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कविता

दास कबीर अकेला था
सुरजन परोही


जीवन के संघर्षों में, दास-कबीर अकेला था

हिंदू-मुस्लिम के बीच चलाई, साखी-तीरों की बोली बानी
मिथ्या-विश्वास हटाकर, निर्मल कर दिया गंगा का पानी
जीवन के सुख-दुख में, एक अनोखा खेल रचाया था
जीवन के संघर्षों में...

गुरुकुल से बाहर, ईश्वरीय विद्या का ज्ञान पाया था
बड़ों ने जब ठुकराया, छोटों को मिलकर अपनाया था
निगुर्नियाँ को भजने में जीवन-प्राण गँवाया था
जीवन के संघर्षों में...

अविद्या के घेरे में, सच्चाई की विद्या ही उनके पास रही
स्वामी ऋषि-मुनि न बना, भक्त दासों का ही दास रहा
साथ निभानेवाला संगी-साथी ही उनका चेला था
जीवन के संघर्षों में...

जीवन की अंतिम बेला में, स्वयं फूलों का हार बना
चिता, कब्र से ऊपर उठकर, सबके हृदय का हार हुआ
अंतिम बिदाई में वह आगे आगे, पीछे दुनिया का मेला था
जीवन के संघर्षों में...

 


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