूर्ति की सम्भावना मुझे नहीं दिखाई पड़ रही है। इस विचित्र परिस्थिति में मुझे सन्तोष इसी बात का है कि मैं उपहास का पात्र होकर भी ऐसे विद्वानों और कर्मवीरों के संसर्ग में बहुत कुछ ज्ञान, बहुत कुछ उत्साह प्राप्त करूँगा। 
हम सब लोग यहाँ यह समझने के लिए एकत्र हैं कि हमारा साहित्य किस दशा में है, उसमें किन किन बातों का अभाव है, उसकी कौन कौन प्रवृत्तियाँ उत्कर्ष की ओर ले जानेवाली हैं और कौन कौन अपकर्ष की ओर तथा वर्तमान समय में वह किस रूप में हमारे जीवन को सरस, सबल और समृद्ध करने में सहायक हो सकता है।
साहित्य किसी जाति की रक्षित वाणी की वह अखंड परम्परा है जो उसके जीवन के स्वतन्त्र स्वरूप की रक्षा करती हुई जगत् की गति के अनुरूप उत्तारोत्तार उसका अन्तर्विकास करती चलती है। उसके भीतर प्राचीन के साथ नवीन का इस मात्र में और इस सफाई के साथ मेल होता चलता है कि उसके दीर्घ इतिहास में कालगत विभिन्नताओं के रहते हुए भी यहाँ से वहाँ तक एक ही वस्तु के प्रसार की प्रतीति होती है। जबकि साहित्य व्यक्त वाणी या वाग्विभूति का संचित भंडार है तब पहले भाषा ही पर ध्यातन जाना स्वाभाविक है। व्यक्त वाणी का यह संचय असभ्य जातियों में तो केवल मौखिक रहता है, पर सभ्य जातियों में पुस्तकों के

क्व फैजाबाद के प्रान्तीय साहित्य सम्मेलन में पठित भाषण।
भीतर हिफ़ाज़त के साथ बन्द रखा जाता है। मौखिक अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकता, पर पुस्तकस्थ होकर हजारों वर्ष तक चला चलता है। 
साहित्य की अखंड दीर्घ परम्परा सभ्यता का लक्षण है। यह परम्परा शब्द की भी होती है और अर्थ की भी। शब्द परम्परा भाषा को स्वरूप देती है और अर्थ परम्परा साहित्य का स्वरूप निर्दिष्ट करती है। यह दोनों परम्पराएँ अभिन्न होती हैं। इन्हें एक ही परम्परा के दो पक्ष समझिए। किसी देश की शब्द परम्परा अर्थात् भाषा कुछ काल तक चलकर जो अर्थ विधान करती है वही उस देश का साहित्य कहलाता है। कुछ काल तक लगातार चलते रहने से शब्द परम्परा या भाषा को भी एक विशेष स्वरूप प्राप्त हो जाता है और अर्थ परम्परा या साहित्य को भी। इस प्रकार दोनों के स्वरूपों का सामंजस्य रहता है। इस सामंजस्य में यदि बाधा पड़ी तो साहित्य देश की प्राकृतिक जीवनधारा से विच्छिन्न हो जायगा और जनता के हृदय का स्पर्श न कर सकेगा। यदि अर्थ परम्परा का स्वरूप बनाए रखकर शब्द-परम्परा का स्वरूप बदल जायगा तो परिणाम होगा 'कोयल का नग़मा' और 'महात्माजी के अलफाज'। यदि शब्द परम्परा स्थिर रखकर अर्थ परम्परा या वस्तु परम्परा बदल जायगी तो आपके सामने 'स्वर्ण अवसर' आएगा, 'हृदय के छाले' फूटेंगे और 'दुपट्टे फाड़े जाएँगे।'
भाषा या साहित्य के विशिष्ट स्वरूप प्राप्त करने का अभिप्राय यह नहीं है कि उसमें बाहर से आए हुए नए शब्द और नई नई वस्तुएँ न मिलें। उसमें नए नए शब्द भी बराबर मिलते जाते हैं और नए नए अर्थों या वस्तुओं की योजना भी होती जाती है, पर इस मात्र में और इस ढब से कि उसका स्वरूप अपनी विशिष्टता बनाए रहता है। हम यह बराबर कह सकते हैं कि वह इस देश का, इस जाति का, इस भाषा का साहित्य है। गंगा एक क्षीण धारा के रूप में गंगोत्तारी से चलती है, मार्ग में न जाने कितने नाले, न जाने कितनी नदियाँ उसमें मिलती जाती हैं, पर सागर संगम तक वह 'गंगा' ही कहलाती है, उसका 'गंगापन' बना रहता है। 
हमारे व्यावहारिक और भावात्मक जीवन से जिस भाषा का संबंध सदा से चला आ रहा है वह पहले चाहे जो कुछ कही जाती रही हो अब हिन्दी कही जाती है। इसका एक एक शब्द हमारी सत्ता का व्यंजक है, हमारी संस्कृति का संपुट है, हमारी जन्मभूमि का स्मारक है, हमारे हृदय का प्रतिबिम्ब है, हमारी बुद्धि का वैभव है। देश की जिस प्रकृति ने हमारे हृदय में रूप रंग भरा है उसी ने हमारी भाषा का भी रूप रंग खड़ा किया है। यहाँ के वन, पर्वत, नदी, नाले, वृक्ष, लता, पशु पक्षी सब इसी हमारी बोली में अपना परिचय देते हैं और अपनी ओर हमें खींचते हैं। इनकी सारी रूप छटा, सारी भाव भंगी हमारी भाषा में और हमारे साहित्य में समाई हुई है। यह वही भाषा है जिसकी धारा कभी संस्कृत के रूप में बहती थी, फिर प्राकृत और अपभ्रंश के रूप में और इधर हजार वर्ष से इस वर्तमान रूप में ज़िसे हिन्दी कहते हैं लगातार बहती चली आ रही है। यह वही भाषा है जिसमें सारे उत्तरीय भारत के बीच चन्द्र और जगनिक ने वीरता की उमंग उठाई; कबीर, सूर और तुलसी ने भक्ति की धारा बहाई; बिहारी, देव और पद्माकर ने ऋंगार रस की वर्षा की, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र ने आधुनिक युग का आभास दिया और आज आप व्यापक दृष्टि फैलाकर सम्पूर्ण मानव जगत् के मेल में लानेवानी भावनाएँ भर रहे हैं। हजारों वर्ष से यह दीर्घ परम्परा अखंड चली आ रही है। ऐसी भव्य परम्परा का गर्व जिसे न हो वह भारतीय नहीं। 
हमारा गर्व यह सोचकर और भी बढ़ जाता है कि यह परम्परा इतनी प्रबल और शक्तिशालिनी सिद्ध हुई कि इधर सौ वर्ष सेअर्थात् ऍंगरेजी राज्य के पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाने के पीछेऌसे बन्द करने के तरह तरह के प्रयत्न कुछ लोगों के द्वारा समय समय पर होते आ रहे हैं, पर यह अपना मार्ग निकालती चली आ रही है। इस विरोध का मूल हमारे उन मुसलमान भाइयों की निर्मूल आशंका है जो अपनी भाषा और साहित्य को विदेशी साँचे में ढालकर अपने लिए अलग रखना चाहते हैं। यदि वे अपनी भाषा और अपने साहित्य की एक अलग परम्परा रखना चाहते हैं तो हमारे लिए यह प्रसन्नता की बात है। इधर अपनी भाषा की छटा, अपने साहित्य की विभूति हमारे सामने रहेगी, उधार उनके साहित्य के चमत्कार से भी हम अपना मनोरंजन करेंगे। यही मौका उन्हें भी रहेगा। मनोरंजन के क्षेत्र में एक से दो रहें तो और अच्छी बात है। यही स्थिति मुसलमानी अमलदारी में रही है। दिल्ली और दक्खिन के बादशाह फारसी कविता का भी आनन्द लेते थे और परम्परागत हिन्दी कविता का भी। फारसी के स्थान पर जब उर्दू की शायरी होने लगी तब भी यही बात रही। अनेकरूपता का नाम ही संसार है। सौन्दर्य की विभूति अनेक रूपों में प्रकट होती है। सहृदय उन सबमें आनन्द का अनुभव करते हैं। अकबर की बात छोड़ दीजिए जो आप कभी कभी हिन्दी में कविता करता था। औरंगजेब तक के दरबार में जाकर हिन्दी कवियों का कविता सुनाना प्रसिद्ध है। रहीम, रसखान, गुलाम नबी इत्यादि का नाम हिन्दी के अच्छे कवियों में है। 
यहीं तक नहीं अपनी धार्मिक भावनाओं की व्यंजना के लिए भी मुसलमान यहाँ की परम्परागत भाषा को बराबर काम में लाते थे। हमारे हिन्दी काव्य के इतिहास में सूफी कवियों का एक वर्ग ही अलग है, जिसके अन्तर्गत, कुतबन, जायसी, उसमान, नूर मुहम्मद इत्यादि दर्जनों कवि हुए हैं। उन्होंने हमारी ही प्यारी बोली में हमारे काव्यों की पदावली में, जिसमें संस्कृत का पुट बराबर रहता आया है, प्रेम कहानियाँ लिखीहैं।
यह देखना चाहिए की हमारी भाषा और हमारे साहित्य में वह कौन सी वस्तु है, जो अब हमारे मुसलमान भाइयों को नापसन्द है। इधर उनकी ओर से जो लेख आदि निकल रहे हैं उनसे पता चलता है कि भाषा में न पसन्द आनेवाली वस्तु है संस्कृत के शब्द और साहित्य में भारतीय दृश्य, भारतीय रीति नीति और भारतीय इतिहास पुराणों के प्रसंग। इस सम्बन्ध में हमारा नम्र निवेदन यह है कि जिस देश का साहित्य होगा उस देश की परम्परागत भाषा, उस देश के प्राकृतिक स्वरूप, रीति नीति, कथा प्रसंग आदि से वह कैसे दूर रह सकता है? 
अब थोड़ा यह भी देखिए कि पुराने मुसलमान भाइयों ने अपने वर्ग के लिए एक अलग साहित्य निर्माण करने में उसका क्या स्वरूप रखा था, और कितने दिनों तक वह स्वरूप वे बनाए रहे। हिन्दी में थोड़े से, अरबी फारसी शब्द मिलाकर अपने साहित्य के लिए जो भाषा उन्होंने ग्रहण की, वह रेखा कहलाती थी। जो हिन्दी उन्होंने ली थी वह केवल व्यवहार और बोलचाल की हिन्दी न थी, परम्परागत काव्यों और गीतों की हिन्दी भी थी, जिसमें बहुत चलते संस्कृत शब्दों के साथ साथ ठेठ घरेलू शब्द भी रहते थे।
यह तो हुई कविता और साहित्य की बात। सबसे अधिक ध्यान देने की बात यह है कि सर्वसाधारण मुसलमान जनता में इस्लाबम के धार्मिक सिद्धन्तों के प्रचार के लिए चार सौ वर्ष पहले जिस भाषा का प्रयोग वे अपनी किताबों में करते थे, उसमें यहाँ के धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में आनेवाले इन्द्रिय विकार आदि शब्द तक भी कभी कभी लाते थे
(1) सराहना नेवाजनां खुदा को बहुत कि वह पालनहारा है आलम का (शरह मरग़बुल कलूब शाह मीराँजी, बीजापुरी, सन् 1495 के पहले)। 
(2) सवालयह तन अलाधा (अलहद:) बल्कि सतंतर (स्वतन्त्र) विकार रूप दिखाता है। एक तिल क़रार नहीं ज्यों मरकट रूप। 
जवाब ऐ आरिफ़! ज़ाहिर तनके फ़ेल से गुजरया व वातिन करतब विषै? दूसरा तन सो भी कि इस इन्द्रियन का विकार व चेष्टा करनहारा...सुख दु:ख भोगनहारा। जेता विकार रूप वही दूसरा तन...। यह तन फ़हम सूँ गुजरया तो गुन उसका क्यों रहे?
(कलामतुल हक़ायक़, शाह बुरहानुद्दीन बीजापुरी सन् 1582) 
उर्दू के इतिहास के लेखक उर्दू का उत्थान बीजापुर और गोलकुंडा की दक्खिनी रियासतों से मानते हैं। वहाँ शिया मुसलमानों की अधिक बस्ती थी। इससे इमामहुसैन की कथा को लेकर दक्खिनी उर्दू कवियों ने कई मसनवियों या प्रबन्ध काव्यों की रचना की। इनमें से एक का नाम है 'करबल कथा'(करबला की कथा)। यह कथा शब्द भला आजकल उर्दू में कभी जगह पा सकता है? ऋंगार की प्रेम कहानियों की रचना भी दक्खिनी उर्दू में बहुत कुछ हुई है। जैसे 'वजही' की 'मसनवी कुतुब मुश्तरी' जिसकी पद्य रचना का रूप देखिए
न भुइँ पर बसे बह न असमान में। 
रहता शद उसी नार के ध्याअन में। 
भुलाई चंचल धान वो यों शाह कों। 
कि लुभवाए ज्यों कहरुबा काह कों। 
लगा शाह उसासाँ भरन आह मार। 
कि नज़दीक ना है व गुनवंत नार। 
वजही' की गश्ज़ल का नमूना यह है 
पिउ अपनेकाँ आज मैं निस सपने देखी सोयकर।
जब पिउ चलिया सेंति सेज तब सोते उट्ठी रोयकरड्ड 
ना पूछूँ बहमन जोयसी कब मिलना पिउ सों होयसीड्ड 
'वजही' का रचनाकाल सन् 1600 से लेकर 1625 तक माना जाता है। इसके उपरान्त सन् 1650 के लगभग 'नसरती' का समय आता है, जो कुछ दिनों तक तो दक्खिनी शायरी की उपर्युक्त परम्परा पर चला पर आगे चलकर वह 'हिन्दवीपन' को बहुत कुछ दूर हटाकर फ़ारसी रूप देने में लगा। अपना यह प्रयत्न उसने स्पष्ट स्वीकार किया है और कहा है 'दखिन के शायरों की मैं रविशपर शेर बोल्या नहीं'। एक स्थान पर और कहता है 
'मआनी की सूरत की है आरसी।
दखिन का किया शेर जूँ फारसीड्ड
फ़साहत में गर फारसी खुश कलाम। 
धारे फष्ख्र्र हिन्दी वचन पर मुदामड्ड 
मैं इस दो हुनर के खुलासों को पा। 
किया शेर ताज: दोनों फन मिलाड्ड' 
नसरती ने जो रास्ता दिखलाया उस पर कुछ लोग धीरे धीरे चलने लगे, पर दक्खिनी शायरी की देशी परम्परा कुछ दिनों तक चलती रही। सन् 1691 ई. में अफ़ज़ल ने हिन्दी गीत काव्य परम्परा के अनुसार 'बारहमासा' लिखा जिसकी भाषा इस ढंग की है 
सखी रे! चैत रितु आई सुहाई। 
अजहुँ उम्मीद मेरी बर न आई। 
रहे हैं भँवर फूलों के गले लाग। 
मेरे सीन: जुदाई की लगी आग। 
सखी दिन रैन मुझ नागिन डसत है। 
फिरूँ दौरी तमामै जग हँसत है। 
सन् 1700 के पीछे वली ने और दक्खिनी शायरों के समान कुछ दिनों तक हिन्दीपन को रहने दिया। उसकी उन रचनाओं में हिन्दी काव्य परम्परा के कुछ शब्द, भारतीय कथा प्रसंगों के कुछ संकेत, प्रेम व्यापार में स्त्रीस पुरुष का भेद आदि कुछ बातें बनी रहीं। जैसे 
इस रैन ऍंधोरी में मत भूल पड़ईँ तिससूँ।
टुक पाँव के बिछुओं की आवाज़ सुनाती जाड्ड
मुझ दिल के कबूतर को पकड़ा है तेरी लट ने। 
यह काम धारम का है टुक इसको छुड़ाती जाड्ड
तुझ मुख की परस्तिश में गई उम्र मेरी सारी। 
ऐ बुत की पुजनहारी इस बुत को पुजाती जाड्ड 
मुख बात बोलता हूँ शिकव: तेरे कपट का। 
तुझ नैन देखने को दिल ठाँठ कर चुका थाड्ड 
पीछे शाह सादुल्लाह गुलशन ने 'वली' को हिदायत की कि ''ये इतने फारसी के मज़मून जो बेकार पड़े हैं, इन्हें काम में ला।'' फिर तो वली ने अपना रुख़ ही पलट दिया और वे इस तरह के कलाम सामने लाने लगे
जब सनम को ख़याले बाग़ हुआ।
तालिबे नश्शए फष्राग़ हुआ।
फ़ौज उश्शाक़ देख हर जानिब।
नाज़नीं साहबे दिमाग़ हुआ।
अश्क सूँ तुझ लबां की सुरख़ी के।
जिगर लाल दाग़ दाग़ हुआड्ड
पहले के दक्खिनी शायर तो देव की श्रुति रुचि के अनुसार जगह को 'जाघा' और 'अलहद:' को अलाधा' तक लिखते थे। फ़ारसी शब्दों के बहुवचन आदि हिन्दी व्याकरण के अनुसार रखते थे, पर वली ने 'आशिक' का बहुवचन अर
बी के क़ायदे पर 'उश्शाक़' रक्खा है और फ़ारसी समाज के ढंग पर नश्शए फराग़ और 'साहबे दिमाग़' लाए हैं। वली सन् 1700 ई. में दिल्ली आए। कषयम ने सन् 1720 में वली के दीवान का दिल्ली पहुँचना लिखा है।
यहाँ से अब दिल्ली के शायरों की परम्परा उर्दू साहित्य में चली है। सन् 1700 ई. [ में ] दिल्ली में हातिम नाम के एक शायर थे। इन्होंने फिर हिन्दी के शब्दों की छँटाई की; जिसका वर्णन उन्होंने आप ही इस प्रकार किया है 
''लस्सान अरबी व ज़बान फ़ारसी कि कुरीबुलफ़हम व कसीरूल इस्तअमाल बाशद व रोज़मर्रा देहली कि मिर्ज़ायाने हिन्द व फसीहाने रिंद दर महावर: दारंद मंजूर दाश्त:। सिवाए ऑं ज़बान हिंदवी कि ऑंरा भाखा गोयंद मौकूफ करद:।''
तात्पर्य यह कि हातिम ने अरबी फ़ारसी के शब्द ला लाकर रखे और हिन्दी या भाषा के शब्दों को निकाल फेंका। अरबी फ़ारसी के बीच हिन्दी के वे ही शब्द और मुहाविरे रहने पाए जिन्हें शाहज़ादे सरदार लोग दरबार में बोलते थे। इस प्रकार उर्दू एक दरबारी भाषा रह गई। इतना होने पर भी इनकी कविताओं में भारतीय कथा प्रसंगों के संकेत पाए जाते हैं 
ख़ुदा के नूर का मथकर समुन्दर।
यही चौदह रतन काढ़े हैं बाहरड्ड
अगर फ़हमीद: हिकमत आशना है। 
इसी नुसखे में चौदह विद्दया हैं। 
हातिम ही के समय में उर्दू के महाकवि 'सौदा' हुए हैं। जो पहले हिन्दीपन से सटी हुई शायरी ही नहीं सर्वसाधारण में प्रचलित हिन्दी भाषा की कविता भी करते थे और अच्छी करते थे। कुछ उध्दृत किए बिना आगे बढ़ते नहीं बनता। 
सौदा की हिन्दी ग़ज़ल
निकलके चौखट से घर की प्यारे जो पट की ओझल ठिठक रहा है। 
सिमट के घट से तेरे दरस को नयन में जी आ अटक रहा है। 
अगिन ने तेरे विरह की जबसे झुलस दिया है कलेजा मेराड्ड
हिये की धड़कन मैं क्या बताऊँ यूँ कोयला सा चटक रहा है। 
जिन्हों की छाती से पार बरछी हुई है रन में वो सूरमा है, 
पड़ा वो सावन्त मन में जिसके विरह का काँटा खटक रहा है। 
मुझे पसीना जो तेरे मुख पर दिखाई दे है तो सोचता हूँ, 
ये क्योंकि सूरज की जोत आगे हर एक तारा छटक रहा है। 
हिलोर यों लेती ओस की बूँद लगके फूलों की पंखड़ी से, 
तुम्हारे कानों में जिस तरह से हर एक मोती लटक रहा है। 
कहीं जो लग चलने साथ देता हो इस तरह का कटर है पापी, 
न जानूँ पेड़ी की धूल मैं हूँ जो मुझसे मुल्ला झटक रहा है। 
कभू लगा है न आते जाते जो बैठकर टुक इसे निकालूँ,
सजन! जो काँटा है तुझ गली का सो पग में मेरे अटक रहा है। 
कोई जो मुझसे य पूछता होय क्यों तू रोता है कह तो हमसे, 
हर एक ऑंसू मेरे नयन का जगह जगह सिर पटक रहा है। 
गुनी हो कैसा ही ध्या न जिसका तेरे गुनों से लगा है प्यारे, 
गयान परबत भी है जो उसका तो छोड़ उसको सटक रहा है। 
जो बाट मिलने की होय उसका पता बता दो मुझे सिरीजन, 
तुम्हारी बटियों में आज बरसों से यह बटोही भटक रहा है। 
जो मैंने सौदा से जाके पूछा तुझे कुछ अपने भी मन की सुधा बुधा, 
य रोके मुझसे कहा किसी की लटक में लटकी लटक रहा है। 
सौदा के हिन्दी दोहे
कारी रैन डरावनी घर तें होइ निरास। 
जंगल में जा सो रहे कोऊ आस न पासड्ड
बैरी पहुँचे आइके तेरी देहली पास। 
बेग ख़बर लो या नबीं! अब पत की नहिं आसड्ड 
खीझ खीझ चहुँ ओर से पड़े वह जालिम टूट। 
वेवों को डरपाय के ले गए घर को लूटड्ड 
कहै हरम सर पीट कर खोकर अपनी लाज। 
माटी में तू रल गयो दीन दुनी के लाजड्ड 
खोयौ तैंने नीर बिन नबी के मन को चैन। 
जालिम तेरे हाथ से प्यासो गयो हुसैनड्ड 
उक्त दोहे मरसियों में आ गए हैं। उन्हीं में से अलग किए गए हैं। सौदा की पहेलियों की भाषा हिन्दी है पर उनकी और सब रचनाएँ हातिम की ही सरणी पर चलती हैं। उर्दू की शायरी में जो थोड़ा बहुत हिन्दीपन लुका छिपा था, वह लखनऊ जाने पर नासिख़ के हाथ से दूर किया गया। फिर तो वह हिन्दी से ऐसी हटी कि उसने अपना एक दायरा ही अलग कर लिया। उस दायरे से जगत, चंचल, नार, गुन, अकास, धारम, धान, करम, दया, वीर, बली ऐसे शब्द एकदम निकाल बाहर हुए। इसी प्रकार वस्तुओं में न कमल और न भँवरे रह गए न वसन्त और कोकिल, न वर्षा ऋतु रह गई न सावन की हरियाली; न भीम और अर्जुन रह गए न कर्ण और भोज। इस प्रकार यहाँ की परम्परागत भाषा के आधो हिस्से से और परम्परागत साहित्य के सर्वांश से अर्थात् देश के सामान्य जीवन से उर्दू दूर हटा दी गई। जबरदस्ती जानबूझकर हटाई गई, आप से आप नहीं हटी। 
उर्दू के इस रूप में आने का परिणाम यह हुआ कि अपना प्रसार करने की स्वाभाविक शक्ति उसमें न रह गई। वह अपने को बनाए रखने के लिए मक़तबों और सरकारी दफ़तरों की मुहताज हो गई। यह बात ऍंगरेजी अमलदारी के प्रतिष्ठित हो जाने पर हमारे नवशिक्षित मुसलमान भाइयों को स्पष्ट दिखलाई पड़ने लगी और वे उसकी रक्षा और प्रसार के कृत्रिम साधनों का अवलम्बन करने में लगे। मुसलमानी अमलदारी में सरकारी दफ्तर फारसी में थे। अत: ईस्ट इण्डिया कम्पनी में भी कुछ दिनों तक सरकारी दफ्तरों की ज़बान फारसी ही रहने दी पर पीछे अधिकारियों को यह बात खटकने लगी कि दफ्तरों की भाषा सर्वसाधारण की भाषा से बिलकुल अलग है। उनका ध्यान देश की प्रचलित भाषा की ओर गया। सन् 1836 ई. में हमारे संयुक्त प्रदेश के सदर बोर्ड से एक इश्तहारनामा निकला जो इस प्रकार था
इश्तहारनामा : बोर्र्ड सदर
पच्छाह के सदर बोर्ड के साहबों ने यह ध्या न किया है कि कचहरी के सब काम पारसी जबान में लिखा पढ़ा होने से सब लोगों को बहुत हर्ज पड़ता है और बहुत कलप होता है, और जब कोई अपनी अर्जी अपनी भाषा में लिखके सरकार में दाखिल करने पावे तो बड़ी बात होगी। सबको चैन आराम होगा इसलिए हुक्म दिया गया है कि सन् 1244 ई की कुवार बदी प्रथम से जिसका जो मामला सदर बोर्ड में हो सो अपना अपना सवाल अपनी हिन्दी की बोली में और पारसी के नागरी अच्छरन में लिख के दाखिल करे कि डाक पर भेजे और सवाल जौन अच्छरन में लिखा हो तौने अच्छरन में और हिन्दी बोली में उस पर हुक्म लिखा जायगा। मिती 29 जुलाई, सन् 1836ई । 
खेद की बात है कि यह व्यवस्था चलने न पाई। मुसलमान भाइयों की ओर से इस बात का घोर प्रयत्न हुआ कि दफ्तरों में हिन्दी घुसने न पाए, उर्दू चलाई जाय। अन्त में सन् 1837 ई. से उर्दू दफ्तरों की भाषा कर दी गई। इसके उपरान्त जब सर्वसाधारण की शिक्षा के लिए सरकार की ओर से जगह जगह मदरसे खुलने की बात उठी और सरकार ने यह निश्चय किया कि संस्कृत की कक्षाएँ तोड़ दी जायँ और हिन्दी भाषा का पढ़ना सब विद्यार्थियों के लिए आवश्यक कर दिया जाय, तब भी मुसलमान भाइयों की ओर से विरोध खड़ा किया गया और सन् 1848 में उनकी प्रेरणा से कम्पनी की सरकार ने यह आज्ञा निकाली 'ऐसी ज़बान का इल्म तमाम तुलबा के लिए लाज़िम क़रार देना जो मुल्क की सरकारी और दफ्तरी ज़बान नहीं है हमारी राय में दुरुस्त नहीं। अलावा इसके मुसलमान तुलबा जिनकी तादाद इस देहली कॉलेज में बड़ी है, इसे अच्छी नज़र से नहीं देखेंगे।'' हिन्दी के विरोध की यह चेष्टा बराबर बढ़ती गई। यहाँ तक कोशिश की गई कि वर्नाकुलर स्कूलों में उसकी शिक्षा जारी ही न होने पाए। हिन्दी की रक्षा के लिए राजा शिवप्रसाद को कितना यत्न करना पड़ा था, यह हिन्दी प्रेमी मात्र जानते हैं। सरकार की ओर से ज्ञान की वृद्धि के लिए एक संस्था (Society For Promotion of Knowledge in India through the medium of Vernacular language) स्थापित हुई थी, जिसका उद्देश्य था अंगरेजी, फारसी, संस्कृत आदि की पुस्तकों का देशी भाषा में अर्थात् हिन्दी, उर्दू और बँगला में अनुवाद करना। पर उर्दू को छोड़कर न हिन्दी में कोई अनुवाद होने पाया न बँगला में। 
सर सैय्यद अहमद साहब वास्तव में उर्दू को क्या समझते थे, यह उन्हीं की ज़बान से सुनिए। वे फष्रमाते हैं''चूँकि यह ज़बान ख़ास बादशाही बाजारों में मुरव्वज थी इस वास्ते इसको ज़बान उर्दू कहा करते थे। और बादशाही अमीर उमरा इसको बोलते थे। गोया हिन्दुस्तान के मुसलमानों की यह ज़बान थी।'' इस प्रकार उर्दू को उन्होंने केवल दरबारी अमीर उमरा और मुसलमानों की ज़बान तसलीम कियाहै। 
मुसलमान किस तरह पहले अपने मज़हब की तालीम के लिए थोड़ी अरबी फारसी मिली एक ख़ास ढंग की हिन्दी काम में लाए, फिर धीरे धीरे हिन्दीपन निकालते निकालते बिलकुल एक विदेशी ढाँचे की भाषा गढ़कर अपने लिखने की भाषा एकदम अलग कर ली, यह बात स्पष्ट हो गई होगी। मुहम्मदशाह के समय तक इस नई गढ़ी हुई भाषा का, जो पीछे उर्दू कहलाई, साहित्य रचना के लिए प्रचार न हो सका था, इसका आभास हिन्दी के सूफी कवि नूर मुहम्मद ने अपनी उस पुस्तक में दिया है जो उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'इन्द्रावती' के पीछे लिखी। पुस्तक का नाम है 'अनुरागबाँसुरी। 1 नूर मुहम्मद के समय से मुसलमान देश की प्रचलित भाषा हिन्दी से किनारा खींचने लगे थे और मुसलमानों के लिए फ़ारसी में रचना करना ही जायज़ समझने लगे थे। 'इन्द्रावती' लिखने पर उन्हें उनके मुसलमान भाइयों ने यह कहकर फटकारना शुरू किया कि ''तुम मुसलमान होकर हिन्दी में क्यों लिखने गए'' इसी से बेचारे को 'अनुरागबाँसुरी' में अपनी सफाई इन शब्दों में देनी पड़ी 
जानत है वह सिरजन हारा। जो कछु है मन मरम हमाराड्ड 
हिन्दू मग पर पाँव न राखेउँ। का जौ बहुतै हिन्दी भाखेउँड्ड
जिसे उर्दू कहते हैं उसका उस समय साहित्य में कोई स्थान न था, यह नूर मुहम्मद के इस कथन से साफ़ झलकता है 
कामयाब2 कहँ कौन जगावा। फिर हिन्दी भाखै परआवाड्ड
छाँड़ि पारसी कंद नवातैं। अरुझाना हिन्दी रस बातैड्ड 
जनता से अपने को बिलकुल अलग दिखाने के लिए मुसलमानों ने ही अपने लिए विदेशी ढाँचे की एक अलग भाषा और साहित्य खड़ा किया, यह इतनी प्रत्यक्ष बात है कि किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। उर्दू की प्राचीनता दिखाने के लिए दक्खिनी शायरों की जो लम्बी सूची सामने लाई गई है, उसमें कोई हिन्दू भी है? शायद एक या दो। और जाने दीजिए 'आबेहयात' ही उठा लीजिए। उसमें सबके सब शायर मुसलमान ही तो हैं! अब और सबूत क्या चाहिए? इतने पर भी न जाने किस मुँह से यह कहा जाता है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के मेल से उर्दू पैदा हुई। मेल से पैदा हुई चीज की यही सूरत होती है? 
आज सबसे बढ़कर खेद तो तब होता है जब कोई कानूनपेशा हिन्दू, पेट के पीछे जिसके घराने का लगाव देश की परम्परागत संस्कृति और साहित्य से बिलकुल टूट गया हो, जिसकी प्रारम्भिक शिक्षा केवल फारसी तथा अदालती भाषा उर्दू की हुई हो, किसी जलसे या मुशायरे में उर्दू को हिन्दू मुस्लिम कलचर के मेल से वजूद में आई हुई एक मुश्तरक: जबान बताने लगता है। हम पूछते हैं कि जब तुम 'हिन्दू कलचर' से कोसों दूर पड़ गए हो तब उसका मेल कहाँ और कितना है, यह क्या पहचान सकते हो? बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात इत्यादि के साहित्य की कुछ खबर है? जब तुम ऐसे कूप मंडूक हो कि अपने तंग घेरे के बाहर नजश्र ही नहीं फैला सकते, तब इस रोशनी के जश्माने में चुप क्यों नहीं रहते? साहित्य की जो देश व्यापक परम्परा बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि और प्रान्तों में चली आ रही है, वही परम्परा तो हिन्दी की भी हैअर्थ परम्परा भी और शब्द परम्परा भी। इसीअर्थ परम्परा और शब्द-परंपरा से इस देश की दस बारह करोड़ जनता परिचित है। 

1. यह पुस्तक अप्रकाशित है। 
2. नूर मुहम्मद फारसी की रचनाओं में अपना तख़ल्लुस 'कामयाब' रखते थे।
इसी को वह अपना समझती आई है जिसने उर्दू नहीं पढ़ी है। उसे जरा अपनी 'मुश्तरक: आम फष्हम' में कोई 'सयासी तकष्रीर' सुनाइए तो पता लगे। हमें सबसे बढ़कर क्षोभ उस समय हुआ था जब हिन्दुस्तानी के किसी जलसे में एक साहब यह फरमा गए थे कि ''मैं तुलसी और कबीर को समझ लेता हूँ पर आजकल की हिन्दी बहुत कम समझ पाता हूँ।'' इस प्रलाप का भी कहीं ठिकाना है? जो आजकल के साहित्य की भाषा नहीं समझता। वह भला तुलसी की भाषा क्या समझेगा? संस्कृत शब्दों की जो परम्परा सूर, तुलसी आदि की रचनाओं में चली आई थी वही आजकल भी चली आ रही है।
जिस प्रकार 'हिन्दवीपन' निकाल निकालकर एक विदेशी ढाँचे की भाषा खड़ी करने का क्रमबद्धा इतिहास है उसी प्रकार उस भाषा को सबके गले मढ़ने के लिए हिन्दी को दूर रखने के घोर प्रयत्न का भी खासा इतिहास है जो उस समय से शुरू होता है जब देश का पूरा शासन अंगरेजों के हाथ में आया। इन दोनों इतिहासों का संक्षेप में उल्लेख करके अब मैं वर्तमान परिस्थिति पर आता हूँ। अब तक शिक्षा का लक्ष्य अधिकतर सरकारी नौकरी रहा है। अत: इस बात का प्रयत्न बराबर होता रहा है कि दफ्तरों में हिन्दी न घुसने पाए। दफ्तरों की भाषा जब तक उर्दू रहेगी तक तक झखमार कर लोगों को अपने बच्चों को उर्दू की शिक्षा देनी पड़ेगी और यह कहने का मौकष रहेगा कि उर्दू पढ़े लिखे लोगों की भाषा है। अगर दफ्तरों की भाषा होना ही प्रचलित भाषा होने का प्रमाण है तब तो फारसी भी, जो कई सौ वर्ष तक दफ्तरों की भाषा रही है, देश की प्रचलित भाषा मानी जानी चाहिए।
जिस समय उर्दू के साथ साथ से हटाकर नहीं हिन्दी को भी स्थान दिलाने के लिए सर ऐंटनी मैकडानल के समय में आन्दोलन उठा उस समय भी पूरा विरोध मुसलमानों की ओर से खड़ा किया गया। अदालतों से ही नहीं शिक्षा पद्धाति से भी हिन्दी को हटाने के लिए प्रयत्न बराबर होते रहे हैं, यह दिखाया जा चुका है। अब आजकल की परिस्थिति देखिए। जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिन्दू मुस्लिम एकता अत्यन्त आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर 'हिन्दुस्तानी' लेकर उठे हैं। इस हिन्दुस्तानी का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिन्दू भी कर रहे हैं। हम भोली भाली जनता को इस 'हिन्दुस्तानी' से सावधान करना अत्यन्त आवश्यक समझते हैं। जो हिन्दुस्तानी इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा और कुछ नहीं है। उर्दू के सब लक्षण, जैसेवाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी फष्हम शब्द, अरबी फारसी कषयदे के बहुवचन उसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह 'हिन्दुस्तानी' कहलाएगी, अन्यथा नहीं।
साहित्य, विज्ञान, दर्शन इत्यादि के काम की हिन्दुस्तानी नहीं हो सकती, यह तो इसके समर्थक भी स्वीकार करते हैं। हमारा कहना है कि साधारण बोलचाल और व्यवहार के लिए भी जिस प्रकार की 'हिन्दुस्तानी' हमारे उर्दू परस्त दोस्तों के ध्यान में है वह चलनेवाली नहीं है। साधारण लिखापढ़ी और व्यवहार में भी वही भाषा चल सकती है जिसमें ठेठ हिन्दी शब्दों के अतिरिक्त जैसे सब प्रकार के लोगों द्वारा बोले जानेवाले अरबी फारसी के शब्द आए, वैसे ही संस्कृत के भी। पर क्या भूलकर भी प्रचलित से प्रचलित संस्कृत शब्द, जिसे गाँवों में बसनेवाली अपढ़ जनता तक बराबर बोलती आ रही हैहिन्दुस्तानी में कभी स्थान पा सकता है ? जहाँ एक भी ऐसा शब्द आया कि हमारे मेहरबान दोस्तों को 'भाखापन' की गन्ध आने लगेगी।
साधारण लिखापढ़ी अदालती व्यवहार तथा बोलचाल के लिए यदि एक सच्ची सामान्य भाषा 'हिन्दुस्तानी' के नाम से ग्रहण कर ली जाय तो कोई हर्ज नहीं। पर उस हिन्दुस्तानी में जिस प्रकार अरबी फारसी के ऐसे चलते शब्द आएँ, जैसे
ज़रूर, कषबू, इख्तियार, दावा, वक्त, सलाह, कषयदा, कानून, हिम्मत, हैरान, सिफषरिश, अरजी, नरम, गरम, मुलायम, गरीब, अमीर, इज्जत, कष्सूर, माफष्, मरजशी गश्रज, किष्फायत, नफष, नुकसान, तकाजश, उम्र, दरवाजा, रंज, गुस्सा, किस्सा, तनखाह, तदबीर, पेशा, साल, शकल, सूरत, ऐब, हुनर, हाजिर, सवाल, जवाब, सजश, मुनासिब, सही, गश्लत, मंजूर।
उसी प्रकार नित्य बोले जानेवाले ऐसे संस्कृत के शब्द भी आएँ, जैसे
विद्या, परीक्षा, ज्ञान, धर्म, अधर्म, पाप, पुण्य, अपराध, न्याय, अन्याय, उपाय, युक्ति, कला, आकाश, पृथ्वी, क्षमा, दया, माया, प्रेम, प्रीति, क्रोध, ईर्ष्यां, शोच, चिन्ता, सुख, दु:ख, सम्पत्ति, विपत्ति, शरण, चरण, धन, मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा, कृपा, बन्धन, नाश, रक्षा, वस्तु, सन्तोष, औषध, वश, भोगविलास, आनन्द, पर्वत, जल, धारा, स्नान, ध्यान, शीत, ताप, शोभा, सुन्दरता, तेज, प्रताप, बल, पराक्रम, पौरुष, वीरता, शरीर, देह, कोमल, सुकुमार, शुद्ध, अशुद्ध, पवित्र, इच्छा, अक्षर, वाणी, कंठ, अर्थ, मनोरथ, कामना इत्यादि।
है ऐसी आशा? यदि नहीं तो ऐसी हिन्दुस्तानी को दूर से नमस्कार।
(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, 1995 वि. 1938 ई.)
[ इस भाषण के प्रारम्भिक दो पैराग्राफ हटाकर 'हिन्दुस्तानी का उद्गम' नामक लघु पुस्तिका
ना.प्र. सभा से 1996 वि. में प्रकाशित की गई थी। ]


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