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कविता

हिसाब-किताब
सुरजन परोही


पाप-पुण्य के
लेखा-जोखा में रत
उलझ जाते हैं -
दूसरों के हिसाब-किताब में
और इसी बीच
खुद बदल जाते हैं - लाश में
बगैर किसी
हिसाब-किताब के

 


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हिंदी समय में सुरजन परोही की रचनाएँ