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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 5
हिंदी साहित्य का इतिहास

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम गद्य साहित्य का प्रसार : द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-1975) पीछे     आगे

प्रकरण 3

सामान्य परिचय


इस उत्थान का आरंभ हम संवत् 1950 से मान सकते हैं। इसमें हम कुछ ऐसी चिंताओं और आकांक्षाओं का आभास पाते हैं जिनका समय भारतेंदु के सामने नहीं आया था। भारतेंदु मंडल मनोरंजक साहित्यनिर्माण द्वारा हिन्दी गद्य साहित्य की स्वतंत्र सत्ता का भाव ही प्रतिष्ठित करने में अधिकतर लगा रहा। अब यह भाव पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गया था और शिक्षित समाज को अपने इस नए गद्य साहित्य का बहुत कुछ परिचय भी हो गया था। प्रथम उत्थान के भीतर बहुत बड़ी शिकायत यह रहा करती थी कि अंग्रेजी की ऊँची शिक्षा पाए हुए बड़े बड़े डिग्रीधाारी लोग हिन्दी साहित्य के नूतन निर्माण में योग नहीं देते और अपनी मातृभाषा से उदासीन रहते हैं। द्वितीय उत्थान में यह शिकायत बहुत कुछ कम हुई। उच्च शिक्षाप्राप्त लोग धीरेधीरे आने लगे , पर अधिकतर यह कहते हुए कि 'मुझे तो हिन्दी आती नहीं'। इधर से जवाब मिलता था, 'तो क्या हुआ? आ न जायगी। कुछ काम तो शुरू कीजिए। अत: बहुत से लोगों ने हिन्दी आने के पहले ही काम शुरू कर दिया।' उनकी भाषा में जो दोष रहते थे, वे उनकी खातिर से दरगुजर कर दिए जाते थे। जब वे कुछ काम कर चुकते थे , दो-चार चीजें लिख चुकते थे तब तो पूरे लेखक हो जाते थे। फिर उन्हें हिन्दी आने न आने की परवाह क्यों होने लगी?
    इस कालखंड के बीच हिन्दी लेखकों की तारीफ में प्राय: यह कहा सुना जाता रहा कि ये संस्कृत बहुत अच्छी जानते हैं, ये अरबी, फारसी के पूरे विद्वान हैं, ये अंग्रेजी के अच्छे पंडित हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी कि ये हिन्दी बहुत अच्छी जानते हैं। यह मालूम ही नहीं होता था कि हिन्दी भी कोई जानने की चीज है। परिणाम यह हुआ कि बहुतसे हिन्दी के प्रौढ़ और अच्छे लेखक भी अपने लेखों में फारसीदानी, अंग्रेजीदानी, संस्कृतदानी आदि का कुछ प्रमाण देना जरूरी समझने लगे थे। 
    भाषा बिगड़ने का एक और सामान दूसरी ओर खड़ा हो गया था। हिन्दी के पाठकों का अब वैसा अकाल नहीं था , विशेषत: उपन्यास पढ़नेवालों का। बँग्ला उपन्यासों के अनुवाद धाड़ाधाड़ निकलने लगे थे। बहुत से लोग हिन्दी लिखना सीखने के लिए केवल संस्कृत शब्दों की जानकारी ही आवश्यक समझते थे जो बँग्ला की पुस्तकों से प्राप्त हो जाती थी। यह जानकारी थोड़ी बहुत होते ही वे बँग्ला से अनुवाद भी कर लेते थे और हिन्दी के लेख भी लिखने लगते थे। अत: एक ओर अंग्रेजीदानाें की ओर से 'स्वार्थ लेना', 'जीवन होड़', 'कवि का संदेश', 'दृष्टिकोण' आदि आने लगे; दूसरी ओर बंगभाषाश्रित लोगों की ओर से 'सिहरना', 'काँदना', 'बसंत रोग' आदि। इतना अवश्य था कि पिछले कैंडे क़े लोगों की लिखावट उतनी अजनबी नहीं लगती थी जितनी पहले कैंड़ेवालों की। बंगभाषा फिर भी अपने देश की और हिन्दी से मिलती जुलती भाषा थी। उसके अभ्यास से प्रसंग या स्थल के अनुरूप बहुत ही सुंदर और उपयुक्त संस्कृत शब्द मिलते थे। अत: बंगभाषा की ओर जो झुकाव रहा उसके प्रभाव से बहुत ही परिमार्जित और सुंदर संस्कृत पदविन्यास की परंपरा हिन्दी में आई, यह स्वीकार करना पड़ता है।
    पर 'अंग्रेजी में विचार करने वाले' जब आप्टे का अंग्रेजी संस्कृत कोश लेकर अपने विचारों का शाब्दिक अनुवाद करने बैठते थे तब तो हिन्दी बेचारी कोसों दूर जा खड़ी होती थी। वे हिन्दी और संस्कृत शब्द भर लिखते थे, हिन्दी भाषा नहीं लिखते थे। उनके बहुत से वाक्यों का तात्पर्य अंग्रेजी भाषा की भावभंगिमा से परिचित लोग ही समझ सकते थे, केवल हिन्दी या संस्कृत जाननेवाले नहीं। 
    यह पहले कहा जा चुका है कि भारतेंदुजी और उनके सहयोगी लेखकों की दृष्टि व्याकरण के नियमों पर अच्छी तरह जमी नहीं थी। वे 'इच्छा किया', 'आशा किया' ऐसे प्रयोग भी कर जाते थे और वाक्यविन्यास की सफाई पर भी उतना ध्यान नहीं रखते थे। पर उनकी भाषा हिन्दी ही होती थी, मुहावरे के खिलाफ प्राय: नहीं जाती थी। पर द्वितीय उत्थान के भीतर बहुत दिनों तक व्याकरण की शिथिलता और भाषा की रूपहानि दोनों साथ साथ दिखाई पड़ती रही। व्याकरण के व्यतिक्रम और भाषा की अस्थिरता पर थोड़े ही दिनों में कोप दृष्टि पड़ी, पर भाषा की रूपहानि की ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया। पर जो कुछ हुआ वही बहुत हुआ और उसके लिए हमारा हिन्दी साहित्य पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी का सदा ऋणी रहेगा। व्याकरण की शुद्ध ता और भाषा की सफाई के प्रवर्तक द्विवेदीजी ही थे। 'सरस्वती' के संपादक के रूप में उन्होंने आई हुई पुस्तकों के भीतर व्याकरण और भाषा की अशुद्धि याँ दिखाकर लेखकों को बहुत कुछ सावधान कर दिया। यद्यपि कुछ हठी और अनाड़ी लेखक अपनी भूलों और गलतियों का समर्थन तरह-तरह की बातें बनाकर करते रहे, पर अधिकतर लेखकों ने लाभ उठाया और लिखते समय व्याकरण आदि का पूरा ध्यान रखने लगे। गद्य की भाषा पर द्विवेदीजी के इस शुभ प्रभाव का स्मरण जब तक भाषा के लिए शुद्ध ता आवश्यक समझी जायगी तब तक बना रहेगा। 
    व्याकरण की ओर इस प्रकार ध्यान जाने पर कुछ दिनों व्याकरण संबंधिनी बातों की चर्चा भी पत्रों में अच्छी चली। विभक्तियाँ शब्दों से मिलाकर लिखी जानी चाहिए या अलग, इसी प्रश्न को लेकर कुछ काल तक खंडनमंडन के लेख जोरशोर से निकले। इस आंदोलन के नायक हुए थे , पं. गोविंद नारायण जी मिश्र, जिन्होंने 'विभक्ति विचार' नाम की एक छोटी सी पुस्तक द्वारा हिन्दी के विभक्तियों को शुद्ध  विभक्तियाँ बताकर लोगों को उन्हें मिलाकर लिखने की सलाह दी थी। 
    इस द्वितीय उत्थान में जैसे अधिक प्रकार के विषय, लेखकों की विस्तृत दृष्टि के भीतर आए वैसे ही शैली की अनेकरूपता का अधिक विकास भी हुआ। ऐसे लेखकों की संख्या कुछ बढ़ी जिनकी शैली में कुछ उनकी निज की शिष्टता रहती थी, जिनकी लिखावट को परखकर लोग कह सकते थे कि यह उन्हीं की है। साथ ही वाक्यविन्यास में अधिक सफाई और व्यवस्था आई। विराम चिद्दों का आवश्यक प्रयोग होने लगा। अंग्रेजी आदि अन्य समुन्नत भाषाओं की उच्च विचारधारा से परिचित और अपनी भाषा पर भी यथेष्ट अधिकार रखनेवाले कुछ लेखकों की कृपा से हिन्दी की अर्थोद्धाटिनी शक्ति की अच्छी वृद्धि  और अभिव्यंजन प्रणाली का भी अच्छा प्रसार हुआ। सघन और गुंफित विचारसूत्रों को व्यक्त करनेवाली तथा सूक्ष्म और गूढ़ भावों की झलकाने वाली भाषा हिन्दी साहित्य को कुछ कुछ प्राप्त होने लगी। उसी के अनुरूप हमारे साहित्य का डौल भी बहुत कुछ ऊँचा हुआ। बँग्ला के उत्कृष्ट सामाजिक, पारिवारिक और ऐतिहासिक उपन्यासों के लगातार आते रहने से रुचि परिष्कृत होती रही जिससे कुछ दिनों की तिलस्म, ऐयारी और जासूसी के उपरांत उच्चकोटि के सच्चे साहित्यिक उपन्यासों की मौलिक रचना का दिन भी ईश्वर ने दिखाया।
    नाटक के क्षेत्र में वैसी उन्नति नहीं दिखाई पड़ी। बाबू राधाकृष्णदास के 'महाराणा प्रताप' (या राजस्थान केसरी) की कुछ दिन धूम रही और उसका अभिनय भी बहुत बार हुआ। राय देवीप्रसादजी पूर्ण ने 'चंद्रकला भानुकुमार' नामक एक बहुत बड़े डीलडौल का नाटक लिखा था, पर वह साहित्य के विविधा अंगों से पूर्ण होने पर भी वस्तुवैचित्रय के अभाव तथा भाषणों की कृत्रिमता आदि के कारण उतना प्रसिद्ध  न हो सका। बँग्ला के नाटकों के कुछ अनुवाद बाबू रामकृष्ण वर्मा के बाद भी होते रहे पर उतनी अधिकता से नहीं जितनी अधिकता से उपन्यासों के। इससे नाटक की गति बहुत मंद रही। हिन्दीप्रेमियों के उत्साह से स्थापित प्रयाग और काशी की नाटक मंडलियों (जैसे भारतेंदु नाटक मंडली) के लिए रंगशाला के अनुकूल दो-एक छोटे मोटे नाटक अवश्य लिखे गए, पर वे साहित्यिक प्रसिद्धि  न पा सके। प्रयाग में पं. माधव शुक्लजी और काशी में पं. दुगवेकरजी अपनी रचनाओं और अनूठे अभिनयों द्वारा बहुत दिनों तक दृश्य काव्य की रुचि जगाए रहे। इसके उपरांत बँग्ला में श्री द्विजेंद्रलाल राय के नाटकों की धूम हुई और उनके अनुवाद हिन्दी में धाड़ाधाड़ हुए। इसी प्रकार रवींद्र बाबू के कुछ नाटक भी हिन्दी रूप में लाए गए। द्वितीय उत्थान के अंत में दृश्य काव्य की अवस्था यही रही। 
    निबंधों की ओर यद्यपि बहुत कम ध्यान दिया गया और उसकी परंपरा ऐसी न चली कि हम 5-7 उच्चकोटि के निबंध लेखकों को उसी प्रकार झट से छाँटकर बता सकें जिस प्रकार अंग्रेजी साहित्य में बता दिए जाते हैं, फिर भी बीच बीच में अच्छे और उच्चकोटि के निबंध मासिक पत्रिकाओं में दिखाई पड़ते रहे। इस द्वितीय उत्थान में साहित्य के एक एक अंग को लेकर जैसी विशिष्टता लेखकों में आ जानी चाहिए थी वैसी विशिष्टता न आ पाई। किसी विषय में अपनी सबसे अधिक शक्ति देख उसे अपनाकर बैठने की प्रवृत्ति बहुत कम दिखाई दी। बहुत लेखकों का यह हाल रहा कि कभी अखबारनवीसी करते, कभी उपन्यास लिखते, कभी नाटक में दखल देते, कभी कविता की आलोचना करने लगते और कभी इतिहास और पुरातत्व की बातें लेकर सामने आते। ऐसी अवस्था में भाषा की पूर्ण शक्ति प्रदर्शित करने वाले गूढ़ गंभीर निबंध लेखक कहाँ से तैयार होते। फिर भी भिन्न भिन्न शैलियाँ प्रदर्शित करने वाले कई अच्छे लेखक इस बीच में बताए जा सकते हैं जिन्होंने लिखा तो कम है पर जो कुछ लिखा है वह महत्व का है। 
    समालोचना का आरंभ यद्यपि भारतेंदु के जीवनकाल में ही कुछ न कुछ हो गया था पर उसका कुछ अधिक वैभव इस द्वितीय उत्थान में ही दिखाई पड़ा। श्रीयुत् पं. महावीर प्रसाद द्विवेदीजी ने पहले पहल विस्तृत आलोचना का रास्ता निकाला। फिर मिश्रबंधुओं और पं. पद्मसिंह शर्मा ने अपने ढंग पर कुछ पुराने कवियों के संबंध में विचार प्रकट किए। पर यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुणदोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता, इन्हीं सब परंपरागत विषयों तक पहुँची। स्थायी साहित्य में परिगणित होनेवाली समालोचना जिसमें किसी कवि की अंतर्वृत्तिा का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती हैं, बहुत ही कम दिखाई पड़ी। 
    साहित्यिक मूल्य रखनेवाले तीन जीवन चरित महत्व के निकले , पं. माधवप्रसाद मिश्र की 'विशुद्ध  चरितावली' (स्वामी विशुध्दानंद का जीवन चरित) तथा बाबू शिवनंदन सहाय लिखित 'हरिश्चंद्र का जीवन चरित', 'गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन चरित' और 'चैतन्य महाप्रभु का जीवन चरित'।

प्रकरण 4
गद्य साहित्य का प्रसार


द्वितीय उत्थान के भीतर गद्य साहित्य का निर्माण इतने परिमाण में और इतने रूपों में हो गया कि हम उसका निरूपण कुछ विभाग करके कर सकते हैं। सुभीते के लिए हम चार विभाग करते हैं , नाटक, उपन्यास, कहानियाँ, निबंध और समालोचना। 
नाटक : अनूदित नाटक
जैसा कि पहले कहा जा चुका है, भारतेंदु के पीछे नाटकों की ओर प्रवृत्ति बहुत कम हो गई। नाम लेने योग्य अच्छे मौलिक नाटक बहुत दिनों तक दिखाई न पड़े। अनुवादों की परंपरा अलबत्ता चलती रही। 
    बंगभाषा के अनुवाद , बाबू रामकृष्ण वर्मा द्वारा वीरनारी, कृष्णकुमारी और पद्मावती नाटकों का उल्लेख पहले हो चुका है। संवत् 1950 के पीछे गहमर (जिला , गाजीपुर) के बाबू गोपालराम ने 'वनवीर', 'वभ्रुवाहन', 'देशदशा', 'विद्या विनोद' और रवींद्र बाबू के 'चित्रांगदा' का अनुवाद किया। 
    द्वितीय उत्थान के अंतिम भाग में पं. रूपनारायण पांडे ने गिरीश बाबू के 'पतिव्रता' क्षीरोदप्रसाद विद्याविनोद के 'खानजहाँ', रवींद्र बाबू के 'अचलायतन' तथा द्विजेंद्रलाल राय के 'उस पार', 'शाहजहाँ', 'दुर्गादास', 'ताराबाई' आदि कई नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए। अनुवादकों की भाषा अच्छी खासी हिन्दी है और मूल के भावों को ठीक ठीक व्यक्त करती है। इन नाटकों के संबंध में यह समझ रखना चाहिए कि इनमें बंगवासियों की आवेशशील प्रकृति का आरोप अनेक पात्रों में पाया जाता है जिससे बहुत से इतिहासप्रसिद्ध  व्यक्तियों के क्षोभपूर्ण लंबे भाषण उनके अनुरूप नहीं जान पड़ते। प्राचीन ऐतिहासिक वृत्त लेकर लिखे हुए नाटकों में उस काल की संस्कृति और परिस्थिति का सम्यक् अध्ययन नहीं प्रकट होता। 
    अंग्रेजी के अनुवाद , जयपुर के पुरोहित गोपीनाथ एम. ए. ने संवत् 1950 के कुछ आगे पीछे शेक्सपियर के इन तीन नाटकों के अनुवाद किए। रोमियोजूलियट ('प्रेमलीला' के नाम से), ऐज यू लाइक इट और वेनिस का बैपारी। उपाधयाय बदरीनारायण्ा चौधारी के छोटे भाई पं. मथुराप्रसाद चौधारी ने संवत् 1950 में 'मैकबेथ' का बहुत अच्छा अनुवाद 'साहसेंद्र साहस' के नाम से प्रकाशित किया। इसके उपरांत संवत् 1967 के लगभग 'हैमलेट' का एक अनुवाद 'जयंत' के नाम से निकला जो वास्तव में मराठी अनुवाद का हिन्दी अनुवाद था। 
    संस्कृत के अनुवाद , संस्कृत के नाटकों के अनुवाद के लिए राय बहादुर लाला सीताराम बी. ए. सदा आदर के साथ स्मरण किये जायँगे। भारतेंदु की मृत्यु से दो वर्ष पहले ही उन्होंने संस्कृत काव्यों के अनुवाद में लग्गा लगाया और संवत् 1940 में मेघदूत का अनुवाद घनाक्षरी छन्दों में प्रकाशित किया। इसके उपरांत वे बराबर किसी न किसी काव्य नाटक का अनुवाद करते रहे। संवत् 1944 में उनका 'नागानंद' का अनुवाद निकला। फिर तो धीरे धीरे उन्होंने मृच्छकटिक, महावीरचरित, उत्तररामचरित, मालतीमाधव, मालविकाग्निमित्र का भी अनुवाद कर डाला। यद्यपि पद्य भाग के अनुवाद में लाला साहब को वैसी सफलता नहीं हुई पर उनकी हिन्दी बहुत सीधी सादी, सरल और आडंबरशून्य है। संस्कृत का भाव उसमें इस ढंग से लाया गया है कि कहीं संस्कृतपन या जटिलता नहीं आने पाई है।
    भारतेंदु के समय में वे काशी के क्वींस कॉलेज स्कूल के सेकेंड मास्टर थे। पीछे डिप्टी कलक्टर हुए और अंत में शांतिपूर्वक प्रयाग में आ रहे जहाँ 2 जनवरी, 1937 को उनका साकेतवास हुआ। 
    संस्कृत के अनेक पुराण ग्रंथों के अनुवादक, रामचरितमानस, बिहारी सतसई के टीकाकार, सनातनधर्म के प्रसिद्ध  व्याख्याता मुरादाबाद के पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र ने 'वेणीसंहार' और 'अभिज्ञान शाकुंतल' के हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किए। संस्कृत की 'रत्नावली नाटिका' हरिश्चंद्र को बहुत पसंद थी और उसके कुछ अंश का अनुवाद भी उन्होंने किया था, पर पूरा न कर सके। भारतमित्र के प्रसिद्ध  संपादक, हिन्दी के बहुत ही सिद्ध हस्त लेखक बाबू बालमुकुंद गुप्त ने उक्त नाटिका का पूरा अनुवाद अत्यंत सफलतापूर्वक किया। 
    संवत् 1970 में पं. सत्यनारायण कविरत्न ने भवभूति के 'उत्तररामचरित' का और पीछे 'मालती माधव' का अनुवाद किया। कविरत्नजी के ये दोनों अनुवाद बहुत ही सरस हुए जिनमें मूल के भावों की रक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। पद्य अधिकतर ब्रजभाषा के सवैयों में हैं जो पढ़ने में बहुत मधुर हैं। इन पद्यों में खटकने वाली केवल दो बातें कहीं कहीं मिलती हैं। पहली बात तो यह है कि ब्रजभाषा साहित्य में स्वीकृत शब्दों के अतिरिक्त वे कुछ स्थलों पर ऐसे शब्द भी लाए हैं जो एक भू भाग तक ही (चाहे वह ब्रजमंडल के अंतर्गत ही क्यों न हो) परिमित हैं। शिष्ट साहित्य में ब्रजमंडल के भीतर बोलेजाने वाले सब शब्द नहीं ग्रहण किए हैं। ब्रजभाषा देश की सामान्य काव्यभाषा रही है। अत: काव्यों में उसके वे ही शब्द लिए गए हैं जो बहुत दूर तक बोले जाते हैं और थोड़े बहुत सब स्थानों में समझ लिए जाते हैं। उदाहरण के लिए 'सिदौसी' शब्द लीजिए जो खास मथुरा वृंदावन में बोला जाता है, पर साहित्य में नहीं मिलता। दूसरी बात यह कि कहीं कहीं श्लोकों का पूरा भाव लाने के प्रयत्न में भाषा दुरूह और अव्यवस्थित हो गई है। 
मौलिक नाटक
काशीनिवासी पं. किशोरीलाल गोस्वामी ने प्रथम उत्थान के अंत में दो नाटक लिखे थे , 'चौपट चपेट' और 'मयंकमंजरी'। इनमें से प्रथम तो एक प्रहसन था जिसमें चरित्रहीन और छलकपट से भरी स्त्रियों तथा लुच्चों, लफंगों आदि के बीभत्स और अश्लील चित्र अंकित किए गए थे। दूसरा पाँच अंकों का नाटक था जो श्रृंगाररस की दृष्टि से संवत् 1948 में लिखा गया था। यह भी साहित्य में कोई विशेष स्थान प्राप्त न कर सका और लोकविस्मृत हो गया। हिन्दी के विख्यात कवि पं. अयोध्यासिंह उपाधयाय की प्रवृत्ति इस द्वितीय उत्थान के आरंभ में नाटक लिखने की ओर भी हुई थी और उन्होंने 'रुक्मिणीपरिणय' और 'प्रद्युम्नविजय व्यायोग' नाम के दो नाटक लिखे थे। ये दोनों नाटक उपाधयायजी ने हाथ आजमाने के लिए लिखे थे। आगे उन्होंने इस ओर कोई प्रयत्न नहीं किया। 
    पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र ने संस्कृत नाटकों के अनुवाद के अतिरिक्त 'सीतावनवास' नाम का एक नाटक भी लिखा था जिसमें भवभूति के 'उत्तररामचरित' की कुछ झलक थी। उनके भाई पं. बलदेवप्रसाद मिश्र ने तीन अच्छे रूपक लिखे। 'प्रभासमिलन' ब्रज के नंद, यशोदा, गोपगोपियों का प्रभास क्षेत्र में वसुदेव, कृष्ण, बलराम आदि से भेंट होने का मार्मिक प्रसंग लेकर बड़ी सहृदयता के साथ रचा गया। 'मीराबाई नाटक' भक्तिभाव जगानेवाला उत्तम नाटक है। 'लल्ला बाबू' समाज का एक छोटा सा खंड चित्र दिखानेवाला अच्छा प्रहसन है। 
    भारतेंदु का बृहत् जीवन चरित लिखनेवाले बाबू शिवनंदन सहाय का 'सुदामा नाटक' भी उल्लेख योग्य है। 
    इन मौलिक रूपकों की सूची देखने से यह लक्षित हो जाता है कि नाटक की कथावस्तु के लिए लोगों का ध्यान अधिकतर ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों की ओर ही गया है। वर्तमान सामाजिक और पारिवारिक जीवन के विविधा उलझे हुए पक्षों का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण करके उनके मार्मिक या अनूठे चित्र खड़ा करनेवाली उद्भावना उनमें नहीं पाई जाती। इस द्वितीय उत्थान के बीच कल्पित कथावस्तु लेकर लिखा जानेवाला बहुत बड़ा मौलिक नाटक कानपुर के प्रसिद्ध  कवि राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' का 'चंद्रकलाभानुकुमार' है। पर वह भी इतिहास के मध्ययुग के राजकुमारों और राजकुमारियों का जीवन सामने लाता है। 
    'पूर्णजी' ब्रजभाषा के एक बड़े ही सिद्ध हस्त कवि थे, साहित्य के अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने इस नाटक को शुद्ध  साहित्यिक उद्देश्य से ही लिखा था, अभिनय के उद्देश्य से नहीं। वस्तुविन्यास में कुतूहल उत्पन्न करनेवाला जो वैचित्रय होता है उसके न रहने से कम ही लोगों के हाथ में यह नाटक पड़ा। ललित और अलंकृत भाषण के बीच बीच में मधुर पद्य पढ़ने की उत्कंठा रखनेवाले पाठकों ही ने अधिकतर इसे पढ़ा। 
उपन्यास : अनूदित
इस द्वितीय उत्थान में आलस्य का जैसा त्याग उपन्यासकारों में देखा गया वैसा और किसी वर्ग के हिन्दी लेखकों में नहीं। अनुवाद भी खूब हुए और मौलिक उपन्यास भी कुछ दिनों तक धाड़ाधाड़ निकले , किस प्रकार के, यह आगे प्रकट किया जाएगा। पहले अनुवादों की बात खतम कर देनी चाहिए।
    अनुवाद , संवत् 1951 तक बाबू रामकृष्ण वर्मा उर्दू और अंग्रेजी के भी कुछ अनुवाद कर चुके थे, जैसे , 'ठगवृत्तांतमाला' (संवत् 1946), 'पुलिस वृत्तांतमाला' (1947), 'अकबर' (1948), 'अमलावृत्तांतमाला (1951)। 'चित्तौरचातकी' का बंगभाषा से अनुवाद उन्होंने संवत् 1952 में किया। यह पुस्तक चित्तौर के राजवंश की मर्यादा के विरुद्ध  समझी गई और इसके विरोध में यहाँ तक आंदोलन हुआ कि सब कॉपियाँ गंगा में फेंक दी गईं। फिर बाबू कार्तिकप्रसाद खत्री ने 'इला' (1952) और 'प्रमीला' (1953) का अनुवाद किया। 'जया' और 'मधुमालती' के अनुवाद दो-एक बरस पीछे निकले।
    भारतेंदु प्रवर्तित प्रथम उत्थान के अनुवादकों में भारतेंदु काल की हिन्दी की विशेषता बनी रही। उपर्युक्त तीनों लेखकों की भाषा बहुत ही साधु और संयत रही। यद्यपि उसमें चटपटापन न था, पर हिन्दीपन पूरा पूरा था। फारसी अरबी के शब्द बहुत ही कम दिखाई देते हैं, साथ ही संस्कृत के शब्द भी ऐसे आए हैं जो हिन्दी के परंपरागत रूप में किसी प्रकार का असामंजस्य नहीं उत्पन्न करते। सारांश यह कि उन्होंने 'शूरता', 'चपलता', 'लघुता', 'मूर्खता', 'सहायता', 'दीर्घता', 'मृदुता' ऐसी संस्कृत का सहारा लिया है, 'शौर्य', 'चापल्य', 'लाघव', 'मर्ौख्य' 'साहाय्य', 'दर्ैघ्य' और 'मार्दव' ऐसी संस्कृत का नहीं। 
    द्वितीय उत्थान के आरंभ में हमें बाबू गोपालराम (गहमर) बंग भाषा के गार्हस्थ उपन्यासों के अनुवाद में तत्पर मिलते हैं। उनके कुछ उपन्यास तो इस उत्थान (संवत् 1957) के पूर्व लिखे गए, जैसे , 'चतुर चंचला' (1950), 'भानमती' (1951), 'नए बाबू' (1951), और बहुत से इसके आरंभ में, जैसे , 'बड़ा भाई' (1957), 'देवरानी जेठानी' (1958), 'दो बहिन' (1959), 'तीन पतोहू' (1961), और 'सास पतोहू'। भाषा उनकी चटपटी और वक्रतापूर्ण है। ये गुण लाने के लिए कहीं कहीं उन्होंने पूरबी शब्दों और मुहावरों का भी बेधाड़क प्रयोग किया है। उनके लिखने का ढंग बहुत ही मनोरंजक है। इस काल के आरंभ में गाजीपुर के मुंशी उदितनारायण लाल के भी कुछ अनुवाद निकले जिनमें मुख्य 'दीपनिर्वाण' नामक ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें पृथ्वीराज के समय का चित्र है।
    इस उत्थान के भीतर बंकिमचंद्र, रमेशचंद्र दत्ता, हाराणचंद्र रक्षित, चंडीचरण सेन, शरत् बाबू, चारुचंद इत्यादि बंगभाषा के प्राय: सब प्रसिद्ध  उपन्यासकारों की बहुत सी पुस्तकों के अनुवाद तो हो ही गए, रवींद्र बाबू के 'ऑंख की किरकिरी' आदि कई उपन्यास हिन्दी रूप में दिखाई पड़े जिनके प्रभाव से इस उत्थान के अंत में आविर्भूत होनेवाले हिन्दी के मौलिक उपन्यासकारों का आदर्श बहुत कुछ ऊँचाहुआ। इस अनुवादविधान में योग देनेवालों में पं. ईश्वरीप्रसाद शर्मा और पं. रूपनाराण पांडेय विशेष उल्लेख योग्य हैं। बंगभाषा के अतिरिक्त उर्दू, मराठी और गुजराती के भीकुछ उपन्यासों के अनुवाद हिन्दी में हुए पर बँग्ला की अपेक्षा बहुत कम। काशी के बाबू गंगाप्रसाद गुप्त ने 'पूना में हलचल' आदि कई उपन्यास उर्दू से अनुवाद करके निकाले। मराठी से अनूदित उपन्यासों में बाबू रामचंद्र वर्मा का 'छत्रसाल' बहुत उत्कृष्ट है।
    अंग्रेजी के दो ही चार उपन्यासों के अनुवाद देखने में आए, जैसे , रेनल्ड्स कृत 'लैला' और 'लंडन रहस्य'। अंग्रेजी के प्रसिद्ध  उपन्यास 'टाम काका की कुटिया' का भी अनुवाद हुआ। 
    अनुवादों की चर्चा यहीं समाप्त कर अब हम मौलिक उपन्यासों को लेते हैं। 
मौलिक उपन्यास
पहले मौलिक उपन्यास लेखक, जिनके उपन्यासों की सर्वसाधारण में धूम हुई, काशी के बाबू देवकीनंदन खत्री थे। द्वितीय उत्थानकाल के पहले ही ये नरेंद्रमोहिनी, कुसुमकुमारी, वीरेंद्रवीर आदि कई उपन्यास लिख चुके थे। उक्त काल के आरंभ में तो 'चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति' नामक इनके ऐयारी के उपन्यासों की चर्चा चारों ओर इतनी फैली कि जो लोग हिन्दी की किताबें नहीं पढ़ते थे वे भी इन नामों से परिचित हो गए। यहाँ पर यह कह देना आवश्यक है कि इन उपन्यासों का लक्ष्य केवल घटनावैचित्रय रहा, रससंचार, भावविभूति या चरित्रचित्रण नहीं। ये वास्तव में घटनाप्रधान कथानक या किस्से हैं जिनमें जीवन के विविधा पक्षों के चित्रण का कोई प्रयत्न नहीं, इससे ये साहित्यकोटि में नहीं आते। पर हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनंदन का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि जितने पाठक उन्होंने उत्पन्न किए उतने और किसी ग्रंथकार ने नहीं। चंद्रकांता पढ़ने के लिए न जाने कितने उर्दूजीवी लोगों ने हिन्दी सीखी। चंद्रकांता पढ़ चुकने पर वे 'चंद्रकांता' की किस्म की कोई किताब ढूँढ़ने में परेशान रहते थे। शुरू शुरू में चंद्रकांता और 'चंद्रकांता संतति' पढ़कर न जाने कितने नवयुवक हिन्दी के लेखक हो गए। 'चंद्रकांता' पढ़कर वे हिन्दी की और प्रकार की साहित्यिक पुस्तकें भी पढ़ चले और अभ्यास हो जाने पर कुछ लिखने भी लगे। 
    बाबू देवकीनंदन के प्रभाव से 'तिलस्म' और 'ऐयारी' के उपन्यासों की हिन्दी में बहुत दिनों तक भरमार रही और शायद अभी तक यह शौक बिल्कुल ठंडा नहीं हुआ है। बाबू देवकीनंदन के तिलस्मी रास्ते पर चलनेवालों में बाबू हरिकृष्ण जौहर विशेष उल्लेख योग्य हैं। 
    बाबू देवकीनंदन के संबंध में इतना और कह देना जरूरी है कि उन्होंने ऐसी भाषा का व्यवहार किया है जिसे थोड़ी हिन्दी और उर्दू पढ़े लोग भी समझ लें। कुछ लोगों का यह समझना कि उन्होंने राजा शिवप्रसाद वाली उस पिछली 'आमफहम' भाषा का बिल्कुल अनुसरण किया जो एकदम उर्दू की ओर झुक गई थी, ठीकनहीं। कहना चाहे तो यों कह सकते हैं कि उन्होंने साहित्यिक हिन्दी न लिखकर 'हिंदुस्तानी' लिखी, जो केवल इसी प्रकार की हलकी रचनाओं में काम दे सकती है। 
    उपन्यासों का ढेर लगा देनेवाले दूसरे मौलिक उपन्यासकार पं. किशोरीलाल गोस्वामी (जन्म , संवत् 1922, मृत्यु , संवत् 1989) है, जिनकी रचनाएँ साहित्य कोटि में आती हैं। इनके उपन्यासों में समाज के कुछ सजीव चित्र, वासनाओं के रूप रंग, चित्ताकर्षक वर्णन और थोड़ा बहुत चरित्र चित्रण भी अवश्य पाया जाता है। गोस्वामी जी संस्कृत के अच्छे जानकार, साहित्य के मर्मज्ञ तथा हिन्दी के पुराने कवि और लेखक थे। संवत् 1955 में उन्होंने 'उपन्यास' मासिक पत्र निकाला और द्वितीय उत्थानकाल के भीतर 65 छोटे बड़े उपन्यास लिखकर प्रकाशित किए। अत: साहित्य की दृष्टि से उन्हें हिन्दी का पहला उपन्यासकार कहना चाहिए। इस द्वितीय उत्थानकाल के भीतर उपन्यासकार इन्हीं को कह सकते हैं। और लोगों ने भी मौलिक उपन्यास लिखे पर वे वास्तव में उपन्यासकार न थे। और चीजें लिखते लिखते वे उपन्यास की ओर भी जा पड़े थे। पर गोस्वामी जी वहीं घर करके बैठ गए। एक क्षेत्र उन्होंने अपने लिए चुन लिया और उसी में रह गए। यह दूसरी बात है, उनके बहुत से उपन्यासों का प्रभाव नवयुवकों पर बुरा पड़ सकता है, उनमें उच्च वासनाएँ व्यक्त करने वाले दृश्यों की अपेक्षा निम्नकोटि की वासनाएँ प्रकाशित करने वाले दृश्य अधिक भी हैं और चटकीले भी। इस बात की शिकायत 'चपला' के संबंध में अधिक हुई थी। 
    एक और बात जरा खटकती है। वह है उनका भाषा के साथ मजाक। कुछ दिन पीछे उन्हें उर्दू लिखने का शौक हुआ। उर्दू भी ऐसी वैसी नहीं, उर्दू-ए-मुअल्ला। इस शौक के कुछ आगे पीछे उन्होंने राजा शिवप्रसाद का जीवन चरित्र लिखा जो 'सरस्वती' के आरंभ के तीन अंकों में (भाग 1, संख्या 2, 3, 4) निकला। उर्दू जबान और शेर सखुन की बेढंगी नकल से, जो असल में कभी कभी साफ अलग हो जाती है, उनके बहुत से उपन्यासों का साहित्यिक गौरव घट गया है। गलत या गलत मानी में लाए हुए शब्द भाषा को शिष्टता के दरजे से गिरा देते हैं। खैरियत यह हुई कि अपने सब उपन्यासों को आपने यह मँगनी का लिबास नहीं पहनाया। 'मल्लिका देवी या बंग सरोजिनी' में संस्कृतप्राय समासबहुला भाषा काम में लाई गई है। इन दोनों प्रकार की लिखावटों को देखकर कोई विदेशी चकपकाकर पूछ सकता है कि 'क्या दोनों हिन्दी हैं?' हम यह भी कर सकते हैं वह भी कर सकते हैं, इस हौसले ने जैसे बहुत से लेखकों को किसी एक विषय पर पूर्ण अधिकार के साथ जमने न दिया, वैसे ही कुछ लोगों की भाषा को बहुत कुछ डावाँडोल रखा, कोई एक टेढ़ा सीधा रास्ता पकड़ने न दिया। 
     गोस्वामी जी के ऐतिहासिक उपन्यासों से भिन्न-भिन्न समयों की सामाजिक और राजनीतिक अवस्था का अध्ययन और संस्कृत के स्वरूप का अनुसंधान नहीं सूचित होता। कहीं कहीं तो काल दोष तुरंत ध्यान में आ जाते हैं, जैसे , वहाँ जहाँ अकबर के सामने हुक्के या पेचवान रखे जाने की बात कही गई है। पं. किशोरीलाल गोस्वामी के कुछ उपन्यासों के नाम ये हैं , तारा, चपला, तरुणतपस्विनी, रजिया बेगम, लीलावती, राजकुमारी, लवंगलता, हृदयहारिण्ाी, हीराबाई, लखनऊ की कब्र इत्यादि। 
    प्रसिद्ध  कवि और गद्य लेखक पं. अयोध्यासिंह उपाधयाय ने भी दो उपन्यास ठेठ हिन्दी में लिखे , 'ठेठ हिन्दी का ठाठ' (संवत् 1956) और 'अधाखिला फूल' (संवत् 1964)। पर ये दोनों पुस्तकें भाषा के नमूने की दृष्टि से लिखी गईं, औपन्यासिक कौशल की दृष्टि से नहीं। उनकी सबसे पहले लिखी पुस्तक 'वेनिस का बाँका' में जैसे भाषा संस्कृतपन की सीमा पर पहुँची हुई थी वैसे ही इन दोनों में ठेठपन की हद दिखाई देती है। इन तीनों पुस्तकों को सामने रखने पर पहला ख्याल यही पैदा होता है कि उपाधयायजी क्लिष्ट, संस्कृतप्राय भाषा भी लिख सकते हैं और सरल ठेठ हिन्दी भी। अधिकतर इसी भाषावैचित्रय पर ख्याल जमकर रह जाता है। उपाधयाय जी के साथ पं. लज्जाराम मेहता का भी स्मरण आता है जो अखबारनबीसी के बीचबीच में पुरानी हिंदूमर्यादा, हिंदूधर्म और हिंदू पारिवारिक व्यवस्था की सुंदरता और समीचीनता दिखाने के लिए बड़े छोटे उपन्यास भी लिखा करते थे। उनके उपन्यासों में मुख्य ये हैं , धाूर्त रसिकलाल (संवत् 1956), हिंदू गृहस्थ, आदर्श दंपति (1961), बिगड़े का सुधार (1964) आदर्श हिंदू (1972)। ये दोनों महाशय वास्तव में उपन्यासकार नहीं। उपाधयायजी कवि हैं और मेहताजी पुराने अखबारनवीस। 
    काव्यकोटि में आनेवाले भावप्रधान उपन्यास, जिनमें भावों या मनोविकारों की प्रगल्भ और वेगवती व्यंजना का लक्ष्य प्रधान हो , चरित्रचित्रण या घटना वैचित्रय का लक्ष्य नहीं , हिन्दी में न देख, बंगभाषा में काफी देख, बाबू ब्रजनंदन सहाय बी‑ ए‑ ने दो उपन्यास इस ढंग के प्रस्तुत किए , 'सौंदर्योपासक' और 'राधाकांत' (संवत्1969)।
छोटी कहानियाँ
जिस प्रकार गीत गाना और सुनना मनुष्य के स्वभाव के अंतर्गत है उसी प्रकार कथा कहानी कहना और सुनना भी। कहानियों का चलन सभ्य असभ्य सब जातियों में चला आ रहा है। सब जगह उसका समावेश शिष्ट साहित्य के भीतर भी हुआ है। घटनाप्रधान और मार्मिक, उनके ये स्थूल भेद भी बहुत पुराने हैं और इनका मिश्रण भी। बृहत्कथा, बैतालपचीसी, सिंहासनबत्तीसी इत्यादि घटनाचक्र में रमानेवाली कथाओं की पुरानी पोथियाँ हैं। कादंबरी, माधावानल कामकंदला, सीतबसंत इत्यादि वृत्तवैचित्रय पूर्ण होते हुए भी कथा के मार्मिक स्थलों में रमानेवाले भावप्रधान आख्यान हैं। इन दोनों कोटि की कहानियों में एक बड़ा भारी भेद तो यह दिखाई देगा कि प्रथम में इतिवृत्त का प्रवाहमात्र अपेक्षित होता है; पर दूसरी कोटि की कहानियों में भिन्न भिन्न स्थितियों का चित्रण या प्रत्यक्षीकरण भी पाया जाता है। 
    आधुनिक ढंग के उपन्यासों और कहानियों के स्वरूप का विकास इसी भेद के आधार पर क्रमश: हुआ है। इस स्वरूप के विकास के लिए कुछ बातें नाटकों की ली गईं, जैसे , कथोपकथन, घटनाओं का विन्यासवैचित्रय, बाह्य और आभ्यंतर परिस्थिति का चित्रण तथा उसके अनुरूप भावव्यंजना। इतिवृत्त का प्रवाह तो उसका मूल रूप था ही; वह तो बना ही रहेगा। उनमें अंतर इतना ही पड़ा कि पुराने ढंग की कथा कहानियों में कथा का प्रवाह अखंड गति से एक ओर चला चलता था जिसमें घटनाएँ पूर्वापर क्रम से जुड़ती सीधी चली जाती थीं। पर यूरोप में जो नए ढंग के कथानक नावेल के नाम से चले और बंगभाषा में आकर 'उपन्यास' कहलाए (मराठी में वे 'कादंबरी' कहलाने लगे) वे कथा के भीतर की कोई भी परिस्थिति आरंभ में रखकर चल सकते हैं और उसमें घटनाओं की श्रृंखला लगातार सीधी न जाकर इधर उधर और श्रृंखलाओं से गुंफित होती चलती है और अंत में जाकर सबका समाहार हो जाता है। घटनाओं के विन्यास की यह वक्रता या वैचित्रय उपन्यासों और आधुनिक कहानियों की वह प्रत्यक्ष विशेषता है जो उन्हें पुराने ढंग की कथा कहानियों से अलग करती है।
    उपर्युक्त दृष्टि से यदि हम देखें तो इंशा की रानी केतकी की बड़ी कहानी न आधुनिक उपन्यास के अंतर्गत आएगी, न राजा शिवप्रसाद का 'राजाभोज का सपना' या 'वीर सिंह का वृत्तांत' आधुनिक छोटी कहानी के अंतर्गत। 
    अंग्रेजी की मासिक पत्रिकाओं में जैसी छोटी छोटी आख्यायिकाएँ या कहानियाँ निकला करती हैं वैसी कहानियों की रचना 'गल्प' के नाम से बंगभाषा में चल पड़ी थीं। ये कहानियाँ जीवन के बड़े मार्मिक और भावव्यंजक खंडचित्रों के रूप में होती थीं। द्वितीय उत्थान की सारी प्रवृत्तियों का आभास लेकर प्रकट होनेवाली 'सरस्वती' पत्रिका में इस प्रकार की छोटी कहानियों के दर्शन होने लगे। 'सरस्वती' के प्रथम वर्ष (संवत् 1957) में ही पं. किशोरीलाल गोस्वामी की 'इंदुमती' नाम की कहानी छपी जो मौलिक जान पड़ती है। इसके उपरांत तो उसमें कहानियाँ बराबर निकलती रहीं पर ये अधिकतर बंगभाषा से अनूदित या छाया लेकर लिखी होती थीं। बंगभाषा से अनुवाद करनेवालों में इंडियन प्रेस के मैनेजर बाबू गिरिजाकुमार घोष, जो हिन्दी कहानियों में अपना नाम 'लाला पार्वतीनंदन' देते थे, विशेष उल्लेख योग्य हैं। उसके उपरांत 'बंगमहिला' का स्थान है जो मिरजापुर निवासी प्रतिष्ठित बंगाली सज्जन बाबू रामप्रसन्न घोष की पुत्री और बाबू पूर्णचंद्र की धर्मपत्नी थीं। उन्होंने बहुत सी कहानियों का बंगला से अनुवाद तो किया ही, हिन्दी में कुछ मौलिक कहानियाँ भी लिखीं जिनमें से एक थी 'दुलाईवाली' जो संवत् 1964 की 'सरस्वती' (भाग 8, संख्या 5) में प्रकाशित हुई। 
    कहानियों का आरंभ कहाँ से मानना चाहिए यह देखने के लिए 'सरस्वती' में प्रकाशित कुछ मौलिक कहानियों के नाम वर्षक्रम से नीचे दिए जाते हैं , 
    इंदुमती           (किशोरीलाल गोस्वामी)     संवत् 1957
    गुलबहार          (किशोरीलाल गोस्वामी)     संवत् 1959
    प्लेग की चुड़ैल     (मास्टर भगवानदास, मिरजापुर)  संवत् 1959
    ग्यारह वर्ष का समय (रामचंद्र शुक्ल)          संवत् 1960
    पंडित और पंडितानी (गिरिजादत्ता वाजपेयी)     संवत् 1960
    दुलाईवाली         (बंगमहिला)             संवत् 1964
    इनमें से यदि मार्मिकता की दृष्टि से भावप्रधान कहानियों को चुनें तो तीन मिलती हैं , 'इंदुमती', 'ग्यारह वर्ष का समय' और 'दुलाईवाली'। यदि 'इंदुमती' किसी बँग्ला कहानी की छाया नहीं है तो हिन्दी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है। इसके उपरांत 'ग्यारह वर्ष का समय' फिर 'दुलाईवाली' का नंबर आता है। 
    ऐसी कहानियों की ओर लोग बहुत आकर्षित हुए और वे इस काल के भीतर की प्राय: सब मासिक पत्रिकाओं में बीच-बीच में निकलती रहीं। संवत् 1968 में कल्पना और भावुकता के कोश बाबू जयशंकर 'प्रसाद' की 'ग्राम' नाम की कहानी उनके मासिक पत्र 'इंदु' में निकली। उसके उपरांत तो उन्होंने 'आकाशदीप', 'बिसाती', 'प्रतिध्वनि', 'स्वर्ग के खंडहर', 'चित्रमंदिर' इत्यादि अनेक कहानियाँ लिखीं जो तृतीय उत्थान के भीतर आती हैं। हास्यरस की कहानियाँ लिखनेवाले जी. पी. श्रीवास्तव की पहली कहानी भी 'इंदु' में संवत् 1968 में ही निकली थी। इसी समय के आसपास आजकल के प्रसिद्ध  कहानी लेखक पं. विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' ने भी कहानी लिखना आरंभ किया। उनकी पहली कहानी 'रक्षाबंधान' 1913 की 'सरस्वती' में छपी। सूर्यपुरा के राजा राधिाकारमणप्रसाद सिंहजी हिन्दी के एक अत्यंत भावुक और भाषा की शक्तियों पर अद्भुत अधिकार रखनेवाले पुराने लेखक हैं। उनकी एक अत्यंत भावुकतापूण्र्ा कहानी 'कानों में कंगना' संवत् 1970 में इंदु में निकली। उसके पीछे आपने 'बिजली' आदि कुछ और सुंदर कहानियाँ भी लिखीें। पं. ज्वालादत्ता शर्मा ने संवत् 1971 से कहानी लिखना आरंभ किया और उनकी पहली कहानी सन् 1914 की सरस्वती में निकली। चतुरसेन शास्त्री भी उसी वर्ष कहानी लिखने की ओर झुके। 
    संस्कृत के प्रकांड प्रतिभाशाली विद्वान हिन्दी के अनन्य आराधक श्री चंद्रधार शर्मा गुलेरी की अद्वितीय कहानी 'उसने कहा था' संवत् 1972 अर्थात् सन् 1915 की 'सरस्वती' में छपी थी। इसमें पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झाँक रहा है , केवल झाँक रहा है निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है। कहानी भर में कहीं प्रेमी की निर्लज्जता, प्रगल्भता, वेदना की बीभत्स विवृत्ति नहीं है। सुरुचि के सुकुमार से सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं पहुँचता। इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं। 
    हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार प्रेमचंद की छोटी कहानियाँ भी संवत् 1973 से ही निकलने लगीं। इस प्रकार द्वितीय उत्थानकाल के अंतिम भाग में ही आधुनिक कहानियों का आरंभ हम पाते हैं जिनका पूर्ण विकास तृतीय उत्थान में हुआ। 
निबंध
यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है। इसीलिए गद्य शैली के विवेचक उदाहरणों के लिए अधिकतर निबंध ही चुना करते हैं। निबंध या गद्य विधान कई प्रकार के हो सकते हैं , विचारात्मक, भावात्मक, वर्णनात्मक। प्रवीण लेखक प्रसंग के अनुसार इन विधानों का बड़ा सुंदर मेल भी करते हैं। लक्ष्यभेद से कई प्रकार की शैलियों का व्यवहार देखा जाता है, जैसे , विचारात्मक निबंधों में व्यास और समास की रीति, भावात्मक निबंधों में धारा, तरंग और विक्षेप की रीति। इसी विक्षेप के भीतर वह 'प्रलाप शैली' आएगी जिसका बँग्ला की देखा देखी कुछ दिनों से हिन्दी में भी चलन बढ़ रहा है। शैलियों के अनुसार गुण दोष भी भिन्न भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। 
    आधुनिक पाश्चात्य लक्षणों के अनुसार निबंध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व अर्थात् व्यक्तिगत विशेषता हो। बात तो ठीक है, यदि ठीक तरह से समझी जाए। व्यक्तिगत विशेषता का यह मतलब नहीं कि उसके प्रदर्शन के लिए विचारों की श्रृंखला रखी ही न जाय या जानबूझकर जगह जगह से तोड़ दी जाय, भावों की विचित्रता दिखाने के लिए ऐसी अर्थयोजना की जाय जो उनकी अनुभूति के प्रकृत या लोकसामान्य स्वरूप से कोई संबंध ही न रखे अथवा भाषा से सरकस वालों की सी कसरतें या हठयोगियों के से आसन कराए जायँ जिनका लक्ष्य तमाशा दिखाने के सिवा और कुछ न हो। 
    संसार की हर बात और सब बातों से संबद्ध  है। अपने अपने मानसिक संघटन के अनुसार किसी का मन किसी संबंधसूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर। ये संबंधसूत्र एक दूसरे से नथे हुए, पत्तों के भीतर की नसों के समान चारों ओर एक जाल के रूप में फैले हैं। तत्वचिंतक या दार्शनिक केवल अपने व्यापक सिध्दांतों के प्रतिपादन के लिए उपयोगी कुछ संबंधसूत्रों को पकड़कर किसी ओर सीधा चलता है और बीच के ब्योरे में कहीं नहीं फँसता। निबंध लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से इधर उधर फूटी हुई सूत्रशाखाओं पर विचरता चलता है। यही उसकी अर्थसंबंधी व्यक्तिगत विशेषता है। अर्थसंबंधसूत्र की टेढ़ीमेढ़ी रेखाएँ ही भिन्न भिन्न लेखकों का दृष्टिपथ निर्दिष्ट करती हैं। एक ही बात को लेकर किसी का मन किसी संबंधसूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर। इसी का नाम है एक ही बात को भिन्न भिन्न दृष्टियों से देखना। व्यक्तिगत विशेषता का मूल आधार यही है।
    तत्वचिंतक या वैज्ञानिक से निबंधलेखक की भिन्नता इस बात में भी है कि निबंधलेखक जिधार चलता है उधर अपनी संपूर्ण मानसिक सत्ता के साथ अर्थात् बुद्धि  और भावात्मक हृदय दोनों लिए हुए। जो करुण प्रकृति हैं उनका मन किसी बात को लेकर, अर्थ संबंध सूत्र पकड़े हुए, करुण स्थलों की ओर झुकता है और गंभीर वेदना का अनुभव करता चलता है। जो विनोदशील हैं उनकी दृष्टि उसी बात को लेकर उसके ऐसे पक्षों की ओर दौड़ती है जिन्हें सामने पाकर कोई हँसे बिना नहीं रह सकता है। इसी प्रकार कुछ बातों के संबंध में लोगों की बँधी हुई धारणाओं के विपरीत चलने में जिस लेखक को आनंद मिलेगा वह उन बातों के ऐसे पक्षों पर वैचित्रय के साथ विचरेगा जो उन धारणाओं को व्यर्थ या अपूर्ण सिद्ध  करते दिखाई देंगे। उदाहरण के लिए आलसियों और लोभियों को लीजिए, जिन्हें दुनिया बुरा कहती चली आ रही है। कोई लेखक अपने निबंध में उनके अनेक गुणों को विनोदपूर्वक सामने रखता हुआ उनकी प्रशंसा का वैचित्रयपूर्ण आनंद ले और दे सकता है। इसी प्रकार वस्तु के नाना सूक्ष्म ब्योरों पर दृष्टि गड़ानेवाला लेखक किसी छोटी से छोटी तुच्छ बात को गंभीर विषय का सा रूप देकर, पांडित्यपूर्ण भाषा की पूरी नकल करता हुआ सामने रख सकता है। पर सब अवस्थाओं में कोई बात अवश्य चाहिए। 
    इस अर्थगत विशेषता के आधार पर ही भाषा और अभिव्यंजना प्रणाली की विशेषता , शैली की विशेषता , खड़ी हो सकती है। जहाँ नाना अर्थसंबंधों का वैचित्रय नहीं, जहाँ गतिशील अर्थ की परंपरा नहीं, वहाँ एक ही स्थान पर खड़ी तरह तरह की मुद्रा और उछल कूद दिखाती हुई भाषा केवल तमाशा करती हुई जान पड़ेगी। 
    भारतेंदुजी के समय से ही निबंधों की परंपरा हमारी भाषा में चल पड़ी थी जो उनके सहयोगी लेखकों में कुछ दिनों तक जारी रही। पर जैसा कि पहले कहा जा चुका है; स्थायी विषयों पर निबंध लिखने की परंपरा बहुत जल्दी बंद हो गई। उसके साथ ही वर्णनात्मक निबंध पद्ध ति पर सामयिक घटनाओं, देश और समाज की जीवनचर्या, ऋतुचर्या आदि का चित्रण भी बहुत कम हो गया। इस द्वितीय उत्थान के भीतर उत्तरोत्तर उच्चकोटि के स्थायी गद्य साहित्य का निर्माण जैसा होना चाहिए था, न हुआ। अधिकांश लेखक ऐसे ही कामों में लगे जिनमें बुद्धि  को श्रम कम पड़े। फल यह हुआ कि विश्वविद्यालयों में हिन्दी की ऊँची शिक्षा का विधान हो जाने पर उच्चकोटि के गद्य की पुस्तकों के कमी का अनुभव चारों ओर हुआ। 
    भारतेंदु के सहयोगी लेखक स्थायी विषयों के साथ साथ समाज की जीवनचर्या, ऋतुचर्या, पर्व त्योहार आदि पर भी साहित्यिक निबंध लिखते आ रहे थे। उनके लेखों में देश की परंपरागत भावनाओं और उमंगों का प्रतिबिंब रहा करता था। होली, विजयादशमी, दीपावली, रामलीला इत्यादि पर उनके लिखे निबंधों में जनता के जीवन का रंग पूरा पूरा रहता था। इसके लिए वे वर्णनात्मक और भावात्मक दोनों विधानों का बड़ा सुंदर मेल करते थे। यह सामाजिक सजीवता भी द्वितीय उत्थान के लेखकों में वैसी न रही। 
    इस उत्थानकाल के आरंभ में ही निबंध का रास्ता दिखानेवाले दो अनुवाद ग्रंथ प्रकाशित हुए , 'बेकन-विचार-रत्नावली' (अंग्रेजी के बहुत पुराने क्या पहले निबंध लेखक लार्ड बेकन के कुछ निबंधों का अनुवाद) और 'निबंधमालादर्श' (चिपलूणकर के मराठी निबंधों का अनुवाद)। पहली पुस्तक पं. महावीरप्रसाद द्विवेदीजी की ही है और दूसरी पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्राी की। उस समय आशा हुई थी कि इन अनुवादों के पीछे वे दोनों महाशय शायद उसी प्रकार के मौलिक निबंध लिखने में हाथ लगाएँ पर ऐसा न हुआ। मासिक पत्रिकाएँ इस द्वितीय उत्थान के भीतर बहुत सी निकलीं पर उनमें अधिकतर लेख 'बातों का संग्रह' के रूप में ही रहते थे, लेखकों के अंत:प्रयास से निकली विचारधारा के रूप में नहीं। इस काल के भीतर जिनकी कुछ कृतियाँ निबंधकोटि में आ सकती हैं उनका संक्षेप में उल्लेख किया जाता है , 
    1. पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी , इनका जन्म दौलतपुर (जिला , रायबरेली) में वैशाख शुक्ल 4, संवत् 1927 को और देहावसान पौष कृष्ण 30, संवत् 1995 को हुआ। 
    द्विवेदीजी ने सन् 1903 में 'सरस्वती' के संपादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय उन्होंने लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि कठिन से कठिन विषय भी ऐसे सरल रूप में रख दिया जाय कि साधारण समझने वाले पाठक भी उसे बहुत कुछ समझ जाएँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख 'बातों के संग्रह' के रूप में ही हैं। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए नए विचारों की उद्भावना वाले निबंध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबंधों की श्रेणी में दो ही चार लेख, जैसे , 'कवि और कविता', 'प्रतिभा' आदि आ सकते हैं। पर ये लेखन कला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। 'कवि और कविता' कैसा गंभीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई हैं, जैसे , 
इससे स्पष्ट है कि किसी किसी में कविता लिखने की इस्तेदाद स्वाभाविक होती है, ईश्वरदत्ता होती है। जो चीज ईश्वरदत्ता है वह अवश्य लाभदायक होगी। वह निरर्थक नहीं हो सकती। उससे समाज को अवश्य कुछ न कुछ लाभ पहुँचता है। कविता यदि यथार्थ में कविता है तो संभव नहीं कि उसे सुनकर कुछ असर न हो। कविता से दुनिया में आज तक बड़े बड़े काम हुए हैं। × कविता में कुछ न कुछ झूठ का अंश जरूर रहता है; असभ्य अथवा अर्धासभ्य लोगों को यह अंश कम खटकता है शिक्षित और सभ्य लोगों को बहुत। × × संसार में जो बात जैसी देख पड़े कवि को उसे वैसी ही वर्णन करना चाहिए। 
    कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदीजी के लेख या निबंध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परंपरा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि  उत्तोजित होकर किसी नई विचारपद्ध ति पर दौड़ पड़े। शुद्ध  विचारात्मक निबंधों का चरम उत्कर्ष वहीं कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध  विचारखंड को लिए हो। द्विवेदीजी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। एक एक सीधी बात कुछ हेरफेर , कहींकहीं केवल शब्दों के ही , साथ पाँच छह तरह के पाँच छह वाक्यों में कही हुई मिलती है। उनकी यह प्रवृत्ति उनकी गद्यशैली निर्धारित करती है। उनके लेखों में छोटे छोटे वाक्यों का प्रयोग अधिक मिलता है। नपे तुले वाक्य को कई बार शब्दों के कुछ हेरफेर के साथ कहने का ढंग वही है जो वाद या संवाद में बहुत शांत होकर समझाने बुझाने के काम में लाया जाता है। उनकी यह व्यास शैली विपक्षी को कायल करने के प्रयत्न में बड़े काम की है। 
    इस बात के उनके दो लेख 'क्या हिन्दी नाम की कोई भाषा ही नहीं' (सरस्वती, सन् 1913) और 'आर्य समाज का कोप' (सरस्वती, 1914) अच्छे उदाहरण हैं। उनके कुछ अंश नीचे दिए जाते हैं , 
1. आप कहते हैं कि प्राचीन भाषा मर चुकी है और उसे मरे तीन सौ वर्ष हुए। इस पर प्रार्थना है न वह कभी मरी और न उसके मरने के कोई लक्षण ही दिखाई देते हैं। यदि आप कभी आगरा, मथुरा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी और इटावा तशरीफ ले जाएं तो कृपा करके वहाँ के एक आधा अपर प्राइमरी और मिडिल स्कूल का मुआइना न सही तो मुलाहजा अवश्य ही करें। ऐसा करने से आपको मालूम हो जाएगा कि जिसे आप मुर्दा समझ रहे हैं, वह अब तक इन जिलों में बोली जाती है। अगर आपकी इस 'भाखा' नामक भाषा को मरे तीन सौ वर्ष हुए तो कृपा करके यह बताइए कि श्रीमान ही के सधार्मी काजिम अली आदि कवियों ने किस भाषा में कविता की है। 1700 ईसवी से लेकर ऐसे अनेक मुसलमान कवि हो चुके हैं जिन्होंने 'भाखा' में बड़े बड़े ग्रंथ बनाए हैं। हिंदू कवियों की आप खबर न रखते तो कोई विशेष आक्षेप की बात न थी।
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आनरेबल असगर अली खाँ की पाँचवीं उक्ति यह है कि उर्दू या हिंदुस्तानी ही यहाँ की सार्वदेशिक भाषा है। आपके इस कथन की सचाई की जाँच सहज ही में हो सकती है। ऊपर हाली साहब के दीवान और दूसरे साहित्य सम्मेलन के सभापति के भाषण से जो अवतरण दिए गए हैं उन्हें खाँ साहब बारी बारी से एक बंगाली; एक मदरासी, एक गुजराती और एक महाराष्ट्री को जो इस प्रांत के निवासी न हों, दिखावें और उनसे यह कहें कि इनका मतलब हमें समझा दीजिए। बस तत्काल ही आपको मालूम हो जायगा कि दो में से कौन भाषा अन्य प्रांतवासी अधिक समझते हैं। 
श्रीयुत् असगर अली खाँ के इस कथन से कि 'उर्दू और हिंदुस्तानी इज द लिंगुआ फ्रैंका ऑव द कंट्री' एक भेद की बात खुल गई। वह यह कि आप लोगों की राय में यह हिंदुस्तानी और कुछ नहीं, उर्दू ही का एक दूसरा नाम है। अतएव समझना चाहिए कि जब हिंदुस्तानी भाषा के प्रयोग पर जोर दिया जाता है तब 'हिंदुस्तानी' नाम की आड़ में उर्दू ही का पक्ष लिया जाता है। और बेचारी हिन्दी के बहिष्कार की चेष्टा की जाती है। 
2. जिस समाज के विद्यार्थी बच्चों तक को अपने दोषों पर धूल डालकर दूसरों को धमकाने और बिना पूछे ही उन्हें 'नेक सलाह' देने का अधिकार है उसके बड़ों और विद्वानों को पराक्रम की सीमा कौन निर्दिष्ट कर सकेगा?
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हमारे पास इससे भी बढ़कर कुतूहलजनक पत्र आए हैं। बनावटी या सच्चा नाम देकर बी. सिंह नाम के एक महाशय ने आगरा से एक पोस्टकार्ड हमें उर्दू में भेजा है। उसमें अनके दुर्वचनों और अभिशापों के अनंतर इस बात पर दुख प्रकट किया गया है कि राज्य अंग्रेजी है, अन्यथा हमारा सिर धाड़ से अलग कर दिया जाता। भाई सिंह! दुख मत करो आर्यसमाज की धार्मोन्नति होती हो तो , 
'कर कुठार, आगे यह सीसा'।
    2. पं. माधवप्रसाद मिश्र , मिश्रजी का जन्म पंजाब के हिसार जिले में भिवानी के पास कूँगड़ नामक ग्राम में भाद्र शुक्ल 13, संवत् 1928 को और परलोकवास उसी ग्राम में प्लेग से चैत्रा कृष्ण 4, संवत् 1964 को हुआ। ये बड़े तेजस्वी, सनातनधर्मसमर्थक, भारतीय संस्कृति की रक्षा के सतत अभिलाषी विद्वान थे। इनकी लेखनी में बड़ी शक्ति थी। जो कुछ ये लिखते थे बड़े जोश के साथ लिखते थे, इससे इनकी शैली बहुत प्रगल्भ होती थी। गौड़ होने के कारण मारवाड़ियों से इनका विशेष लगाव था और उनके समाज का सुधार ये हृदय से चाहते थे, इसी से 'वैश्योपकार' पत्र का संपादनभार कुछ दिन इन्होंने अपने ऊपर लिया था। जिस वर्ष 'सरस्वती' निकली (संवत् 1957) उसी वर्ष प्रसिद्ध  उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री की सहायता से काशी से इन्होंने 'सुदर्शन' नामक एक मासिक पत्र निकलवाया जो सवा दो वर्ष चलकर बंद हो गया। इसके संपादनकाल में इन्होंने साहित्य संबंधी बहुत से लेख, समीक्षाएँ और निबंध लिखे। जोश में आने पर ये बड़े शक्तिशाली लेख लिखते थे। 'समालोचक' संपादक पं. चंद्रधार शर्मा गुलेरी ने इसी से एक बार लिखा था कि , 
मिश्रजी बिना किसी अभिनिवेश के लिख नहीं सकते। यदि हमें उनसे लेख पाने हैं तो सदा एक न एक टंटा उनसे छेड़ ही रक्खा करें।
  इसमें संदेह नहीं कि जहाँ किसी ने कहीं कोई ऐसी बात लिखी जो इन्हें सनातन धर्म के संस्कारों के विरुद्ध  अथवा प्राचीन ग्रंथकारों के और कवियों के गौरव को कम करनेवाली लगी कि इनकी लेखनी चल पड़ती थी। पाश्चात्य संस्कृताभ्यासी विद्वान जो कुछ कच्चा पक्का मत यहाँ के वेद, पुराण, साहित्य आदि के संबंध में प्रकट किया करते थे वे इन्हें खल जाते थे और उनका विरोध ये डटकर करते थे। उस विरोध में तर्क, आवेश, भावुकता सबका एक अद्भुत मिश्रण रहता था। 'वेबर का भ्रम' इसी झोंक में लिखा गया था। पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने अपनी 'नैषधा चरित चर्चा' में नैषधा के कई एक बड़ी दूर की सूझ वा अत्युक्तिपूर्ण पद्यों को अस्वाभाविक और सुरुचिविरुद्ध  कह दिया। फिर क्या था, ये एकबारगी पिल पड़े और उनकी बातों का अपने ढंग पर उत्तर देते हुए लगे हाथों पं. श्रीधार पाठक के 'गुनवंत हेमंत' नाम की एक कविता की , जिसकी द्विवेदीजी ने बड़ी प्रशंसा की थी, नीरसता और इतिवृत्तात्मकता भी दिखाई। यह विवाद कुछ दिन चला था। 
    मिश्रजी का स्वदेश प्रेम भी बहुत गंभीर था। ये संस्कृत के और पंडितों के समान देशदशा के अनुभव से दूर रहनेवाले व्यक्ति न थे। राजनीतिक आंदोलनों के साथ इनका हृदय बराबर रहता था। जब देशपूज्य मालवीयजी ने छात्रों को राजनीतिक आंदोलनों से दूर रहने की सलाह दी थी तब इन्होंने एक अत्यंत क्षोभपूर्ण 'खुली चिट्ठी' उनके नाम छापी थी। देशदशा की इस तीव्र अनुभूति के कारण इन्हें श्रीधार पाठक की कविताओं में एक बात बहुत खटकी। पाठकजी ने जहाँ ऋतु शोभा या देश छटा का वर्णन किया है वहाँ केवल सुख, आनंद और प्रफुल्लता के पक्ष पर ही उनकी दृष्टि पड़ती है, देश के असंख्य दीन दुखियों के पेट की ज्वाला और कंकालवत् शरीर पर नहीं। 
    मिश्रजी ने स्वामी विशुध्दानंदजी के बड़े जीवन चरित्र के अतिरिक्त और भी बीसों व्यक्तियों के छोटे छोटे जीवन चरित्र लिखे जिनमें कुछ संस्कृत के पुराने ढाँचे के विद्वान तथा सनातन धर्म के सहायक सेठ साहूकार आदि हैं। 'सुदर्शन' में इनके लेख प्राय: सब विषयों पर निकलते थे, जैसे , पर्व, त्योहार, उत्सव, तीर्थस्थान, यात्रा, राजनीति इत्यादि। पर्व त्योहारों तथा भिन्न भिन्न ऋतुओं में पड़नेवाले उत्सवों पर निबंध लिखने की जो परंपरा भारतेंदु के सहयोगियों ने चलाई थी, वह इस द्वितीय उत्थान में आकर इन्हीं पर समाप्त हो गई। हाँ, संवाद पत्रों के होली, दिवाली के अंकों में उनका आभास बना रहा। लोक सामान्य स्थायी विषयों पर मिश्रजी के केवल दो लेख मिलते हैं , 'धाृति' और 'क्षमा'। 
    द्वितीय उत्थान के आंरभकाल में इस प्रभावशाली लेखक के उदय की उज्ज्वल आभा हिन्दी साहित्य गगन में कुछ समय के लिए दिखाई पड़ी, पर खेद है कि अकाल ही विलीन हो गई। पं. माधवप्रसाद मिश्र के मार्मिक और ओजस्वी लेखों को जिन्होंने पढ़ा होगा उनके हृदय में उनकी मधुर स्मृति अवश्य बनी होगी। उनके निबंध अधिकतर भावात्मक होते थे और धाराशैली पर चलते थे। उनमें बहुत सुंदर मर्मपथ का अनुसरण करती हुई स्निग्ध वाग्धारा लगातार चली चलती थी। इनके गद्य के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं , 
(क) आर्य वंश के धर्म, कर्म और भक्तिभाव का वह प्रबल प्रवाह जिसने एक दिन जगत् के बड़ेबड़े सन्मार्ग विरोधी भूधारों का दर्पदलन कर उन्हें रज में परिणत कर दिया था और इस परम पवित्र वंश का वह विश्वव्यापक प्रकाश जिसने एक समय जगत् में अंधकार का नाम तक न छोड़ा था, अब कहाँ है? इस गूढ़ एवं मर्मस्पर्शी प्रश्न का यही उत्तर मिलता है कि सब भगवान महाकाल के पेट में समा गया। × × × जहाँ महा महा महीधार लुढ़क जाते थे और अगाधा अतलस्पर्शी जल था वहाँ अब पत्थरों में दबी हुई एक छोटी सी किंतु सुशीतल वारिधारा बह रही है। जहाँ के महाप्रकाश से दिग्दिगंत उद्भासित हो रहे थे वहाँ अब एक अंधकार से घिरा हुआ स्नेहशून्य प्रदीप टिमटिमा रहा है जिससे कभी कभी यह भूभाग प्रकाशित हो जाता है। × × × भारतवर्ष की सुखशांति और भारतवर्ष का प्रकाश अब केवल 'राम नाम' पर अटक रहा है। × × × पर जो प्रदीप स्नेह से परिपूर्ण नहीं है तथा जिसकी रक्षा का कोई उपाय नहीं है वह कब तक सुरक्षित रहेगा। 
(ख) अब रही आपके जानने की बात; सो जहाँ तक आप जानते हैं वहाँ तक तो सब सफाई है। आप जहाँ तक जानते हैं, महाकवि श्री हर्ष के काव्य में 'सर्वत्र गाँठें ही गाँठें' हैं और पं. श्रीधारजी की कविता 'सर्वतोभाव से प्रशंसित' है। आप जहाँ तक जानते हैं, आप संस्कृत, हिन्दी, बँग्ला आदि इस देश की सब भाषाएँ जानते हैं और हम वेबरसाहब की करतूत से भी अनभिज्ञ हैं। आप जहाँ तक जानते हैं श्री हर्ष, 'लाल बुझक्कड़' को भी मात करता है; और वेबर साहब याज्ञवल्क्य के समान ठहरता है। आप जहाँ तक जानते हैं, हमारे तत्वदर्शी पंडितों ने कुछ न लिखा और अंग्रेजों ने इतना लिखा कि भारतवासी उनके ऋणी हैं। आप जहाँ तक जानते हैं, नैषधा की प्रशंसा तो सब पक्षपाती पंडितों ने की है और निंदा दुराग्रहरहित पुरुषों ने की है। आप जहाँ तक जानते हैं डॉ. बूलर, हाल आदि साहबों ने जो कुछ लिखा है युक्तिपूर्वक लिखा है और मिश्र राधाकृष्ण ने युक्तिशून्य। आप जहाँ तक जानते हैं, प्रोफेसर वेबर की पुस्तकों का अभी तक अनुवाद नहीं हुआ। वेबर साहब का ज्ञान हमें 'नैषधा चरितचर्चा' में हुआ है। 
(ग) लोग केवल घर के ही नष्ट होने पर 'मिट्टी हो गया' नहीं कहते हैं और जगह इसका प्रयोग करते हैं। किसी का बड़ा भारी श्रम जब विफल हो जाय तब कहेंगे कि 'सब मिट्टी हो गया'। किसी का धान खो जाय, मानमर्यादा भंग हो जाय, प्रभुता और क्षमता चली जाय, तो कहेंगे 'सब मिट्टी हो गया'। इससे जाना गया कि नष्ट होना ही मिट्टी होना है। किंतु मिट्टी को इतना बदनाम क्यों किया जाता है? अकेली मिट्टी ही इस दुर्नाम को क्यों धारण करती है! क्या सचमुच मिट्टी इतनी निकृष्ट है! और क्या केवल मिट्टी ही निकृष्ट है, हम निकृष्ट नहीं हैं! भगवती वसुंधारे! तुम्हारा 'सर्वसहा' नाम यथार्थ है। 
'अच्छा माँ! यह तो कहो तुम्हारा नाम 'वसुंधारा' किसने रखा? यह नाम तो उस समय का है। यह नाम व्यास, वाल्मीकि, पाणिनी, कात्यायन आदि सुसंतानों का दिया हुआ है। जाने वे तुम्हारे सुपुत्र कितने आदर से, कितनी श्लाघा से और श्रध्दा से तुम्हें पुकारते थे। 
    उपन्यासों से कुछ छुट्टी पाकर बाबू गोपालराम (गहमर निवासी) पत्र पत्रिकाओं में कभी कभी लेख और निबंध भी दिया करते थे। उनके लेखों और निबंधों की भाषा बड़ी चंचल, चटपटी, प्रगल्भ और मनोरंजक होती थी। विलक्षण रूप खड़ा करना उनके निबंधों की विशेषता है। किसी अद्भुत बात का चरम दृश्य दिखानेवाले ऐसे विलक्षण और कुतूहलजनक चित्रों के बीच से वे पाठक को ले चलते हैं कि उसे एक तमाशा देखने का सा आनंद आता है। उनके 'ऋद्धि  और सिद्धि ' नामक निबंध का थोड़ा सा अंश उध्दृत किया जाता है , 
अर्थ या धान अलाउद्दीन का चिराग है। यदि यह हाथ में है तो तुम जो चाहो सो पा सकते हो। यदि अर्थ अधिापति हो तो वज्र मूर्ख होने पर भी विश्वविद्यालय तुम्हें डी. एल. की उपाधि देकर अपने तईं धन्यवाद समझेगा। × × × बरहे पर चलनेवाला नट हाथ में बाँस लिए बरहे पर दौड़ते समय, 'हाय पैसा', 'हाय पैसा' करके चिल्लाया करता था। दुनिया के सभी आदमी वैसे ही नट हैं। मैं दिव्यदृष्टि से देखता हूँ कि खुद पृथ्वी भी अपने रास्ते पर 'हाय पैसा', 'हाय पैसा' करती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही है।
  कालमाहात्म्य और दिनों के फेर से ऐश्वर्यशाली भगवान ने तो अब स्वर्ग से उतर कर दरिद्र के घर शरण ली है और उनके सिंहासन पर अर्थ जा बैठा है। × × × अर्थ ही इस युग का परब्रह्म है। इस ब्रह्मवस्तु के बिना विश्व संसार का अस्तित्व नहीं रह सकता। यही चक्राकार चैतन्यरूप कैशबॉक्स में प्रवेश करके संसार को चलाया करते हैं। × × × साधाकों के हित के लिए अर्थनीतिशास्त्र में इसकी उपासना की विधि लिखी है। × × × बच्चों की पहली पोथी में लिखा है , 'बिना पूछे दूसरे का माल लेना चोरी कहलाता है।' लेकिन कहकर जोर से दूसरे का धान हड़प कर लेने से क्या कहलाता है, यह उसमें नहीं लिखा है। 'मेरी राय में यही कर्मयोग का मार्ग है।'
    कहने की आवश्यकता नहीं कि उध्दृत अंश में बंगभाषा के प्रसिद्ध  ग्रंथकार बंकिमचंद्र की शैली का पूरा आभास है। 
    3. बाबू बालमुकुंद गुप्त , गुप्तजी का जन्म पंजाब के रोहतक जिले के गुरयानी गाँव में संवत् 1922 में और मृत्यु संवत् 1964 में हुई। ये अपने समय के सबसे अनुभवी और कुशल संपादक थे। पहले इन्होंने दो उर्दू पत्रों का संपादन किया था, पर शीघ्र ही कलकत्तो के प्रसिद्ध  संवादपत्र 'बंगवासी' के संपादक हो गए। बंगवासी को छोड़ते ही ये 'भारतमित्र' के प्रधान संपादक बनाए गए। ये बहुत ही चलते पुरजे और विनोदशील लेखक थे अत: कभी कभी छेड़छाड़ भी कर बैठते थे। पं. महावीरप्रसाद द्विवदी ने जब 'सरस्वती' (भाग 6, संख्या 11) के अपने प्रसिद्ध  'भाषा और व्याकरण' शीर्षक लेख में 'अनस्थिरता', शब्द का प्रयोग कर दिया तब इन्हें छेड़छाड़ का मौका मिल गया और इन्होंने 'आत्माराम' के नाम से द्विवेदीजी के कुछ प्रयोगों की आलोचना करते हुए लेखमाला निकाली जिसमें चुहलबाजी का पुट पूरा था। द्विवेदीजी ऐसे गंभीर प्रकृति के व्यक्ति को भी युक्तिपूर्ण उत्तर के अतिरिक्त इनकी विनोदपूर्ण विगर्हणा के लिए 'सरगौ नरक ठेकाना नाहिं' शीर्षक देकर बहुत फबता हुआ आल्हा 'कल्लू अल्हइत' के नाम से लिखना पड़ा।
    पत्रसंपादन काल में इन्होंने कई विषयों पर अच्छे निबंध भी लिखे जिनका एक संग्रह 'गुप्त निबंधावली' के नाम से छप चुका है। इनके 'रत्नावली नाटिका' के सुंदर अनुवाद का उल्लेख हो चुका है। 
    गुप्तजी ने सामयिक और राजनीतिक परिस्थिति को लेकर कई मनोरंजक प्रबंध लिखे हैं जिनमें 'शिवशंभु का चिट्ठा' बहुत प्रसिद्ध  है। गुप्तजी की भाषा बहुत चलती, सजीव और विनोदपूर्ण होती थी। किसी प्रकार का विषय हो, गुप्तजी की लेखनी उसपर विनोद का रंग चढ़ा देती थी। वे पहले उर्दू के एक अच्छे लेखक थे, इससे उनकी हिन्दी बहुत चलती और फड़कती हुई होती थी। वे अपने विचारों को विनोदपूर्ण वर्णनों के भीतर ऐसा लपेटकर रखते थे कि उनका आभास बीच बीच में ही मिलता था। उनके विनोदपूर्ण वर्णनात्मक विधान के भीतर विचार और भाव लुके छिपे रहते थे। यह उनकी लिखावट की एक बड़ी विशेषता थी। 'शिवशंभु का चिट्ठा' से थोड़ा सा अंश नमूने के लिए दिया जाता है , 
इतने में देखा कि बादल उमड़ रहे हैं। चीलें नीचे उतर रही हैं। तबीयत भुरभुरा उठी। इधर भंग, उधर घटा , बहार में बहार। इतने में वायु का वेग बढ़ा, चीलें अदृश्य हुईं। अंधेरा छाया, बूँदें गिरने लगीं; साथ ही तड़तड़ धाड़धाड़ होने लगी। देखा, ओले गिर रहे हैं। ओले थमें; कुछ वर्षा हुई, बूटी तैयार हुई; 'बमभोला' कहकर शर्माजी ने एक लोटा भर चढ़ाई। ठीक उसी समय लालडिग्गी पर बड़े लाट मिंटो ने बंगदेश के भूतपूर्व छोटे लाट उडबर्न की मूर्ति खोली। ठीक एक ही समय कलकत्तो में यह दो आवश्यक काम हुए। भेद इतना ही था कि शिवशंभु के बरामदे की छत पर बूँदें गिरतीं और लार्ड मिंटों के सिर या छाते पर। 
भंग छानकर महाराजजी ने खटिया पर लंबी तानी और कुछ काल सुषुप्ति के आनंद में निमग्न रहे। × × × हाथ पाँव सुख में; पर विचार के घोड़ों को विश्राम न था। वह ओलों की चोट से बाजुओं को बचाता हुआ परिंदों की तरह इधर उधर उड़ रहा था। गुलाबी नशों में विचारों का तार बँधा कि बड़े लाट फुरती से अपनी कोठरी में घुस गए होंगे और दूसरे अमीर भी अपने अपने घरों में चले गए होंगे। पर वह चील कहाँ गई होगी? हा! शिवशंभु को इन पक्षियों की चिंता है, पर वह यह नहीं जानता कि इन अभ्रस्पर्शी अट्टालिकाओं से परिपूरित महानगर में सहस्रों अभागे रात बिताने को झोपड़ी भी नहीं रखते। 
    4. पं. गोविंदनारायण मिश्र , यद्यपि ये हिन्दी के बहुत पुराने लेखकों में थे पर उस पुराने समय में वे अपने फुफेरे भाई पं. सदानंद मिश्र के 'सारसुधानिधि' पत्र में कुछ सामयिक और साहित्यिक लेख ही लिखा करते थे जो पुस्तकाकार छपकर स्थायी साहित्य में परिणत न हो सके। अपनी गद्यशैली का निर्दिष्ट रूप द्वितीय उत्थान के भीतर ही उन्होंने पूर्णतया प्रकाशित किया। इनकी लेखशैली का पता इनके सम्मेलन के भाषण और 'कवि और चित्रकार' नामक लेख से लगता है। गद्य के संबंध में इनकी धारणा प्राचीनों के 'गद्यकाव्य' की सी थी। लिखते समय बाण और दंडी इनके ध्यान में रहा करते थे। पर यह प्रसिद्ध  बात है कि संस्कृत साहित्य में गद्य का वैसा विकास नहीं हुआ। बाण और दंडी का गद्यकाव्य, अलंकार की छटा दिखानेवाला गद्य था, विचारों को  उत्तेजना  देनेवाला, भाषा की शक्ति का प्रसार करनेवाला गद्य नहीं। विचारपद्ध ति को उन्नत करने वाले गद्य का अच्छा और उपयोगी विकास यूरोपीय भाषाओं में ही हुआ। गद्यकाव्य की पुरानी रूढ़ि के अनुसरण से शक्तिशाली गद्य का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। 
    पं. गोविंदनारायण मिश्र के गद्य को समास अनुप्रास में गुँथे शब्दगुच्छों का एक अटाला समझिए। जहाँ वे कुछ विचार उपस्थित करते हैं वहाँ भी पदच्छटा ही ऊपर दिखाई पड़ती है। शब्दावली दोनों प्रकार की रहती है , संस्कृत की भी और ब्रजभाषाकाव्य की भी। एक ओर 'प्रगल्भ प्रतिभा स्रोत से समुत्पन्न शब्दकल्पना कलित अभिनव भावमाधुरी' है तो दूसरी ओर 'तमतोम सटकाती मुस्काती पूरनचंद की सकल मनभाई छिटकी जुन्हाई' है। यद्यपि यह गद्य का क्रीड़ाकौतुक मात्र है पर इसकी भी थोड़ी सी झलक देख लेनी चाहिए , 
साधारण गद्य का नमूना
परंतु मंदमति अरसिकों के अयोग्य, मलिन अथवा कुशाग्रबुद्धि  चतुराें के स्वच्छ मलहीन मन को भी यथोचित शिक्षा से उपयुक्त बना लिए बिना उनपर कवि की परम रसीली उक्ति छबिछबीली का अलंकृत नखशिख लौं स्वच्छ सर्वांगसुंदर अनुरूप, यथार्थ, प्रतिबिंब कभी न पड़ेगा। × × × स्वच्छ दर्पण पर ही अनुरूप, यथार्थ, सुस्पष्ट प्रतिबिंब प्रतिफलित होता है। उससे साम्हना होते ही अपनी ही प्रतिबिंबित प्रतिकृति मानो समता की स्पर्धा में आ, उसी समय साम्हना करने आमने सामने आ खड़ी होती है।
काव्यमय गद्य का नमूना
सरद पूनो के समुदित पूरनचन्द की छिटकी जुन्हाई सकल मनभाई के भी मुँह मसि मल, पूजनीय अलौकिक पदनखचंद्रिका की चमक के आगे तेजहीन मलीन और कलंकित कर दरसाती, लजाती, सरस सुधाधौली अलौकिक सुप्रभा फैलाती, अशेष मोहजड़ता प्रगाढ़ तमतोम सटकाती, मुस्काती, निज भक्तजन मनवांछित वराभय भुक्ति मुक्ति सुचारु चारों मुक्त हाथों से मुक्ति लुटाती × × × मुक्ताहारी नीरक्षीर विचार सुचतुर कवि कोविदराज हियसिंहासन-निवासिनी मंदहासिनी, त्रिालोक प्रकासिनी सरस्वती माता के अति दुलारे, प्राणों से प्यारे पुत्रों की अनुपम अनोखी अतुल बलवाली परम प्रभावशाली सुजन मन मोहिनी नवरस भरी सरस सुखद विचित्र वचनरचना का नाम ही साहित्य है। 
    भारतेंदु के सहयोगी लेखक प्राय: 'उचित', 'उत्पन्न', 'उच्चरित', 'नव' आदि से ही संतोष करते थे पर मिश्रजी ऐसे लेखकों ने बिना किसी जरूरत के उपसर्गों का पुछल्ला जोड़े जनता के इन जाने बूझे शब्दों को भी , 'समुचित', 'समुत्पन्न', 'समुच्चरित', 'अभिनव' करके अजनबी बना दिया। 'मृदुता', 'कुटिलता', 'सुकरता', 'समीपता', 'ऋजुता' आदि के स्थान पर 'मार्दव', 'कौटिल्य', 'सौकर्य', 'सामीप्य', 'आर्जव' आदि ऐसे ही लोगों की प्रवृत्ति से लाए जाने लगे। 
    5. बाबू श्यामसुंदरदासजी (बाबू साहब) , नागरीप्रचारिणी सभा के स्थापनकाल से लेकर बराबर हिन्दी भाषा, कवियों की खोज तथा इतिहास आदि के संबंध में ख्;s] लेख लिखते आए हैं। आप जैसे हिन्दी के अच्छे लेखक हैं वैसे ही बहुत अच्छे वक्ता भी। आपकी भाषा इस विशेषता के लिए बहुत दिनों से प्रसिद्ध  है कि उसमें अरबी, फारसी के विदेशी शब्द नहीं आते। आधुनिक सभ्यता के विधानों के बीच की लिखापढ़ी के ढंग पर हिन्दी को ले चलने में आपकी लेखनी ने बहुत कुछ योग दिया है। 
    बाबू साहब ने बड़ा भारी काम लेखकों के लिए सामग्री प्रस्तुत करने का किया है। हिन्दी पुस्तकों की खोज के विधान द्वारा आपने साहित्य का इतिहास, कवियों के चरित और उनपर प्रबंध आदि लिखने का बहुत सा मसाला इकट्ठा करके रख दिया। इसी प्रकार आधुनिक हिन्दी के नए पुराने लेखकों के संक्षिप्त जीवनवृत्त 'हिन्दी कोविद-रत्नमाला' के दो भागों में आपने संगृहीत किए हैं। शिक्षोपयोगी तीन पुस्तकें , भाषा विज्ञान, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा साहित्यालोचन , भी आपने लिखी या संकलित की है। 
    6. पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी , हास्यविनोदपूर्ण लेख लिखनेवालों में कलकत्ता के पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी का नाम भी बराबर लिया जाता है। पर उनके अधिकांश लेख भाषण मात्र हैं, स्थायी विषयों पर लिखे हुए निबंध नहीं। 
    7. पं. चंद्रधार गुलेरी , इनका जन्म जयपुर में एक विख्यात पंडित घराने में 25 आषाढ़ संवत् 1940 में हुआ था। इनके पूर्वज काँगड़े के गुलेर नामक स्थान से जयपुर आए थे। पं. चंद्रधारजी संस्कृत के प्रकांड विद्वान और अंग्रेजी उच्च शिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम वर्षों के पहले ये बराबर अजमेर के मेयो कॉलेज में अध्यापक रहे। पीछे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ओरियंटल कॉलेज के ंप्रसिपल होकर आए। पर हिन्दी के दुर्भाग्य से थोड़े ही दिनों में संवत् 1977 में इनका परलोकवास हो गया। ये जैसे धुरंधर पंडित थे वैसे ही सरल और विनोदशील प्रकृति के थे।
    गुलेरीजी ने 'सरस्वती' के कुछ ही महीने पीछे अपनी थोड़ी अवस्था में जयपुर से 'समालोचक' नामक एक मासिक पत्र अपने संपादकत्व में निकलवाया था। उक्त पत्र द्वारा गुलेरीजी एक बहुत ही अनूठी लेखनशैली लेकर साहित्यक्षेत्र में उतरे थे। ऐसा गंभीर और पांडित्यपूर्ण हास, जैसा इनके लेखों में रहता था, और कहीं देखने में न आया। अनेक गूढ़ शास्त्रीय विषयों तथा कथाप्रसंगों की ओर विनोदपूर्ण संकेत करती हुई उनकी वाणी चलती थी। इसी प्रसंगगर्भत्व (एल्यूसिवनेस) के कारण इनकी चुटकियों का आनंद अनेक विषयों की जानकारी रखनेवाले पाठकों को ही विशेष मिलता था। इनके व्याकरण ऐसे रूखे विषय के लेख भी मजाक से खाली नहीं होते थे।
    यह बेधाड़क कहा जा सकता है कि शैली की जो विशिष्टता और अर्थगर्भित वक्रता गुलेरीजी में मिलती है, और किसी लेखक में नहीं। इनके स्मित हास की सामग्री ज्ञान के विविधा क्षेत्रों से ली गई है। अत: इनके लेखों का पूरा आनंद उन्हीं को मिल सकता है जो बहुज्ञ या कम से कम बहुश्रुत हैं। इनके 'कछुआ धरम' और 'मारेसि मोहिं कुठाउँ' नामक लेखों से उद्ध रण दिए जाते हैं। 
1. मनुस्मृति में कहा गया है कि जहाँ गुरु की निंदा या असत् कथा हो रही हो वहाँ पर भले आदमी को चाहिए कि कान बंद कर ले या कहीं उठकर चला जाए! × × × मनु महाराज ने न सुनने जोग गुरु के कलंक कथा सुनने के पाप से बचने के दो ही उपाय बताए हैं। या तो कान ढककर बैठ जाओ या दुम दबाकर चल दो। तीसरा उपाय जो और देशों के सौ में नब्बे आदमियों को ऐसे अवसर पर पहले सूझेगा, वह मनु ने नहीं बताया कि जूता लेकर या मुक्का तानकर सामने खड़े हो जाओ और निंदा करने वाले का जबड़ा तोड़ दो या मुँह पिचका दो कि ऐसी हरकत न करे। × × × पुराने से पुराने आर्यों की अपने भाई असुरों से अनबन हुई। असुर असुरिया में रहना चाहते थे, आर्य सप्तसिंधुओं को आर्यावर्त बनाना चाहते थे। आगे चल दिए। पीछे वे दबाते आए। विष्णु ने अग्नि, यज्ञपात्र और अरणि रखने के लिए तीन गाड़ियाँ बनाईं। उसकी पत्नी ने उनके पहियों की चूल को घी से ऑंज दिया। ऊखल, मूसल और सोम कूटने के पत्थरों तक को साथ लिए हुए 'कारवाँ' मुंजवत् हिंदुकुश के एकमात्र दर्रे खैबर में होकर सिंधु की एक घाटी में उतरा। पीछे से श्वान, भ्राज, अंभारि, बंभारि, हस्त, सुहस्त, कृशन, शंड, मर्क मारते चले आते थे, वज्र की मार से पिछली गाड़ी भी आधी टूट गई, पर तीन लंबे डग मारनेवाले विष्णु ने पीछे फिरकर नहीं देखा और न जमकर मैदान लिया। पितृभूमि अपने भ्रातृव्यों के पास छोड़ आए और यहाँ 'भ्रातृव्यस्त बधाय' (सजातानां मध्यमेष्ठयाय) देवताओं की आहुति देने लगे। जहाँ जहाँ रास्ते में टिके थे वहाँ वहाँ यूप खड़े होगए। यहाँ की सुजला सुफला शस्य श्यामला भूमि में ये बुलबुलें चहकने लगीं। 
पर ईरान के अंगूरों और गुलों का, यानी मुंजवत् पहाड़ की सोमलता का चसका पड़ा हुआ था। लेने जाते तो वे पुराने गंधार्व मारने दौड़ते। हाँ, उनमें से कोई कोई उस समय का चिलकौआ नकद नारायण लेकर बदले में सोमलता बेचने को राजी हो जाते थे। उस समय का सिक्का गौएँ थीं। जैसे आजकल लखपती, करोड़पती कहलाते हैं वैसे तब 'शतगु', 'सहस्रगु' कहलाते थे। ये दमड़ीमल के पोते करोड़ीचंद अपने 'नवग्वा:', 'दशग्वा:' पितरों से शरमाते न थे, आदर से उन्हें याद करते थे। आजकल के मेवा बेचनेवाले पेशावरियों की तरह कोई कोई 'सरहदी' यहाँ पर भी सोम बेचने चले आते थे। कोई आर्य सीमाप्रांत पर जाकर भी ले आया करते थे। मोल ठहराने में बड़ी हुज्जत होती थी, जैसी कि तरकारियों का भाव करने में कुंजड़िनों से हुआ करती है। ये कहते कि गौ की एक कला में सोम बेच दो। वह कहता, वाह! सोम राजा का दाम इससे कहीं बढ़कर है। इधर ये गौ के गुण बखानते। जैसे बुङ्ढे चौबेजी ने अपने कंधो पर चढ़ी बालवधाू के लिए कहा था कि 'याही में बेटा और याही में बेटी' वैसे ये भी कहते कि इस गौ से दूध होता है, मक्खन होता है, दही होता है, यह होता है, वह होता है, पर काबुली काहे को मानता? उसके पास सोम की 'मनोपली' थी और इनका बिना लिए सरता नहीं। अंत में गौ का एक पाद, अर्धा होते होते दाम तय हो जाता। भूरी ऑंखोंवाली एक बरस की बछिया में सोम राजा खरीद लिए जाते। गाड़ी में रखकर शान से लाए जाते।
अच्छा अब उसी पंचनद में 'वाहीक' आकर बसे। अश्वघोष की फड़कती उपमा के अनुसार धर्म भागा और दंड कमंडल लेकर ऋषि भी भागे। अब ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश और आर्यावर्त की महिमा हो गई; और वह पुराना देश , न तत्रा दिवसं वसेत। बहुत वर्ष पीछे की बात है। समुद्र पार के देशों में और धर्म पक्के हो चले। वे लूटते मारते थे ही बेधरम भी कर देते थे। बस, समुद्रयात्रा बंद! कहाँ तो राम के बनाए सेतु का दर्शन करके ब्रह्महत्या मिटती थी और कहाँ नाव में जानेवाले द्विज का प्रायश्चित कराकर भी संग्रह बंद! वही कछुआ धर्म? ढाल के अंदर बैठे रहो। 
किसी बात का टोटा होने पर उसे पूरा करने की इच्छा होती है, दुख होने पर उसे मिटाना चाहते हैं। यह स्वभाव है। संसार में त्रिाविधा दुख दिखाई पड़ने लगे। उन्हें मिटाने के लिए उपाय भी किए जाने लगे। 'दृष्ट' उपाय हुए। उनसे संतोष न हुआ तो सुने सुनाए (आनुश्रविक) उपाय किए। उनसे भी मन न भरा। सांख्यों ने काठ कड़ी गिन गिन कर उपाय निकाला, बुद्ध  ने योग में पककर उपाय खोजा। किसी न किसी तरह कोई न कोई उपाय मिलता गया। कछुओं ने सोचा, चोर को क्या मारें; चोर की माँ को ही न मारें; न रहे बाँस न बजे बाँसुरी। लगीं प्रार्थनाएँ होने , 'मा देहि राम! जननीजठरे निवासम्।' और यह उस देश में जहाँ सूर्य का उदय होना इतना मनोहर था कि ऋषियों का यह कहते कहते तालू सूखता था कि सौ बरस इसे हम उगता देखें, सौ बरस सुनें, सौ बरस बढ़ बढ़कर बोलें, सौ बरस अदीन होकर रहें। 
हयग्रीव या हिरण्याक्ष दोनों में से किसी एक दैत्य से देव बहुत तंग थे। सुरपुर में अफवाह पहुँची। बस, इंद्र ने झटपट किवाड़ बंद कर दिए, आगल डाल दी। मानो अमरावती ने ऑंखें बंद कर लीं। यह कछुआ धरम का भाई शुतुरमुर्ग धरम है। 
2. हमारे यहाँ पूँजी शब्दों की है। जिससे हमें काम पड़ा, चाहे और बातों में हम ठगे गए, पर हमारी शब्दों की गाँठ नहीं कतरी गई। × × × यही नहीं जो आया उससे हमने कुछ ले लिया। 
पहले हमें काम असुरों से पड़ा, असीरियावालों से। उनके यहाँ 'असुर' शब्द बड़ी शान का था। 'असुर' माने प्राणवाला, जबरदस्त। हमारे इंद्र की भी यही उपाधि हुई, पीछे चाहे शब्द का अर्थ बुरा हो गया। × × × पारस के पारसियों से काम पड़ा तो वे अपने सूबेदारों की उपाधि 'क्षत्राप', 'क्षत्रापावन' या 'महाक्षत्राप' हमारे यहाँ रख गए और गुस्तास्प, बिस्तास्प के वजन के कृशाश्व, श्यावाश्व, बृहदश्व आदि ऋषियों और राजाओं के नाम दे गए। यूनानी यवनों से काम पड़ा तो वे यवन की स्त्री यवनी तो नहीं, पर यवन की लिपि 'यवनानी' शब्द हमारे व्याकरण को भेंट कर गए। साथ ही बारह राशियाँ मेष, वृष, मिथुन आदि भी यहाँ पहुँचा गए। पुराने ग्रंथकार तो शुद्ध  यूनानी नाम आर, तार, जितुम आदि ही काम में लाते थे। बराहमिहिर की स्त्री खना चाहे यवनी रही हो, या न रही हो, उसने आदर से कहा है कि म्लेच्छ यवन भी ज्योतिष शास्त्र जानने से ऋषियों की तरह पूजे जाते हैं। अब चाहे 'वेल्यूवेबल सिस्टम' भी वेद में निकाला जाए, पर पुराने हिंदू कृतघ्न और गुरुमार न थे। × × × यवन राजाओं की उपाधि 'सीटर' त्राातार का रूप लेकर हमारे राजाओं के यहाँ आ लगी। × × × शकों के हमले हुए तो 'शाकपार्थिव' वैयाकरणों के हाथ लगा और शक संवत् या शाका सर्वसाधारण के। हूण वंक्षु (ऑक्सस) नदी के किनारे पर से यहाँ चढ़ आए तो कवियों को नारंगी की उपमा मिली कि ताजे मुड़े हुए हूण की ठुव्ी की सी नारंगी।
                                            ×                ×                ×
बकौल शेक्सपियर के जो मेरा धान छीनता है वह कूड़ा चुराता है पर जो मेरा नाम चुराता है वह सितम ढाता है, आर्यसमाज ने मर्मस्थल पर वह मार की है कि कुछ कहा नहीं जाता। हमारी ऐसी चोटी पकड़ी है कि सिर नीचा कर दिया है। औरों ने तो गाँठ का कुछ न लिया, पर इन्होंने तो अच्छे अच्छे शब्द छीन लिए। 
इसी से कहते हैं कि 'मारेसि मोहिं कुठाउँ'। अच्छे अच्छे पद तो यों सफाई से ले लिए गए हैं कि इस पुरानी जमी हुई दुकान का दिवाला निकल गया? लेने के देने पड़ गए!!!
हम अपने आपको आर्य नहीं कहते, हिंदू कहते हैं। × × × और तो क्या 'नमस्ते' का वैदिक फिकरा हाथ से गया। चाहे 'जय रामजी' कह लो चाहे 'जय श्रीकृष्ण', नमस्ते मत कह बैठना। ओंकार बड़ा मांगलिक शब्द है। कहते हैं कि पहले यह ब्रह्मा का कंठ फाड़ कर निकला था। 
    इसी द्वितीय उत्थान के भीतर हम दो ऐसे निबंध लेखकों का नाम लेते हैं जिन्होंने लिखा तो कम है पर जिनके लेखों में भाषा की एक नई गतिविधि तथाआधुनिकजगत् की विचारधारा से उद्दीप्त नूतन भावभंगिमा के दर्शन होते हैं , 
    1. अध्यापक पूर्णसिंह , 'सरस्वती' के पुराने पाठकों में से बहुतों को अध्यापक पूर्णसिंह के लेखों का स्मरण होगा। उनके तीन चार निबंध ही उक्त पत्रिका में निकले, उनमें विचारों और भावों को एक अनूठे ढंग से मिश्रित करनेवाली एक नई शैली मिलती है। उनकी लाक्षणिकता हिन्दी गद्य साहित्य में एक नई चीज थी। भाषा की बहुत कुछ उड़ान, उसकी बहुत कुछ शक्ति, 'लाक्षणिकता' में देखी जाती है। भाषा और भाव की एक नई विभूति उन्होंने सामने रखी। योरप के जीवन क्षेत्र की अशांति से उत्पन्न आध्यात्मिकता की, किसानों और मजदूरों की महत्वभावना की जो लहरें उठीं उनमें वे बहुत दूर तक बहे। उनके निबंध भावात्मक कोटि में ही आएँगे यद्यपि उनकी तह में क्षीण्ा विचारधारा स्पष्ट लक्षित होती है। इस समय उनके तीन निबंध हमारे सामने हैं, 'आचरण की सभ्यता', 'मजदूरी और प्रेम' और 'सच्ची वीरता'। यहाँ हम उनके निबंधों से कुछ अंश उध्दृत करते हैं , 
आचरण की सभ्यता
पश्चिमी ज्ञान से मनुष्य मात्र को लाभ हुआ है। ज्ञान का वह सेहरा बाहरी सभ्यता की अंतर्विलीन आध्यात्मिक सभ्यता का वह मुकुट , जो आज मनुष्य जाति ने पहन रखा है, यूरोप को कदापि प्राप्त न होता, यदि धान को एकत्र करने के लिए यूरोप निवासी इतने कमीने न बनते। यदि सारे पूरबी जगत् ने इस महत्ताा के लिए अपनी शक्ति से अधिक चन्दा देकर सहायता की तो बिगड़ क्या गया? एक तरफ जहाँ योरोप के जीवन का एक अंश अभ्यस्त प्रतीत होता है , कमीना और कायरता से भरा मालूम होता है , वहीं दूसरी ओर योरोप के जीवन का वह भाग जहाँ विद्या और ज्ञान का सूर्य चमक रहा है, इतना महान् है कि थोड़े ही समय में पहले अंश को मनुष्य अवश्य ही भूल जाएँगे। × × × आचरण की सभ्यता का देश ही निराला है। उसमें न शारीरिक झगड़े हैं, न मानसिक, न आध्यात्मिक। × × × जब पैगंबर मुहम्मद ने ब्राह्मणों को चीरा और उसके मौन आचरण को नंगा किया तब सारे मुसलमानों को आश्चर्य हुआ कि काफिर में मोमिन किस प्रकार गुप्त था। जब शिव ने अपने हाथ से ईसा के शब्दों को परे फेंककर उसकी आत्मा के नंगे दर्शन कराए तो हिंदू चकित हो गए कि वह नग्न करने अथवा नग्न होनेवाला उनका कौन सा शिव था। 
मजदूरी और प्रेम
जब तक जीवन के अरण्य में पादरी, मौलवी, पंडित और साधुसंन्यासी हल, कुदाल और खुरपा लेकर मजदूरी न करेंगे, तब तक उनका मन और उनकी बुद्धि  अनंतकाल बीत जाने तक मलिन मानसिक जुआ खेलती रहेगी। उनका चिंतन बासी, उनका ध्यान बासी, उनकी पुस्तकें बासी, उनका विश्वास बासी और उनका खुदा भी बासी हो गया है। 
    2. बाबू गुलाबराय , इस कोटि के दूसरे लेखक हैं बाबू गुलाबराय एम. ए‑, एल-एल. बी.। उन्होंने विचारात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार के निबंध थोड़े बहुत लिखे हैं, जैसे , र्'कत्ताव्य संबंधी रोग, निदान और चिकित्सा', 'समाज औरर् कत्ताव्यपालन', 'फिर निराशा क्यों'। 'फिर निराशा क्यों' एक छोटी सी पुस्तक है जिसमें कई विषयों पर बहुत छोटे छोटे अभ्यासपूर्ण निबंध हैं। इन्हीं में से एक 'कुरूपता' भी है जिसका थोड़ा सा अंश नीचे दिया जाता है , 
सौंदर्य की उपासना करना उचित है सही, पर क्या उसी के साथ साथ कुरूपता घृणास्पद और निंद्य है? नहीं, सौंदर्य का अस्तित्व ही कुरूपता के ऊपर निर्भर है। सुंदर पदार्थ अपनी सुंदरता पर चाहे जितना मान करे, किंतु असुंदर पदार्थों की स्थिति में ही वह सुंदर कहलाता है। अंधाों में काना ही श्रेष्ठ समझा जाता है। 
सत्तासागर में दोनों की स्थिति है। दोनों ही एक तारतम्य में बँधो हुए हैं। दोनों ही एक दूसरे में परिणत होते रहते हैं। फिर कुरूपता घृणा का विषय क्यों? रूपहीन वस्तु से तभी तक घृणा है, जब तक हम अपनी आत्मा को संकुचित बनाए हुए बैठे हैं। सुंदर वस्तु को भी इसी कारण सुंदर कहते हैं कि उसमें हम अपने आदर्शों की झलक देखते हैं। आत्मा के सुविस्तृत और औदार्यपूर्ण हो जाने पर सुंदर और असुंदर दोनों ही समान प्रिय बन जाते हैं। कोई माता अपने पुत्र को कुरूपवान नहीं कहती। इसका यही कारण है कि वह अपने पुत्र में अपने आपको ही देखती है। जब हम सारे संसार में अपने आपको ही देखेंगे तब हमको कुरूपवान भी रूपवान दिखाई देगा। 
    अब निबंध का प्रसंग यहीं समाप्त किया जाता है। खेद है कि समास शैली पर ऐसे विचारात्मक निबंध लिखनेवाले, जिनमें बहुत ही चुस्त भाषा के भीतर एक पूरी अर्थपरंपरा कसी हो, अधिक लेखक हमें न मिले। 
समालोचना
समालोचना का उद्देश्य हमारे यहाँ गुण दोष विवेचन ही समझा जाता रहा है। संस्कृत साहित्य में समालोचना का पुराना ढंग यह था कि जब कोई आचार्य या साहित्यमीमांसक कोई नया लक्षणग्रंथ लिखता था तब जिन काव्य रचनाओं को वह उत्कृष्ट समझता था उन्हें रस, अलंकार आदि के उदाहरणों के रूप में उध्दृत करता था और जिन्हें पुष्ट समझता था उन्हें दोषों के उदाहरणों में देता था। फिर जिसे उसकी राय नापसंद होती थी वह उन्हीं उदाहरणों में से अच्छे ठहराए हुए पद्यों में दोष दिखाता था और बुरे ठहराए हुए पद्यों के दोष का परिहार करता था। 1 इसके अतिरिक्त जो दूसरा उद्देश्य समालोचना का होता है , अर्थात् कवियों की अलग अलग विशेषताओं का दिग्दर्शन , उसकी पूर्ति किसी कवि की स्तुति में दो एक श्लोकबद्ध  उक्तियाँ कहकर ही लोग संतोष मान लिया करते थे, जैसे , 
निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु।
प्रीति:  मधुरसांद्रासु  मंजरीष्वि  व  जायते
 
उपमा  कालिदासस्य,  भारवेरर्थगौरवम्।
नैषधो पदलालित्यं, माघे सन्ति त्रायो गुणा:
    किसी कवि या पुस्तक के गुण दोष या सूक्ष्म विशेषताएँ दिखाने के लिए एक दूसरी पुस्तक तैयार करने की चाल हमारे यहाँ न थी। योरप में इसकी चाल खूब चली। वहाँ समालोचना काव्यसिध्दांत निरूपण से स्वतंत्र एक विषय ही हो गया। केवल गुण दोष दिखानेवाले लेखों या पुस्तकों की धूम तो थोड़े ही दिनों रहती थी, पर किसी कवि की विशेषताओं का दिग्दर्शन करनेवाली, उसकी विचारधारा में डूबकर उसकी अंतर्वृत्तिायों की छानबीन करनेवाली पुस्तक, जिसमें गुण दोष का कथन भी आ जाता था, स्थायी साहित्य में स्थान पाती थी। समालोचना के दो प्रधान मार्ग होते हैं , निर्णयात्मक (जुडिशियल मेथड) और व्याख्यात्मक (इंडक्टिव क्रिटिसिज्म)। 2 निर्णयात्मक आलोचना किसी रचना के गुण दोष निरूपति करके उसका मूल्य निर्धारित करती है। उसमें लेखक या कवि की कहीं प्रशंसा होती है, कहीं निंदा। व्याख्यात्मक आलोचना किसी ग्रंथ में आई हुई बातों को एक व्यवस्थित रूप में सामने रखकर उनका अनेक प्रकार से स्पष्टीकरण करती है। यह मूल्य निर्धारित करने नहीं जाती। ऐसी आलोचना अपने शुद्ध  रूप में काव्यवस्तु तक ही परिमित होती है अर्थात् उसी के अंग प्रत्यंग की विशेषताओं को ढूँढ़ निकालने और भावों की व्यवच्छेदात्मक व्याख्या करने में तत्पर रहती है। पर इस व्याख्यात्मक समालोचना के अंतर्गत बहुत सी बाहरी बातों का भी विचार होता है, जैसे , सामाजिक, राजनीतिक, सांप्रदायिक परिस्थिति आदि का प्रभाव। ऐसी समीक्षा को 'ऐतिहासिक समीक्षा' (हिस्टॉरिकल क्रिटिसिज्म) कहते हैं। इसका उद्देश्य यह निर्दिष्ट करना होता है कि किसी रचना का उसी प्रकार की और रचनाओं से क्या संबंध है और उसका साहित्य की चली आती हुई परंपरा में क्या स्थान है। बाह्य पद्ध ति के अंतर्गत ही कवि के जीवनक्रम और स्वभाव आदि के अध्ययन द्वारा उसकी अंतर्वृत्तिायों का सूक्ष्म अनुसंधान भी है जिसे 'मनोवैज्ञानिक आलोचना' (साइकोलॉजिकल क्रिटिसिज्म) कहते हैं। इनके अतिरिक्त दर्शन, विज्ञान आदि की दृष्टि से समालोचना की और भी कई पद्ध तियाँ हैं और हो सकती हैं। इस प्रकार समालोचना के स्वरूप का विकास योरप में हुआ।
    केवल निर्णयात्मक समालोचना की चाल बहुत कुछ उठ गई है। अपनी भली बुरी रुचि के अनुसार कवियों की श्रेणी बाँधाना, उन्हें नंबर देना अब एक बेहूदा बात समझी जाती है। 3
    कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारे हिन्दी साहित्य में समालोचना पहले पहल केवल गुण दोष दर्शन के रूप में प्रकट हुई। लेखों के रूप में इसका सूत्रपात बाबू हरिश्चंद्र के समय में ही हुआ। लेख के रूप में पुस्तकों की विस्तृत समालोचना उपाधयाय पं. बदरीनारायण चौधारी ने अपनी 'आनंदकादंबिनी' में शुरू की। लाला श्रीनिवासदास के 'संयोगिता स्वयंवर' नाटक की बड़ी विशद और कड़ी आलोचना, जिसमें दोषों का उद्धाटन बड़ी बारीकी से किया गया था, उक्त पत्रिका में निकली थी। पर किसी ग्रंथकार के गुण अथवा दोष ही दिखलाने के लिए कोई पुस्तक भारतेंदु के समय में न निकली थी। इस प्रकार की पहली पुस्तक पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी की 'हिन्दी कालिदास की आलोचना' थी जो इस द्वितीय उत्थान के आरंभ में ही निकली। इसमें लाला सीताराम बी. ए. के अनुवाद किए हुए नाटकों के भाषा तथा भावसंबंधी दोष बड़े विस्तार से दिखाए गए हैं। यह अनुवादों की समालोचना थी, अत: भाषा की त्रुटियों और मूलभाव के विपर्यय आदि के आगे जा ही नहीं सकती थी। दूसरी बात यह कि इसमें दोषों का ही उल्लेख हो सका, गुण नहीं ढूँढ़े गए। 
    इसके उपरांत द्विवेदीजी ने कुछ संस्कृत कवियों को लेकर दूसरे ढंग की , अर्थात् विशेषता परिचायक , समीक्षाएँ भी निकालीं। इस प्रकार की पुस्तकों में 'विक्रमांकदेवचरित चर्चा' और 'नैषधाचरित चर्चा' मुख्य हैं। इसमें कुछ तो पंडित मंडली में प्रचलित रूढ़ि के अनुसार चुने हुए श्लोकों की खूबियों पर साधुवाद है (जैसे क्या उत्तम उत्प्रेक्षाहै!) और कुछ भिन्न भिन्न विद्वानों के मतों का संग्रह। इस प्रकार की पुस्तकों से संस्कृत न जाननेवाले हिन्दी पाठकों को दो तरह की जानकारी हासिल होती है , संस्कृत के किसी कवि की कविता किस ढंग की है, और वह पंडितों और विद्वानों के बीच कैसी समझी जाती है। द्विवेदीजी की तीसरी पुस्तक 'कालिदास की निरकुंशता' में भाषा और व्याकरण के वे व्यतिक्रम इकट्ठे किए गए हैं जिन्हें संस्कृत के विद्वान लोग कालिदास की कविता में बताया करते हैं। यह पुस्तक हिन्दी वालों के या संस्कृत वालों के फायदे के लिए लिखी गई, यह ठीक ठीक नहीं समझ पड़ता। जो हो, इन पुस्तकों को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए, स्वतंत्र समालोचना के रूप में नहीं।
    यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गंभीर साहित्यसमीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा आदि की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदीजी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध  और ऊटपटाँग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रुकती। उनके प्रभाव से लेखक सावधानहो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। 
    कवियों का बड़ा भारी इतिवृत्तसंग्रह (मिश्रबंधु विनोद) तैयार करने के पहले मिश्रबंधुओं ने 'हिन्दी नवरत्न' नामक समालोचनात्मक ग्रंथ निकाला था जिसमें सबसे बढ़कर नई बात यह थी कि 'देव' हिन्दी के सबसे बड़े कवि हैं। हिन्दी के पुराने कवियों को समालोचना के लिए सामने लाकर मिश्रबंधुओं ने बेशक जरूरी काम किया। उनकी बातें समालोचना कही जा सकती हैं या नहीं, यह दूसरी बात है। रीतिकाल के भीतर यह सूचित किया जा चुका है कि हिन्दी में साहित्यशास्त्र का वैसा निरूपण नहीं हुआ जैसा संस्कृत में हुआ है। हिन्दी के रीतिग्रंथों के अभ्यास से लक्षण, व्यंजना, रस आदि के वास्तविक स्वरूप की सम्यक्धाारणा नहीं हो सकती। कविता की समालोचना के लिए यह धारणा कितनी आवश्यक है, कहने की जरूरत नहीं। इसके अतिरिक्त उच्चकोटि की आधुनिक शैली की समालोचना के लिए विस्तृत अध्ययन, सूक्ष्म अन्वीक्षण बुद्धि  और मर्मग्राहिणी प्रज्ञा अपेक्षित है। 'कारो कृतहि न मानै' ऐसे ऐसे वाक्यों को लेकर यह राय जाहिर करना कि 'तुलसी कभी राम की निंदा नहीं करते, पर सूर ने दो-चार स्थानों पर कृष्ण के कामों की निंदा भी की है', साहित्यमर्मज्ञों के निकट क्या समझा जायगा?
    'सूरदास प्रभु वै अति खोटे', 'कारो कृतहि न मानै' ऐसे ऐसे वाक्यों पर साहित्यिक दृष्टि से जो थोड़ा भी ध्यान देगा, वह जान लेगा कि कृष्ण न तो वास्तव में खोटे कहे गए हैं, न कालेकलूटे कृतघ्न। पहला वाक्य सखी की विनोद या परिहास की उक्ति है, सरासर गाली नहीं है। सखी का यह विनोद हर्ष का ही एक स्वरूप है जो उस सखी का राधाकृष्ण के प्रति रतिभाव व्यंजित करता है। इसी प्रकार दूसरा वाक्य विरहाकुल गोपी का वचन है जिससे कुछ विनोदमिश्रित अमर्ष व्यंजित होता है। यह अमर्ष, यहाँ विप्रलंभ श्रृंगार में रतिभाव का ही व्यंजक है। इसी प्रकार कुछ 'दैन्य' भाव की उक्तियों को लेकर तुलसीदास जी खुशामदी कहे गए हैं। 'देव' को बिहारी से बड़ा सिद्ध  करने के लिए बिहारी में बिना दोष के दोष ढूँढे ग़ए हैं। 'संक्रोन' को 'संक्रांति' का (संक्रमण तक ध्यान कैसे जा सकता था?) अपभ्रंश समझ आप लोगों ने उसे बहुत बिगाड़ा हुआ शब्द माना है। 'रोज' शब्द 'रुलाई' के अर्थ में कबीर, जायसी आदि पुराने कवियों में न जाने कितनी जगह आया है और आगरे आदि के आसपास अब तक बोला जाता है; पर वह भी 'रोजा' समझा गया है। इसी प्रकार की बेसिर पैर की बातों से पुस्तक भरी है। कवियों की विशेषताओं के मार्मिक निरूपण की आशा में जो इसे खोलेगा, वह निराश ही होगा। 
    इसके उपरांत पं. पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी पर एक अच्छी आलोचनात्मक पुस्तक निकाली। इसमें उस साहित्य परंपरा का बहुत ही अच्छा उद्धाटन है जिसके अनुकरण पर बिहारी ने अपनी प्रसिद्ध  सतसई की रचना की। 'आर्यासप्तशती' और 'गाथासप्तशती' के बहुत से पद्यों के साथ बिहारी के दोहों का पूरा पूरा मेल दिखाकर शर्माजी ने बड़ी विद्वता के साथ एक चली आती हुई साहित्यिक परंपरा के बीच बिहारी को रखकर दिखाया। किसी चली आती हुई साहित्यिक परंपरा का उद्धाटन भी साहित्यसमीक्षक का एक भारीर् कत्ताव्य है। हिन्दी के दूसरे कवियों के मिलते जुलते पद्यों की बिहारी के दोहों के साथ तुलना करके शर्माजी ने तारतमिक आलोचना का शौक पैदा किया। इस पुस्तक में शर्माजी ने उन आक्षेपों का भी बहुत कुछ परिहार किया जो देव को ऊँचा सिद्ध  करने के लिए बिहारी पर किए गए थे। हो सकता है कि शर्माजी ने बहुत से स्थानों पर बिहारी का पक्षपात किया हो, पर उन्होंने जो कुछ किया है, वह एक अनूठे ढंग से किया है। उनके पक्षपात का भी साहित्यिक मूल्य है। 
    यहाँ पर यह बात सूचित कर देना आवश्यक है कि शर्माजी की यह समीक्षा भी रूढ़िगत (कन्वेंशनल) है। दूसरे श्रृंगारी  कवियों से अलग करनेवाली बिहारी की विशेषताओं के अन्वेषण और अंत:प्रवृत्तियों के उद्धाटन का , जो आधुनिक समालोचना का प्रधान लक्ष्य समझा जाता है , प्रयत्न इसमें नहीं हुआ। एक खटकने वाली बात है, बिना जरूरत के जगह जगह चुहलबाजी और शाबाशी का महफिली तर्ज। 
    शर्माजी की पुस्तक से दो बातें हुईं। एक तो 'देव बड़े कि बिहारी' यह भद्दा झगड़ा सामने आया। दूसरे 'तुलनात्मक समालोचना' के पीछे लोग बेतरह पड़े। 
    'देव और बिहारी' के झगड़े को लेकर पहली पुस्तक पं. कृष्णबिहारी मिश्र बी‑ए‑, एल‑ एल‑ बी‑ की मैदान में आई। इस पुस्तक में बड़ी शिष्टता, सभ्यता और मार्मिकता के साथ दोनों बड़े कवियों की भिन्न भिन्न रचनाओं का मिलान किया गया है। इसमें जो बातें कही गई हैं वे बहुत कुछ साहित्यिक विवेचन के साथ कही गई हैं, 'नवरत्न' की तरह यों ही नहीं कही गई हैं। वह पुरानी परिपाटी की साहित्य समीक्षा के भीतर अच्छा स्थान पाने के योग्य है। मिश्रबंधुओं की अपेक्षा पं. कृष्णबिहारीजी साहित्यिक आलोचना के कहीं अधिक अधिकारी कहे जा सकते हैं। 'देव और बिहारी' के उत्तर में लाला भगवानदीनजी ने 'बिहारी और देव' नाम की पुस्तक निकाली जिसमें उन्होंने मिश्रबंधुओं के भद्दे आक्षेपों का उचित शब्दों में जवाब देकर पं. कृष्णबिहारीजी की बातों पर भी पूरा विचार किया। अच्छा हुआ कि 'छोटे बड़े' के इस भद्दे झगड़े की ओर अधिक लोग आकर्षित नहीं हुए। 
    अब 'तुलनात्मक समालोचना' की बात लीजिए। उसकी ओर लोगों का कुछ आकर्षण देखते ही बहुतों ने 'तुलना' को ही समालोचना का चरम लक्ष्य समझ लिया और पत्रिकाओं में तथा इधर उधर भी लगे भिन्न भिन्न कवियों के पद्यों को लेकर मिलान करने। यहाँ तक कि जिन दो पद्यों में वास्तव में कोई भावसाम्य नहीं उनमें बादरायण संबंध स्थापित करके लोग इस 'तुलनात्मक समालोचना' के मैदान में उतरने का शौक जाहिर करने लगे। इसका असर कुछ समालोचकों पर भी पड़ा। पं. कृष्णबिहारी मिश्रजी ने जो 'मतिरामग्रंथावली' निकाली, उसकी भूमिका का आवश्यकता से अधिक अंश उन्होंने इस 'तुलनात्मक आलोचना' को ही अर्पित कर दिया, और बातों के लिए बहुत कम जगह रखी। 
    द्वितीय उत्थान के भीतर 'समालोचना' की यद्यपि बहुत कुछ उन्नति हुई पर उसका स्वरूप प्राय: रूढ़िगत (कन्वेंशनल) ही रहा। कवियों की विशेषताओं का अन्वेषण और उनकी अंत:प्रकृति की छानबीन करनेवाली उच्चकोटि की समालोचना का प्रारंभ तृतीय उत्थान में जाकर हुआ। 
संदर्भ
  1. साहित्यदर्पणकार ने श्रृंगाररस के उदाहरण में 'शून्य वासगृहं विलोक्य' यह श्लोक उध्दृत किया। रसगंगाधारकार ने इस श्लोक में अनेक दोष दिखलाए और उदाहरण में अपना बनाया श्लोक भिड़ाया। हिन्दी कवियों में श्रीपति ने दोषों के उदाहरण में केशवदास के पद रखे हैं।
  2. मेथड्स ऐंड मैटेरियल्स ऑव लिटरेरी क्रिटिसिज्म , गेले ऐंड स्काट।
  3. द रैकिंग ऑव राइटर्स इन ऑर्डर ऑव मेरिट हैज विकम आवसोलीट , द न्यू क्रिटिसिज्म वाई. जे. ई. स्पिन्गार्न (1911)।


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